Monday, August 29, 2011

पढ़िए तो क्या क्या लिक्खा है दरिया की पेशानी पर


आपको याद होगा पिछले महीने की पोस्ट में मैंने एक अत्यंत प्रतिभा शाली युवा शायर अखिलेश तिवारी जी का परिचय आप सब से करवाया था. उनकी ग़ज़ल को सुधि पाठकों ने बहुत पसंद भी किया था इसीलिए आज फिर एक बार आपको अखिलेश जी की एक बेहद खूबसूरत ग़ज़ल पढवाता हूँ. मुझे उम्मीद है आप इस होनहार शायर की हौंसला अफ़जाही जरूर करेंगे. उनका मोबाईल नंबर एक बार फिर नोट कर लें:- 9460434278


हँसना रोना पाना खोना मरना जीना पानी पर
पढ़िए तो क्या क्या लिक्खा है दरिया की पेशानी पर

मँहगाई है दाम मिलेंगे सोचा था हमने लेकिन
शर्मिंदा हो कर लौटे हैं ख़्वाबों की अर्ज़ानी पर
अर्ज़ानी : सस्ताई, मंदी

इस उजड़ेपन में भी कुछ तो नज्ज़ारों के लायक हैं
वर्ना जमघट क्यूँ उमड़ा रहता है इस वीरानी पर

रात जो आँखों में चमके जुगनू मैं उनका शाहिद हूँ
आप भले चर्चा करिए अब सूरज की ताबानी पर
ताबानी: गर्मी , ताकत

सुब्ह,सवेरा दफ्तर,बीवी,बच्चे,महफ़िल,नींदें,रात
यार किसी को मुश्किल भी होती है इस आसानी पर

उसकी सपनों वाली परियां मैं क्यूँ देख नहीं पाता
बच्चा हैराँ है मुझ पर मैं बच्चे की हैरानी पर

एक अछूता मंज़र मुझको छूकर गुज़रा था अब तो
पछताना है खुद में डूबे रहने की नादानी पर

हम फ़नकारों की फितरत से वाकिफ हो तुम तो 'अखिलेश'
मक्सद समझो रुक मत जाना बस लफ़्ज़ों के मानी पर


लीजिये अब देखिये अखिलेश जी को ग़ज़ल सुनाते हुए

46 comments:

Anupama Tripathi said...

एक अछूता मंज़र मुझको छूकर गुज़रा था अब तो
पछताना है खुद में डूबे रहने की नादानी पर
बहुत उम्दा ग़ज़ल....
बधाई अखिलेश जी ...और आभार नीरज जी ..इसे सभी तक पहुँचाने के लिए ...!!

Smart Indian said...

बहुत सुन्दर रचना. एक प्रतिभावान शायर से परिचय कराने का आभार!

सदा said...

उसकी सपनों वाली परियां मैं क्यूँ देख नहीं पाता
बच्चा हैराँ है मुझ पर मैं बच्चे की हैरानी पर

एक अछूता मंज़र मुझको छूकर गुज़रा था अब तो
पछताना है खुद में डूबे रहने की नादानी पर
हर पंक्ति लाजवाब ... अखिलेश जी की इस रचना प्रस्‍तुति के लिये आपका आभार ।

abhi said...

हर एक शेर लाजवाब है..

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत उम्दा गज़ल पढवाई है ..आभार

Anju (Anu) Chaudhary said...

उसकी सपनों वाली परियां मैं क्यूँ देख नहीं पाता
बच्चा हैराँ है मुझ पर मैं बच्चे की हैरानी पर........................
खो गई पढ़ते हुए

वाह बहुत खूब ...अखिलेश जी को पढना सच में अच्छा लगा ...

anu

अशोक सलूजा said...

हँसना रोना पाना खोना मरना जीना पानी पर
पढ़िए तो क्या क्या लिक्खा है दरिया की पेशानी पर

नीरज जी ,शुरुआत में ही आह:और वाह.. निकाल दी ...अखिलेश जी नें ...बधाई !

खुश और स्वस्थ रहें !
शुभकामनायें!

P.N. Subramanian said...

सुन्दर रचना. अखिलेश जी को जाना. आभार.

रविकर said...

बहुत-बहुत बधाई |

सुन्दर प्रस्तुति ||

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आज 29 - 08 - 2011 को आपकी पोस्ट की चर्चा यहाँ भी है .....


...आज के कुछ खास चिट्ठे ...आपकी नज़र .तेताला पर

अरुण चन्द्र रॉय said...

अखिलेश जी को पढना सच में अच्छा लगा .

रश्मि प्रभा... said...

wakai bahut badhiyaa

रेखा said...

बहुत ही उम्दा गजल है .अखिलेशजी जी से परिचय करने के लिए धन्यवाद

Dr (Miss) Sharad Singh said...

रात जो आँखों में चमके जुगनू मैं उनका शाहिद हूँ
आप भले चर्चा करिए अब सूरज की ताबानी पर .

बहुत उम्दा गज़ल ...

प्रवीण पाण्डेय said...

बेहतरीन भावाभिव्यक्ति। परिचय का आभार।

Anonymous said...

उसकी सपनों वाली परियां मैं क्यूँ देख नहीं पाता
बच्चा हैराँ है मुझ पर मैं बच्चे की हैरानी पर

सुभानाल्लाह.......दिल जीत लिए इस शेर ने.......वाह......वाह........कमाल

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है! यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

vandan gupta said...

कई बार तो निशब्द कर देते हैं………हर शेर ज़िन्दगी को झकझोर जाता है…………पढवाने के लिये हार्दिक आभार्।

नीरज गोस्वामी said...

Comment from Gurudev PRAN SHARMA JI received from ENGLAND:-

प्रिय नीरज जी ,
आपके ब्लॉग पर श्री अखिलेश की ग़ज़ल पढ़ी है.
अच्छी है . इसी ज़मीन पर कई साल पहले मेरी कही
ग़ज़ल भी है . मेरे ग़ज़ल संग्रह ` ग़ज़ल कहता हूँ ` में
है . पढ़िएगा . शायद पृष्ठ 41 पर है .
शुभ कामनाओं के साथ ,
प्राण शर्मा

prerna argal said...

शब्द विहीन करती हुई बहुत ही अच्छी गजल /सारे शेर ही लाजबाब हैं /इतने प्रतिवावान शायर की गजल पढवाने के लिए शुक्रिया आपका /बधाई आपको /




please visit my blog.
www.prernaargal.blogspot.com

Sunil Kumar said...

रात जो आँखों में चमके जुगनू मैं उनका शाहिद हूँ
आप भले चर्चा करिए अब सूरज की ताबानी पर
बहुत अच्छा ख्याल है , मुबारक हो

रजनीश तिवारी said...

बहुत अच्छी गजल...हर शेर लाजवाब है ...धन्यवाद !

Archana Chaoji said...

शुक्रिया....

नीरज गोस्वामी said...

Comment received on e-mail from Sh.Om Prakash Sapra Ji:-

neeraj ji
"dariya ki peshani pe"
it is a very novel and unique imagination
and also an experiment,
congrats to u and shri akhilesh tiwari ji.- a good gazal, of course.
regds.
-om sapra, delhi-9
9818180932

Rajeysha said...

सुब्ह,सवेरा दफ्तर,बीवी,बच्चे,महफ़िल,नींदें,रात
यार किसी को मुश्किल भी होती है इस आसानी पर
इसका बहुत बड़ा अर्थ है जी...
सुबह-सवेरा,दफ्तर,बीवी-बच्चे-महफ़िल,नींदें-रातें
यार बड़ी मुश्किल होती है मुझको इस आसानी पर
करोड़ो जि‍न्‍दगि‍यां यहीं खत्‍म हो जाती हैं, जन्‍म जन्‍म भर आदमी यही करता है, दुनि‍यां भर की समस्‍याएं पैदा करते हुए...उन्‍हें हल करते हुए..

Pawan Kumar said...

अखिलेश जी की ग़ज़लों को पढना सुनना दोनों अच्छा लगा...... ऐसे नायब हीरे को सामने लेन का आपको हार्दिक शुक्रिया......!!! प्रतीक्षा है अगले अंक की.....!!
बहुत नाज़ुक और बेशकीमती शेर लिखा है यह.....
उसकी सपनों वाली परियां मैं क्यूँ देख नहीं पाता
बच्चा हैराँ है मुझ पर मैं बच्चे की हैरानी पर
वाह वाह!!!!!

amrendra "amar" said...

एक अछूता मंज़र मुझको छूकर गुज़रा था अब तो
पछताना है खुद में डूबे रहने की नादानी पर

behtreen gajal , waah

ताऊ रामपुरिया said...

अति लाजवाब रचना, परिचय के लिये आभार.

रामराम

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

उसकी सपनों वाली परियां मैं क्यूँ देख नहीं पाता
बच्चा हैराँ है मुझ पर मैं बच्चे की हैरानी पर
कितनी मासूमियत से कहा गया बेहतरीन शेर...

एक अछूता मंज़र मुझको छूकर गुज़रा था अब तो
पछताना है खुद में डूबे रहने की नादानी पर

बहुत उम्दा, अखिलेश जी के साथ साथ नीरज जी आपको भी मुबारकबाद.

Kailash Sharma said...

लाज़वाब प्रस्तुति...परिचय करवाने के लिए आभार.

www.navincchaturvedi.blogspot.com said...

एक एक मिसरा नायाब है| ग़ज़ल पढ़ा तो पढ़ता ही चला गया| थेंक्यू सर जी अखिलेश भाई की एक और शानदार ग़ज़ल पढ़वाने के लिए|

Sunil Deepak said...

वाह नीरज जी, अखिलेश जी की इस गज़ल के लिए शुक्रिया

Apanatva said...

Akhilesh jee se parichay karvane ke liye dhanyvaad sabhee sher ek se bad kar ek hai.


http://www.youtube.com/watch?v=0vJD6TzsmA0&feature=related
ise link ko suniye aur circulate karne me madad kariye .
dhanyvaad .

नीरज गोस्वामी said...

Comment received on e-mail from famous shayar janab Aalam Khurshiid Saheb:

नीरज भाई !
अखिलेश जी की ग़ज़ल पसंद आई .
उन्होंने सलीके से ग़ज़ल कही है. मेरी ओर से उन्हें बधाई !
आलम खुरशीद

डॉ. मनोज मिश्र said...

एक अछूता मंज़र मुझको छूकर गुज़रा था अब तो
पछताना है खुद में डूबे रहने की नादानी पर
वाह,बेहतरीन ग़ज़ल..,आभार ..

Vandana Ramasingh said...

बहुत उम्दा गज़ल

Manoj K said...

बहुत ही बढ़िया गज़ल.. एक प्रतिभावन शायर से मिलवाने के लिए शुक्रिया !!

मनोज

Asha Joglekar said...

नीरज जी अखिलेश जी से परिचय करवाने का शुक्रिया ।
रात जो आँखों में चमके जुगनू मैं उनका शाहिद हूँ
आप भले चर्चा करिए अब सूरज की ताबानी पर

सुब्ह,सवेरा दफ्तर,बीवी,बच्चे,महफ़िल,नींदें,रात
यार किसी को मुश्किल भी होती है इस आसानी पर बहुत उम्दा ।

निवेदिता श्रीवास्तव said...

बहुत उम्दा ग़ज़ल....

Dr Varsha Singh said...

अखिलेश जी की बेहतरीन ग़ज़ल प्रस्तुत करने के लिए बहुत बहुत बधाई स्वीकार करें ।

kumar zahid said...

बिल्कुल नया अंदाज नयी बानगी नये तसव्वुर और सब कुछ सामयिक..ताज़ा और ताजगी से भरपूर
आपकी पारखी निगाह और पेशकस को सलाम


आपके कमेन्टेटर्स को देखकर लगा कि
काश जो आपके हैं वो मेरे भी होते। आपकी खूबसूरत दुनिया को भी सलाम

Shiv said...

सुब्ह,सवेरा दफ्तर,बीवी,बच्चे,महफ़िल,नींदें,रात
यार किसी को मुश्किल भी होती है इस आसानी पर

बहुत खूबसूरत ग़ज़ल. अखिलेश जी के बारे में पहले भी पढ़वाया है आपने. वो पोस्ट भी बढ़िया और ये ग़ज़ल भी.

Udan Tashtari said...

वाह वाह!! गज़ब...जरुर इनसे फोन पर चर्चा की जायेगी...आपका आभार.

नीरज गोस्वामी said...

Comment received from Sh.Prakash Singh Arsh on fb:-

हाँ आपके ब्लोग पर मैं गया था और जनाब अखीलेश साब की शाईरी खूब पढी.. बहुत अछा लिखते हैं...

नीरज गोस्वामी said...

Comment received from Mr. Ankit Joshi on fb:-


नीरज जी, आप की हर पोस्ट पढता हूँ, मगर वहां हाज़िरी दर्ज करने का समय नहीं मिल पता, केवल अच्छा लगा जैसी छोटी टिप्पणी करने से अच्छा, ख़ामोशी से पढ़ कर गुज़र जाने में समझता हूँ. ख़ुद मैंने कितने महीने से अपने ब्लॉग पे लिखने की फुर्सत नहीं निकाल पा रहा हूँ. अखिलेश जी की अभी वाली ग़ज़ल भी पढ़ चुका हूँ और पहले वाली भी पढ़ी हैं. बहुत अच्छा लिखते हैं."

दिगम्बर नासवा said...

अखिलेश जी की इस नायाब गज़ल को पढ़ के मज़ा आ गया ... दिल करता है ऐसे शायर का हाथ चूम लूं ... बहुत ही लाजवाब शेर हैं सभी ... आपका शुक्रिया नीरज जी इस तोहफे के लिए ...