Monday, January 8, 2018

किताबों की दुनिया -159

कल रात गुदगुदा गई यादों की उँगलियाँ
दिल पे मेरे वो भरती रही नर्म चुटकियाँ

झोंका हवा का आयेगा कर जायेगा उदास
इस डर से खोलते नहीं यादों की खिड़कियाँ

मैं सोचता हूँ तुझको ही सोचा करूँ मगर
इक शै पे कैसे ठहरें ख्यालों की तितलियाँ

जिगर साहब ने फ़रमाया था के शेर इतना आसान कहो कि सुनने वाला कहे के ये तो मैं भी कह सकता हूँ लेकिन जब कहने वाला कहने बैठे तो कह न पाये। ये बात हमारे आज के शायर डा. प्रेम भंडारी जी , जिनकी ग़ज़लों की किताब "खुशबू-रंग,सदा के संग" की हम बात करेंगे, पर पूरी तरह सच साबित होती है। प्रेम जी कोई एलोपैथी या होम्योपैथी के डाक्टर नहीं हैं, उन्होंने ये पदवी संगीत में पी.एच.डी करके प्राप्त की है.


 तुम समंदर ही सही मैं भी तो इक दरिया हूँ 
मेरी बाहों में किसी रोज़ सिमट कर देखो 

तुम अगर मेरी तरह मुझको परखना चाहो 
मेरे साये की तरह मुझसे लिपट कर देखो 

कौन है कैसा यहाँ जान सकोगे तुम भी 
जिस जगह तुम हो वहां से कभी हट कर देखो 

उदयपुर, राजस्थान में 23 सितम्बर 1949 को श्री दलपत सिंह भंडारी के पुत्र के रूप में श्री प्रेम भंडारी जी का जन्म हुआ। बचपन से ही उनका रुझान संगीत की और था। उनके इस शौक को हवा दी उनकी माता श्रीमती दरियाव बाई कंवर जी ने। उन्होंने ही प्रेम जी को सब्र के सबक के साथ सबका शुक्रिया अदा करना और किसी से शिकायत नहीं करना भी सिखाया। प्रेम जी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा कंवरपाड़ा हायर सेकेंडरी स्कूल से पूरी की। संगीत से अगाध प्रेम होने की वजह से उन्होंने 1976 में संगीत से एम.ए किया और ग़ज़ल गायकी विषय पर 1991 में पी.एच.डी। "हिंदुस्तानी संगीत में ग़ज़ल गायकी " विषय पर प्रकाशित किया गया उनका शोध ग्रंथ देश विदेश के सभी संगीत एवं ग़ज़ल के उस्तादों द्वारा खूब सराहा गया। आज भी इसे इस विषय के सन्दर्भ ग्रंथ के रूप में ख्याति प्राप्त है।

ठीक से जाना, जल्दी आना, याद भी करना, भूल न जाना 
रुख़्सत करते वक़्त वो भीगी आँख से क्या-क्या कहती है 

आओ इक दूजे से होकर दूर ज़रा हम भी देखें 
रूहों को नज़दीक, सुना है जिस्म की दूरी करती है 

सोच-विचार तज़र्बा तो हर चीज़ में नुक्स निकलेगा 
बच्चे बन कर देखो हर शै कितनी अच्छी लगती है 

लगभग 15-16 की उम्र से ही प्रेम जी ने अपनी ग़ज़ल गायकी को सार्वजानिक मंचो से पेश करना शुरू कर दिया था। दूसरों की ग़ज़लों को गाते गाते वो अपने ख्यालों को भी सुर में ढालने लगे, इस कोशिश को लोगों ने बहुत सराहा। लोगों से मिले प्रोत्साहन के बाद से प्रेम जी ने शायरी को गंभीरता से लेना शुरू किया। सबसे पहले उन्होंने जनाब खुर्शीद नवाब साहब से उर्दू सीखनी शुरू की। खुर्शीद साहब ने शुरू के शेरों को सुनकर उनकी हौसला अफ़ज़ाई भी की। जैसे जैसे प्रेम जी का लेखन आगे बढ़ा उनको उस्ताद शायरों की रहनुमाई भी हासिल होने लगी जिनमें जनाब कैफ़ भोपाली और जनाब जमील कुरैशी का नाम प्रमुख है।

इश्क ने आँख से अश्कों की रवानी लेली 
जो समंदर थे कभी दश्त के मंज़र निकले 

था निगाहों का वो धोका के ख़ता मेरी थी 
फूल समझे थे जिन्हें बरता तो पत्थर निकले 

ख़ौफ़ ये था कि कहीं ज़िन्दगी पहचान न ले 
आख़री वक़्त में जो मुंह को छुपा कर निकले 

ग़ज़ल गायकी में डॉक्टरेट करने के दौरान ही प्रेमजी की ग़ज़लों का पहला मजमुआ सन 1990 में "झील किनारे तनहा चाँद " मन्ज़रे आम पर आ गया। ग़ज़ल के इस मजमूए ने धूम मचा दी और उन्हें बेहतरीन गायक के साथ साथ लाजवाब शायर भी कहा जाने लगा। इस मजमूए को डा.जमील जलिबी, बलराज कोमल, शहाब सरमदी , डा. गोपी चंद नारंग ,वाली आसी, कैसर-उल-जाफ़री ,डा.मुख़्तार शमीम और नौशाद अली जैसे अदीबों ने जी भर के सराहा। इस सराहना से प्रेम जी के ग़ज़ल लेखन का सिलसिला जोर पकड़ गया नतीजतन सन 2003 में उनकी ग़ज़लों का दूसरा मजमुआ मन्ज़रे आम पर आ गया , आज हम उसी मजमुए की ही तो बात कर रहे हैं।

इक उम्र अपने आप में, मैं देवता रहा 
मेरा ग़रूर टूटा तो इंसान हो गया

ऐसा समा गया है वो मेरे वजूद में 
यूँ लग रहा है उसकी मैं पहचान हो गया 

जिस्मों की आग के परे इक आग और है 
तुझसे मिला तो सोच के हैरान हो गया

प्रेम साहब ने ग़ज़ल गायकी और लेखन के साथ साथ सुखाड़िया विश्वविद्यालय में बरसों अध्यापन के बाद वहां के संगीत विभाग के अध्यक्ष के पद पर कार्य किया है 2009 में सेवा निवृत होने के बावजूद उनमें सीखने और सिखाने का ज़ज़्बा ज्यूँ का त्यूं है। उनके बहुत से शिष्यों ने गायकी के क्षेत्र में बहुत मकबूलियत हासिल की है। संगीत में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें मेवाड़ फिल्म अकेडमी द्वारा "किंग ऑफ़ ग़ज़ल " के ख़िताब से सन 1984 में नवाज़ गया था इसके अलावा 1994 में राजस्थान उर्दू अकेडमी द्वारा , 2001 में मीरा संगीत सुधाकर सम्मान ,2002 में 'संगीत राज " सम्मान, 2002 में ही तैमूर सोसाइटी द्वारा ग़ालिब अवार्ड और 2004 में कलकत्ता में 'सुर नंदन अवार्ड " से सम्मानित किया जा चुका का है।

सच का ज़हर लबों से उगलना पड़ा मुझे
फिर यूँ हुआ सलीब पर चढ़ना पड़ा मुझे 

शंकर बना के लोग मुझे पूजते रहे 
मजबूरियों में ज़हर निगलना पड़ा मुझे 

मैं वो चराग़ हूँ के अँधेरे ज़हान में 
शब् की कहूँ क्या दिनमें भी जलना पड़ा मुझे

यूँ तो ग़ज़ल गायकी के लिए भारत और पाकिस्तान में एक से बढ़ कर एक नामवर गायक हुए हैं जिनमें मेहदी हसन ,गुलाम अली ,जगजीत सिंह आदि बहुत प्रसिद्ध हैं लेकिन प्रेम जी इन सब से अलग हैं क्यूंकि वो सिर्फ ग़ज़ल गायक ही नहीं हैं बल्कि एक मकबूल शायर भी हैं उन्होंने दूसरों की शायरी के साथ साथ अपनी शायरी को भी सुरों में ढाला है। वो सार्वजिनक मंचो पर कभी एक गायक तो कभी एक शायर की हैसियत से शिरकत करते हैं। भारत के अलावा विदेशों में भी उनकी शायरी और गायन के प्रशंसकों की कमी नहीं है।

दिल से दिल की बात हुई तो होंठों से क्या कहना है 
काग़ज़ पर होठों को रख दें फिर खत में क्या लिखना है 

पतझड़ के आते ही सारे साथी उनसे रूठ गए 
अगली रुत तक अब पेड़ों को तनहा तनहा रहना है 

कभी कभी बरतन टकराएं घर में अच्छा लगता है 
मुझको इससे ज्यादा तुझसे और नहीं कुछ कहना है 

एक ज़माना था जब कितने ज़ेवर पहने रहती थी 
मोती जैसा इक आंसू ही अब आँखों का गहना है 

मृदु भाषी ,मिलनसार आत्म प्रशंसा से दूर और हमेशा दूसरों की सहायताकरने को तत्पर प्रेम जी की शायरी पढ़ते हुए अब आपको भी जिगर साहब की उस बात से इत्तेफ़ाक़ हो गया होगा जिसका जिक्र मैंने शुरू में किया था। उनकी किताब का हर शेर निहायत सादगी से कहा गया है इसीलिए सीधा दिल पे असर करता है और ये ही उनकी मकबूलियत का कारण भी है। प्रेम जी के संगीत निर्देशन में उनकी ग़ज़ल को जगजीत सिंह साहब ने गाया है और ये बात किसी भी लिहाज़ से छोटी नहीं है। उनकी शायरी की जुबान ख़ालिस हिंदुस्तानी जुबान है इसलिए हिंदी और उर्दू जानने वालों को समान रूप से पसंद आती है। ग़ज़ल और ग़ज़ल गायन प्रेम जी की ज़िन्दगी का अहम् हिस्सा है।

काँटों की तासीर लिए क्यों 
फूलों जैसे लोग मिले थे

 प्यास बुझाना खेल नहीं था 
यूँ तो दरिया पाँव तले थे

शाम हुई तो सूरज सोचे 
सारा दिन बेकार जले थे 

इस किताब की सभी 115 ग़ज़लें हिंदी और उर्दू दोनों लिपियों में प्रकाशित की गयी हैं। ऐसा नहीं है कि एक पृष्ठ पर हिंदी में ग़ज़ल छपी हो और उसके सामने वाले पृष्ठ पर उर्दू में बल्कि सभी हिंदी की ग़ज़लें एक साथ और उर्दू की भी एक साथ छपी हैं जैसे किसी ने उर्दू और हिंदी में छपी अलग अलग किताबों को एक जिल्द में बांध दिया हो। इस किताब को पश्चिमी क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र उदयपुर एवं तामीर सोसाइटी उदयपुर द्वारा प्रकाशित किया गया हैहालाँकि उर्दू में पढ़ने वाले इसका इ-बुक संस्करण रेख़्ता की साइट पर ऑन लाइन पढ़ सकते हैं। ग़ज़लें और फुटकर शेर भी रेख़्ता की साइट पर उपलब्ध हैं.

 साँस मेरी जब अंदर से बाहर की जानिब आती है 
 और तो क्या कुछ उम्र का हिस्सा साथ में लेकर जाती है

जैसा भी हो अपना घर तो अपना घर ही होता है 
औरों के बिस्तर पे यूँ भी नींद कहाँ आ पाती है 

बचपन झरना ,नदी जवानी, सागर जैसी उम्र पकी 
एक समय के बाद ये सच है गहराई आ जाती है 

इस किताब की प्राप्ति जो रास्ता मुझे मालूम है वो एक ही है कि आप प्रेम भंडारी जी को उनकी खूबसूरत ग़ज़लों के लिए बधाई देते हुए उनके मोबाईल न 9414158358 पर बात करें और किताब प्राप्ति का रास्ता पूछें। मुझे तो ये किताब भाई विकास गुप्ता जी के माध्यम से मिली जो इंटरनेट पर उर्दू की सबसे बड़ी साइट "रेख़्ता" के आफिस में काम करते हैं और उर्दू शायरी से बेहद मोहब्बत करते हैं।
आपसे विदा लेने से पहले पढ़िए प्रेम जी की एक छोटी बहर की ग़ज़ल के ये शेर :

क्या हासिल है शम्मा जला कर 
परवाने को राख बना कर 

मैं तो सब कुछ भूल चूका हूँ 
तू भूले तो बात बराबर 

दीवारों की तन्हाई को
दूर करूँ तस्वीर लगा कर

5 comments:

Amit Thapa said...

ग़ज़ल के साथ जुड़े हुए बड़े बड़े शब्दों (रदीफ़,काफिया, बहर) ने एक तरह से शायद ग़ज़ल का नुकसान ही ज्यादा किया है, मेरे जैसे एक साधारण सुनने वाले के लिए इन शब्दों से हटकर ग़ज़ल में ज्यादा जरुरी ये है की किसी भी ग़ज़ल में किस तरह के हर्फ़ रखे गये है, ग़ज़ल के अरूज़ की ज्यादा समझ ना होते हुए सिर्फ इतना कह सकता हूँ की ग़ज़ल वो ही अच्छी होती है जो एक आम इन्सान भी समझ सके, इसलिए ही ग़ालिब भले ही कितने बड़े शायर हुए पर उनके भी वो ही अश’आर आज तक जिंदा रह सके जो उन्होंने बहुत ही साधारण शब्दों में लिखे

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले


और शायद डॉ. प्रेम भंडारी जी की ग़ज़लों में खासियत है की उन्होंने बहुत ही आसान शब्दों का प्रयोग करते हुए बड़ी बात कह दी है जो की आसानी से मुझ से साधारण पढने सुनने वाले को भी समझ आ सके और गर आपको रदीफ़, काफिया, बहर की परिभाषा आपको समझ आती है तो ये ग़ज़ल आपको आसानी से उसका उदहारण के तौर पे समझा सकती है

कल रात गुदगुदा गई यादों की उँगलियाँ
दिल पे मेरे वो भरती रही नर्म चुटकियाँ

झोंका हवा का आयेगा कर जायेगा उदास
इस डर से खोलते नहीं यादों की खिड़कियाँ

मैं सोचता हूँ तुझको ही सोचा करूँ मगर
इक शै पे कैसे ठहरें ख्यालों की तितलियाँ

ये बात दीगर है की वो ग़ज़ल कहने के साथ ही साथ ग़ज़ल गायक भी है

तुम समंदर ही सही मैं भी तो इक दरिया हूँ
मेरी बाहों में किसी रोज़ सिमट कर देखो

तुम अगर मेरी तरह मुझको परखना चाहो
मेरे साये की तरह मुझसे लिपट कर देखो

कौन है कैसा यहाँ जान सकोगे तुम भी
जिस जगह तुम हो वहां से कभी हट कर देखो

किसी इंसान को समझने के लिए एक उम्र कम है और ये ग़ज़ल इस बात को चरितार्थ करती है


इक उम्र अपने आप में, मैं देवता रहा
मेरा ग़रूर टूटा तो इंसान हो गया

अब इस शेर की क्या तारीफ की जाए बस इतना ही काफी है काश हम सब इंसान हो जाये तो ये दुनिया खूबसूरत हो जाये

सच का ज़हर लबों से उगलना पड़ा मुझे
फिर यूँ हुआ सलीब पर चढ़ना पड़ा मुझे

सच कहना कितना मुश्किल है, सच वास्तव में कड़वा हो होता है


खैर, नीरज जी का एक बार फिर से शुक्रिया अदा करते हुए उन्हें उनकी नयी किताब '५१ क़िताबे ग़ज़ल की' के विमोचन पे बधाई

संजय भास्‍कर said...

ग़ज़ल की प्रस्तुति के बाद ....शब्दों को अर्थ के समझ कर ...एक बेहतरीन ग़ज़ल पढने को मिली
मैं तो सब कुछ भूल चूका हूँ
तू भूले तो बात बराबर

mgtapish said...

Kya kahne ek aur shair ko padhne Jan ne ka sukhd ehsaas badhai ake lekhan ko
Naman

arun prakash said...

उम्दा शायरी और गजल गायन भी ईश्वर कृपा है
यू ट्यूब पर ढूंढते है इनकी गजलों को
सभी शेर एक से बढ़ कर एक है

शंकर बना कर पूजते रहे है लोग
के अशआर बहुत अच्छा लगा

Navin C. Chaturvedi said...

Waah kya baat hai