Monday, June 5, 2017

किताबों की दुनिया - 128/2

जॉन एलिया साहब से एक बार जब किसी ने पूछा कि आप इतने बरसों से शायरी कर रहे हैं लेकिन आपका कोई मज्मूआ अब तक शाया क्यों नहीं हुआ तो उन्होंने फ़रमाया :- “अपनी शायरी का जितना मुंकिर* मैं हूं, उतना मुंकिर मेरा कोई बदतरीन दुश्मन भी न होगा. कभी कभी तो मुझे अपनी शायरी. बुरी, बेतुकी, लगती है इसलिए अब तक मेरा कोई मज्मूआ शाये नहीं हुआ और जब तक खुदा ही शाये नहीं कराएगा. उस वक्त तक शाये होगा भी नहीं.’ *मुंकिर: खारिज करने वाला”
जॉन साहब की ये बुरी और बेतुकी शायरी शाया होने के बाद किस क़दर हंगामा बरपा देगी अगर इस का जरा सा भी गुमाँ उन्हें होता तो शायद उनकी सभी किताबें उनके जीते जी ही शाया हो गयी होतीं।

रूठा था तुझसे यानी ख़ुद अपनी ख़ुशी से मैं 
फिर उसके बाद जान न रूठा किसी से मैं 

बाँहों से मेरी वो अभी रुखसत नहीं हुआ 
पर गुम हूँ इंतेज़ार में उसके अभी से मैं 

दम भर तिरी हवस से नहीं है मुझे क़रार 
हलकान हो गया हूँ तेरी दिल-कशी से मैं 

इस तौर से हुआ था जुदा अपनी जान से 
जैसे भुला सकूंगा उसे आज ही से मैं 

जरा सोचिये ऐसे लाजवाब अशआर बिना पाठकों तक पहुंचे रद्दी के भाव बाज़ार में बिक गए होते अगर ख़ालिद अहमद अन्सारी साहब उन्हें सहेज कर किताबों की शक्ल नहीं देते। सुना है की उनके अशआर लोगों ने चुराने शुरू कर दिए थे बहुत मुमकिन है कि उनकी शायरी का अहम् तो नहीं पर थोड़ा बहुत हिस्सा ऐसे उठाईगिरों की कैद में अब भी पड़ा हो।

जीत के मुझको खुश मत होना, मैं तो इक पछतावा हूँ 
खोऊँगा, कुढ़ता ही रहूँगा , पाऊंगा , पछताऊंगा 

एह्दे-रफ़ाक़त ठीक है लेकिन मुझको ऐसा लगता है 
तुम तो मेरे साथ रहोगी , मैं तनहा रह जाऊँगा 
एह्दे-रफ़ाक़त =दोस्ती का वादा 

शाम को अक्सर बैठे बैठे, दिल कुछ डूबने लगता है 
तुम मुझको इतना मत चाहो , मैं शायद मर जाऊँगा 

एनीबुक प्रकाशन ने जॉन साहब का 'गुमान ' के बाद एक साल के अंदर ही दूसरा शेरी मज़्मूआ 'लेंकिन' जिस की बात हम अभी कर रहे हैं को जिस सादगी और ख़ूबसूरती से शाया किया है उसकी जितनी तारीफ़ की जाय कम होगी। एक नए प्रकाशक के लिए एक शायरी की किताब छापना वो भी जॉन एलिया जैसे की ,बहुत बड़ी बात है। हिंदी के बड़े से बड़े प्रकाशक भी ये काम नहीं कर पाए जो इस नए प्रकाशक ने कर दिखाया है।


अभी इक शोर सा उठा है कहीं 
कोई खामोश हो गया है कहीं 

तुझको क्या हो गया कि चीजों को 
कहीं रखता है ढूंढता है कहीं 

तू मुझे ढूंढ मैं तुझे ढूंढूं 
कोई हम में से रह गया है कहीं 

इसी कमरे से कोई हो के विदाअ 
इसी कमरे में छुप गया है कहीं

'गुमान' या 'लेकिन' पढ़ते वक्त इस बात का एहसास होता है कि जॉन साहब का अपनी बात को कहने का सबसे जुदा अपना एक अलग अंदाज़ था ,उनकी शायरी चौंकाने वाली और एक दम नयी थी। कहना होगा कि वो ओरिजिनल शायर थे जिन्होंने किसी और की बनाई राह पर चलने से गुरेज किया और अपनी ज़मीने ईज़ाद कीं। आज तो बहुत से शायर उनकी नक़ल करते हुए मिल जायेंगे लेकिन उस वक्त ऐसी शायरी करने वाला उनके अलावा कोई दूसरा नहीं था जो मंज़र से ज्यादा पसमंज़र पर निगाहें रखते हुए शायरी करे।उनकी शायरी की जुबान भी बिलकुल अलग थी।

इक तरफ दिल है इक तरफ दुनिया 
ये कहानी बहुत पुरानी है 

क्या बताऊँ मैं अपना पासे -अना 
मैंने हंस हंस के हार मानी है 
पासे -अना =स्वाभिमान की रक्षा 

रोजमर्रा है ज़िन्दगी का अजीब 
रात है और नींद आनी है 

ज़िन्दगी किस तरह गुज़ारूं मैं 
मुझको रोज़ी नहीं कमानी है 

आज सोशल मिडिया पर उनके मुशायरे के ढेरों विडिओ रोज दिखाई देते हैं , लोग उनकी अनोखी अदाओं लम्बी जुल्फों, बात चीत के अंदाज़ की चर्चा तो करते नज़र आते हैं लेकिन उनकी शायरी की जितनी होनी चाहिए उतनी चर्चा नहीं हो रही जो कि होनी चाहिए.. वो अकेले ऐसे शायर हैं जिसे किसी ढांचे में फिट नहीं किया जा सकता। वो जिस बात को कबूल कर रहे हैं उसे ही तुरंत नकारते भी नज़र आजायेंगे बशर्ते की कोई बात उनकी पहले से कबूल की गयी बात से बेहतर हो। जॉन साहब की शायरी प्याज की परतों की तरह है जिसे अभी पूरी तरह से खोला नहीं गया है।

मुझे याँ किसी पे भरोसा नहीं 
मैं अपनी निगाहों से छुप कर छुपा 

पहुँच मुख़बिरों की सुख़न तक कहाँ 
सो मैं अपने होटों पे अक्सर छुपा 

मिरि सुन ! न रख अपने पहलु में दिल 
इसे तू किसी और के घर छुपा 

यहाँ तेरे अंदर नहीं मेरी खैर 
मिरि जां ! मुझे मेरे अंदर छुपा 

'लेक़िन' में शाया हुई ग़ज़लों में से कौनसे शेर चुनूं कौनसे छोडूं की उधेड़बुन में बहुत दिन लगा रहा आखिर हुआ ये कि अचानक पलटते हुए जिस पन्ने पर ऊँगली रखी उसी पर छपी ग़ज़ल से कुछ शेर उठा लिए और आपको पेश कर दिए - आखिर खज़ाना भी कहीं चुना जाता है ? जहाँ हाथ डालेंगे खरे सोने की खनखनाती अशर्फियाँ ही हाथ आएँगी , यकीन न हो तो अमेज़न से ऑन लाइन या फिर एनीबुक से 'लेकिन' मंगवाएं -जिसका पता मैंने अपनी पिछली पोस्ट में आपको दिया ही था - और खुद देख लें।

बोल रे जी अब साजन जी का मुखड़ा है किस दर्पण का 
मैं जो टूटा , मैं जो बिखरा , मैं था दर्पण साजन का

मुझको मेरे सारे खिलौने लाके दो मैं क्या जानूँ 
कैसी जवानी, किसकी जवानी , मैं हूँ अपने बचपन का 

उस जोगन के रूप हज़ारों , उनमें से एक रूप है तू 
जब से मैंने जोग लिया है जोगी हूँ उस जोगन का

'गुमान ' और 'लेकिन ' के बाद बात करते हैं उनकी तीसरी किताब की जो हाल में ही में " मैं जो हूँ जॉन एलिया हूँ" शीर्षक से प्रकाशित हुई है । वाणी प्रकाशन की इस पेपरबैक किताब में डा कुमार विश्वास ने जॉन साहब की कुछ चर्चित अधिकतर छोटी बहर की ग़ज़लों को संकलित किया है। जॉन साहब की शायरी को पूरी तरह तो नहीं लेकिन आंशिक रूप में जानने के लिहाज़ से इस किताब को पढ़ा जा सकता है।



तो क्या सचमुच जुदाई मुझसे कर ली 
तो खुद अपने को आधा कर लिया क्या 

बहुत नज़दीक आती जा रही हो 
बिछड़ने का इरादा कर लिया क्या 

वाणी प्रकाशन की ये किताब आपकी जॉन एलिया को पढ़ने की प्यास भड़का जरूर सकती है लेकिन बुझा नहीं सकती। कुमार साहब ने जॉन साहब की लगभग 140 ग़ज़लें इसमें संकलित की हैं जो पढ़ने वाले को अपने साथ बहा ले जाती हैं , उन्होंने ध्यान रखा है कि जॉन साहब के अपेक्षाकृत सरल अशआर हिंदी पाठकों को परोसे जाएँ

जो गुज़ारी न जा सकी हम से 
हमने वो ज़िन्दगी गुज़ारी है 

बिन तुम्हारे कभी नहीं आयी
क्या मिरि नींद भी तुम्हारी है 

आप में कैसे आऊं मैं तुझ बिन 
सांस जो चल रही है,आरी है 

 जॉन साहब दरअसल एक ऐसी दुनिया का खवाब देखते रहे जहाँ धर्म की दीवारें न हों भाईचारा हो अमन चैन हो ईमानदारी हो सच्चाई हो और जब ऐसी दुनिया उन्हें नहीं मिली तो वे टूट गए खुद को शराब में डुबो कर बर्बादी की कगार पर ले आये और इस दुनिया ऐ फानी से रुखसत हो गए। उनकी शायरी में उदासी झल्लाहट गुस्सा साफ़ देखा जा सकता है।अपनी बात कहने में वो किसी से कभी नहीं डरे और जो कहा किसी परवाह के बिंदास कहा

धरम की बांसुरी से राग निकले 
वो सूराखों से काले नाग निकले 

खुदा से ले लिया जन्नत का वादा 
ये जाहिद तो बड़े ही घाघ निकले 

है आखिर आदमियत भी कोई शै 
तिरे दरबान तो बुलडाग निकले 

कुमार विश्वास किताब की भूमिका में लिखते हैं कि " बिरला होने के लिए आपमें शब्दों को निभाने की न्यूनतम योग्यता होनी चाहिए , एक स्वाभिमान चाहिए , एक खुदरंग तबियत चाहिए और इस बात की सलाहियत चाहिए कि अपनी शायरी को आम आदमी से कैसे स्वीकार करवाना है। यही जॉन हैं। जॉन बिरले हैं। " बिरले ही हैं तभी तो ऐसे बिरले शेर कहें हैं उन्होंने

सोचता हूँ कि उसकी याद आखिर 
अब किसे रात भर जगाती है 

क्या सितम है कि अब तिरि सूरत 
ग़ौर करने पे याद आती है 

कौन इस घर की देखभाल करे 
रोज़ इक चीज़ टूट जाती है 

हज़ारों शेर हैं जॉन साहब के जो लोगों के दिल में धड़कते हैं किस किस शेर की बात की जाय मेरी इस पोस्ट की एक सीमा है और जॉन साहब के शेरों की कोई सीमा नहीं एक कोट करो तो लगता है अरे इसे तो जरूर पढ़वाना चाहिए था क्या करें ? आप ऐसा करें इस किताब को वाणी प्रकाशन या फिर अमेज़न से ऑन लाइन मंगवा ही लें ,मेरे भरोसे जॉन साहब को पढ़ना ठीक नहीं। आपसे विदा लेने से पहले उनका एक शेर पढ़वाता चलता हूँ जो मुझे बहुत पसंद है , शायद आपको भी पसंद आये , अपनी तरह का अकेला बिरला लाजवाब बेमिसाल सच्चा शेर
 :-
कितनी दिलकश हो तुम कितना दिल जू हूँ मैं 
क्या सितम है कि हम लोग मर जाएंगे 
 जू :सुन्दर

6 comments:

शारदा अरोरा said...

bahut sundar shayari...durlabh

Amit Thapa said...

जॉन साहब को थोड़ा बहुत पढ़ा है और यूट्यूब के माध्यम से सुना भी है पर जो मज़ा आपके शब्दो के साथ उन्हें समझने में आया है वो अलग ही है

तबियत से फक्कड़ पर मिज़ाज़ का अमीर शायर जो मन मे है वो ही जुबाँ पे
उनका हर हर्फ़ अपने आप मे ना जाने कितना कुछ कह जाता है

आशा है कि आप ऐसे ही हमे अपने शब्दों के साथ हमारा और भी किताबो से तारूफ़ कराते रहेंगे

शुक्रिया

अमित थापा

सु-मन (Suman Kapoor) said...

बहुत बढ़िया

सुशील कुमार जोशी said...

बहुत सुन्दर ब्लॉग।

Kavita Rawat said...

तुझको क्या हो गया कि चीजों को
कहीं रखता है ढूंढता है कहीं

तू मुझे ढूंढ मैं तुझे ढूंढूं
कोई हम में से रह गया है कहीं

कुमार दुर्गेश said...

सर जॉन साहब पागलपन की सारी हदों के बाद की शायरी करते थे जहां तक पहुँच पाना तकरीबन असम्भव हैं, यही उनकी खासियत हैं यही उनका तरीका भी और इसी लिए हम जॉन से इतनी मुहब्बत करते हैं !

जॉन एलिया सा'ब ज़िन्दाबाद