Monday, October 16, 2017

किताबों की दुनिया -147

दूर से इक परछाईं देखी अपने से मिलती-जुलती
पास से अपने चेहरे में भी और कोई चेहरा देखा

सोना लेने जब निकले तो हर-हर ढेर में मिटटी थी
जब मिटटी की खोज में निकले सोना ही सोना देखा

रात वही फिर बात हुई ना हम को नींद नहीं आयी
अपनी रूह के सन्नाटे से शोर सा इक उठता देखा

हिंदी पाठकों ने नासिर काज़मी और इब्ने इंशा का नाम जरूर सुना होगा जिन्होंने ग़ज़ल को ऐसी लय दी जिसे नई ग़ज़ल का नाम दिया जाता है लेकिन शायद अधिकांश ने जनाब खलीलुर्रहमान आज़मी साहब का नाम नहीं सुना होगा जिनका नाम भी उन दोनों शायरों के साथ ही लिया जाता है। आज़मी साहब को सन 1950 के बाद लिखी जाने वाली ग़ज़ल का इमाम कहा जाता है। आज हम उनकी किताब "ज़ंज़ीर आंसुओं की " की बात करेंगे जिसे सन 2010 में वाणी प्रकाशन ने प्रकाशित किया था।



न जाने किसकी हमें उम्र भर तलाश रही 
जिसे करीब से देखा वो दूसरा निकला 

हमें तो रास न आयी किसी की महफ़िल भी 
कोई खुदा कोई हमसायए-खुदा निकला
हमसायए-खुदा=खुदा का पड़ौसी 

हमारे पास से गुज़री थी एक परछाईं 
पुकारा हमने तो सदियों का फासला निकला 

खलीलुर्रहमान आज़मी 9 अगस्त 1927 को जिला आज़मगढ़ के एक गाँव सीधा सुल्तानपुर के एक मध्यमवर्गीय परिवार में पैदा हुए। उनके पिता मोहम्मद शफ़ी बहुत धार्मिक प्रवृति के इंसान थे। प्रारम्भिक शिक्षा शिब्ली नेशनल हाई स्कूल से हासिल करने के बाद वह 1945 में अलीगढ आये ,1948 में बी.ऐ और उर्दू में एम् ऐ की तालीम, प्रथम स्थान प्राप्त कर,अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय से हासिल की। सन 1953 से वो अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में बतौर लेक्चरर पढ़ाते रहे। सन 1957 में उन्होंने "उर्दू में तरक्की पसंद अदबी तहरीक " विषय पर, जो उर्दू में आज भी बेहतरीन दस्तावेज माना जाता है, पी एच.डी की डिग्री पायी। जून 1978 को ब्लड कैंसर से लम्बी लड़ाई लड़ते हुए वो दुनिया-ऐ-फ़ानी से कूच फ़रमा गए।

हाँ तू कहे तो जान की परवा नहीं मुझे
यूँ ज़िन्दगी से मुझको मोहब्बत जरूर है

अपना जो बस चले तो तुझे तुझसे मांग लें 
पर क्या करें की इश्क की फितरत ग़यूर है
ग़यूर :स्वाभिमान 

आरिज़ पे तेरे मेरी मोहब्बत की सुर्खियां 
मेरी जबीं पे तेरी वफ़ा का गुरूर है 

अपने स्कूली दिनों से आज़मी साहब ने शायरी शुरू कर दी। उनकी लिखी रचनाएँ तब की बच्चों की प्रसिद्ध पत्रिका "पयामि तालीम "में छपती रहीं। उन्हें गद्य और पद्य दोनों विधाओं पर सामान रूप से अधिकार प्राप्त था. उर्दू साहित्य की परम्परागत लेखन शैली में उन्होंने आधुनिकता के पुट का समावेश किया। प्रगतिशील आंदोलन से वो जीवन पर्यन्त जुड़े रहे। वो प्रगतिशील लेखक संघ के सेक्रेटरी भी रहे।

हर खारों-ख़स से वज़अ निभाते रहे हैं हम 
यूँ ज़िन्दगी की आग जलाते रहे हैं हम 

इस की तो दाद देगा हमारा कोई रक़ीब 
जब संग उठा, तो सर भी उठाते रहे हैं हम 

ता दिल पे ज़ख़्म और न कोई नया लगे 
अपनों से अपना हाल छिपाते रहे हैं हम 

आलोचकों का विचार है कि खलीलुर्रहमान आज़मी एक ऐसे प्रगतिशील शायर थे जिन्होंने प्रगतिशीलता और आधुनिकता के दरमियान पुल का काम किया। उनकी शायरी के दो संग्रह "कागज़ी पैरहन (1955 )और "नया अहद नामा (1966 ) उनके जीवन काल में प्रकाशित हुए जबकि "ज़िन्दगी-ऐ-ज़िन्दगी" 1983 में उनके देहावसान के बाद। यूँ उनकी अनेक विषयों पर दर्जनों किताबें हैं और वो सभी उर्दू साहित्य की धरोहर हैं। प्रोफ़ेसर शहरयार ने उनकी कुलियात "आसमां-ऐ-आसमां" नाम से प्रकाशित करवाई।

तमाम यादें महक रहीं हैं हर एक गुंचा खिला हुआ है
ज़माना बीता मगर गुमां है कि आज ही वो जुदा हुआ है

कुछ और रुसवा करो अभी मुझको ता कोई पर्दा रह न जाए 
मुझे मोहब्बत नहीं जुनूँ है जुनूँ का कब हक़ अदा हुआ है 

वफ़ा में बरबाद होके भी आज ज़िंदा रहने की सोचते हैं 
नए ज़माने में अहले-दिल का भी हौसला कुछ बढ़ा हुआ है 

सन 1978 में ग़ालिब सम्मान से सम्मानित खलीलुर्रहमान साहब की ये किताब हिंदी में छपी उनकी पहली किताब है जिसे शहरयार और महताब हैदर नक़वी साहब ने सम्पादित किया है। इस किताब में आज़मी साहब की लगभग 40 ग़ज़लें और इतनी ही नज़्में आदि शामिल हैं। इस किताब की प्राप्ति के लिए आप जैसा मैं पहले बता चूका हूँ ,आप दिल्ली के "वाणी प्रकाशन " से संपर्क कर सकते हैं चलते चलते आईये उनकी ग़ज़लों के कुछ शेर आपको पढ़वाता हूँ :-

तेरे न हो सके तो किसी के न हो सके 
ये कारोबारे-शौक़ मुक़र्रर न हो सका 
*** 
यूँ तो मरने के लिए ज़हर सभी पीते हैं 
ज़िन्दगी तेरे लिए ज़हर पिया है मैंने 
*** 
क्या जाने दिल में कब से है अपने बसा हुआ 
ऐसा नगर कि जिसमें कोई रास्ता न जाए
*** 
हमने खुद अपने आप ज़माने की सैर की 
हमने क़ुबूल की न किसी रहनुमा की शर्त 
*** 
कहेगा दिल तो मैं पत्थर के पाँव चूमूंगा 
ज़माना लाख करे आके संगसार मुझे 
*** 
ज़ंज़ीर आंसुओं की कहाँ टूट कर गिरी 
वो इन्तहाए-ग़म का सुकूँ कौन ले गया
*** 
उम्र भर मसरूफ हैं मरने की तैय्यारी में लोग 
एक दिन के जश्न का होता है कितना एहतमाम

Monday, October 9, 2017

किताबों की दुनिया -146

तअल्लुक़ की नई इक रस्म अब ईजाद करना है 
न उसको भूलना है और न उसको याद करना है 

ज़बाने कट गईं तो क्या, सलामत उँगलियाँ तो हैं 
दरो-दीवार पे' लिख दो तुम्हें फ़रियाद करना है 

बना कर एक घर दिल की ज़मीं पर उसकी यादों का 
कभी आबाद करना है कभी बर्बाद करना है 

तक़ाज़ा वक़्त का ये है न पीछे मुड़ के देखें हम 
सो हमको वक़्त के इस फ़ैसले पर साद करना है 
साद =सही निशाना लगाना 

बनारस के पुस्तक मेले में राजपाल पब्लिकेशन के स्टॉल पर जब अचानक इस किताब पर नज़र पड़ी तो उठा लिया और इसके आख़री फ्लैप पर लिखी इस इबारत को पढ़ कर इस किताब को खरीदने में एक लम्हा भी ज़ाया नहीं किया ,लिखा था कि "ये शायद पाकिस्तानी और हिन्दुस्तानी औरत का मुश्तर्का अल्मिया (एक जैसी ट्रेजिडी) है कि औरत का कोई घर नहीं होता। वो हमेशा चार रिश्तों की मुहताज रहती है बाप, भाई, शौहर और बेटा। " वैसे ये बात सिर्फ हिंदुस्तान या पाकिस्तान की औरतों की ही नहीं है बल्कि ये सच्चाई कमोबेश पूरी दुनिया की औरतों पर लागू होती है .

कैसा अजीब दुःख है कि देखा न रात भर
आँखों ने कोई ख़्वाब भी, सोने के बावजूद

उगने लगी है फिर से अंधेरों की एक फ़स्ल
तारों को इस ज़मीन पर बोने के बावजूद

खूं से लिखा हुआ है कोई नाम आज भी
क़ातिल की आस्तीन पे' धोने के बावजूद

अहसास की कमी है कि इंतिहाए- कर्ब
आँखों में अश्क ही नहीं रोने के बावजूद
इंतिहाए- कर्ब =वेदना की चरम अवस्था 

'आँखों में अश्क ही नहीं रोने के बावजूद' जैसा मिसरा किसी शायर के लिए कहना मुश्किल काम है, ऐसे मिसरे कोई शायरा ही कह सकती है। स्त्री के दुःख को पुरुष समझ तो सकता है लेकिन उसे सही ढंग से शायद बयाँ नहीं कर सकता। किताबों की दुनिया में आज जिस किताब की बात होगी वो है "पांचवी हिजरत" जिसकी शायरा हैं पाकिस्तानी मशहूर शायरा "हुमैरा राहत" साहिबा। हिंदी के पाठकों के शायद ये नाम बहुत जाना पहचाना न हो क्यों की हिंदी में छपने वाली ये उनकी पहली किताब है।


रहे-दीवानगी से डर न जाये 
तुम्हारा इश्क मुझ में मर न जाये  

 खुदा के बाद जो है आस मेरी 
वही इक शख़्स तन्हा कर न जाये 

कभी ऐसा भी कोई मु'जिज़ा हो 
कि ये महताब अपने घर न जाये
मु'जिज़ा=चमत्कार 

 1959 में जन्मी हुमैरा राहत करांची में रहती हैं, घर-बार वाली ख़ातून शायरा हैं और स्कूल में पढ़ाती हैं। अदब की दुनिया में उनका रिश्ता शायरी के साथ साथ अफ़सानानिगारी से भी है और पाकिस्तान के अदबी हल्क़ों में अलग से पहचानी जाती हैं। इस किताब की भूमिका का आग़ाज़ वो जिस अंदाज़ से करती हैं वो बेहद दिलकश है उन्होंने लिखा है " ज़िन्दगी क्या है ! लम्ह-ऐ-अज़ल से लम्ह-ऐ-अबद तक ( पैदा होने से लेकर मरने तक का क्षण ) आँख की पुतली में जमी हुई हैरत ! पहले होने की फिर न होने की। इसी हैरत के आस-पास इश्क का कारखाना है। मगर इश्क ने भी हैरत की कोख़ से जनम लिया है , इश्क का अपना एक जहान -ऐ- हैरत है. मैंने जब अपने अंदर झाँका तो उसी जहान -ऐ-हैरत में मेरी शायरी भटक रही थी सो इसी शायरी का हाथ थाम कर मैं आपकी दुनिया में चली आयी हूँ।"

  हरेक ख़्वाब की ता'बीर थोड़ी होती है 
 मुहब्बतों की ये तक़दीर थोड़ी होती है 

 सफ़र ये करते हैं इक दिल से दूसरे दिल तक 
दुखों के पांवों में ज़ंजीर थोड़ी होती है 

 दुआ को हाथ उठाओ तो ध्यांन में रखना 
 हरेक लफ़्ज़ में तासीर थोड़ी होती है 

 हुमैरा साहिबा जब सार्क सम्मेलन में भाग लेने सन 2011 में पाकिस्तानी प्रतिनिधि मंडल के साथ आगरा तशरीफ़ लायी तो उनकी मुलाकात दिल्ली के मशहूर शायर आलोचक और अनुवादक जनाब सुरेश सलिल साहब से हुई। सुरेश जी ने जब उन्हें एक महफ़िल में अपनी ग़ज़लें और नज़्में सुनाते सुना तो सोचा कि क्यों न इनकी ग़ज़लों और नज़्मों का हिंदी अनुवाद कर उसे एक बड़े पाठक वर्ग तक पहुँचाया जाय। बात हुई लेकिन अंजाम तक न पहुंची। एक लम्बे अर्से के बाद फिर से ये बात जनाब नूर ज़हीर के माध्यम से उठाई गयी ,सुरेश जी दुबारा हुमैरा साहिबा से मिले जिसका नतीजा "पांचवीं हिजरत" की शक्ल में मंज़र-ऐ-आम पर दिखाई दिया. 

 बारिश के कतरे के दुःख से नावाकिफ़ हो 
 तुम हँसते चेहरे के दुःख से नावाकिफ़ हो 

 साथ किसी के रह कर के जो तनहा कटता है 
 तुम ऐसे लम्हे के दुःख से नावाकिफ़ हो 

 इक लम्हे में किर्ची -किर्ची जो हो जाये 
 तुम उस आईने के दुःख से नावाकिफ़ हो 

 मुहब्बत के कई कई शेड्स आपको उनकी शायरी में दिखाई देते हैं हुमैरा कहती हैं "इश्क और मोहब्बत में मामूली सा फर्क है -मुहब्बत इब्तिदा है और इश्क इन्तहा , मुहब्बत रसाई (पहुँच, प्रवेश) है और इश्क नारसाई (पहुँच से परे), मुहब्बत दुआ है और इश्क इबादत ,मुहब्बत तलब है और इश्क हैरत। बहुत सारे रंग हैं इश्क के मगर जब आँखें उन रंगों में इम्तियाज़ पर क़ादिर (चुनने पर आमादा ) हो जाती हैं तो एक ही रंग बन जाता है -आंसुओं का रंग , तिश्नगी और आबलापाई का रंग।"

हिसारे-ज़ात से बाहर निकलना चाहती हूँ मैं 
अब हर हुक्म से इंकार करना चाहती हूँ 
 हिसारे-ज़ात =ख़ुदी के दायरे से 

 ज़मीं पर घर की बुनियादें बहुत कमज़ोर ठहरीं 
 मैं अब पानी पे' घर तामीर करना चाहती हूँ 

 किसी हरफ़े-सताइश की तलब दिल में नहीं है
 मैं खुद अपने लिए सजना-सँवरना चाहती हूँ 
 हरफ़े-सताइश की तलब =किसी से सराहना पाने की इच्छा 

 हुमैरा राहत की शायरी की तीन किताबें मंज़र-ऐ-आम पर आ चुकी हैं इन्हीं सब किताबों में से चुनिंदा 46 ग़ज़लें और 37 नज़्में सुरेश सलिल जी ने हिंदी में लिप्यांतर कर इस संग्रह में संकलित की हैं। किताब को राजपाल एंड सन्ज ने प्रकाशित किया है। सभी रचनाएँ अपने अलग रंग और लहज़े के कारण पढ़ने योग्य हैं। उनके कुछ शेर देर तक ज़ेहन में घूमते रहते हैं। 

 है चलन कितना अजब ये कि मिरे अहद में लोग 
 बीज बोते नहीं मिटटी में , समर मांगते हैं 
 समर=फल 

 इस क़दर घर को उजड़ते हुए देखा है कि अब
 घर की ख़्वाइश नहीं रखते हैं खंडहर मांगते हैं 

 संगदिल धूप में उम्मीद है बारिश की हमें 
 और साहिल पे' बना रेत का घर मांगते हैं 

 हुमैरा साहिबा ने शायरी के अलावा उपन्यास और कहानियां भी लिखी है लेकिन नज़्मों की और उनका झुकाव ज्यादा है। इस किताब में संग्रहित नज़्में कमाल की हैं कुछ तो बिलकुल नयी हैं जो इस किताब के अलावा अभी तक और कहीं प्रकाशित नहीं हुई। उनका कहना है कि" नज़्म अफ़साने से ज़्यादा क़रीब होती है ,वही पहली लाइन चौका देने वाली ,एहसास की नज़ाकत, ज़ज़्बात का इज़हार और फिर आखिर में एक अबूझ अपरिभाषित सी प्यास का रह जाना। नज़्म कभी मुकम्मल नहीं होती और अफ़साना भी हमेशा अधूरा ही रहता है शायद यही वजह है कि नज़्म लिखने में मुझे ज्यादा लुत्फ़ आता है " आईये पहले उनकी कुछ एक छोटी -छोटी नज़्मों का लुत्फ़ लें : 

1. तेरा नाम
 बारिशों के मौसम में 
 छत पे' बैठ के तन्हा 
 नन्ही नन्ही बूंदों से 
 तेरा नाम लिखती हूँ 

 2. काश 
 मेरे मालिक 
 बहुत रहमो-करम 
 मुझ पर किये तूने 
 मैं तेरा शुक्र अदा करते नहीं थकती 
 मगर, बस एक छोटी सी शिकायत है
 कि मेरी ज़िन्दगी में 
 इतने सारे ' काश' 
क्यों रक्खे 

 3. सवाल 
 मुहब्बत आशना लम्हे (प्रेम पूर्ण क्षण ) 
छिपाये इक अजब सा कर्ब (वेदना ) 
लहज़े में मुझी से पूछते हैं 
ये अगर हर ख़्वाब की किस्मत में 
 मर जाना ही लिखा है 
 तो आँखें देखती क्यों हैं 

 ये तो मैंने बता ही दिया है कि अगर आपको किताब चाहिए तो राजपाल एंड सन्ज दिल्ली से संपर्क करें , उनकी एक साइट भी है जी पर जा कर आप ऑन लाइन किताब मंगवा सकते हैं अगर वहां से नहीं तो अमेजन पर भी ये किताब उपलब्ध है , वैसे है तो myshopbazzar और universalbooksellers पर भी , आप जहाँ से चाहें मंगवा लें , पढ़ें और फिर फेसबुक पर हुमैरा जी के पेज पर जा कर बधाई भी दे आएं। आपकी सुविधा के लिए मैं ऑन लाइन मंगवाने के लिए तीन लिंक दे रहा हूँ आपको इनपर क्लिक करके ऑर्डर ही करना है बस।

 https://www.myshopbazzar.com/panchvin-hijrat-humaira-rahat.html

  
https://www.amazon.in/Panchavi-Hijarat-Hindi-Humera-Rahat-ebook/dp/B01MT9N3UF?_encoding=UTF8&%2AVersion%2A=1&%2Aentries%2A=0&portal-device-attributes=desktop

 आखिर में जैसा कि हमेशा करता आया हूँ आपको उनकी एक ग़ज़ल के चंद शेर पढ़वाता चलता हूँ , शेर नहीं इस बार चलिए एक नज़्म पढ़वाता हूँ उम्मीद है पसंद आएगी : 

 क्या मोहब्बत एक पल है 

 मैं दिल से पूछती हूँ 
 क्या मोहब्बत को भुलाना 
 इस कदर आसान होता है
 "चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों " 
बस इस मिसरे की ऊँगली थाम कर 
 बरसों पुराना साथ पल में तोड़ देते हैं 
 मोहब्बत एक लम्हा तो नहीं
 जो ज़िन्दगी में आये 
 और वापस चला जाय 
 मोहब्बत उम्र है 
 और उम्र जां के साथ जाती है 
 मोहब्बत आईना कब है
 मोहब्बत अक्स है 
 जब आईना गिर कर ज़मीन पर 
 टूट जाता है 
 तो अपने अक्स को टूटे हुए टुकड़ों में भी 
 महफूज़ रखता है 
 तो फिर मुमकिन नहीं कि 
 अजनबियत का लबादा ओढ़ कर
 कोई ये कह दे कि 
चलो अब लौट जाते हैं.....

Monday, October 2, 2017

किताबों की दुनिया -145

आप तस्वीर में न मर जाएँ 
चलना फिरना बहुत जरूरी है 

ज़िन्दगी में बिना किताबो-क़लम 
पढ़ना-लिखना बहुत जरूरी है 

याद करना उसे जरूरी नहीं 
याद रखना बहुत जरूरी है 

मेरा होना पता नहीं चलता 
तुमको छूना बहुत जरूरी है 

जब कभी भी छोटी बहर में कही ग़ज़लों का जिक्र होगा तो वो जनाब "विज्ञान व्रत" का नाम लिए बिना मुकम्मल नहीं होगा। छोटी बहर में उन्होंने इतनी ग़ज़लें कही हैं कि आप सोच भी नहीं सकते तभी तो उनके पांच या शायद छै ग़ज़ल संग्रह छप कर चर्चित हो चुके हैं। आप सोचेंगे कि इस श्रृंखला में विज्ञान व्रत जी के ग़ज़ल संग्रह की चर्चा तो पहले हो चुकी है तो फिर आज दोबारा से उनका जिक्र क्यों ? वो इसलिए कि आज के हमारे शायर भी छोटी बहर में ग़ज़ल कहने वाले शायरों की फेहरिश्त में बहुत अहम् मुकाम रखते हैं। जैसा मैं हर बार कहता हूँ कि छोटी बहर में कही ग़ज़ल पढ़ने सुनने में बहुत आसान सी लगती है लेकिन होती नहीं। गागर में सागर भरने के लिए आपके पास अनोखा हुनर होना चाहिए, तभी बात बनेगी , थोड़ी सी चूक हुई और शेर ढेर हुआ।

तिरे नज़दीक आना चाहता हूँ 
मैं खुद से दूर जाना चाहता हूँ 

तुझे छूना मिरा मक़सद नहीं है 
मैं खुद को आज़माना चाहता हूँ 

वही तो सोचता रहता हूँ हर दम 
मैं तुमको क्या बताना चाहता हूँ 

अदाकारी बड़ा दुःख दे रही है 
मैं सचमुच मुस्कुराना चाहता हूँ 

ज़िला बदायूं के बिसौली क़स्बे के एक नीम सरकारी महकमे में मुलाज़िम ज़नाब अहमद शेर खां उर्फ़ मद्दन खां के यहाँ चार जनवरी 1952 को जिस बेटे का जन्म हुआ उसका नाम रखा गया " ज़मा शेर खान उर्फ़ पुत्तन खान " जो आगे चल कर शायर जनाब "फ़ेहमी बदायूंनी " के नाम से पहचाने जाने लगे, आज इस श्रृंखला में हम उनके "ऐनीबुक " गाज़ियाबाद द्वारा देवनागरी में बेहद ख़ूबसूरती से प्रकाशित पहले ग़ज़ल संग्रह "पांचवी सम्त " की बात करेंगे। पेपरबैक में छपे इस संग्रह का आवरण और छपाई बहुत दिलकश है , किताब हाथ में लेते ही इसे पढ़ने की चाहत बलवती हो उठती है।


 मिरी वादा-खिलाफ़ी पर वो चुप है 
उसे नाराज़ होना चाहिये था 

अब उसको याद करके रो रहे हैं 
बिछड़ते वक़्त रोना चाहिये था 

चला आता यक़ीनन ख़ाब में वो 
हमें इक रात सोना चाहिये था 

हमारा हाल तुम भी पूछते हो 
तुम्हें मालूम होना चाहिये था 

किताब की भूमिका में मशहूर शायर और आलोचक जनाब "मयंक अवस्थी" साहब लिखते हैं कि "फ़हमी साहब ने छोटी बहर में बेशतर ग़ज़लें कही हैं और लफ्ज़ को बरतने में भी और उसे मआनी देने में भी उनका जवाब नहीं। इनके हर शेर की रूह नूरानी है।ऊला-सानी का रब्त बेहद असरदार है और इनके शेर का जिस्म तो चुराया जा सकता है रूह कतई नहीं। बयान शफ़्फ़ाक़ पानियों जैसा है -किसी बेअदब ग़ैर जरूरी लफ्ज़ का रत्ती भर दख़्ल इनकी शायरी में नहीं हो सकता। इस बुलंद मफ़्हूम के नाख़ुदा ने बेहद आसान लफ़्ज़ों की नाव से गहरे अर्थों के बेशुमार समंदर सर किये हैं। "

जब रेतीले हो जाते हैं 
पर्वत टीले हो जाते हैं 

तोड़े जाते हैं जो शीशे 
वो नोकीले हो जाते हैं 

फूलों को सुर्खी देने में 
पत्ते पीले हो जाते हैं 

फ़हमी साहब ने बदायूं से इंटरमीडिएट तक की तालीम 1968 में हासिल की चूँकि उस वक्त बदायूं में कोई डिग्री कॉलेज नहीं था इसलिए तालीम हासिल करने के लिए तालिब-ऐ-इल्मों को बरेली या चंदौसी जाना पड़ता था ,फ़हमी साहब के घर की हालत इस लायक नहीं थी कि वो घर छोड़ कर बाहर जाते लिहाज़ा उन्होंने घर पर किताबें ला कर ग्रेजुएशन की पढाई करने की ठानी। घर पर पढाई चलती रही और इस बीच उन्हें 1970 में यू पी गवर्नमेंट के रेवन्यू महकमे में "चकबंदी लेखपाल" की नौकरी मिल गयी जो उन्हें हुए पीलिया के हमले के बाद ज़्यादा लम्बी नहीं खिंच पायी। इस बीच शादी भी हो गयी और बच्चे भी। बेरोज़गारी के आलम में उन्होंने स्कूली बच्चों के लिए गणित और साइंस विषयों की ट्यूशन लेनी शुरू की। उनके पढ़ाने का अंदाज़ और विषयों पर पकड़ इस कदर लोकप्रिय हुई की उनसे बीएससी और इंजीनियरिंग के छात्र भी ट्यूशन लेने आने लगे और ज़िन्दगी की गाड़ी पटरी पर दौड़ने लगी।

हर कोई रास्ता बताएगा 
कोई चल कर नहीं दिखायेगा 

जलना-बुझना भी और उड़ना भी 
चाँद जुगनू से हार जायेगा 

नाम दरिया है जब तलक तेरा 
हर समंदर तुझे बुलाएगा 

रिवायत से हट कर शायरी करना और बात कहने का नया सलीका ईज़ाद करना फ़हमी साहब की खासियत है।उनके बहुत से शेर मुहावरों की तरह इस्तेमाल किये जा सकते हैं। सब से बढ़िया बात जो उनकी शायरी में नज़र आती है वो ये कि आपको ऐसा एक भी लफ्ज़ उनकी शायरी का हिस्सा नहीं बनता नहीं दिखता जिसका मतलब खोजने के लिए पाठक को लुग़त मतलब डिक्शनरी का सहारा लेना पड़े. लियाकत ज़ाफ़री साहब ने फ़हमी साहब की शायरी के बारे में लिखा है कि "फ़हमी का शेर पहली ही रीडिंग में पकड़ लेता है... फिर सोचने पर मजबूर करता है.... उसके बाद परत दर परत खुलने लगता है ...और फिर जिस पाठक का जो मेयार है उसी के मुताबिक़ उसे मज़ा दे कर आगे निकल जाता है "

जब तलक तू नहीं दिखाई दिया 
घर कहीं का कहीं दिखाई दिया 

रोज़ चेहरे ने आईने बदले 
जो नहीं था नहीं दिखाई दिया

बस ये देखा कि वो परेशां है 
फिर हमें कुछ नहीं दिखाई दिया

"नदीम अहमद काविश" साहब ने इस संकलन में फ़हमी साहब की बेजोड़ 90 ग़ज़लें संगृहीत की हैं जो बार बार पढ़ी जाने योग्य हैं। बहुत से शेर तो पढ़ने के साथ ही आपके ज़ेहन में घर कर लेते हैं। लियाक़त ज़ाफ़री साहब ने इस किताब की भूमिका में फ़हमी साहब के लिए बहुत दिलचस्प अंदाज़ में लिखा है कि "फ़हमी एक ऐसा शायर जिसकी तबई-उम्र का अंदाज़ा उसकी शायरी से कर पाना तक़रीबन ना-मुमकिन है....फ़हमी की उम्र का उसके शेर से कोई लेना देना नहीं ... सिरे से उलट मामला है यहाँ.... आप में से पच्चीस-तीस वालों को ये साठ-सत्तर का कोई तज्रिबेकार बूढा लगेगा और साठ-सत्तर वालों को कोई नटखट रूमानी लौंडा जिसने अभी अभी इ-टीवी उर्दू के मुशायरे पढ़ने शुरू किये हैं....

लिख के रख लीजिये हथेली पर 
हाथ मलना शिकस्त खाना है 

ये जो तिल है तुम्हारे आरिज़ पर 
ये मुहाफ़िज़ है या खज़ाना है 
आरिज़=गाल , मुहाफ़िज़ =रक्षक 

बादलों से दुआ सलाम रखो 
हमको मिटटी का घर बनाना है 

आप कहते हैं पास तो आओ 
ये डराना है या बुलाना है

इस बाकमाल किताब के शेर पढ़वाने का लालच मुझे अब छोड़ना पड़ेगा क्यूंकि अगर सभी शेर यहाँ आपको पढ़वा दिए तो आप किताब मंगवाएंगे नहीं जबकि मेरा मक़सद इस किताब को आपकी किताबों की अलमारी में सजा हुआ देखना है। किताब मंगवाने के लिए आप अमेज़न की शरण में जा सकते हैं या फिर ऐनीबुक के पराग अग्रवाल से 9971698930 पर संपर्क करें.मेरी आपसे गुज़ारिश है कि आप फेहमी साहब से उनके मोबाईल न 9897454216 पर कॉल करके उन्हें इस बेहद खूबसूरत शायरी के लिए भरपूर दाद दें।देर मत कीजिये बस कोई सा भी रास्ता अख्तियार कर किताब मंगवा लीजिये उसे इत्मीनान से पढ़िए और फिर मुझे अगर चाहें तो धन्यवाद दीजिये। आखिर में उनकी कुछ और ग़ज़लों के चुनिंदा शेर आपकी खिदमत में पेश कर रुख़सत होता हूँ और निकलता हूँ अगली किताब की तलाश में :

छिपकली ने बचा लिया वरना 
रात तन्हाई जान ले लेती 
*** 
इक जनाज़े के साथ आया हूँ 
मैं किसी क़ब्र से नहीं निकला 
*** 
वहां फ़रहाद का ग़म कौन समझे 
जहां बारूद पत्थर तोड़ती है 
*** 
उसे लेकर जो गाड़ी जा चुकी है 
मैं शायद उसके नीचे आ गया हूँ 
*** 
बस वही लफ़्ज़ जानलेवा था 
ख़त में लिख कर जो उसने काटा था
*** 
शिकार आता है क़दमों में बैठ जाता है 
हमारे पास कोई जाल वाल थोड़ी है 
*** 
फूल को फूल ही समझते हो 
आपसे शायरी नहीं होगी 
*** 
तिरे मौज़े यहीं पर रह गए हैं 
मैं इनसे अपने दस्ताने बना लूँ 
*** 
नमक की रोज़ मालिश कर रहे हैं 
हमारे ज़ख़्म वर्जिश कर रहे हैं 
*** 
अदालत फ़र्शे-मक़्तल धो रही है 
उसूलों की शहादत हो गयी क्या 
फ़र्शे-मक़्तल = वध स्थल

Monday, September 25, 2017

किताबों की दुनिया -144

पुरानी साइकल की हम मरम्मत को तरसते हैं 
हमारे गाँव का सरपंच नित कारें बदलता है 

पड़ौसी का जला कर घर तमाशा देखने वालों 
हवा का रुख बदलने में ज़रा सा वक़्त लगता है 

अंधेरों से ज़रा भी हिम्मतों को डर नहीं लगता 
हमारी आँख में उम्मीद का सूरज चमकता है 

उर्दू के भारी भरकम लफ़्ज़ों, बोझिल दार्शनिकता और लफ़्फ़ाज़ी से कोसों दूर सीधी सादी जबान में अपनी बात आप तक पहुँचाने वाले, आज हम उस शायर की किताब को आपके सामने ला रहे हैं जो अभी लोकप्रियता की सीढ़ियां ख़रामा ख़रामा चढ़ रहा है,  ये शायर खुद्दार है तभी इसका नाम किसी खेमे से नहीं जुड़ा और न ही इसकी किसी मठाधीश के चरणों में अपना माथा रगड़ने की ख़बर है। शायर का नाम है श्री " राम नारायण हलधर" और किताब का उन्वान है "अभी उम्मीद बाकी है " जिसे जयपुर के "बोधि प्रकाशन " ने जून 2017 में प्रकाशित किया है :


अलावों पर मुसीबत की, मुसल्सल मावठें बरसीं 
मग़र इस राख़ में उम्मीद का, शोला दबा सा है 

दिलासे और मत दो, दिल हमारा यार रो देगा 
ये बच्चा भीड़ में माँ-बाप से, बिछड़ा हुआ सा है 

कबूतर भी उसे लगता है मानो, बाज़ हो कोई 
वो जोड़ा हंस का, घर से अभी भागा हुआ सा है 

जब तक आप शायरी के घिसे पिटे बिम्ब और विषयों से अलग कुछ नया नहीं कहते तब तक आप कितना भी लिखें आपकी पहचान बनना मुश्किल है। नया विषय और नयी ज़मीन तलाशने के लिए जोख़िम उठाना पड़ता है ,गुलिवर की तरह अनजान जगहों की यात्रा करनी पड़ती है जो मन के अंदर और बाहर दोनों ओर होती है। युवा शायर हलधर जी ने इस जोख़िम को उठाया है और वो नए रास्तों की तलाश में चलते दिखाई देते हैं।

मुस्कानों का क़र्ज़ लिए हम चेहरा जोड़े बैठे हैं 
अंदर-अंदर सब कुछ टूटा इक बस्ती वीरान हुई 

चंदा जैसी हंसमुख लड़की जब देखो घर आती थी 
माथे पर सूरज चमका है, उस दिन से अनजान हुई 

जब सूरज ने बेमन से ये पूछा कौन कहाँ के हो 
इक जुगनू को अपने क़द की तब जा कर पहचान हुई 

राम नारायण हलधर 01 अप्रेल 1970 को राजस्थान के बारां जिला की छीपाबड़ौद तहसील के अंतर्गत आये गाँव तूमड़ा में पैदा हुए. राजकीय महाविद्यालय कोटा से उन्होंने हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर की डिग्री हासिल की। वर्तमान में राम नारायण जी आकाशवाणी कोटा में वरिष्ठ उद्घोषक हैं। उन्होंने अपने पिता के अदम्य साहस को जिसके बल पर वो प्राकृतिक आपदाओं से लड़ते हुए विजय प्राप्त करते रहे और माँ के मधुर कंठ से सुनी लोकगीत की स्वर लहरियों को अपनी ग़ज़लों में ढाला है।

ख़ुशी से दिल हमारा आज मीरा होने वाला है 
झुकी खेतों के ऊपर श्यामवर्णी मेघमाला है 

हिना का रंग उनके हाथ पे यूँ ही नहीं महका 
सुबह से शाम तक हमने, रसोई घर संभाला है 

वज़ीफ़ा कौन देता है हमें, हम गाँव वाले हैं 
हमारा इल्म केवल ढाई आखर वर्णमाला है 

हलधर जी ग़ज़लें पढ़ते वक्त वैसी ही ताज़गी का अहसास होता है जैसे भरी दोपहरी में किसी बरगद की छाँव में बैठने से होता है। गाँव की मिटटी और चूल्हे पर पकती रोटी की सी खुशबू आप उनकी ग़ज़लों से उठती महसूस कर सकते हैं। हो सकता है कि महानगर की चकाचौंध में रह रहे पाठकों को ये ग़ज़लें अपील न करें लेकिन जिन के मन में गाँव और उसकी सहजता सरलता बसी है वो तो जरूर पसंद करेंगे।

अभी हम लोग बच्चों से कई बातें छुपाते हैं 
किसी का तो हमें है डर, अभी उम्मीद बाकी है 

दिवाली की सजावट को घरों पे ईद तक रक्खा 
किसी मासूम की जिद पर , अभी उम्मीद बाकी है 

उसी से रूठ कर बैठा, उसी की राह तकता हूँ 
मना लेगा मुझे आकर, अभी उम्मीद बाकी है 

कोटा के वरिष्ठ कवि और समीक्षक अरविन्द सरल जी इस किताब की भूमिका में लिखते हैं कि " खेत-खलियान, किसान और उसके जीवन के दुःख-दर्द जितनी भरपूर मात्रा में हलधर के यहाँ हैं, ग़ज़ल में तो संभवतः और कहीं नहीं होंगे। " अरविन्द जी की बात इस संग्रह को पढ़ते वक्त मुझे सोलह आना सही लगी लेकिन मुझे उनकी ग़ज़लों में अद्भुत काव्य सौंदर्य और शिल्प की कलात्मकता के साथ साथ उनकी सकारात्मक सोच भी नज़र आयी। खेत खलियानो और गाँव के इतर रची उनकी ग़ज़लें भी जादू सा असर करने में सक्षम हैं .

तेरे पापा का कोई फोन आया 
बड़ी उम्मीद से, पूछा करो हो 

किसी ने सांवली कह दिल दुखाया 
घटा क्यों ,रात भर बरसा करो हो

न यूँ नाराज़ हो कर सोइयेगा 
सुबह तक करवटें बदला करो हो 

हम सब जानते हैं कि छोटी बहर में ग़ज़ल कहना दोधारी तलवार पर चलने के समान है इसपर चलने के लिए जबरदस्त अनुभव और संतुलन की जरुरत होती है। बहुत से शायरों ने छोटी बहर पर अच्छी ग़ज़लें कही हैं "विज्ञान व्रत" जी को तो इसमें महारत हासिल है लेकिन हलधर जी ने भी इस संग्रह में बहुत सी ग़ज़लें छोटी बहर में कही हैं उन्हीं में से एक ग़ज़ल के चंद शेर गौर करें और देखें की किसतरह उन्होंने शब्दों का चयन किया है

वो इक आकाश गंगा है 
मेरा मन वेधशाला है 

कई अनजान लिपियों सा 
तेरा मासूम चेहरा है 

न कर चर्चा सियासत की 
यहाँ इक पौधशाला है 

बहुमुखी प्रतिभा के धनी 'हलधर" जी ग़ज़लों के अलावा दोहे, गीत, गद्य-व्यंग और आधुनिक छंद मुक्त कवितायेँ भी लिखते हैं। उनकी रचनाएँ पिछले दो दशकों से देश की प्रसिद्ध अख़बारों और पत्रिकाओं जैसे पंजाब सौरभ , पाञ्चजन्य,दैनिक जागरण, नई दुनिया, राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, सरिता, डेली न्यूज , जनसंदेश टाइम्स, व्यंग यात्रा , मधुमती आदि में निरंतर प्रकाशित होती रहती हैं। उनका दोहा संग्रह " शिखरों के हक़दार" सं 2012 में प्रकाशित हो कर चर्चित हो चुका है। "अभी उम्मीद बाक़ी है " उनका पहला ग़ज़ल संग्रह है।

रोज़ पत्थर उछालता मैं भी 
घर मेरा कांच का नहीं होता 

तितलियों के परों को देखो फिर 
हमसे कहना , खुदा नहीं होता 

क़र्ज़ लेकर उजास करता है 
हर कोई चाँद सा नहीं होता 

लोकप्रिय शायर "आलोक श्रीवास्तव" ने इस किताब की भूमिका में लिखा है कि "इस संग्रह की ज़्यादातर ग़ज़लें हिंदी ग़ज़ल के घराने से आती हैं ,इसलिए उर्दू-ग़ज़ल के खानदान वाले यहाँ थोड़ा रुक-रुक कर, ठिठक-ठिठक कर चलेंगे ऐसा मेरा ख्याल है। " आलोक जी का ख्याल हो सकता है सही हो लेकिन मेरा ख्याल है की पाठक चाहे उर्दू ग़ज़ल का हो या हिंदी ग़ज़ल का अगर कहन में ताज़गी है तो वो उसे पसंद करता है , बहुत कम पाठक हैं जो उर्दू-हिंदी के झमेले में पढ़ते हैं और भाषा के बिना पर ग़ज़ल को पसंद नापसंद करते हैं।

रोने के हैं लाख बहाने रो लीजे 
हंसने में आसानी हो तो ग़ज़लें हों 

विज्ञापन से कब तक प्यास बुझाएं हम 
बादल बांटे गुड़-धानी तो ग़ज़लें हों 

करवट लेकर चाँद अकेला सोया है 
छोड़े ज़िद-आनाकानी तो ग़ज़लें हों 

हलधर जी को उनकी काव्य यात्रा के दौरान भारतेन्दु समिति कोटा द्वारा "साहित्य श्री सम्मान ", सृजन साहित्य एवं सांस्कृतिक संस्था कोटा द्वारा "सृजन साहित्य सम्मान", डॉ.रतन लाल शर्मा स्मृति सम्मान और हिंदी साहित्य सभा आगरा द्वारा "ओम प्रकाश त्रिपाठी स्मृति सम्मान" प्राप्त हो चुका है। अगर आप हलधर जी लीक से हट कर लिखी ग़ज़लों का आनंद लेना चाहते हैं तो इस किताब को तुरंत अमेज़न से घर बैठे मंगवा लें या फिर जयपुर के बोधि प्रकाशन के श्री माया मृग जी से 9829018087 पर संपर्क करें , जैसा मैं हमेशा कहता आया हूँ आज फिर कहूंगा कि आप शायर से सीधा संपर्क कर उसे बधाई दें और किताब प्राप्ति का रास्ता पूछें। हलधर जी से संपर्क करने के विविध रास्ते ये हैं :

मोबाईल द्वारा : 9660325503 पर संपर्क करें
rnmhaldhar@gmail.com पर इ-मेल करें
डी -27, गली नंबर -1, कृष्णा नगर , पुलिस लाइन , कोटा-324001 पर पत्र लिखें

आप जो जी में आये रास्ता इख़्तियार करें मैं चलता हूँ उनके कुछ फुटकर शेर आपको पढ़वा कर :

दर्द घुटनों का मेरा जाता रहा ये देख कर
थामकर ऊँगली नवासा सीढ़ियां चढ़ने लगा 
*** 
बरी हो कर मेरा क़ातिल सभी के सामने खुश है 
अकेले में फ़फ़क कर रो पड़ेगा , देखना इक दिन 
*** 
मौन के शूल को पंखुड़ी से छुआ 
मुस्कुराने से मुश्किल सरल हो गयी
*** 
कभी है "चौथ" उलझन में, कभी रोज़े परेशां हैं 
किसी दिन चाँद के ख़ातिर, बड़ी दीवार टूटेगी
*** 
तेरा वादा सियासतदान ऐसा खोटा सिक्का है 
जिसे अँधा भिखारी भी सड़क पर फेंक देता है

Monday, September 18, 2017

किताबों की दुनिया -143

कल मेरे लफ़्ज़ों में मेरी जान रहेगी 
दुनिया जब देखेगी तो हैरान रहेगी 

जब दिल से तस्वीर तेरी हट जाएगी 
जीने और मरने में क्या पहचान रहेगी

रिश्ता जब यादों का दिल से टूटेगा 
मर जाने की मुश्किल भी आसान रहेगी 

हिज्र को शब् से ऐसी तो उम्मीद न थी 
पहचानेगी मुझको और अनजान रहेगी 
हिज्र =विरह , शब् =रात 

अब क्या लिखूं ? कैसे लिखूं ? कहाँ से लिखूं ? हमारे आज के शायर उर्दू साहित्य की वो कद्दावर शख्सियत रहे हैं जिनके के बारे में लिखने की सोचना ही बहुत बड़ी बात है। हिंदी पाठक भले ही उनके नाम से ज्यादा वाकिफ़ न हों लेकिन जिस किसी को भी उर्दू अदब में जरा सी दिलचस्पी है वो जनाब "मुग़न्नी तबस्सुम " के नाम से अनजान नहीं होगा। हम आज उनकी ग़ज़लों की किताब "मिटटी मिटटी मेरा दिल " पर बात करेंगे जिसका एक एक शेर रुक रुक कर पढ़ने, पढ़वाने और दिल में बसाने लायक है। इस किताब को वाणी प्रकाशन ने सन 2002 में शाया किया था।


मैं अपने ख़्वाबों की दुनिया में खोया रहा 
कब रात ढली कब चाँद बुझा मालूम नहीं 

जब भोर भये कोयल की सदा कानों में पड़ी 
क्यों मेरे दिल में दर्द उठा मालूम नहीं 

ये जान गए हंसने की सज़ा अब मिलती है 
इस रोने का अंजाम है क्या मालूम नहीं 

सच कहूं तो "जब भोर भये कोयल की सदा कानों में पड़ी " जैसा सुरीला सरल मिसरा उर्दू शायरी में बड़ी मुश्किल से ढूंढें मिलता है और ऐसे मिसरे इस किताब के वर्क वर्क में बिखरे हुए हैं। आप सर धुनते रहिये और बस पढ़ते रहिये। शायरी की ज़बान ऐसी मीठी जैसे शहद और क्यों न हो आखिर मुग़न्नी तबस्सुम उस्मानिया विश्वविद्यालय , हैदराबाद के ऐसे होनहार तालिबे-इल्म थे जो बाद में उसी यूनिवर्सिटी में उर्दू विभाग के अध्यक्ष रहे।

बेमानी सा लगता है घर जाना भी 
दीवारों से टकराना मर जाना भी 

रस्ता तकते रहना सारी रात कभी 
आहट सुनकर क़दमों की डर जाना भी 

बादल अब जो खेल तमाशे करता है 
उसने मेरी नाव डुबो कर जाना भी

मोहम्मद अब्दुल गनी जो "मुग़न्नी तबस्सुम" के नाम से जाने जाते हैं का जन्म 19 जून 1930 को हैदराबाद में हुआ। मात्र 14 वर्ष की उम्र से ही उन्होंने शायरी शुरू कर दी. मशहूर शायर अल्लामा इक़बाल साहब की शायरी से वो बहुत प्रभावित हुए। उर्दू की प्रगतिशील विचारधारा को अपनाते हुए उन्होंने ने लेखन कार्य किया और थोड़े समय तक आधुनिक विचारधारा के समर्थक भी रहे लेकिन बाद में फिर प्रगतिशील विचारधारा की और मुड़ गए.

आसमाँ पर है अजब चाँद सितारों का समां 
दिल में देखो तो यहाँ रात का मंज़र है अलग 

पास तेरे हूँ कि क़तरा है निहाँ दरिया में 
दूर तुझसे हूँ कि सहरा से समंदर है अलग 

फुर्सते उम्र है कम, हर्फ़े तमन्ना सुन लो 
बात शिकवों की न पूछो कि वो दफ्तर है अलग
फुर्सते उम्र =ज़िन्दगी की फुर्सत , हर्फ़े तमन्ना =इच्छा की बात 

ज़िन्दगी के तजुर्बों को सीधे सरल अंदाज़ में शायरी में ढालने का हुनर जैसा तबस्सुम साहब के यहाँ मिलता है वैसा और कहीं मिलना मुश्किल है। उनके बारे में प्रोफ़ेसर शमीम ईफानफ़ी फरमाते हैं की "मुग़न्नी साहब निहायत धीमे अंदाज़ में लगभग फुसफुसाते हुए अपनी बात कहते हैं जो खरामा खरामा हमारे ज़ेहन में घर करती है और इसलिए न तो बोझ बनती है और न ही चौंकाती है , उनके अशआरों से अपनत्व का अहसाह उभरता है और हमें अपने आगोश में ले लेता है।"

तपते सहरा में ये खुशबू साथ कहाँ से आई
जिक्र ज़माने का था तेरी बात कहाँ से आई 

दिल मिटटी था आँखों में सौगात कहाँ से आई 
सावन बीत चला था ये बरसात कहाँ से आई 

बीते लम्हें टूटे भी तो याद बने या ख़्वाब 
परछाईं थी परछाईं फिर हाथ कहाँ से आई 

प्रोफ़ेसर तबस्सुम द्वारा "फ़ानी बदायूनी " पर किया गया शोध कार्य उर्दू में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज की हैसियत से जाना जाता है। एक आलोचक के रूप में जैसी प्रतिष्ठा मुगन्नि साहब ने पायी उसकी मिसाल ढूंढनी मुश्किल है। उर्दू साहित्य को नयी दिशा और उसके मयार में लगातार इज़ाफ़ा करने के उद्देश्य के लिए वो मुईनुद्दीन क़ादरी ज़ोर साहब द्वारा 1930 में हैदराबाद में स्थापित "इदारा-ऐ-अदबियत-ऐ-उर्दू" के साथ आखरी सांस तक जुड़े रहे। उर्दू भाषा में उनके द्वारा सम्पादित मासिक पत्रिका "सबरस" बहुत लोकप्रिय हुई ,उन्होंने नए लेखकों को प्रोत्साहन देने की गरज़ से छमाही पत्रिका "शेर-औ-हिक़मत" का संपादन भी सफलता पूर्वक किया।

तरस गया हूँ मैं सूरज की रौशनी के लिए 
वो दी है सायए दीवार ने सज़ा मुझको 

जो देखिये तो इसी से है ज़िन्दगी मेरी
मगर मिटा भी रही है यही हवा मुझको 

उसी नज़र ने मुझे तोड़ कर बिखेर दिया 
उसी नज़र ने बनाया था आईना मुझको 

एक बहुत लम्बी फेहरिस्त है उनकी विभिन्न विषयों जैसे शायरी , आलोचना , शोध ,जीवनी ,संकलन और संपादन पर प्रकाशित लगभग 23 किताबों की, जिनका नाम यहाँ देना संभव नहीं अलबत्ता शायरी पर उनकी ये किताबें बहुत मकबूल हैं जो उर्दू में हैं "'" : "नवा-ऐ-तल्ख़ (1946)", "पहली किरण का बोझ (1980)"' "मिटटी मिटटी मेरा दिल (1991) और " दर्द के खेमे के आसपास(2002)" .इसके अलावा देश विदेश के रिसालों में उनके लेखों की संख्या तो सैंकड़ों में है। लन्दन और अमेरिका की बड़ी बड़ी यूनिवर्सिटीज के तालिब-ऐ-इल्मों को वो उर्दू अदब के ढेरों विषयों पर हुए सेमिनारों में भाषण देने जाते थे।

तारे डूबें तो अच्छा है, चाँद बुझे तो बेहतर है 
कोई नहीं आएगा यहाँ, अब आँख लगे तो बेहतर है 

आइना वीरान खड़ा है ,अनजाना सा लगता है 
हमने चुप साधी है वो भी कुछ न कहे तो बेहतर है 

ख़्वाब में तुझसे मिलते हैं और बात दुआ में करते हैं 
तू भी हमको देखे और कुछ बोल सके तो बेहतर है 

उर्दू के इस खिदमतगार को उत्तर प्रदेश , बिहार , पश्चिमी बंगाल ,आंध्र प्रदेश , दिल्ली आदि अनेकों उर्दू अकादमियों के अलावा महाराष्ट साहित्य अकादमी ने भी पुरुस्कृत किया है। जनाब "स्वाधीन" जिन्होंने इस किताब को हिंदी में लिप्यांतर किया है लिखते हैं कि " इस शायर ने देश काल और इतिहास को अलग-थलग नहीं करते हुए अपने उस आदमी के साथ एकमेल कर दिया है जो रोज उसके भीतर जागा रहता है "

चढ़े हुए थे जो दरिया उतर गए अब तो 
मुहब्बतों के ज़माने गुज़र गए अब तो

न आहटें हैं, न दस्तक, न चाप क़दमों की 
नवाहे- जाँ से सदा के हुनर गए अब तो 
 नवाहे जाँ=प्राणो का विस्तार

सबा के साथ गयी बूए पैरहन उसकी 
ज़मीं की गोद में गेसू बिखर गए अब तो 
सबा=हवा , बुए पैरहन =गंध के वस्त्र गेसू =बाल 

उर्दू अदब का ये रौशन सितारा अपनी ज़िन्दगी के सत्तर से अधिक बरस तक अदब की खिदमत करते हुए आखिर 15 फरवरी 2012 की शाम को इस दुनिया-ऐ-फ़ानी से रुख़सत हो गया और पीछे छोड़ गया उनकी बसाई अदब की एक ऐसी पुरअसर दुनिया जो सदियों तक ज़िंदा रहेगी। डॉक्टर तबस्सुम जैसे शख्सियत कभी कहीं जाती नहीं हमेशा हमारे आसपास अपनी किताबों और रिसालों में मौजूद रहती है।
"मिटटी मिटटी मेरा दिल" में उनकी सिर्फ 60 ग़ज़लें संकलित हैं जिनमें कुल जमा 250-300 शेर होंगे लेकिन एक भी ऐसा शेर नहीं है जिसे यहाँ आपको पढ़वाने की मेरी इच्छा न हो, अफ़सोस ऐसा करना संभव नहीं। मेरी गुज़ारिश है कि आप इस किताब को वाणी प्रकाशन दिल्ली से मंगवा कर पढ़ें और देखें कि उर्दू शायरी का जादू किस तरह सर चढ़ कर बोलता है।
उनकी एक ग़ज़ल के चंद शेर पढ़वाता हूँ और फिर आपसे अगली किताब की तलाश करने को रुखसत होता हूँ :

एक अहदे विसाल चार सू है 
और दर्दे फ़िराक़ कू-ब-कू है
अहदे विसाल =मिलान का वादा , चार सू =चरों तरफ़, दर्दे फ़िराक़=जुदाई का दर्द , कू-ब -कू =गली गली 

जो सो न सके वो आँख हूँ मैं 
जो टूट गयी वो नींद तू है  

मैं सोच रहा हूँ, तू नहीं है
मैं देख रहा हूँ और तू है 

दुनिया के सारे सवाल मुझ पर
चुप हूँ कि मेरा जवाब तू है

Monday, September 11, 2017

किताबों की दुनिया - 142

जो मंज़र आँख पर है ,लम्हा लम्हा 
मिरे सीने के अंदर खुल रहा है 

कभी खुद मौज साहिल बन गयी है 
कभी साहिल, कफ़-ऐ-दरिया हुआ है 
कफ़-ऐ-दरिया=नदी की हथेली 

पलट कर आएगा बादल की सूरत 
इसी खातिर तो दरिया बह रहा है 

महकते हैं जहां खुशबू के साये 
तसव्वुर भी वहां तस्वीर-सा है 

जो "किताबों की दुनिया" के नियमित पाठक हैं उन्हें तो पता है, लेकिन जो कभी कभार भूले भटके पढ़ने आते हैं उन्हें शायद नहीं पता होगा कि इस श्रृंखला में सरहद पार के मकबूल जिन शायरों /शायराओं की ग़ज़ल की किताबों का अब तक जिक्र किया गया है उनके नाम हैं : "नासिर काज़मी "," परवीन शाकिर ","शाहिदा हसन","शकेब जलाली", "इफ़्तिख़ार आरिफ़", "मुज़फ्फर वारसी ", "अशरफ़ गिल ","ज़फर इकबाल","इरफ़ाना अज़ीज़"," जॉन एलिया",और जनाब "मुनीर नियाज़ी", इसी फेहरिश्त में हम आज एक और शायर की किताब को जोड़ने जा रहे हैं जिनका नाम इन सब से थोड़ा सा कम मकबूल जरूर है क्यूंकि इनकी ग़ज़लों को तब के मशहूर ग़ज़ल गायकों ने अपनी आवाज़ नहीं दी लेकिन जिनकी शायरी का मयार इस फेहरिश्त में आये सभी नामों से उन्नीस नहीं है।

खिले जो फूल उसे क़दमों में रोंदती है क्यों 
हवा से कोई तो पूछो कि सरफिरी है क्यों 

मलाल यूँ भी रहा यार से बिछुड़ने का 
कि उससे कह न सके हम उदास जी है क्यों 

अजीब लम्स-ऐ-खुनक है हवा की पोरों में 
जो तू नहीं है तो फिर दर्द में कमी है क्यों 
लम्स-ऐ-खुनक=ठंडा स्पर्श 

आधुनिक उर्दू शायरी को नया रंग रूप प्रदान करने में जिन पाकिस्तानी शायरों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है उनमें हमारी श्रृंखला के आज के शायर जनाब " तौसीफ़ तबस्सुम" का नाम बहुत ऊपर है ,आज हम उनकी किताब "घर की खुशबू " का जिक्र करने जा रहे हैं जिसे डायमंड बुक्स ने सन 2006 में शाया किया था. तौसीफ़ साहब का नाम मैंने सब से पहले सतपाल ख़्याल साहब के ब्लॉग "आज की ग़ज़ल" में सन 2010 में पढ़ा था उसके बाद उनकी ग़ज़लें रेख़्ता की साइट पर पढ़ कर इस किताब को अमेजन से ऑन लाइन मंगवा लिया।


यही हुआ कि हवा ले गयी उड़ा के मुझे 
तुझे तो कुछ न मिला ख़ाक में मिला के मुझे 

चिराग़ था तो किसी ताक़ ही में बुझ रहता 
ये क्या किया कि हवाले किया हवा के मुझे 

हो इक अदा तो उसे नाम दूँ तमन्ना का 
हज़ार रंग हैं इस शोला-ऐ-हिना के मुझे 

बलन्द शाख़ से उलझा था चाँद पिछले पहर 
गुज़र गया है कोई ख़्वाब सा दिखा के मुझे 

बदायूं उत्तर प्रदेश के सहसवान गाँव में 3 अगस्त 1928 को जन्में तौसीफ साहब ने प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली में ग्रहण की और फिर देश विभाजन के बाद 21 सितम्बर 1947 को पाकिस्तान चले गए और वहीँ गोर्डन कालेज रावलपिंडी से एम ऐ. की डिग्री हासिल की। उन्होंने 1857 के ग़दर के वक्त के प्रसिद्ध शायर "मुनीर शिकोहाबादी" की शायरी पर गहरायी से शोध किया और डॉक्टरेट की डिग्री हासिल की। "मुनीर "न सिर्फ शायर थे बल्कि स्वतंत्रता संग्राम के सैनिक भी थे , अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लिखने के कारण उन्हें सात साल की काले पानी की सज़ा भी हुई। "मुनीर" साहब की शायरी पर किये गए उनके शोध ग्रन्थ की बहुत सराहना हुई।

करेगा कोई तो इस तीरा-खाकदाँ से रिहा 
बदल ही जाएगी ज़ंजीर खुद से कहता हूँ 
तीरा-खाकदाँ =संसार 

छुआ तो रह गया पोरों पे लम्स खुशबू का 
सो आज तक वही दर्दे-फ़िराक़ सहता हूँ 

मिरा लहू मिरा दुश्मन पुकारता है मुझे 
मैं अपने आप से सहमा हुआ सा रहता हूँ 

आम बोलचाल की शब्दावली से अपनी अनुभूतियों को अभिव्यक्ति देने और उसे साधारण जन की आवाज़ बना देने वाले तौसीफ़ तबस्सुम मुख्यतः ग़ज़ल के शायर हैं। "घर की खुशबू" हिंदी में छपने वाला उनका एक मात्र मजमुआ है जिसमें उनकी लगभग 75 ग़ज़लें और 20 नज़्में संकलित हैं। तौसीफ साहब ने शायरी भारत में रहते हुए शुरू कर दी थी जो उनके पाकिस्तान चले जाने के बाद परवान चढ़ी। 1952 बाद पकिस्तान का शायद ही कोई ऐसा अदबी रिसाला हो जिसमें तौसीफ़ साहब का कलाम न छपा हो।

जो सरबलन्द थे ,उन्हें फेंका है ख़ाक पर
जो ख़ाक पर थे उनको उठा ले गयी हवा

मिटटी से रंग,शाख़ से पत्ते, गुलों से बू
जो भी हवा के साथ गया, ले गयी हवा

पतझड़ में शाख़ शाख़ थी तलवार की तरह
हैरत है कैसे खुद को बचा ले गयी हवा

तौसीफ़ साहब की शायरी रिवायती होते हुए भी बिलकुल अलग हट के है। उनके यहाँ जो दर्शन और प्रतीक मिलते हैं वो और कहीं ढूंढने मुश्किल हैं ,हालाँकि उनका मानना है कि ग़ज़ल लेखन सबसे आसान फन है जो चलते फिरते भी निभाया जा सकता है जबकि नज़्म कहने में ज्यादा वक्त लगता है और अगर कहीं कहानी उपन्यास याने नस्र में कुछः कहना हो तो सबसे ज्यादा वक्त लगता है। उनकी शायरी के बारे में राजस्थान के प्रसिद्ध शायर राजेंद्र स्वर्णकार जी ने सतपाल जी के ब्लॉग पर कमेंट करते हुए बहुत सही लिखा है कि " जनाब तौसीफ़ तबस्सुम के कलाम से रू ब रू होना अपने आप में ज़ियारत जैसा है । उनका कलाम उस्तादाना है और जब तक एक ग़ज़ल को चार पांच बार न पढ़ लिया जाय तब तक तश्नगी-ऐ-सुखन बढ़ती ही रहती है " आईये फिर से उनकी शायरी की और मुड़ें :

आवाज़ों के फेर में कैसे हाल खुलेगा भीतर का 
दिल के अंदर हू का आलम, बाहर शोर समंदर का 
हू =ईश्वर 

बहता दरिया, उड़ता पंछी, दोनों ही सैलानी थे 
आँख के रस्ते क़ैद है दिल में इक-इक मंज़र बाहर का 

पहली बार सफर पर निकले, घर की खुशबू साथ चली 
झुकी मुँडेरें कच्चा रस्ता, रोग बने, रस्ते भर का 

" घर की खुशबू " की नज़्मों और ग़ज़लों को हिंदी लिपि में प्रस्तुत करने का सारा श्रेय सुरेश कुमार जी और डायमंड बुक्स को जाता है. सुरेश जी किताब की भूमिका में लिखते हैं कि तौसीफ साहब की शायरी को पढ़ते हुए हमें ऐसा बिलकुल महसूस नहीं होता कि हम किसी दूसरे मुल्क के शायर की रचनाएँ पढ़ रहे हैं। उनकी शायरी में आज भी भारतीय संस्कृति की झलक स्पष्ट दिखाई देती है क्यूंकि भले ही सरहदों ने मुल्क को दो हिस्सों में बाँट दिया हो लेकिन दोनों देशों के नागरिकों खास तौर पर आम इंसान की समस्याएं और हालात लगभग एक जैसे ही हैं तभी हमें वहां की शायरी में भी खुद की आवाज़ सुनाई देती है।

सुनो कवी तौसीफ़ तबस्सुम इस दुःख से क्या पाओगे 
सपना लिखते-लिखते आखिर खुद सपना हो जाओगे 

हर खिड़की में फूल खिले हैं पीले पीले चेहरों के 
कैसी सरसों फूली है, क्या ऐसे में घर जाओगे 

इतने रंगों में क्या तुमको एक रंग मन भाया है 
भेद ये अपने जी का कैसे औरों को समझाओगे 

दिल की बाज़ी हार के रोये हो तो ये भी सुन रक्खो 
और अभी तुम प्यार करोगे और अभी पछताओगे 

तौसीफ़ साहब ने जो लिखा बहुत पुख्ता और मयारी लिखा। उन्हें उनकी "कोई एक सितारा " किताब पर अल्लामा इक़बाल हिजरा अवार्ड से और उर्दू साहित्य में दिए उनके योगदान के लिए पाकिस्तान के "प्रेजिडेंट अवार्ड " से भी नवाज़ा गया। अगर आप गंभीर शायरी के रसिया हैं तो आपको उनकी हिंदी में छपी ये किताब जरूर पढ़नी चाहिए। उनकी चुनिंदा ग़ज़लों और नज़्मों को आप रेख़्ता की साइट पर भी पढ़ सकते हैं.
अगली किताब की तलाश में निकलने से पहले मैं आईये उनकी एक ग़ज़ल के ये शेर पढ़वाता चलता हूँ :

दिल था पहलू में तो कहते थे तमन्ना क्या है 
अब वो आँखों में तलातुम है कि दरिया क्या है 
तलातुम :बाढ़ 

शौक़ कहता है कि हर जिस्म को सिजदा कीजे 
आँख कहती है कि तूने अभी देखा क्या है 

क्या ये सच है कि खिजाँ में भी चमन खिलता है 
मेरे दामन में लहू है तो महकता क्या है 

 सच कहूं तो आप को तौसीफ़ साहब की चंद ग़ज़लों से शेर पढ़वा कर मुझे तसल्ली नहीं मिली लेकिन अब पूरी की पूरी किताब तो यहाँ पेश नहीं की जा सकती न इसलिए तो सोचा चलो आपको कुछ फुटकर शेर भी पढ़वाता चलूँ , अच्छा लगे तो बताइए जरूर : 

सुना है अस्ल-ऐ-गुलिस्तां सिवा-ऐ-ख़ाक नहीं 
अगर ये सच है तो खुशबू कहाँ से आती है 
अस्ल-ऐ-गुलिस्तां=उपवन का आधार , सिवा-ऐ-ख़ाक =मिटटी के अतिरिक्त
 *** 
याद आएँगी बहुत नींद से बोझिल पलकें 
शाम के साथ ये दुःख और घनेरा होगा 
 *** 
ज़िन्दगी ख़्वाब के साये में बसर हो जाती 
सोचा होता तुझे ,ऐ काश न देखा होता 
 *** 
ज़ीस्त तपते हुए सहरा का सफर थी शायद 
 साया होता तो मुसाफ़िर कहीं ठहरा होता
 *** 
नश्शा-ऐ-कुर्ब से आँखों का गुलाबी होना 
 खून में उठती हुई लहर से डरना उसका 
नश्शा-ऐ-कुर्ब=निकटता का नशा 
   *** 
आइना हँसता है,हँसने दो,मिरे चेहरे पर
सैंकड़ों ज़ख्म हैं हाथों से छुपाऊँ कैसे 
 *** 
अगर ये होश की दीवार गिर जाये 
 मज़ा आये तमाशा देखने में 
 *** 
बरसे जो खुल के अब्र तो दिल का कँवल खिले 
 कब तक मिज़ा-मिज़ा पे समन्दर उठाइये 
 अब्र=बादल, मिज़ा-मिज़ा=पलक-पलक 
 *** 
आईना रूठ गया चेहरे से
 इस मकाँ में नहीं रहता कोई 
 *** 
जो मुझको छोड़ गया इतना बेख़बर तो न था
 जो हमसफ़र है, मिरा दर्द जानता ही नहीं 
 *** 
जो भी गुज़रनी है आँखों पर काश इक बार गुज़र जाये 
 सर्द हवा में जुल्म तो ये है पत्ता-पत्ता गिरता है

Monday, September 4, 2017

किताबों की दुनिया -141

तुम्हारी याद में आँखों से जब बरसात होती है 
तो खुशबू में नहाई चाँद-सी वो रात होती है 

किसी से हम मुख़ातिब हों कोई हो रूबरू अपने 
तुम्हीं को देखते हैं और तुम्हीं से बात होती है 

हमारे पास तो ले देके बस है दर्द की दौलत 
बड़े आराम से अपनी बसर औक़ात होती है 

मान लीजिये कि आप "कौन बनेगा करोड़पति " कार्यक्रम की हॉट सीट पे बैठे हैं और अमिताभ बच्चन आपसे पूछें कि दिल्ली में उर्दू की प्रथम महिला पत्रकार का नाम बताएं जो अपने समय की बेहतरीन शायरा भी रहीं हैं ,तो आप क्या जवाब देंगे ? आपके पास नाम बताने के लिए चार ऑप्शन भी अगर नहीं हैं तो हो सकता है कि अगर आप हिंदी भाषी हैं तो शायद इस सवाल पर सर खुजाएँ और किसी लाइफ लाइन जैसे "फोन ऐ फ्रेंड" या "ऑडियंस पोल" का चुनाव करें पर उर्दू प्रेमी और पुराने लोग मुमकिन है कि इसका जवाब दे पाएं।

गुमां यक़ीन की हद तक कभी नहीं आया 
भरोसा अपनी समझ पर मुझे ज़ियादा था 

न जाने कैसे हुई मात बादशाह को भी 
हमारे पास तो ले-देके इक पियादा था

तुम्हारे दौर से 'सर्वत' निबाह कर न सकी 
कि उसके पास रिवायत का इक लबादा था 

मक्ते में शायरा का नाम आने से हो सकता है आप में से कुछ को उनका का नाम याद आ गया हो लेकिन जिन्हें नहीं आया उन्हें बता दूँ कि हमारी आज की शायरा है 28 नवम्बर 1949 को दिल्ली में जन्मी " नूरजहां सर्वत " जिनकी किताब " बेनाम शजर " की बात आज हम करेंगे। ये किताब वाणी प्रकाशन से सन 2000 में प्रकाशित हुई थी।


वक़्त, अल्फ़ाज़ का मफ़हूम बदल देता है 
देखते-देखते हर बात पुरानी होगी 
मफ़हूम =अर्थ 

बेज़बाँ कर गया मुझको तो सवालों का हुजूम 
ज़िन्दगी आज तुझे बात बनानी होगी 

कर रही है जो मेरे अक्स को धुंधला 'सर्वत ' 
मैंने दुनिया की कोई बात न मानी होगी

'सर्वत' साहिबा ने अपनी तालीम की शुरुआत दिल्ली के बुलबुली खन्ना सीनियर सेकण्डरी स्कूल से की और फिर दिल्ली कालेज अजमेरी गेट से बी.ऐ. की डिग्री हासिल की। दिल्ली विश्विद्यालय से 1971 में उन्होंने एम.ऐ की डिग्री डिस्टिंक्शन से हासिल की। नूरजहां अपने समय की बहुत मेधावी छात्र रहीं। उन्होंने अपनी विलक्षण योग्यता का परिचय "जवाहर लाल नेहरू" यूनिवर्सिटी और उसके बाद ज़ाकिर हुसैन कॉलेज में लेक्चरर के पद पर छात्रों को पढ़ाते हुए दिया।

याद है उससे बिछुड़ने का समां 
शाख़ से फूल जुदा हो जैसे 

हर क़दम सहते हैं लम्हों का अज़ाब 
ज़िन्दगी कोई खता हो जैसे 
अज़ाब =यातना 

ज़िन्दगी यूँ है गुरेज़ाँ 'सर्वत' 
हमने कुछ मांग लिया हो जैसे 
गुरेज़ाँ =दूर दूर रहना 

कुछ समय तक वो आल इण्डिया रेडिओ के साथ रहीं और रेडिओ के लिए विभिन्न क्षेत्र से जुड़े लोगों से गुफ़्तगू की ज़िम्मेवारी सफलता से निभाई। सन 1980 से उन्होंने "कौमी एकता" अखबार के साथ बतौर पत्रकार काम करना शुरू कर दिया। उन्होंने बाद में उस पत्रिका के रविवारीय संस्करण के संपादक की हैसियत से भी काम संभाला। पत्रकारिता के क्षेत्र में उनकी निडरता और खुले विचारों ने सबको प्रभावित किया। मुंबई के "इंक़लाब " अखबार के दिल्ली रेजिडेंट संपादक पद पर भी उन्होंने काम किया और और इस तरह उन्होंने दिल्ली की प्रथम महिला संपादक होने का श्रेय हासिल किया।

गुरुर से सर उठा रहे थे, वो जश्ने-हस्ती मना रहे थे 
हवा ने खींचा जब अपना दामन, हवा हुए फिर हुबाब सारे 
हुबाब=बुलबुला 

वो खुशबुओं का लिबास पहने, मिला कुछ ऐसे कि एक पल में 
पड़े हुए थे जो जिस्मो-जां पर, उतर गए वो नकाब सारे 

सवाल सादा सा ज़िन्दगी से, किया था हमने भी एक 'सर्वत' 
वो पत्थरों की हुई है बारिश, कि मिल गए हैं जवाब सारे 

नूरजहां 'सर्वत'साहिबा के लिए प्रो शारिब रदौलवी साहब ने लिखा है कि "सर्वत उर्दू की एक अच्छी और मक़बूल शायरा हैं। उर्दू में ख़ासतौर से हिन्दुस्तान में शायरा का तसव्वुर बड़ा अजीब है, रिवायती किस्म के अशआर, मुतारन्नुम आवाज़, निजी कैफ़ियतों से आरी (रिक्त) शायरी। लेकिन 'नूरजहां' इससे बिलकुल मुख़्तलिफ़ हैं। पत्रकार की हैसियत से ज़िन्दगी को उन्होंने बहुत करीब से देखा है तभी इन अनुभवों ने उनकी शायरी में एक अजीब किस्म की बेचैनी और कर्ब पैदा कर दिया है। 

तन्हाइयों की बर्फ कि पिघली नहीं हनोज़ 
यादों के ऐतबार की भी धूप छंट गयी 

हमने वफ़ा निभाई बड़ी तम्कनत के साथ 
अपने ही बल पे ज़िंदा रहे उम्र कट गयी
तम्कनत = गर्व

'सर्वत' हरेक रुत में लपेटे रहे जिसे 
वो नामुराद आस की चादर भी फट गयी

 "बेनाम शजर" नूरजहां साहिबा का एक मात्र मजमुआ है जो 1995 में उर्दू में शाया हुआ और सन 2000 में वाणी प्रकाशन से हिंदी में। इस किताब में 'सर्वत' जी की 34 ग़ज़लें और 42 नज़्में संकलित हैं। उनकी नज़्में भी ग़ज़लों की तरह पूरी दुनिया में मकबूल हुईं। उन्होंने अपनी ही तरह की अलग सी शैली की में कही गयी ग़ज़लों और नज़्मों से पूरी दुनिया के उर्दू प्रेमियों को अपना दीवाना बना दिया। दुनिया के हर ऐसे देश में जहाँ उर्दू बोली या समझी जाती है उन्होंने अपने फ़न का झंडा गाड़ा है।

तय करो अपना सफर तन्हाइयों की छाँव में 
भीड़ में कोई तुम्हें क्यों रास्ता देने लगा 

कुरबतों की आंच में जलने से कुछ हासिल न था 
कैसे-कैसे लुत्फ़ अब ये फ़ासला देने लगा 
कुर्बत=निकटता

'सर्वत' साहिबा इस किताब की भूमिका में लिखती है कि 'शायरी की असल बुनियाद एहसासो-फ़िक्र है लेकिन आज का इंसान संवेदनाओं और कोमल भावनाओं से कोसों दूर हो गया है , इंसानी रिश्ते बेमानी हो गए हैं ,तहज़ीब के धागे में पिरोये मोती बिखर के टूट चुके हैं। हमारे बीच बड़ा से बड़ा हादसा यूँ गुज़र जाता है जैसे कुछ हुआ ही नहीं। किसी को किसी के लिए सोचने ठहरने की फुर्सत नहीं है ऐसे हालात में शायरी बहुत मुश्किल हो गयी है , अगर इंसान इसी तरह फ़िक्रों-एहसास से दूर होता चला गया तो शायरी नामुमकिन हो जाएगी।

भुला चुके थे मगर ये मुआमला कब था 
उसे न याद करें इतना हौसला कब था 

सहारा बख़्श दिया हमको यादे-माज़ी ने 
तुम्हारे दौर में जीने का वलवला कब था 
यादे-माज़ी =अतीत की याद ; वलवला =उत्साह 

उजाले जिसने बिखेरे हैं मेरी राहों में 
तिरि सदा थी सितारों का काफला कब था 

प्रोफ़ेसर 'गोपी चंद नारंग' साहब फरमाते हैं कि " नूरजहां सर्वत ' के यहाँ तुरंत चकाचौंध कर देने वाली दुनिया नहीं है, मानवीय रिश्तों के उतार चढ़ाव और दर्द का ऐसा धुंधला-धुंधला उजाला अवश्य है जो रूह में उतर जाता है और किसी न किसी कैफियत का पता देता है। ये शायरी जरुरत की पैदावार नहीं अंदर की आवाज़ है।

दिल्ली उर्दू अकेडमी ने उन्हें उर्दू की खिदमत करने पर अवार्ड भी दिया था। अपनी शायरी से उर्दू अदब को मालामाल कर देने वाली इस शायरा ने मात्र 60 साल की उम्र में ,17 अप्रेल 2010 को, इस दुनिया को अलविदा कह दिया। उनके पत्रकारिता और उर्दू अदब के क्षेत्र में दिए योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता और ना ही उनके द्वारा छोड़े गए रिक्त स्थान को कभी भरा जा सकता है।

बहुत डूबे रहे मन की चुभन में 
ज़रा अब जा के देखें अंजुमन में 

हुए हैं शहर इंसानों से खाली 
कि तहज़ीबें बसी हैं जा के बन में 

भला आईने को इसकी खबर क्या
कि कितना खोट है किस-किस के मन में 

कहूं क्या उसमें किस दर्ज़ा कशिश थी 
कि 'सर्वत' खो गयी जिसकी लगन में 

इस किताब की प्राप्ति के लिए आप वाणी प्रकाशन को लिखें जिसका पता और नंबर मैंने अपनी पिछली बहुत सी पोस्ट में दिया है। अगर वाणी से ये किताब नहीं मिले तो आप इस लिंक को कॉपी करें और गूगल कर लें ये लिंक आपको आन लाइन ऑर्डर करने की सुविधा देगा



हर उर्दू शायरी के दीवाने के पास ये किताब होनी चाहिए क्यों की इसमें कुछ ऐसी नज़्में हैं जो संग्रहणीय हैं और जिन्हें मैंने भी ज़ाहिर नहीं किया है. आखिर थोड़ा सस्पेंस भी बना रहना जरूरी है न। अगली किताब की तलाश से पहले चलते चलते उनकी एक ग़ज़ल के ये शेर और पढ़वाता चलता हूँ :

आपबीती में भला किसको मज़ा आएगा
दास्ताँ अपनी यहाँ किसको सुनाने निकले

कितने कमज़र्फ थे वो लोग जो अपने घर से
बेबसी अपनी ज़माने को दिखाने निकले
कमज़र्फ =ओछे

दिल की दुनिया में अभी तक हैं अकेले 'सर्वत'
हम तो नादान रहे लोग सयाने निकले