Monday, June 3, 2013

नीम के ये पेड़


हो खफा हमसे वो रोते जा रहे हैं 
और हम रुमाल होते जा रहे हैं 

नीम के ये पेड़ इक दिन आम देंगे 
 सोच कर रिश्तों को ढोते जा रहे हैं

पत्थरों से दोस्ती कर ली है जब से 
आईने पहचान खोते जा रहे हैं 

कब तलक दें फूल उनको ये बताओ 
जो हमें कांटे चुभोते जा रहे हैं

रहनुमा मक्खन का वादा करके देखो 
कब से पानी ही बिलोते जा रहे हैं 

है यकीं इक दिन यहीं गुलशन बनेगा 
बीज हम बंज़र में बोते जा रहे हैं 

पास मत आना हमारे, कह रहे जो 
आँख से "नीरज" वो न्योते जा रहे हैं

46 comments:

इस्मत ज़ैदी said...

रहनुमा मक्खन का वादा करके देखो
कब से पानी ही बिलोते जा रहे हैं

वाह बड़ी ही सहज और आम बोलचाल की भाषा में कही गई ग़ज़ल
बहुत ख़ूब !!!

Dr. Amar Jyoti said...

एक शानदार ग़ज़ल के लिए बधाई.
'नीम के ये पेड़ ....' तो हासिले ग़ज़ल
शेर है.

Madan Mohan Saxena said...

अच्छी रचना...अंतिम पंक्तियाँ तो बहुत ही अच्छी लगीं.

Vijay Kumar Shrotryia said...

बेहतरीन ...
मेरा उत्तर >>>
हम नहीं सुधरे हमे मालूम कब था
नीम मीठे आम होते जा रहे हैं..।

साभार
विजय

Anupama Tripathi said...

bahut sundar abhivyakti .

Ashok Khachar said...

पत्थरों से दोस्ती कर ली है जब से
आईने पहचान खोते जा रहे हैं
क्या बात है वाह वाह बहोत अच्छा शेर है वाह

Reena Maurya said...

बेहतरीन गजल...
अति उत्तम...
:-)

parul singh said...

hamesha rumal hona hausle ka kam hai.....Khubsurat gajal.....

नीरज गोस्वामी said...

Via Facebook:-


Tejendra Sharma: नीम के ये पेड़ इक दिन आम देंगे
सोच कर रिश्तों को ढोते जा रहे हैं... (Rishton kee defination)

नीरज गोस्वामी said...

Via Face book:-

Prakash Khatri: नीम के ये पेड़ इक दिन आम देंगे
सोच कर रिश्तों को ढोते जा रहे हैं..waah.

नीरज गोस्वामी said...

Via Facebook:-

Pramod Kumar: achchi gajal......

नीरज गोस्वामी said...

Via Facebook:-

Anand Kumar Mishra:: Lajabaab....

Jabab...wakayee Nahin

Saral Bhasha......Saumay Andaaz

NAVIN C. CHATURVEDI said...

नीम के ये पेड़ इक दिन आम देंगे
सोच कर रिश्तों को ढोते जा रहे हैं ........... बहुत ख़ूब भाई जी और बिलोते वाला भी ज़बरदस्त शेर है।

ताऊ रामपुरिया said...

शानदार, एक से बढके एक.

रामराम.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत खूबसूरत गज़ल

दीपिका रानी said...

बहुत खूब नीरज जी... बड़े दिन बाद आपकी कोई ग़ज़ल पढ़ने को मिली।

Saurabh said...

आमंत्रण खुला था सो आया और मुग्ध हो गया.

सबने नीम और आम वाले शेर पर कुछ न कुछ कहा है. मुझे भी अच्छा लगा.
पानी बिलोने वाला शेर अपनी अलग तासीर रखता है.

आपकी लेखिनी का अपना अंदाज़ है जो गठा हुआ है.
सादर

Neeraj Kumar said...

बहुत खूब

Bhagat Singh Panthi said...

नीम के ये पेड़ इक दिन आम देंगे
सोच कर रिश्तों को ढोते जा रहे हैं
wah!

KRANT M.L.Verma said...

नीरज जी!आपकी निष्ठा असंदिग्ध है फल जरूर देगी विश्वास रखिये!

तिलक राज कपूर said...

हर शेर लाजवाब
आपने प्रश्‍न उइाया है तो हुजूर खार सारे खत्‍म न हो जायें तब तक, फूल देते जाईये और परिणाम देखें।

Abhishek Ojha said...

रुमाल और नीम के पेड़ - सबसे अच्छे :)

pallavi trivedi said...

नीम के ये पेड़ इक दिन आम देंगे
सोच कर रिश्तों को ढोते जा रहे हैं.... gazab
...

Rajesh Kumari said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगलवार ४ /६/१३ को चर्चामंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आप का वहां हार्दिक स्वागत है ।

shorya Malik said...

नीम के ये पेड़ इक दिन आम देंगे
सोच कर रिश्तों को ढोते जा रहे हैं

आदरणीय नीरज गोस्वामी जी ,

नमस्कार ,

बहुत सुंदर लिखा है , ह्रदय को छूने वाली बाते है,, और सच भी है, आभार

अरुन शर्मा 'अनन्त' said...

आपकी यह रचना कल मंगलवार (04 -06-2013) को ब्लॉग प्रसारण के "विशेष रचना कोना" पर लिंक की गई है कृपया पधारें.

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

नीम के ये पेड़ इक दिन आम देंगे
सोच कर रिश्तों को ढोते जा रहे हैं
वाह !!! बहुत सुंदर गजल के लिए बधाई नीरज जी ,,


recent post : ऐसी गजल गाता नही,

Anurag Sharma said...

बहुत सुंदर!

नीरज गोस्वामी said...

Recd on e-mail:-

bhai neeraj ji
ati sunder rachan hai
badhai ho,
prof kuldip salil ji ki kitab "dhoop ke saye mein"" ki samiksha kab kar rahen hain

kabhi delhi ayen to milen
saadar-
om sapra, delhi-
98181809032

Shiv said...

बड़ी सहजता के साथ बेहतरीन ग़ज़लें लिखने में महारत हासिल है आपको। सारे शेर एक से बढ़कर एक।
हमारे समय की बेहतरीन रिपोर्टिंग हैं आपकी गज़लें।

sushila said...

पास मत आना हमारे, कह रहे जो
आँख से "नीरज" वो न्योते जा रहे हैं

क्या बात है ! खूबसूरत !

Onkar said...

सुन्दर ग़ज़ल

नीरज गोस्वामी said...

Via Facebook:-

Akash Lalwani Jain:: lajawaab

प्रदीप कांत said...

हो खफा हमसे वो रोते जा रहे हैं
और हम रुमाल होते जा रहे हैं

नीम के ये पेड़ इक दिन आम देंगे
सोच कर रिश्तों को ढोते जा रहे हैं

रहनुमा मक्खन का वादा करके देखो
कब से पानी ही बिलोते जा रहे हैं

_______________________________

baDhiyaa

_______________________________


आशा जोगळेकर said...

नीम के ये पेड़ इक दिन आम देंगे
सोच कर रिश्तों को ढोते जा रहे हैं ।

क्या कमाल का शेर है वैसे तो पूरी गज़ल शानदार है ।
बचपन भी याद आ गया जब निबौरियों को आम बना कर ढक्कनों की तराजू में तोल कर बेचा करते थे और इमली के बीजों के पैसे पाकर खुश होते थे ।

नीरज गोस्वामी said...

From Facebook:-

Pravin Naik:: nice awesoom.............

नीरज गोस्वामी said...

Via Facebook::

Amitabh Meet :: बहुत ख़ूब सर जी ! लाजवाब ग़ज़ल !

Yashwant Mathur said...

आपने लिखा....हमने पढ़ा
और लोग भी पढ़ें;
इसलिए कल 08/06/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
आप भी देख लीजिएगा एक नज़र ....
धन्यवाद!

कविता रावत said...

बहुत सुन्दर गहरे भाव

नीरज गोस्वामी said...

Via mail:-

आपको रूमाल क्या चादर मिलेगी
क्यूँ बेचारे को भिगोते जा रहे हैं


Sarv Jeet "Sarv"

नीरज गोस्वामी said...

Via e-mail:-

जब कभी इतिहास लिखा जायेगा
नीरज कवि को याद रखा जायेगा

दिल से

चाँद शुक्ला हदियाबादी

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

हमेशा की तरह ग़जल तो शानदार है ही। इसी काफ़िए में एक मौजूँ शेर सटाता हूँ :

आडवाणी जी हुए इतिहास फिर भी
जिद में किश्ती को डुबोते जा रहे हैं

रचना दीक्षित said...

है यकीं इक दिन यहीं गुलशन बनेगा
बीज हम बंज़र में बोते जा रहे हैं

उम्मीद जगी रहनी चाहिये.

बेहतरीन भाव लिये सुंदर गज़ल.

Shiv Kumar Sahi said...

vehad sunder surili rachna ... LAZBAB

संतोष पाण्डेय said...

हर शेर शानदार। कितनी सरलता है.

संजय भास्‍कर said...

क्या बात है