Monday, July 23, 2012

कि जिनके हाथ में जलती हुई माचिस की तीली है



नजाकत है न खुश्बू औ’ न कोई दिलकशी ही है
गुलों के साथ फिर भी खार को रब ने जगह दी है

किसी की याद चुपके से चली आती है जब दिल में
कभी घुँघरू से बजते हैं, कभी तलवार चलती है

वही करते हैं दावा आग नफरत की बुझाने का
कि जिनके हाथ में जलती हुई माचिस की तीली है

हटो, करने दो अपने मन की भी इन नौजवानों को
ये इनका दौर है, इनका समय है, इनकी बारी है

घुटन, तड़पन, उदासी, अश्क, रुसवाई, अकेलापन
बग़ैर इनके अधूरी इश्क की हर इक कहानी है

कभी बच्चों को मिल कर खिलखिलाते नाचते देखा
लगा तब जिंदगी ये हमने क्या से क्या बना ली है

उतर आये हैं बादल याद के आंखों में यूं “नीरज”
ज़मीं जो कल तलक सूखी थी अब वो भीगी भीगी है

47 comments:

Shiv said...

कभी बच्चों को मिल कर खिलखिलाते नाचते देखा
लगा तब जिंदगी ये हमने क्या से क्या बना ली है

उतर आये हैं बादल याद के आंखों में यूं “नीरज”
ज़मीं जो कल तलक सूखी थी अब वो भीगी भीगी है

शानदार! जीवन के रंग ही रंग लिए शानदार गजल.

parul singh said...

नीरज जी
बहुत ही खूबसूरत गजल कही है ...हर एक शेर गहराई लिए हुए
हैरान यूँ हूँ के यंहा किसका जिक्र करू .. फिर भी जो बहुत ही दिल को छू
गए है वो है
किसी की याद चुपके से चली आती है जब दिल में
कभी घुँघरू से बजते हैं, कभी तलवार चलती है

घुटन, तड़पन, उदासी, अश्क, रुसवाई, अकेलापन
बग़ैर इनके अधूरी इश्क की हर इक कहानी है

और जमीं के गीली होने का संकेत बता रहा है के
याद कितनी गहरी थी ....

उतर आये हैं बादल याद के आंखों में यूं “नीरज”
ज़मीं जो कल तलक सूखी थी अब वो भीगी भीगी है

शुक्रिया इस पोस्ट के लिए

पारुल सिंह

हरकीरत ' हीर' said...

नजाकत है न खुश्बू औ’ न कोई दिलकशी ही है
गुलों के साथ फिर भी खार को रब ने जगह दी है
क्या बात है .....
किसी की याद चुपके से चली आती है जब दिल में
कभी घुँघरू से बजते हैं, कभी तलवार चलती है
oye होए ....!!
वही करते हैं दावा आग नफरत की बुझाने का
कि जिनके हाथ में जलती हुई माचिस की तीली है
ग्रेट ....
हटो, करने दो अपने मन की भी इन नौजवानों को
ये इनका दौर है, इनका समय है, इनकी बारी है
पर आपका कोई saani नहीं .....
घुटन, तड़पन, उदासी, अश्क, रुसवाई, अकेलापन
बग़ैर इनके अधूरी इश्क की हर इक कहानी है
kyamat है ये इश्क की खानी .....:))
कभी बच्चों को मिल कर खिलखिलाते नाचते देखा
लगा तब जिंदगी ये हमने क्या से क्या बना ली है
sacch....!!
उतर आये हैं बादल याद के आंखों में यूं “नीरज”
ज़मीं जो कल तलक सूखी थी अब वो भीगी भीगी है

गलत .....
नीरज की jamin कभी भीगी हो ही नहीं सकती ....!!

शारदा अरोरा said...

bahut achchi lagi gazal

सदा said...

कभी बच्चों को मिल कर खिलखिलाते नाचते देखा
लगा तब जिंदगी ये हमने क्या से क्या बना ली है
इन पंक्तियों में बिल्‍कुल मन की बात कह दी आपने ... लाजवाब प्रस्‍तुति ...आभार

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

किसी की याद चुपके से चली आती है जब दिल में
कभी घुँघरू से बजते हैं, कभी तलवार चलती है

बहुत खूब ...विरोधाभास को बखूबी लिखा है ...बहुत खूबसूरत गज़ल

दर्शन कौर धनोय said...

किसी की याद चुपके से चली आती है जब दिल में
कभी घुँघरू से बजते हैं, कभी तलवार चलती है...

बहुत खूब नीरज जी आज तो अंदाज ही निराला है ...

Rohitas ghorela said...

किसी की याद चुपके से चली आती है जब दिल में
कभी घुँघरू से बजते हैं, कभी तलवार चलती है



एक से एक बढकर लाजवाब शैर

बार बार पढ़ने को मन कर रहा



awesome

please welcome to my blog. It will be my pleasure

बधाई स्वीकारें

kshama said...

Nihayat khoobsoorat rachana!

यादें....ashok saluja . said...

नीरज जी,
में अपनी टिप्पणी "हीर" जी से साझा करना चाहता हूँ ..इज़ाज़त हीर जी ..?
शुभकामनाएँ!

रविकर फैजाबादी said...

उत्कृष्ट प्रस्तुति |
आभार श्रीमान जी ||

रश्मि प्रभा... said...

किसी की याद चुपके से चली आती है जब दिल में
कभी घुँघरू से बजते हैं, कभी तलवार चलती है
:)

इस्मत ज़ैदी said...

वही करते हैं दावा आग नफरत की बुझाने का
कि जिनके हाथ में जलती हुई माचिस की तीली है
बिल्कुल सही कहा, आप ने सच्चाई शेर में ढाल दी है

कभी बच्चों को मिल कर खिलखिलाते नाचते देखा
लगा तब जिंदगी ये हमने क्या से क्या बना ली है

क्या बात है !! बहुत मासूम शेर है

dheerendra said...

घुटन, तड़पन, उदासी, अश्क, रुसवाई, अकेलापन
बग़ैर इनके अधूरी इश्क की हर इक कहानी है,,,,

वाह ,,, बहुत बढ़िया प्रस्तुती, सुंदर गजल ,,,,

RECENT POST काव्यान्जलि ...: आदर्शवादी नेता,

दीपिका रानी said...

आपकी ग़ज़ल में कसक भी है, और संदेश भी.. बहुत सुंदर

दिगम्बर नासवा said...

वही करते हैं दावा आग नफरत की बुझाने का
कि जिनके हाथ में जलती हुई माचिस की तीली है

नीरज जी जब से ये शेर पढ़ा है गुनगुना रहा हूँ ... लाजवाब ... बहुत ही मस्त शेर है ... आजके इंसान का असली शेहरा ...

GYANDUTT PANDEY said...

वास्त्व मे‍ यह अनुभूत सत्य है -

वही करते हैं दावा आग नफरत की बुझाने का
कि जिनके हाथ में जलती हुई माचिस की तीली है!

डॉ टी एस दराल said...

वही करते हैं दावा आग नफरत की बुझाने का
कि जिनके हाथ में जलती हुई माचिस की तीली है
वाह ! बढ़िया व्यंग के साथ सुन्दर ग़ज़ल .

manu said...

बहुत दिन बाद आए आज आप के इधर ..फेसबुक की बदौलत..

हीर जी से पहले आए होते तो कुछ कहते भी..अब कुछ रहा ही नहीं कहने को..


मक्ते कू देखते हैं..और फिर कमेन्ट को..


गलत .....
नीरज की jamin कभी भीगी हो ही नहीं सकती ....!!

:)

इमरान अंसारी said...

खुबसूरत......कुछ शेर तो बहुत उम्दा है

ऋता शेखर मधु said...

कभी बच्चों को मिल कर खिलखिलाते नाचते देखा
लगा तब जिंदगी ये हमने क्या से क्या बना ली है

वाह !! बच्चों जैसी सच्चाई और निश्छलता खोकर वाकई बड़े क्या बन जाते हैं...

पूरी की पूरी ग़ज़ल लाज़वाब !!!

शिवनाथ कुमार said...

कभी बच्चों को मिल कर खिलखिलाते नाचते देखा
लगा तब जिंदगी ये हमने क्या से क्या बना ली है

अंतर्भाव खूबसूरती से रखा आपने ...

प्रवीण पाण्डेय said...

वही करते हैं दावा आग नफरत की बुझाने का
कि जिनके हाथ में जलती हुई माचिस की तीली है

क्या हौले से झटका दिया है..

Abhishek Ojha said...

शानदार ! ..."कि जिनके हाथ में जलती हुई माचिस की तीली है"

vandana said...

कभी घुँघरू से बजते हैं, कभी तलवार चलती है

बहुत बढ़िया प्रतीक
साथ ही
वही करते हैं दावा आग नफरत की बुझाने का
कि जिनके हाथ में जलती हुई माचिस की तीली है
और
कभी बच्चों को मिल कर खिलखिलाते नाचते देखा
लगा तब जिंदगी ये हमने क्या से क्या बना ली है

शेर लाजवाब हैं

Nikhil said...

सुन्दर ! अति-सुन्दर !

तिलक राज कपूर said...

अब आपकी इस ग़ज़ल पर कया कहूँ। सादर नमन है उस सोच को जिससे ये जन्‍मी है।
ग़ज़ल पढ़कर लगा हर शेर की रंगत नयी सी है
नयी इनकी अदा है, औ कहन इनकी ज़मीनी है।

नीरज गोस्वामी said...

Comment received on fb:-

Rajeev Bharol वाह वाह. नीरज जी. कमाल की गज़ल. गजब का मतला.

नीरज गोस्वामी said...

Comment received on mail:-

Sir ji

wah wah kya likha hai
किसी की याद चुपके से चली आती है जब दिल में
कभी घुँघरू से बजते हैं, कभी तलवार चलती है

subhan allah

With Regards:
RADHE SHYAM MUNDHRA
Mob:09381020516

प्रतीक माहेश्वरी said...

क्या खूब ग़ज़ल लिखी है नीरज जी!
बेहतरीन!

Reena Maurya said...

बहुत ही बढ़िया सर जी...
बेहतरीन गजल
:-)

PRAN SHARMA said...

AAPKEE GAZAL DIL MEIN SAMAA GAYEE HAI.

अर्शिया अली said...

बहुत ही प्‍यारी गजल कही है आपने। बधाई।

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सर्व said...

नीरज जी

मन होता है कि हर इक शेर को हथेलियों में समेट कर रख लें !

इसी पर कहा है -

"वो बीते वक्त का पानी रहे हम मश्क़ में ढोते
इसी से बूँद रिस रिस के गयी कर ज़िन्दगी सीली!"

SATISH said...

आदरणीय नीरज जी,
बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल कही है वाह...वाह..

"नजाकत है न खुश्बू औ’ न कोई दिलकशी ही है
गुलों के साथ फिर भी खार को रब ने जगह दी है"
जवाब नहीं.....वाह वाह

"किसी की याद चुपके से चली आती है जब दिल में
कभी घुँघरू से बजते हैं, कभी तलवार चलती है"
क्या कहने...

खूबसूरत अशआर पढ़वाने के लिए आपका सादर आभार.
दिली मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं.
सादर,
सतीश शुक्ला 'रक़ीब'
जुहू, मुंबई-49.

Vaanbhatt said...

छा गये बन्धु...क्या लाज़वाब शेर मारे हैं...

वही करते हैं दावा आग नफरत की बुझाने का
कि जिनके हाथ में जलती हुई माचिस की तीली है

Bharat Bhushan said...

कभी बच्चों को मिल कर खिलखिलाते नाचते देखा
लगा तब जिंदगी ये हमने क्या से क्या बना ली है

क्या बात है नीरज जी. बहुत खूब ग़ज़ल कही है.

निर्मला कपिला said...

कितनी देर तो मतले पर ही अटकी रही बार बार पढा। दिल नही भरा और फिर इस शेर पर
घुटन, तड़पन, उदासी, अश्क, रुसवाई, अकेलापन
बग़ैर इनके अधूरी इश्क की हर इक कहानी है

नीरज जी कमाल की गज़ल है बधाई।

देवेन्द्र पाण्डेय said...

कमाल की गज़ल है हर इक शेर नपे तुले गहरे अर्थ लिए हुए। यह शेर तो यहाँ से ले जाकर अपनी पोस्ट में चिपकाता हूँ..

कभी बच्चों को मिल कर खिलखिलाते नाचते देखा
लगा तब जिंदगी ये हमने क्या से क्या बना ली है।

डॉ.त्रिमोहन तरल said...

किसी की याद चुपके से चली आती है जब दिल में

कभी घुँघरू से बजते हैं कभी तलवार चलती है

ज़िन्दगी के साठोत्तरी पढाव पर ये सत्ताईस साला अहसासात आपको ताउम्र यों ही जवान बनाए रक्खेंगे ये एकदम तय है .और उसके बाद

कभी बच्चों को मिलकर खिलखिलाते नाचते देखा

लगा तब ज़िन्दगी ये हमने क्या से क्या बना ली है

पर आते-आते एकबारगी फिर उसी हकीक़त से रूबरू जो ज़िन्दगी के तजुर्बात के चलते इस उम्र में हो जाना अपरिहार्य-सा ही लगता है. बहरहाल, एक उम्दा ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई.

डॉ0 त्रिमोहन तरल , आगरा

Devendra Gautam said...

नजाकत है न खुश्बू औ’ न कोई दिलकशी ही है
गुलों के साथ फिर भी खार को रब ने जगह दी है

घुटन, तड़पन, उदासी, अश्क, रुसवाई, अकेलापन
बग़ैर इनके अधूरी इश्क की हर इक कहानी है

क्या खूब ग़ज़ल कही है नीरज जी! आप निश्चित रूप से कुछ महत्वपूर्ण काम में व्यस्त रहे होंगे लेकिन ब्लॉग जगत में आपकी लम्बी चुप्पी खल रही थी.

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

.

मेरा कमेंट ?
गायब !?
…पता नहीं क्या समस्या है … … …


नीरज भाईसाहब,
बहुत शानदार ग़ज़ल हुई है … एक-एक शे'र काबिले-ता'रीफ़ है ।

इस शे'र का तो जवाब ही नहीं -
"कभी बच्चों को मिल कर खिलखिलाते नाचते देखा
लगा तब जिंदगी ये हमने क्या से क्या बना ली है"

सादर शुभकामनाओं सहित …

Ankit Joshi said...

नमस्कार सर जी, बहुत उम्दा शेर कहे हैं.
"किसी की याद चुपके से चली आती है जब दिल में............" वाह वा
इस शेर पे तो कुछ कहते नहीं बन रहा बस बार-बार पढ़े जा रहा हूँ. लाजवाब शेर कहा है..............
हटो, करने दो अपने मन की भी इन नौजवानों को
ये इनका दौर है, इनका समय है, इनकी बारी है

"कभी बच्चों को मिल कर खिलखिलाते नाचते देखा......................", nostalgic sher
मक्ता भी खूब गढ़ा है आपने....."उतर आये हैं बादल याद के आंखों में यूं “नीरज”....................." वाह वा

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बेहतरीन गजल है सर!


सादर

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

बहुत खुबसूरत गजल है सर...
एक एक शेर... वाह! वाह!
सादर.

sumitra sharma said...

नजाकत है न खुश्बू औ’ न कोई दिलकशी ही है

गुलों के साथ फिर भी खार को रब ने जगह दी है

छोटा सा तथ्य मगर कितना बड़ा सबक हम ये समझ ले तो जिंदगी आराम से कट जाये की फूलो के साथ काँटों को होना ही है

Sandeep Sirohi said...

किसी की याद चुपके से चली आती है जब दिल में
कभी घुँघरू से बजते हैं, कभी तलवार चलती है..

वाह वाह !!! बहुत खूब , लिखते रहिए |