Monday, October 4, 2010

गुल हमेशा चाहता हमसे रहा बदले में वो




जिस शजर ने डालियों पर देखिए फल भर दिए
हर बशर ने आते - जाते उसको बस पत्थर दिए

शजर : पेड़

रब की नज़रों में सभी इक हैं तो उसने क्यों भला
एक को पत्थर दिए और एक को गौहर दिए
गौहर : मोती

गुल हमेशा चाहता हमसे रहा बदले में वो
जिसने हमको हर कदम पर बेवजह नश्तर दिए
नश्तर: कांटे

खो रहे हैं क्यूँ अदावत में उन्हें, ये सोचिये
प्यार करने के खुदा ने जो हमें अवसर दिए
अदावत: दुश्मनी

मिल गए हैं रहजनों से लूटने के वास्ते
मुल्क को चुनकर ये कैसे आपने रहबर दिए
रहज़न: लुटेरे

कुछ नहीं देती है ये दुनिया किसी को मुफ्त में
नींद ली बदले में जिसको रेशमी बिस्तर दिए

ज़िन्दगी बख्शी खुदा ने माना के "नीरज" हमें
पर लगा हमको कि जैसे खीर में कंकर दिए



( आदरणीय गुरुदेव प्राण शर्मा जी की रहनुमाई में लिखी ग़ज़ल )

70 comments:

स्वाति said...

जिस शजर ने डालियों पर देखिए फल भर दिए
हर बशर ने आते - जाते उसको बस पत्थर दिए

bahut badhiya lagi aapki gazal....

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

खो रहे हैं क्यूँ अदावत में उन्हें, ये सोचिये
प्यार करने के खुदा ने जो हमें अवसर दिए

दुश्मनी में प्यार के एहसास ही तो भूल जाता है इंसान

मिल गए हैं रहजनों से लूटने के वास्ते
मुल्क को चुनकर ये कैसे आपने रहबर दिए

नेताओं पर अच्छा कटाक्ष है ..


ज़िन्दगी बख्शी खुदा ने माना के "नीरज" हमें
पर लगा हमको कि जैसे खीर में कंकर दिए

बहुत अच्छी गज़ल है ...हर शेर उम्दा ..

Shiv said...

बहुत सुन्दर ग़ज़ल. हर एक शेर बढ़िया.

वन्दना said...

जिस शजर ने डालियों पर देखिए फल भर दिए
हर बशर ने आते - जाते उसको बस पत्थर दिए

बस यही तो दुनिया का दस्तूर है जिसे दुनिया खूबसूरती से निभाना जानती है।

रब की नज़रों में सभी इक हैं तो उसने क्यों भला
एक को पत्थर दिए और एक को गौहर दिए

क्या करें……………किस्मत एक सी नही थी ना।

कुछ नहीं देती है ये दुनिया किसी को मुफ्त में
नींद ली बदले में जिसको रेशमी बिस्तर दिए

कुछ पाने के बदले कुछ तो खोना ही पडता है।

ज़िन्दगी बख्शी खुदा ने माना के "नीरज" हमें
पर लगा हमको कि जैसे खीर में कंकर दिए

चलिये कुछ तो मिला हमे उसने इस काबिल ही समझा।

नीरज जी,
गज़ल का हर शेर सोचने को मजबूर करता है………………हमेशा की तरह बहुत ही चुन चुन कर मोती निकाल कर लाते हैं आप्……………बेहतरीन्।

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

poori ghazal behtareen bani hai

कुछ नहीं देती है ये दुनिया किसी को मुफ्त में
नींद ली बदले में जिसको रेशमी बिस्तर दिए

ye sher sabse jyada pasand aayaa...

प्रवीण पाण्डेय said...

बड़ी सुन्दर, गहरी रचना।

इमरान अंसारी said...

नीरज जी,

शानदार ग़ज़ल कुछ शेर बहुत उम्दा बन पड़े हैं ........दाद कबूल फरमाएं |

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी रचना 5-10 - 2010 मंगलवार को ली गयी है ...
कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया

http://charchamanch.blogspot.com/

seema gupta said...

ज़िन्दगी बख्शी खुदा ने माना के "नीरज" हमें
पर लगा हमको कि जैसे खीर में कंकर दिए

" behd khubsurat..."

regards

दिगम्बर नासवा said...

खो रहे हैं क्यूँ अदावत में उन्हें, ये सोचिये
प्यार करने के खुदा ने जो हमें अवसर दिए ..

सुभान अल्ला .... अगर हर कोई इस शेर के ज़ज़्बे को समझ सके तो दुनिया बदल जाए ....
बहुत ही लाजवाब ग़ज़ल है ...

Mumukshh Ki Rachanain said...

कुछ नहीं देती है ये दुनिया किसी को मुफ्त में
नींद ली बदले में जिसको रेशमी बिस्तर दिए

अपन ने तो अभी तक रेशमी बिस्तर देखे ही नहीं.......शायद इसीलिए भाग्यशाली हूँ कि नींद में कोई दखल नहीं, जो भी मिलाती है, सकून दे जाती है.

शानदार ग़ज़ल एक बार फिर हमेशा की ही तरह......

बधाई...बधाई...

चन्द्र मोहन गुप्त

Rajeev Bharol said...

वाह. आनंद आ गया नीरज जी.

"खीर में कंकर".. "रेशमी बिस्तर", "अवसर" वाले शेर तो क्या कहने.

इस्मत ज़ैदी said...

जिस शजर ने डालियों पर देखिए फल भर दिए
हर बशर ने आते - जाते उसको बस पत्थर दिए

वाह !क्या बात है !
बेहद ख़ूबसूरत मतले से शुरू हो कर ग़ज़ल अपनी बलंदियों को छूते हुए मक़ते तक पहुंची

खो रहे हैं क्यूँ अदावत में उन्हें, ये सोचिये
प्यार करने के खुदा ने जो हमें अवसर दिए

सुबहान अल्लाह !
मेरी नज़र में तो हासिले ग़ज़ल शेर है ये

कुछ नहीं देती है ये दुनिया किसी को मुफ्त में
नींद ली बदले में जिसको रेशमी बिस्तर दिए

बहुत ख़ूब!हक़ीक़त बयान की है आप ने

एक बहुत उम्दा ग़ज़ल के लिये बधाई स्वीकार करें

सुशीला पुरी said...

रब की नज़रों में सभी इक हैं तो उसने क्यों भला
एक को पत्थर दिए और एक को गौहर दिए
??????????????????????????????

vishal said...

कुछ नहीं देती है ये दुनिया किसी को मुफ्त में
नींद ली बदले में जिसको रेशमी बिस्तर दिए।
हर चीज की कीमत चुकानी पड़ती है यहाँ। बहुत खूब ग़ज़ल है।

ज़िंदगी की तुलना खीर में आए कंकरों से भी खूब बन पड़ी है।

डॉ टी एस दराल said...

वाह , वाह नीरज जी । अति सुन्दर ग़ज़ल । सत्य ब्यान करती हुई ।

psingh said...

niraj ji
sundar gajl likhi apne
har sher umda hai
kabile tarif
badhai

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

कुछ नहीं देती है ये दुनिया किसी को मुफ्त में
नींद ली बदले में जिसको रेशमी बिस्तर दिए

ज़िन्दगी बख्शी खुदा ने माना के "नीरज" हमें
पर लगा हमको कि जैसे खीर में कंकर दिए

क्या कहूँ ? और कहने को क्या रह गया ...
इतनी सुन्दर पंक्तियाँ हैं कि मेरे पास शब्द नहीं है तारीफ़ के लिए ...

अभिषेक ओझा said...

"कुछ नहीं देती है ये दुनिया किसी को मुफ्त में
नींद ली बदले में जिसको रेशमी बिस्तर दिए" वाह !

shyam1950 said...

हर शेर को पढ़ने के बाद एक ही शब्द दिमाग में गूंजता रहा "कमाल"

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

आज बस कह लेने दीजिए आपकी बात आप ही की ग़ज़ल के बारे में... वो कलम कहाँ है जिससे आपने ये गज़ल लिखी...चूमने को जी कर रहा है... बेहद खूबसूरत लफ्ज़ और उतने ही खूबसूरत ज़ज्बात पिरोये हैं आपने अपनी गज़ल में…

तिलक राज कपूर said...

एक को पत्‍थर मिला और एक को गौहर मिला।
पर एतराज न करें:
जोडि़यॉं ही वो बनाता है जहां में इस तरह
एक को बीबी मिली और एक को शौहर मिला।

अब किस को क्‍या मिला ये मुकद्दर की बात है।

खैर ये तो हुआ विशुद्ध हास्‍य आप जैसी हास्‍य प्रवृत्ति के लिये, गंभीर बात यह है कि इस ग़ज़ल में आपने जो गौहर दिये हैं वो सम्‍हाल कर रखने की चीज हैं। आपकी घड़ी मूर्ति पर प्राण शर्मा साहब की रहनुमाई, जैसे सोने पर सुहागा
भूमंडलीकृत सोच है। बधाई।

rashmi ravija said...

मिल गए हैं रहजनों से लूटने के वास्ते
मुल्क को चुनकर ये कैसे आपने रहबर दिए

बहुत खूब...सारे शेर बहुत ही उम्दा हैं..

रूप said...

किब्ला, क्या शेर लिखे हैं आपने. दाद क़ुबूल फरमाएं, हौसला -अफजाई गर , इस नाचीज़ कि क़ुबूल हो तो अगली ग़ज़ल/नज़्म/या शेर लिख मारे , बंदा बेताब है , बहुत खूब कभी बन्दे के ब्लॉग पर तशरीफ़ अता फरमाएं............................

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति। धन्यवाद

शरद कोकास said...

अच्छी गज़ल है भाई ।

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

जिस शजर ने डालियों पर देखिए फल भर दिए
हर बशर ने आते - जाते उसको बस पत्थर दिए

vaah neeraj jee, kitana khoobsoorat matalaa diya hai...kamaal hai

खो रहे हैं क्यूँ अदावत में उन्हें, ये सोचिये
प्यार करने के खुदा ने जो हमें अवसर दिए...
insaniyat ke liye...insaniyat ka paigam...
poori ghazal dil ko chhoo gaee.

महेन्द्र मिश्र said...

खो रहे हैं क्यूँ अदावत में उन्हें, ये सोचिये
प्यार करने के खुदा ने जो हमें अवसर दिए

बहुत ही सुन्दर रचना...आभार

Majaal said...

आज तो लगते है पूरी, तबीयत में वो 'नीरज',
दिए छांट छांट कर, शेर चुन चुन कर दिए ..

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

ज़िन्दगी बख्शी खुदा ने माना के "नीरज" हमें
पर लगा हमको कि जैसे खीर में कंकर दिए

यह शेर सिर्फ़ शेर ही रहे

Mrs. Asha Joglekar said...

नीरज जी बहुत ही खूबसूरत गज़ल पेश की है ।
कुछ नहीं देती है ये दुनिया किसी को मुफ्त में
नींद ली बदले में जिसको रेशमी बिस्तर दिए

ज़िन्दगी बख्शी खुदा ने माना के "नीरज" हमें
पर लगा हमको कि जैसे खीर में कंकर दिए

वाह वाह ।

आशीष/ ਆਸ਼ੀਸ਼ / ASHISH said...

बाऊ जी,
नमस्ते!
आनंद! आनंद! आनंद!
आशीष
--
प्रायश्चित

अजय कुमार said...

कुछ नहीं देती है ये दुनिया किसी को मुफ्त में
नींद ली बदले में जिसको रेशमी बिस्तर दिए

शानदार रचना ,कमाल है ।

ajit gupta said...

नीरज जी गजल क्‍या है बस फूलों का गुलदस्‍ता है जिसमें एक से बढ़कर एक फूल अपनी खुशबू बिखेर रहा है। एक बात मुझे बताएं कि मैं तो नश्‍तर का अर्थ घाव ही समझती आयी थी, आपने इसे कांटे बताया है?

निर्मला कपिला said...

नीरज जी किस किस शेर की तारीफ करूँ? आपकी कलम हो और प्राण भाई साहिब की रहनुमाई तो फिर हमारे कहने को क्या रह जाता है। कमाल के शेर हैं
मिल गए हैं रहजनों से लूटने के वास्ते
मुल्क को चुनकर ये कैसे आपने रहबर दिए


कुछ नहीं देती है ये दुनिया किसी को मुफ्त में
नींद ली बदले में जिसको रेशमी बिस्तर दिए

ज़िन्दगी बख्शी खुदा ने माना के "नीरज" हमें
पर लगा हमको कि जैसे खीर में कंकर दिए
यूँ मुझे तो हर एक शेर बहुत ही अच्छा लगा। बधाई आपको।

Shah Nawaz said...

जिस शजर ने डालियों पर देखिए फल भर दिए
हर बशर ने आते - जाते उसको बस पत्थर दिए

वाह! बेहद खूबसूरत ग़ज़ल लिखी है नीरज जी. यूँ तो हर एक शेर एक दुसरे से बढ़कर है, लेकिन ऊपर वाला तो ज़बरदस्त है!

Sadhana Vaid said...

नीरज जी हर एक शेर कमाल का है और बहुत ही अर्थवान है ! किसे चुनें किसे छोड़ें चयन करना मुश्किल है !
मिल गए हैं रहजनों से लूटने के वास्ते
मुल्क को चुनकर ये कैसे आपने रहबर दिए


कुछ नहीं देती है ये दुनिया किसी को मुफ्त में
नींद ली बदले में जिसको रेशमी बिस्तर दिए
बहुत शानदार और प्राणवान गज़ल ! आपको बहुत बहुत बधाई !

पी.सी.गोदियाल said...

तकदीर की बाते है, सबको अलग-अलग मुक्कदर दिए,
बहुत सुन्दर गजल लिखी, और शब्द बड़े मुक्तसर दिए !!

sada said...

जिस शजर ने डालियों पर देखिए फल भर दिए
हर बशर ने आते - जाते उसको बस पत्थर दिए

बहुत ही सुन्‍दर पंक्तियां, गहरे भावों के साथ अनुपम हमेशा की तरह ।

संतोष कुमार said...

बहुत ही सुंदर !

अच्छी ग़ज़ल, हर शेर एक से बढ़ कर एक !
हार्दिक शुभकामनाएं !

DEEPAK BABA said...

नीरज जी, क्या उम्दा लिखते हैं. ...
गज़ल के हर शेर पर दाद है.........

कुछ नहीं देती है ये दुनिया किसी को मुफ्त में
नींद ली बदले में जिसको रेशमी बिस्तर दिए

आप हमेशा कुछ सोचने के मजबूर करते हैं.

भूख बेचकर ही तो दो रोटी खरीदी है हमने.
नींद बेचकर - कुछ ख्वाब संभाल पाएं हैं.

विवेक सिंह said...

टिप्पणी में क्या कहें, कितने हमें अच्छे लगे
हर्फ़ कुछ जोड़े, बताकर गज़ल, आगे कर दिए

रश्मि प्रभा... said...

कुछ नहीं देती है ये दुनिया किसी को मुफ्त में
नींद ली बदले में जिसको रेशमी बिस्तर दिए
waah, bahut hi achhi panktiyaan

वाणी गीत said...

नींद ले बदले में जिसको रेशमी बिस्तर दिए ...
जीवन की विसंगतियों पर अच्छी कविता/ग़ज़ल ...!

Kailash C Sharma said...

खो रहे हैं क्यूँ अदावत में उन्हें, ये सोचिये
प्यार करने के खुदा ने जो हमें अवसर दिए......

बहुत सुन्दर विचार जिन्हें अगर दुनिया अपना सके तो सारे झगड़े ही समाप्त हो जायेंगे...बहुत सुन्दर प्रस्तुति...आभार..

क्षितिजा .... said...

कुछ नहीं देती है ये दुनिया किसी को मुफ्त में
नींद ली बदले में जिसको रेशमी बिस्तर दिए

बहुत खूब नीरज जी .... बहुत सुंदर रचना ... बधाई स्वीकारें ..

mahendra verma said...

ज़िंदगी बख़्शी ख़ुदा ने माना के नीरज हमें,
पर लगा हमको कि जैसे खीर में कंकर दिए।
वाह...वाह...ज़िदगी के अनदेखे कोनों पर आपकी नज़रें घूम घूम कर ग़ज़लें कहती रहती हैं...बधाई।

योगेन्द्र मौदगिल said...

behtreen khayaal or khoobsurat kafiye...wah bhai ji wah....

arganikbhagyoday said...

aapki gajal hr jindagi ki ek khubasurat kahani hai
arganik bhagyoday.blogspot.com

अनामिका की सदायें ...... said...

हर शेर सोचने को मजबूर करता हुआ.

और पूरी गज़ल उम्दाय्गी के मोतियों से सजी बेहतरीन गज़ल.

बधाई.

वीना said...

रब की नज़रों में सभी इक हैं तो उसने क्यों भला
एक को पत्थर दिए और एक को गौहर दिए

गज़ल का हर शेर दाद के काबिल है..बहुत खूबसूरत गज़ल

मुन्नी बदनाम said...

very good neeraj darling

मो सम कौन ? said...

नीरज साहब,
गुल, गुलशन और गुलफ़ाम कर दिया जी आपने।

एक सुझाव दूँ, कठिन शब्दों के हिन्दी अर्थ अगर पंक्ति के सामने दे सकें या फ़िर गज़ल के बाद में, तो रौ में पढ़ने का और ज्यादा मजा आ जाता। छोटे मुंह बड़ी बात हो गई न? जानता हूँ आप बुरा नहीं मानेंगे।

एक एक शेर नायाब है।

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...

नीरज जी
नमस्कार !
बहुत रवां दवां ग़ज़ल कही है एक बार फिर से आपने । सबसे अच्छी बात यह कि कहीं भी भर्ती के लफ़्ज़ नहीं हैं । सहज संप्रेषणीय आमफ़हम ज़ुबान में कहा गया एक एक मिसरा ता'रीफ़ का मुस्तहक़ है ।

एक शे'र , दो शे'र कोट करने की गुंजाइश नहीं है , क्योंकि पूरी ग़ज़ल ही कोट के लायक है । दिलजोई के लिए एक शे'र छांटा है -
खो रहे हैं क्यूं अदावत में उन्हें, ये सोचिये
प्यार करने के खुदा ने जो हमें अवसर दिए


शुभकामनाओं सहित
- राजेन्द्र स्वर्णकार

Udan Tashtari said...

हाय!! हर शेर पर खड़े होकर दाद बरसाई...दिखे क्या?

बहुत बेहतरीन..

जिस शजर ने डालियों पर देखिए फल भर दिए
हर बशर ने आते - जाते उसको बस पत्थर दिए

राजेश उत्‍साही said...

आपकी खीर के कंकड़ पसंद आए।

डॉ .अनुराग said...

आज थोड़ी उदास लगी गजल.......काहे जी....

विरेन्द्र सिंह चौहान said...

श्रीमान जी ... बहुत ही बढ़िया रचना ...
मुझे तो हर शेर पसंद आया ...
आभार ..

singhsdm said...

नीरज भाई.....
जिस शजर ने डालियों पर देखिए फल भर दिए
हर बशर ने आते - जाते उसको बस पत्थर दिए
......वाह वाह ! क्या बात कही. (@ अब तो किस्मत हैं उनके पत्थर ही, जिन दरख्तों ने फल उगाये हैं,)

रब की नज़रों में सभी इक हैं तो उसने क्यों भला
एक को पत्थर दिए और एक को गौहर दिए
यह शेर भी खूब रहा......!


खो रहे हैं क्यूँ अदावत में उन्हें, ये सोचिये
प्यार करने के खुदा ने जो हमें अवसर दिए
*******
मिल गए हैं रहजनों से लूटने के वास्ते
मुल्क को चुनकर ये कैसे आपने रहबर दिए
हालत को पहचानने वाले दोनों शेर लिख दिए नीरज भाई....दाद क़ुबूल करें.

कुछ नहीं देती है ये दुनिया किसी को मुफ्त में
नींद ली बदले में जिसको रेशमी बिस्तर दिए
आहा !!!!!!!!!!! क्या सच्चाई और बेबसी बयां की है ........बहुत सुन्दर !

hem pandey said...

खो रहे हैं क्यूँ अदावत में उन्हें, ये सोचिये
प्यार करने के खुदा ने जो हमें अवसर दिए

- आज की परिस्थिति में मौजूं |

अल्पना वर्मा said...

गुल हमेशा चाहता हमसे रहा बदले में वो
जिसने हमको हर कदम पर बेवजह नश्तर दिए
बहुत खूब!
-ग़ज़ल का हर शेर नायाब लगा .

Prem said...

बहुत दिनों बाद ब्लॉग खोला ,ग़ज़ल पढ़ कर मज़ा आ गया .सुंदर अभिव्यक्ति के लिए शुभकामनायें ।

ZEAL said...

कुछ नहीं देती है ये दुनिया किसी को मुफ्त में....Beautiful !

Ashish said...

behtareen

विनोद कुमार पांडेय said...

वाह नीरज जी..किस किस शेर पे दाद दूं...पूरी ग़ज़ल ही बेहतरीन बन पड़ी है....बधाई हो..

हरकीरत ' हीर' said...

जिस शजर ने डालियों पर देखिए फल भर दिए
हर बशर ने आते - जाते उसको बस पत्थर दिए
यही तो दुनिया की रीत है ....
जरा सी बात पर यहाँ हर कोई पत्थर उठा लेता है ......

रब की नज़रों में सभी इक हैं तो उसने क्यों भला
एक को पत्थर दिए और एक को गौहर दिए
शायद हमारे कर्मों के हिसाब से ......

कुछ नहीं देती है ये दुनिया किसी को मुफ्त में
नींद ली बदले में जिसको रेशमी बिस्तर दिए
सही कहा ......
आपकी गजलें हमेशा ही बहुत गहरी बात कह जातीं है ....
क्या कहूँ ? बस इतना ही बहुत ही उम्दा .....

अंकित "सफ़र" said...

नमस्कार नीरज जी,
इन दो शेरों ने तो लाजवाब कर दिया.
"मिल गए हैं रहजनों से लूटने के वास्ते
मुल्क को चुनकर ये कैसे आपने रहबर दिए."

"कुछ नहीं देती है ये दुनिया किसी को मुफ्त में
नींद ली बदले में जिसको रेशमी बिस्तर दिए."

Vijay Kumar Sappatti said...

ज़िन्दगी बख्शी खुदा ने माना के "नीरज" हमें
पर लगा हमको कि जैसे खीर में कंकर दिए..............................


amazing lines ...very close to heart and life....

hats off sir..

Prem said...

बहुत सुन्सेर अल्फाज़ खीर के कंकर तो खूब भाए।

मुदिता said...

नीरज जी ,
बहुत उम्दा गज़ल.....हर शेर गज़ब ..गहन... असरदार....
बधाई