Monday, March 29, 2010

लीक पर चलना, कहाँ दुश्वार है



खौफ का जो कर रहा व्यापार है
आदमी वो मानिये बीमार है

चार दिन की ज़िन्दगी में क्यूँ बता
तल्खियाँ हैं, दुश्मनी, तकरार है

जिस्म से चल कर रुके, जो जिस्म पर
उस सफ़र का नाम ही, अब प्यार है

दुश्मनों से बच गए, तो क्या हुआ
दोस्तों के हाथ में तलवार है

लुत्फ़ है जब राह अपनी हो अलग
लीक पर चलना, कहाँ दुश्वार है

ज़िन्दगी भरपूर जीने के लिए
ग़म, खुशी में फ़र्क ही बेकार है

बोल कर सच फि़र बना 'नीरज' बुरा
क्या करे आदत से वो लाचार है।


{भाई तिलक राज जी के सहयोग का तहे दिल से शुक्रिया जिनकी मदद से मैं ये ग़ज़ल कह पाया}

55 comments:

पी.सी.गोदियाल said...

जिस्म से चल कर रुके, जो जिस्म पर
उस सफ़र का नाम ही, अब प्यार है


दुश्मनों से बच गए, तो क्या हुआ
दोस्तों के हाथ में तलवार है


lajabaab neeraj ji !

seema gupta said...

चार दिन की ज़िन्दगी में क्यूँ बता
तल्खियाँ हैं, दुश्मनी, तकरार है
बेहद सुन्दर प्रस्तुति...शानदार

regards

रश्मि प्रभा... said...

ज़िन्दगी भरपूर जीने के लिए
ग़म, खुशी में फ़र्क ही बेकार है
waah

वन्दना said...

दुश्मनों से बच गए, तो क्या हुआ
दोस्तों के हाथ में तलवार है

har sher apne aap mein ek kahani kahta hua ........ek hakeekat ke bayan karta huaa..........gazab ki prastuti.

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

बोल कर सच फि़र बना 'नीरज' बुरा
क्या करे आदत से वो लाचार है..
......... sundar gajal ,

aaj ke samay men bhee pyaar ko jism tak hee naheen kah sakte .... aabhaar ,,,

तिलक राज कपूर said...

छोटी-छोटी बातें जीवन में कितना बड़ा महत्‍व रखती हैं, इसका एहसास शायद उन्‍हें नहीं होता होगा जो बड़ी बातों में उलझे रहते हैं। इस ग़ज़ल का हर शेर चिंतन के लिये प्रेरित करता है और मेरा मानना है कि सकारात्‍मक सृजन वही है जो सोचने पर मजबूर करे और ऐसा सोचने पर मजबूर करे कि सकारात्‍मक विकास हो। मत्‍ले के शेर को ही लें, ख़ौफ़ पैदा करने वाला कोई भी इंसान जब गहराई से इस विषय में सोचेगा तो पायेगा कि वास्‍तव में उसका व्‍यवहार तोड़-फ़ोड़ में विश्‍वास रखने वाले मानसिक रोगी जैसा है। दूसरे शेर को देखें सीधी सच्‍ची बात सीधे सच्‍चे तरीके से सोचने को मजबूर करता है कि भाई जो जीवन आनंद के साथ व्‍यतीत हो सकता है उसमें तल्खियाँ, दुश्मनी, तकरार का क्‍या स्‍थान।
बधाई के पात्र हैं नीरज भाई।

कुश said...

हिंदी, इंग्लिश और उर्दू तीनो के शब्द मिलकर ग़ज़ल को और असरदार बनाते है.. बहुत बढ़िया है जी

अमिताभ मीत said...

कमाल है सर जी ... ये बस आप के बस का रोग है ... इतने अच्छे शेर ... तंज़ भी और इतना खूबसूरत !

बेहतरीन सर जी , बेहतरीन !!

संजय भास्कर said...

बेहद सुन्दर प्रस्तुति...शानदार

रचना दीक्षित said...

खौफ का जो कर रहा व्यापार है
आदमी वो मानिये बीमार है
जिस्म से चल कर रुके, जो जिस्म पर
उस सफ़र का नाम ही, अब प्यार है
नीरज जी बहुत लाजवाब ग़ज़ल है. बहुत गहरी बातें कह दी आपने. मैं आपकी बातों से सहमत हूँ.
आभार .

डॉ .अनुराग said...

खौफ का जो कर रहा व्यापार है
आदमी वो मानिये बीमार है

ज़माना बदल रहा है साहब....आजकल इसे व्योपार कहते है .देखिये न अमेरिका को ....पाकिस्तान को ज़हाज़ बेच दिए ...फिर हमारे यहाँ आकर कहता है .देखिये पाकिस्तान क्या कर रहा है.....

devendra goswami said...

bahut khub
kya baat-kya baat
sach bolne ki saja sabhi ko jhelni padti hai

इस्मत ज़ैदी said...

नीरज जी नमस्कार ,
मतला ही ध्यान खींच लेता है बहुत सुंदर
एक अच्छी ग़ज़ल पढ़वाई आप ने
धन्यवाद

सुशीला पुरी said...

मै छुपाना जानती तो जग मुझे साधु समझता ,
शत्रु मेरा बन गया है छल रहित व्यवहार मेरा .

Shiv Kumar Mishra said...

बेहतरीन ग़ज़ल. हमेशा की तरह बढ़िया.

शारदा अरोरा said...

सचमुच बेहतरीन , मुस्कराते हुए हर किसी ने कुछ शिक्षा के घूँट पिए होंगे , दाद देने लायक |

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत ही सुन्दर,
क्या कहें, यह टिप्पणी उद्गार है ।

kshama said...

दुश्मनों से बच गए, तो क्या हुआ
दोस्तों के हाथ में तलवार है
Oh! Kin,kin panktiyonka wasta diya jay?

सुलभ § सतरंगी said...

ज़िन्दगी भरपूर जीने के लिए
ग़म, खुशी में फ़र्क ही बेकार है

बोल कर सच फि़र बना 'नीरज' बुरा
क्या करे आदत से वो लाचार है।

Bahut Badhiyaa Sir.

Udan Tashtari said...

हर शेर में अपनी जान है..बहुत उम्दा गज़ल बनी है.

चार दिन की ज़िन्दगी में क्यूँ बता
तल्खियाँ हैं, दुश्मनी, तकरार है

क्या बात कही है, वाह!!

तुस्सी ग्रेट हो जी!!

MUFLIS said...

बोल कर सच फि़र बना 'नीरज' बुरा
क्या करे आदत से वो लाचार है।

हर बार की तरह
इस बार भी
एक नायाब ख़ज़ाना
एक रत्न-जड़ित रचना
एक भावपूर्ण साहित्य
....
मौलिकता की कसौटी पर खरी उतरती हुई
कामयाब औ शानदार ग़ज़ल
तिलक राज जी की
एक एक बात से सहमत हूँ

बधाई स्वीकारें

डॉ. मनोज मिश्र said...

चार दिन की ज़िन्दगी में क्यूँ बता
तल्खियाँ हैं, दुश्मनी, तकरार है..
सभी बेहतरीन, बधाई.

M VERMA said...

लुत्फ़ है जब राह अपनी हो अलग
लीक पर चलना, कहाँ दुश्वार है
शानदार गज़ल
बेहतरीन

मनोज कुमार said...

दुश्मनों से बच गए, तो क्या हुआ
दोस्तों के हाथ में तलवार है
व्यक्ति को तरीक़े से पहचानने की कोशिश नज़र आती है।

"अर्श" said...

नमस्कार नीरज जी ,
हर शे'र कामयाब , बड़े दिन बाद आये मगर दुरुस्तगी के साथ , मैं तो सबसे ज्यादह इस बात से गम हूँ , के जिस तरह से लफ्ज़ तल्खी को आपने खूबसूरती से इस्तेमाल किया है ..
जिस्म से चल कर रुके, जो जिस्म पर
उस सफ़र का नाम ही, अब प्यार है
और यह तीसरा शे'र वर्त्तमान को परिभाषित करता हुआ...
जिस्म की बात नहीं थी उनके दिल तक जाना था
लम्बी दुरी तय करने में वक्त तो लगता है ....
पूरी तरह से विपरीत ... शायद जमाने का यह असर है ... वो भी एक क्या ज़माना होगा
और अब यह है के जब शाईर यह शे'र लिखने पर मजबूर हो जाए ..
सलाम इस शे'र पर...
फिर से आता हूँ ... और तिलक साहब को भी आदाब ...

अर्श

गौतम राजरिशी said...

हमेशा की तरह नीरज की लेखनी से उपजी एक बेमिसाल ग़ज़ल। एक वो हैं गीतों वाले नीरज और एक आप हैं ये ग़ज़लों वाले नीरज...

मक्ते के अंदाज़े-बयां पे ढ़ेरों दाद, खूब तालियाँ।

राज भाटिय़ा said...

दुश्मनों से बच गए, तो क्या हुआ
दोस्तों के हाथ में तलवार है
बहुत खुब जी,
धन्यवाद

श्याम कोरी 'उदय' said...

लुत्फ़ है जब राह अपनी हो अलग
लीक पर चलना, कहाँ दुश्वार है
.....बहुत खूब,जबरदस्त!!!!

anitakumar said...

चार दिन की ज़िन्दगी में क्यूँ बता
तल्खियाँ हैं, दुश्मनी, तकरार है
दुश्मनों से बच गए, तो क्या हुआ
दोस्तों के हाथ में तलवार है


बेहद सुंदर प्रस्तुति…पर उसमें नया क्या है? आप तो हमेशा ही बहुत अच्छा लिखते हैं।

तिलक राज कपूर said...

दिन में कार्यालयीन व्‍यस्‍तता के कारण दो अशआर पर ही टिप्‍पणी हो सकी, बाकी अशआर भी उसी गहराई से कहे गये हैं और गज़ब ढा रहे हैं चाहे जिस्म से चल कर रुके का कटाक्ष हो या आज की तथाकथित दोस्‍ती का हाल या अपनी अलग राह बनाने की बात। और जिस आदमी ने ग़म और खुशी में फ़र्क करना बंद कर दिया उसके जीवन में तो आनंद ही आनंद है। हॉं सच बोलने पर नाराज़गी मिलती है तो मिला करे, ये आदत तो कतई बदलने लायक नहीं।
एक बार फिर बधाई।

वीनस केशरी said...

नीरज जी क्या कहूँ, कहाँ से अपनी बात शुरू करूँ समझ नहीं आ रहा :)

जिस तरह इन्द्रधनुष देख कर बच्चे खुशी से किलकारी भरने लगते है उसी तरह आज की सात रंगों में रंगी गजल पढ़ कर मेरा हाल हुआ

हर शेर नायाब मोती, इस गजल को भूल अब मेरे लिए मुमकिन नही है

तिलक जी को भी बहुत बहुत धन्यवाद
अब तो आपको मेरी बात माननी पड़ेगी :)

जब लिंक पर आपकी पोस्ट की हेडिंग पढ़ी तो ही पता चल गया आज की ब्लोगिंग सफल हुई :)


ज़िन्दगी भरपूर जीने के लिए
ग़म, खुशी में फ़र्क ही बेकार है

उफ्फ्फ्फ्फ्फ़ इस फलसफे को लाख सलाम ...

वीनस

डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह said...

वह नीरज भैया ,हर बार कि तरह इस बार भी बेहद उम्दा ग़ज़ल ,बस यूं कहिये के मज़ा आ गया /
दुश्मनों से बच गए तो क्या हुआ /दोस्तों के हाथ मे तलवार है /
बहुत दिनों से चुप हैं ,क्यों?सादर,
डॉ.भूपेन्द्र रीवा

अभिषेक ओझा said...

बढ़िया गजल ! सत्य वचन !

बेचैन आत्मा said...

ज़िन्दगी भरपूर जीने के लिए
ग़म, खुशी में फ़र्क ही बेकार है
---वाह क्या बात है
कितना प्यारा जीवन दर्शन
पुलकित होता अपना भी मन

Dr. Smt. ajit gupta said...

दुश्मनों से बच गए, तो क्या हुआ
दोस्तों के हाथ में तलवार है
नीरज जी, दोस्‍तों के हाथ भी तलवार है कैसा रहता? वे दोस्‍त ही क्‍या जो तलवार ना रखे। बहुत ही सार्थक गजल, बधाई।

दिगम्बर नासवा said...

नीरज जी आपकी ग़ज़ल का हमेशा ही इंतज़ार रहता है .... और ग़ज़ल पढ़ कर लगता है ... गलत प्रतीक्षा नहीं करता ...
बहुत ही ताजगी सी नज़र आती है आपकी ग़ज़ल में ... कमाल के शेर हैं सब ... सुभान अल्ला ...

SAHITYIKA said...

antim pankti to bilkul sahi kahi hai aapne..
badhiya prastuti..

Ankit Joshi said...

नमस्कार नीरज जी,
नपे तुले लफ़्ज़ों में उम्दा बात कही है, मतले के मिसरा-ए-सनी में काफिये के रूप में आया बीमार लफ्ज़ बहुत अच्छे तरीके से अपनी बयानगी दे रहा है.
खौफ का जो कर रहा व्यापार है
आदमी वो मानिये बीमार है
ये शेर आप की खुशमिजाजी का एक और उदाहरण है,
चार दिन की ज़िन्दगी में क्यूँ बता
तल्खियाँ हैं, दुश्मनी, तकरार है
इस शेर में आपने, आसान सी लगने वाली मुश्किल बात कह दी है,
लुत्फ़ है जब राह अपनी हो अलग
लीक पर चलना, कहाँ दुश्वार है
बहुत उम्दा ग़ज़ल.

नीरज गोस्वामी said...

E-Mail received from Ratan Kumar: Newzealand.

Wah ji.. wah.. bahut khub.

Ratan

नीरज गोस्वामी said...

E-mail received from Om Sapra Ji:

shri neraj ji
namastey
thanks for sending this good gazal,
regards
-om sarpa, delhi-9
9818180932

डॉ टी एस दराल said...

दुश्मनों से बच गए, तो क्या हुआ
दोस्तों के हाथ में तलवार है

लुत्फ़ है जब राह अपनी हो अलग
लीक पर चलना, कहाँ दुश्वार है

बहुत खूब लिखा है नीरज जी । सुन्दर प्रस्तुति।

haidabadi said...

नीरज साहिब
ग़ज़ल देखी मज़ा आ गया एक से बढ़ कर एक शेर अल्लाह करे
जोरे कलम और ज्यादा
चाँद शुक्ला हदियाबादी
डेनमार्क

सुशील कुमार छौक्कर said...

ज़िन्दगी भरपूर जीने के लिए
ग़म, खुशी में फ़र्क ही बेकार है

बोल कर सच फि़र बना 'नीरज' बुरा
क्या करे आदत से वो लाचार है।

हमारी पसंद के इन दो शेर पर आपका क्या विचार है। वैसे हमें तो अपने से लगे।

लता 'हया' said...

शुक्रिया ,
मतले से मक़ते तक बस एक ही लफ्ज़ ज़बान से निकला ........वाह !

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

खौफ का जो कर रहा व्यापार है
आदमी वो मानिये बीमार है

--------
शुक्रिया। कई बीमारों के चेहरे यादों में घूम गये। बेचारे, क्या समझते हैं अपने को! :(

Manish Kumar said...

खौफ का जो कर रहा व्यापार है
आदमी वो मानिये बीमार है

क्या खूब कहा बंधुवर !

Tapashwani Anand said...

बहुत खूब लिखा सर जी
दुश्मनों से बच गए, तो क्या हुआ
दोस्तों के हाथ में तलवार है !!!!!!

bahut bahut badhai!!

Satish Pancham said...

बहुत शानदार गजल है।

राकेश खंडेलवाल said...

बोल कर सच फि़र बना 'नीरज' बुरा
क्या करे आदत से वो लाचार है।


कह रहा हूँ सच, कुबूले दाद यो
एक जुमला यह हजारों बार है

Vijay Kumar Sappatti said...

neeraj ji deri se aane ke liye maafi .....

लुत्फ़ है जब राह अपनी हो अलग
लीक पर चलना, कहाँ दुश्वार है

is sher ne mera din bana diya sir , hats off to you ....

vijay

श्रद्धा जैन said...

लुत्फ़ है जब राह अपनी हो अलग
लीक पर चलना, कहाँ दुश्वार है


waah kya kamaal ka sher hua hai Neeraj ji

बोल कर सच फि़र बना 'नीरज' बुरा
क्या करे आदत से वो लाचार है।

is sher ke liye kya kaha jaaye .......

bahut hi khoobsurat gazal hui hai Neeraj ji
aap ko padh kar hamesha achcha lagta hai
sakun milta hai

राकेश खंडेलवाल said...

जो गज़ल में ज़िन्दगी को घोल दे
नाम नीरज उसका मेरे यार है
क्या कहें इस दौर में बतलाइये
संयमित हर चाह का विस्तार है

RajeevBharol said...

एक से बढ़ कर एक शेर. बधाई.

हिमान्शु मोहन said...

नीरज जी,
आदाब, बल्कि कोर्निश!
इस ग़ज़ल ने नतमस्तक कर दिया।

ख़्वाहिशे-तारीफ़, पर अल्फ़ाज़ कम
किस क़दर मेरी ज़ुबाँ लाचार है

आपका हर शेर घुँघरू है, ग़ज़ल
हर कदम पर इक नयी झंकार है

क्या सुख़न है! क्या है अन्दाज़े-बयाँ!
जिस तरफ़ देखो नया अन्वार है

ख़ूबसूरत सोच, फिर लहज़ा गिरह
गज़ल है या नौलखा सा हार है

क्या तनासुब है कि हर इक चीज़ की
हर जगह बिल्कुल सही मिकदार है

सादर,

डा.सुभाष राय said...

नीरज जी, ब्लाग की दुनिया में आकर जिन कुछ मोतियों से मिला, उनमें आप को न गिनूं तो ठीक नहीं होगा. जिसका जीवन लयबद्ध होता है, केवल वही अच्छी रचनायें दे पाते हैं. मैं समझ सकता हूं आप के जीवन के बारे में, उसकी लय के बारे में. मैं भी इसी रास्ते पर कहीं चलता आया हूं. आप की गज़लों में मुझे अपनी आवाज सुनायी पड़्ती है. बधाई.