Monday, January 11, 2010

आप गिनाते क्यूँ हो




तुम नहीं साथ तो फिर याद भी आते क्यूँ हो
इस कमी का मुझे एहसास दिलाते क्यूँ हो

डर जमाने का नहीं दिल में तुम्हारे तो फिर
रेत पर लिखके मेरा नाम मिटाते क्यूँ हो

दिल में चाहत है तो काँटों पे चला आयेगा
अपनी पलकों को गलीचे सा बिछाते क्यूँ हो

हमपे उपकार बहुत से हैं तुम्हारे,माना
उँगलियों पर उसे हर बार गिनाते क्यूँ हो

जाने कब इनकी ज़ुरूरत कहीं पड़ जाए तुम्‍हें
यूं ही अश्‍कों को बिना बात बहाते क्यूँ हो

ज़िन्दगी फूस का इक ढेर है इसमें आकर
आग ये इश्‍क की सरकार लगाते क्यूँ हो

मुझको मालूम है तुम दोस्त नहीं, दुश्मन हो
अपने खंजर को भला मुझसे छिपाते क्यूँ हो

प्यार मरता नहीं "नीरज" है पता तुमको भी
फिर भी मीरा को सदा ज़हर पिलाते क्यूँ हो


( गुरुदेव पंकज सुबीर जी की भट्टी में तप कर कुंदन बनी ग़ज़ल )
(गुरुदेव प्राण साहब ने भी अपने आशीर्वाद से इसे संवारा है)

68 comments:

श्रद्धा जैन said...

दिल में चाहत है तो काँटों पे चला आयेगा
अपनी पलकों को गलीचे सा बिछाते क्यूँ हो

वाह वाह नीरज जी
कमाल का शेर है
पलकें बिछाते क्यूँ हो


मुझको मालूम है तुम दोस्त नहीं, दुश्मन हो
अपने खंजर को भला मुझसे छिपाते क्यूँ हो

बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल
पंकज जी की शागिर्दी रंग ला रही है
आपकी ग़ज़लें तो हमेशा से ही मुझे बहुत पसंद रही हैं

दिगम्बर नासवा said...

डर जमाने का नहीं आपके दिल में तो फिर
रेत पर लिख के मेरा नाम मिटाते क्यूँ हो

कमाल का शेर है नीरज जी ........ गुरुदेव ने आपको पूरा उस्ताद बना दिया है ..... आपकी ग़ज़लों में भी बहुत कुछ होता है हम जैसों के लिए ........

जाने कब इनकी ज़ुरूरत कहीं पड़ जाए तुम्‍हें
यूं ही अश्‍कों को बिना बात बहाते क्यूँ हो

सच कहा है आँसुओं को संभाल कर रखना चाहिए ...... बेवजह बर्बाद नही करना चाहिए ......

आपकी पूरी ग़ज़ल हक़ीकत के शेरों से लदी हुई है .........

मोहिन्दर कुमार said...

नीरज जी,

बहुत ही खूबसूरत शेरों से सजी हुई गजल है..
किसी एक को भी छोडना नाइन्साफ़ी होगी इसलिये किसी एक पर खास जोर नहीं दे रहा हूं
लिखते रहिये.

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी said...

मुझे तो यह पंक्तियाँ रुचीं ---
'' प्‍यार मरता नहीं 'नीरज' है पता सदियों से
फिर भी मीरा को ज़हर आप पिलाते क्यूँ हो''
........ आभार ,,,

singhsdm said...

आपके हम पे हैं उपकार बहुत ये माना
बारहा उनको मगर आप गिनाते क्यूँ हो

ज़िन्दगी फूस का इक ढेर है इसमें आकर
आग ये इश्‍क की सरकार लगाते क्यूँ हो

नीरज जी
शब्द तो बड़े सीधे सादे रहे मगर असर देर तक रहा.......यही हुनर आपका मुझे कायल करता है आपका //////////

भंगार said...

बहुत खूबसूरत लिखा आपने .दिल को छू गया ।

वन्दना said...

दिल में चाहत है तो काँटों पे चला आयेगा
अपनी पलकों को गलीचे सा बिछाते क्यूँ हो

प्‍यार मरता नहीं 'नीरज' है पता सदियों से
फिर भी मीरा को ज़हर आप पिलाते क्यूँ हो

hamesha ki tarah har sher lajawaab.......aur in dono sheron mein to gazab ke bhav hain..........bahut hi umda.

Mired Mirage said...

बहुत सुन्दर!
घुघूती बासूती

alka sarwat said...

मुझको मालूम है तुम दोस्त नहीं, दुश्मन हो
अपने खंजर को भला मुझसे छिपाते क्यूँ हो

मुझको मालूम है तुम दोस्त नहीं, दुश्मन हो
अपने खंजर को भला मुझसे छिपाते क्यूँ हो

वाह धमकी का नया अंदाज
मुबारकां

रश्मि प्रभा... said...

डर जमाने का नहीं आपके दिल में तो फिर
रेत पर लिख के मेरा नाम मिटाते क्यूँ हो
.........waah

रचना दीक्षित said...

बहुत बढ़िया प्रस्तुती एक एक शब्द एक एक शेर मुखर हो उठा है आपकी कलम का साथ पा कर

Pratik Maheshwari said...

सर्वश्रेष्ठ पंक्तियाँ :
"डर जमाने का नहीं आपके दिल में तो फिर
रेत पर लिख के मेरा नाम मिटाते क्यूँ हो"

ज़बर्दस्त रचना..

आभार

अंकित "सफ़र" said...

नमस्कार नीरज जी,
मतला बहुत खूबसूरत बना है, जितनी तारीफ करू कम होगी.....
"दिल में चाहत है.......' वाला शेर बेहद पसंद आया

रंजना [रंजू भाटिया] said...

सभी शेर एक से बढ़ कर एक हैं ...बेहद खुबसूरत अंदाजमें आपने लिखा है ..शुक्रिया

प्रकाश पाखी said...

बेहतरीन गजल
डर जमाने का नहीं आपके दिल में तो फिर
रेत पर लिख के मेरा नाम मिटाते क्यूँ हो


आपके हम पे हैं उपकार बहुत ये माना
बारहा उनको मगर आप गिनाते क्यूँ हो


मुझको मालूम है तुम दोस्त नहीं, दुश्मन हो
अपने खंजर को भला मुझसे छिपाते क्यूँ हो


प्‍यार मरता नहीं 'नीरज' है पता सदियों से
फिर भी मीरा को ज़हर आप पिलाते क्यूँ हो
पूरी गजल अपनी परिपूर्ण परिपक्वता से प्रभावित करती है.इन चार शेरों ने बहुत प्रभावित किया है आपकी गजल की उस्तादी को सलाम.

डॉ टी एस दराल said...

वाह नीरज भाई , एक से बढ़कर एक शेर लिखे हैं।
ग़ज़ल और शायरी में आपका ज़वाब नहीं।

Roshani said...

चित्र और ग़ज़ल दोनों ही बहुत अच्छे लगे... ...
aabhar

डॉ. मनोज मिश्र said...

जाने कब इनकी ज़ुरूरत कहीं पड़ जाए तुम्‍हें
यूं ही अश्‍कों को बिना बात बहाते क्यूँ हो..
कमाल की लाइनें हैं,धन्यवाद.

"अर्श" said...

नीरज जी नमस्कार,
नयी बोतल में पुरानी शराब परोसना कोई आप से सीखे , हर शे'र तारो
ताज़ा हैं,.. खास कर इस शे'र ने चौंका दिया मगर फिर सोचा ये आप भी कर सकते हैं..
ज़िन्दगी फूस का इक ढेर है इसमें आकर
आग ये इश्‍क की सरकार लगाते क्यूँ हो

बहुत बहुत बधाई खुबसूरत ग़ज़ल के लिए ...

अर्श

shyam1950 said...

शुक्र है इस बार कमेंट्स की इतनी लंबी रेल में धकम्मपेल नहीं करनी पड़ी वरना आपके यहाँ तो इंतजार में ही जो कुछ मन में आया होता है निकल भागता है .. बहुत प्यारे शेर पढ़ने को मिले ..शायरी में जीवन के गहरे अनुभवों का अंतर्गुम्फन और अभिव्यक्ति में सरलता उसमें जादू भर देती है .. आपके शेर बार बार पढ़े जाने के लायक होते हैं कुछ एक तो याद रखने के लायक ..

Priya said...

comment ke roop mein jo aapka aashirwad mila ......tahe dil se shukriya....आपके हम पे हैं उपकार बहुत ये माना
बारहा उनको मगर आप गिनाते क्यूँ हो

bahut khoob

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

"डर जमाने का नहीं आपके दिल में तो फिर
रेत पर लिख के मेरा नाम मिटाते क्यूँ हो"

बहुत ही काबिले तारीफ रचना!

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

नीरज जी, आदाब.
दिल में चाहत है तो काँटों पे चला आयेगा
अपनी पलकों को गलीचे सा बिछाते क्यूँ हो
नये अंदाज में कहा गया शेर..
आपके हम पे हैं उपकार बहुत ये माना
बारहा उनको मगर आप गिनाते क्यूँ हो
वाह, क्या बात है,
अपना एक शेर याद आ गया-
तूफान से तो बच गया लेकिन ये खौफ है
अहसां जता के मार न दे नाखुदा मुझे
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

Kulwant Happy said...

जब मिल बैठेंगे दो महारथी तो कुछ ऐसा ही होगा

anitakumar said...

जाने कब इनकी ज़ुरूरत कहीं पड़ जाए तुम्‍हें
यूं ही अश्‍कों को बिना बात बहाते क्यूँ हो

आज दिन भर पानी का इंतजार करने के बाद यही शेर मन को भाया। अश्क बहाओ तो नीचे बाल्टी लगा लेना…॥:)

खैर वो तो मजाक की बात थी, सच में कुन्दन बन के निकली है गजल

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर लगी आप की कविता

तिलक राज कपूर said...

तुम नहीं साथ तो फिर याद भी आते क्यूँ हो
इस कमी का मुझे एहसास दिलाते क्यूँ हो (उत्‍तम)

डर जमाने का नहीं आपके दिल में तो फिर
रेत पर लिख के मेरा नाम मिटाते क्यूँ हो(उत्‍तम+उत्‍तम)

दिल में चाहत है तो काँटों पे चला आयेगा
अपनी पलकों को गलीचे सा बिछाते क्यूँ हो (उत्‍तम+उत्‍तम)


आपके हम पे हैं उपकार बहुत ये माना
बारहा उनको मगर आप गिनाते क्यूँ हो (उत्‍तम)


जाने कब इनकी ज़ुरूरत कहीं पड़ जाए तुम्‍हें
यूं ही अश्‍कों को बिना बात बहाते क्यूँ हो (उत्‍तम+उत्‍तम)
वाह, वाह, वाह, वाह और वाह। अच्‍छी बॉंधने वाली ग़ज़ल।

मनोज कुमार said...

अच्छी ग़ज़ल, जो दिल के साथ-साथ दिमाग़ में भी जगह बनाती है।

योगेन्द्र मौदगिल said...

वाह भाई जी वाह खूबसूरत गजल है...

Udan Tashtari said...

किस शेर की तारीफ करुँ-किसे छोडूँ??

मुझको मालूम है तुम दोस्त नहीं, दुश्मन हो
अपने खंजर को भला मुझसे छिपाते क्यूँ हो

-छा गये...बहुत उम्दा!!

Dr. Amar Jyoti said...

'दिल में चाहत है तो…'
'आपके हम पे हैं उपकार…'
क्या बात है! शानदार।

Shiv Kumar Mishra said...

बहुत सुन्दर ग़ज़ल. हमेशा की तरह.

पी.सी.गोदियाल said...

मुझको मालूम है तुम दोस्त नहीं, दुश्मन हो
अपने खंजर को भला मुझसे छिपाते क्यूँ हो

बहुत ही उम्दा , अति सुन्दर !

सुलभ 'सतरंगी' said...

वाह सर जी वाह!

ये तो बहुत खास है..

मुझको मालूम है तुम दोस्त नहीं, दुश्मन हो
अपने खंजर को भला मुझसे छिपाते क्यूँ हो

सतपाल said...

तुम नहीं साथ तो फिर याद भी आते क्यूँ हो
इस कमी का मुझे एहसास दिलाते क्यूँ हो
wahwa!!

Kusum Thakur said...

वाह !! सारे के सारे शेर एक से बढ़कर एक हैं !!

Prem Farrukhabadi said...

Neeraj Bhai,
Bahut khoob.
Apki rachna se prabhavit hua hoon.

paas aana nahin chaahte ho to yaad mujhe aate kyun ho.
Apni us khoobsoorat kami ka ahsaas mujhe dilate kyun ho.

सुशील कुमार छौक्कर said...

नीरज जी गज़ल लिखने का क ख ग हमें भी सीखा दीजिए। बताए कब से आपकी क्लास में हाजिरी लगाऊँ। सच कमाल का लिखते है आप।
तुम नहीं साथ तो फिर याद भी आते क्यूँ हो
इस कमी का मुझे एहसास दिलाते क्यूँ हो

वाह।

पारूल said...

जाने कब इनकी ज़ुरूरत कहीं पड़ जाए तुम्‍हें
यूं ही अश्‍कों को बिना बात बहाते क्यूँ हो

:)

गौतम राजरिशी said...

ये मंडॆ के मंडॆ की ग़ज़ल हमारी जान लेकर ठहरेंगी...कभी हमने भी सोचा था कि हर मंडे ग़ज़ल लेकर उतरेंगे, लेकिन वो ख्वाब ही रह गया तो आजकल कुछ से कुछ उल-जलूल लगाते रहते हैं अपने ब्लौग पर मंडे के मंडे।

किंतु आप हर हफ़्ते की शुरुआत चौंकाते रहते हैं अपनी ग़ज़लों की खुश्बू से। "जाने कब इनकी ज़ुरूरत कहीं पड़ जाए तुम्‍हें/यूं ही अश्‍कों को बिना बात बहाते क्यूँ हो" लाजवाब शेर...

निर्मला कपिला said...

डर जमाने का नहीं आपके दिल में तो फिर
रेत पर लिख के मेरा नाम मिटाते क्यूँ हो

मुझको मालूम है तुम दोस्त नहीं, दुश्मन हो
अपने खंजर को भला मुझसे छिपाते क्यूँ हो

वाह नीरज जी इन शेरों ने तो कमाल कर दिया। क्या कमाल की गज़ल लिखी है हो भी क्यों न जब जडों मे पंकज जी ने खाद डाली हो तो पेड भी शानदार होगा और फल भी जानदार होगा। लाजवाब है बधाई

रविकांत पाण्डेय said...

आदरणीय नीरज जी,
आपकी गज़ल पर टिप्पणी करना संसार का सबसे कठिन कार्य है। पहले तो किस शेर की तारीफ़ करूं और दूसरे तारीफ़ के लिये शब्द कहां से लाऊं और तीसरे आपकी गज़ल पढ़ने के बाद होश ही कहां सलामत रहता है जो टिप्पणी करना भी याद रहे।

निपुण पाण्डेय said...

ज़िन्दगी फूस का इक ढेर है इसमें आकर
आग ये इश्‍क की सरकार लगाते क्यूँ हो !

नीरज जी ,
बहुत सुन्दर शेर हैं ....बेहतरीन शेरों की झड़ी ही कहा जाये इसे!!

जाने कब इनकी ज़ुरूरत कहीं पड़ जाए तुम्‍हें
यूं ही अश्‍कों को बिना बात बहाते क्यूँ हो

आज बहुत दिन बाद समय मिला तो इस ग़ज़ल ने समाँ बाँध दिया !
सच में!
कुंदन ही है ये ग़ज़ल !

venus kesari said...

कई दिन बाद ब्लोग पर आया और तड्कती फ़डकती गजल पढने को मिली कि दिल खुश हो गया और सब्से अच्छा वही होता है जिसे पढ कर दिल खुश हो

इसलिये आपकी पुरानी पोस्ट पढ कर और खुश होता हू:)

वैसे इस गजल की बहर निकालने मे दिमाग का मुरब्बा बन गया और पल्ले कुछ नही पडा गुरु जी की क्लास मे और मेह्नत कर्नी पडेगी :)

- वीनस

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

बहुत सुन्दर!
ज़िन्दगी फूस का इक ढेर है इसमें आकर
आग ये इश्‍क की सरकार लगाते क्यूँ हो


ये आग न लगे तो जिन्दगी क्या जिन्दगी!

Sudhir (सुधीर) said...

नीरज जी,

कई दिनों बाद चिठ्ठे पढने बैठा हूँ. बड़ा आनद आया आपकी ग़ज़ल पढ़कर विशेष रूप से ये शेर -

*********
दिल में चाहत है तो काँटों पे चला आयेगा
अपनी पलकों को गलीचे सा बिछाते क्यूँ हो
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आपके हम पे हैं उपकार बहुत ये माना
बारहा उनको मगर आप गिनाते क्यूँ हो
*****
प्‍यार मरता नहीं 'नीरज' है पता सदियों से
फिर भी मीरा को ज़हर आप पिलाते क्यूँ हो

vaah

Apanatva said...

डर जमाने का नहीं आपके दिल में तो फिर
रेत पर लिख के मेरा नाम मिटाते क्यूँ हो
Sadaiv kee bhati is var bhee dhuadhar gazal .mazaa aa gaya . Bahut bahut BADHAI

शारदा अरोरा said...

सचमुच , कुन्दन जैसी ग़ज़ल , दिल के तारों को झंकारती हुई ये ग़ज़ल |

आपने बहुत सुन्दर सी टिप्पणी दी है मेरे गीत पर , कोई जब हिन्दी का टूल खोल कर दो शब्द लिखने की जहमत उठाता है , तो टिप्पणी लिखने से पहले ही सार्थक हो उठती है |

डॉ .अनुराग said...

अजीब शख्स था वो....जाते जाते भीड़ में तन्हाईया दे गया

सर्वत एम० said...

बाप रे बाप!!! ऐसे ऐसे अशआर!! दहशत में आ गया हूँ भाई, आपके अशआर से एक तरफ खौफ महसूस हो रहा है तो दूसरी तरफ जलन. आज समझ आया उस उस मिसरे का अर्थ- "रेख्ती के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो ग़ालिब". कमाल की गजल है, मुबारकबाद इस हुस्न के लिए.
आपने शागिर्दी का हक अदा कर दिया. ऐसे ही शागिर्द, उस्ताद का परचम बुलंद रखते हैं. एक सवाल पूछना चाहता हूँ-- १० की रात क्या खाया था?
कहना तो बहुत कुछ चाह रहा था लेकिन यकीन करें, अलफ़ाज़ नहीं मिल रहे हैं. आपको इल्म है, मैं किसी एक या एकाध को कोट नहीं करता, पूरी रचना पर तब्सिरा ज्यादा अच्छा लगता है. और यहाँ तो पूरी गजल खुद बोल रही है, मैं क्या बोलूँ!

Apanatva said...

Happy makar sankranti !

RAJ SINH said...

क्या कहा है नीरज भाई ...................

तो समेटिये अपनी शान में मेरी तरफ से ......

बुझ चुके कब के हम शोला हैं न चिंगारी हैं
फिर सुनी ऐसी ग़ज़ल .......आग लगाते क्यूं हो ??

संक्रांति की बधाईयाँ !!

श्याम कोरी 'उदय' said...

... गुरु और शिष्य दोनों मिलकर भट्टी में तपा-तपा कर कुंदन बना रहे हैं,बेहतरीन गजल, बधाई !!!!

नीरज गोस्वामी said...

E-mail received from OM Prakash Sapra Ji:-

shri neeraj ji
namastey,
again a very good gazal from you, congrats,
especialy the following lines are very good and touching:-

जाने कब इनकी ज़ुरूरत कहीं पड़ जाए तुम्‍हें
यूं ही अश्‍कों को बिना बात बहाते क्यूँ हो


ज़िन्दगी फूस का इक ढेर है इसमें आकर
आग ये इश्‍क की सरकार लगाते क्यूँ हो


मुझको मालूम है तुम दोस्त नहीं, दुश्मन हो
अपने खंजर को भला मुझसे छिपाते क्यूँ हो

drop in some time in delhi, when ever you get some time,
Happy Lohri festival,
-om sapra, delhi-9

haidabadi said...

जनाबे नीरज साहिब
खुबसूरत सुलझी निखरी ख़ूबसूरत ग़ज़ल
देखी पढ़ी और महसूस हुआ के जैसे कोई खुबसूरत
तस्वीर दिल में उत्तर गई माशा अल्लाह ख़ूब लिखते हो
जिस तरीके से ग़ज़ल नें महफ़िल में अपनी चुनर लहराई है
मुझे ऐसा लगता है के बारिश की आमद आमद है
अपना एक शेर अपनी नज़र करता हूँ
रेत पे लिख के मेरा नाम अक्सर
बार बार इसको न मिटाया कर
दोस्त होते हैं चाँद नीरज से
दोस्तों को न आजमाया कर
आदाब

Babli said...

मकर संक्रांति की बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएँ!
बहुत ही खूबसूरत रचना !

अल्पना वर्मा said...

डर जमाने का नहीं आपके दिल में तो फिर
रेत पर लिख के मेरा नाम मिटाते क्यूँ हो

waah!
behad khubsurat gazal!

रंजन said...

मुझको मालूम है तुम दोस्त नहीं, दुश्मन हो
अपने खंजर को भला मुझसे छिपाते क्यूँ हो


बहुत खूब..

केतन कनौजिया 'शाइर' said...

मुझको मालूम है तुम दोस्त नहीं, दुश्मन हो
अपने खंजर को भला मुझसे छिपाते क्यूँ हो


क्या बात है नीरज सर.. बहुत बढ़िया गज़ल हुई है.. :)

Devendra said...

दिल में चाहत है तो काँटों पे चला आयेगा
अपनी पलकों को गलीचे सा बिछाते क्यूँ हो
...उम्दा शेर.

shama said...

Hamesha kee tarah nistabdh hun!

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

डर जमाने का नहीं आपके दिल में तो फिर
रेत पर लिख के मेरा नाम मिटाते क्यूँ हो
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
नीरज भाई , देर से पहुँची हूँ
पर क्या गज़ब के शेर लिखे हैं आपने
वाह वाह .........
बस !!!
यूं ही लिखा करीए
तिल गुड , चिक्की ,
लोनावाला से लाकर
खाईं या नहीं ? :)
स स्नेह,

- लावण्या

Ghost Buster said...

बस ठीक सी है, आपकी सबसे बेहतर रचना नहीं ये.

dipayan said...

इस गज़ल के हर शेर बेहतरीन. मुबा़रक हो.

Mrs. Asha Joglekar said...

नीरज जी बहुत दिनों के बाद यहां आई और इतनी खूबसूरत गज़ल ।
ज़िन्दगी फूस का इक ढेर है इसमें आकर
आग ये इश्‍क की सरकार लगाते क्यूँ हो

मुझको मालूम है तुम दोस्त नहीं, दुश्मन हो
अपने खंजर को भला मुझसे छिपाते क्यूँ हो

प्‍यार मरता नहीं 'नीरज' है पता सदियों से
फिर भी मीरा को ज़हर आप पिलाते क्यूँ हो
वाह वाह इतने खूबसूरत इलज़ाम और ये स्टाइल ।

sulbha said...

Finally, chacha jaan.......i visited your blog and spent sometime.......its a pleasuere to read this stuff....and u r a true genius........
maloom hai be intehaah talent hai aap mein........yun blogs pe ginaate kyun ho ?
jokes apart.......amzing stuff out here...

संजय भास्कर said...

बहुत बढ़िया प्रस्तुती एक एक शब्द एक एक शेर मुखर हो उठा है आपकी कलम का साथ पा कर

तुषार राज रस्तोगी said...

हर एक शेर पर दाद देने को जी चाहता है | बहुत बेहतरीन ग़ज़ल | बधाई


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Tamasha-E-Zindagi
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