Monday, August 31, 2009

फूल तितली रंग खुशबू



गुरुदेव पंकज सुबीर जी ने अपने ब्लॉग पर एक तरही मुशायरे का आयोजन किया था जिसमें बहुत से नामी गिरामी शायरों ने अपने बेमिसाल कलामों के साथ शिरकत की, उसी मुशायरे में खाकसार ने भी अपनी ग़ज़ल भेजी जिसे उसमें कुछ नए शेर जोड़ कर यहाँ पेश किया जा रहा है.

मुस्कुरा कर डालिए तो इक नज़र बस प्यार से
नर्म पड़ते देखिये दुश्मन सभी खूंखार से

नाम तो लेता नहीं मेरा मगर लगता है ये
रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से

फूल तितली रंग खुशबू जल हवा धरती गगन
सब दिया रब ने नहीं पर हम झुके आभार से

जो दिया था आपने, लौटा रहा है ये वही
किसलिए फिर कर रहे इतना गिला संसार से

दूर से भी दूर है वो पास से भी पास है
आप पर है आप करते याद किस अधिकार से

जब तलक है पास कीमत का पता चलता नहीं
आप उनसे पूछिए जो दूर हैं परिवार से

ज़िन्दगी में यूँ सभी से ही मिली खुशियाँ मगर
जो बिताये साथ तेरे दिन थे वो त्यौहार से

पीठ से मासूम की, लादा हुआ बस्ता हटा
दब रहीं किलकारियां हैं देख उसके भार से

झूठ कहने का हुनर 'नीरज' अगर सीखा नहीं
आप सहरा में नज़र आओगे फिर गुलज़ार से

74 comments:

sada said...

फूल तितली रंग खुशबू जल हवा धरती गगन
सब दिया रब ने नहीं पर हम झुके आभार से

जो दिया था आपने, लौटा रहा है ये वही
किसलिए फिर कर रहे इतना गिला संसार से

बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति, आभार्

Mumukshh Ki Rachanain said...

भाई नीरज जी,
इतनी शानदार ग़ज़ल कि इसके किस -किस शेर की तारीफ करुँ.
फिर भी निम्न कुछ शेर मुझे विशेष रूप से पसंद आये........

फूल तितली रंग खुशबू जल हवा धरती गगन
सब दिया रब ने नहीं पर हम झुके आभार से

दूर से भी दूर है वो पास से भी पास है
आप पर है आप करते याद किस अधिकार से

झूठ कहने का हुनर 'नीरज' अगर सीखा नहीं
आप सहरा में नज़र आओगे फिर गुलज़ार से

आभार अपनी एक और बेशकीमती ग़ज़ल से रु-ब-रु करवाने का

चन्द्र मोहन गुप्त "मुमुक्षु"
जयपुर
मेरे ब्लाग का लिंक
www.cmgupta.blogspot.com
जिस पर "दोहे" आपका इंतजार कर रहे हैं.....प्रतिक्रियाओं के लिए

mehek said...

ज़िन्दगी में यूँ सभी से ही मिली खुशियाँ मगर
जो बिताये साथ तेरे दिन थे वो त्यौहार से
lajawab gazal,ye sher bahut hi pasand aaya.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

ज़िन्दगी में यूँ सभी से ही मिली खुशियाँ मगर
जो बिताये साथ तेरे दिन थे वो त्यौहार से
वाह वाह नीरज जी बहुत सुन्दर ,...

पी.सी.गोदियाल said...

क्या बात है ! बहुत सुन्दर, नीरज जी !!!

raj said...

जो दिया था आपने, लौटा रहा है ये वही
किसलिए फिर कर रहे इतना गिला संसार से....boht sunder gazal....

कुश said...

फूल तितली रंग खुशबू जल हवा धरती गगन
सब दिया रब ने नहीं पर हम झुके आभार से

ये शेर तो माशाल्लाह है... वाकई

poemsnpuja said...

भीनी भीनी खुशबू में बसी गजलें...कमाल लिखते हैं आप नीरज जी.

सागर said...

फूल तितली रंग खुशबू जल हवा धरती गगन
सब दिया रब ने नहीं पर हम झुके आभार से

बहुत अच्छे...

इससे मिलता जुलता बशीर बद्र साहब का शेर याद आया...

चाँद चेहरा, ज़ुल्फ़ दरिया, बात खुशबू, होठ फूल
एक खुदा ने तुम्हें देकर जाने क्या-क्या दे दिया मुझे

विनय ‘नज़र’ said...

वाह वाह अशआर हैं के मोती हैं
--->
गुलाबी कोंपलें · चाँद, बादल और शाम

कंचन सिंह चौहान said...

दूर से भी दूर है वो पास से भी पास है
आप पर है आप करते याद किस अधिकार से


आप के किस शेर की तारीफ की जाये कौन बेहतरीन है, ये कहना जिनके वश की बात होगी, वो कुछ अलग गुर रखते होंहगे मुझमे नही है वो....!

हर शेर कितना खूबसूरत है ??

मैं लिखने बैठती हूँ तो कभी कहन फिसल जाती है कभी बहर...!

एक को कोट करने का मतलब ये नही कि यही सर्वश्रेष्ठ था..पूरी गज़ल कोट बी तो नही कर सकती थी....!

विनोद कुमार पांडेय said...

जब तलक है पास कीमत का पता चलता नहीं
आप उनसे पूछिए जो दूर हैं परिवार से,

नीरज जी,बहुत सुन्दर,
बेहतरीन गजलें!!!

vandana said...

नाम तो लेता नहीं मेरा मगर लगता है ये
रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से

जो दिया था आपने, लौटा रहा है ये वही
किसलिए फिर कर रहे इतना गिला संसार से

दूर से भी दूर है वो पास से भी पास है
आप पर है आप करते याद किस अधिकार से


kis kis sher ki tarif karein......har sher kya poori gazal hi lajawaab hai.

ओम आर्य said...

ज़िन्दगी में यूँ सभी से ही मिली खुशियाँ मगर
जो बिताये साथ तेरे दिन थे वो त्यौहार से
नीरज जी इन पंक्तियो का जवाब नही ......क्या कहू एक से बढकर एक शेर है ....जो सीधे दिल मे उतर गई........अतिसुन्दर

PREETI BARTHWAL said...

झूठ कहने का हुनर 'नीरज' अगर सीखा नहीं
आप सहरा में नज़र आओगे फिर गुलज़ार से

बहुत खूब लिखा है नीरज जी।

Science Bloggers Association said...

Bahut hi sundar bhaav.
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

अर्चना तिवारी said...

नीरज जी बहुत खूबसूरत ग़ज़ल है...khaas taur pe ये शे'र तो बहुत ही उमदा है ..
फूल तितली रंग खुशबू जल हवा धरती गगन
सब दिया रब ने नहीं पर हम झुके आभार से

रश्मि प्रभा... said...

नाम तो लेता नहीं मेरा मगर लगता है ये
रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से
bahut khoob

Shilpa said...

you are a very very good poet. i really liked your creation.specially these lines:
फूल तितली रंग खुशबू जल हवा धरती गगन
सब दिया रब ने नहीं पर हम झुके आभार से

जो दिया था आपने, लौटा रहा है ये वही
किसलिए फिर कर रहे इतना गिला संसार से

So simple,but yet so powerful and so true. Thanks for posting such a creation.
cheers!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

पीठ से मासूम की, लादा हुआ बस्ता हटा
दब रहीं किलकारियां हैं देख उसके भार से
झूठ कहने का हुनर 'नीरज' अगर सीखा नहीं
आप सहरा में नज़र आओगे फिर गुलज़ार से

बहुत खूबसूरत अशआर हैं।
बधाई!

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत शानदार जी. शुभकामनाएं.

रामराम.

M VERMA said...

नाम तो लेता नहीं मेरा मगर लगता है ये
रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से
बिना आवाज के बिना नाम लिये पुकारना और शायद झट से सुनाई भी पड जाती होगी.
बहुत खूब

"अर्श" said...

आदरणीय नीरज जी सादर प्रणाम,
आप तो भारत के उस्ताद शईरों में आतें है और आपके बारे में मैं भला क्या कह सकता हूँ बस आपके लिखे ग़ज़लों को पढ़ कर सीखता रहता हूँ एक शे'र निचे लिख रहा हूँ इसका मतलब कतई ये ना निकाला जाये के यही बेहतरीन था ....

दूर से भी दूर है वो पास से भी पास है
आप पर है आप करते याद किस अधिकार से

गिरह जी तरह से आपने लगाई है वो अलग से खड़े होकर दाद मांग रहा है ... नायब शे'र के लिए बहुत बहुत बधाई

अर्श

pukhraaj said...

नाम तो लेता नहीं मेरा मगर लगता है ये
रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से ...

क्या खूब कह डाला है नीरज जी ...पूरी ग़ज़ल ही बहुत सुन्दर है

vikram7 said...

पीठ से मासूम की, लादा हुआ बस्ता हटा
दब रहीं किलकारियां हैं देख उसके भार से
इस बेहतरीन गजल के लिये बहुत बहुत बधाई

Shiv Kumar Mishra said...

सुन्दर गजल. एक-एक शेर क्या कुछ नहीं कहता. वाह!

haidabadi said...

जनाबे नीरज साहिब
आपकी ग़ज़ल में हुस्ने तकरार है ख़यालात का इज़हार है
हिंदी के शब्द सुन्दर हैं और ग़ज़ल को खूबसूरती देते हुए दिखते हैं
आपकी सोच जिंदगी की तलख़ हकीक़त बयाँ करती है
शिकवा नहीं करती शिकायत नहीं करती एहसान मंद है
छुपा कर बात करने का हुनर भी आपको है मंज़रकशी भी आप का
शेवा है जनाबे किबला साहिब माज़रत के साथ लिख रहा हूँ के
हो सकता हो के आपको कभी कबार अलहाम भी होता होगा
डर यह है के कहीं आप पर वही न नाज़िल हो जाये
कोई कंबख्त रात भर आपको उस पार से आवाज़ तो देता है
यह तो इल्म है आपको आपके नाम लेवा तो हैं तफ्तीश करे के वोह कौन है
में तो नहीं हो सकता

चाँद शुक्ला हदियाबादी
डेनमार्क

अमिताभ मीत said...

नाम तो लेता नहीं मेरा मगर लगता है ये
रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से

ज़िन्दगी में यूँ सभी से ही मिली खुशियाँ मगर
जो बिताये साथ तेरे दिन थे वो त्यौहार से

भाई .... किस किस शेर की तारीफ़ हो. और सच कहूँ तो मैं कुछ भी कहने में खुद को नाकाफ़ी पाता हूँ. कोई टिपण्णी नहीं. बस पढ़ी ये खूबसूरत ग़ज़ल, और खामोश हूँ.

Priya said...

waise to poori gazal achchi hai but hamhe 3rd, 6th & 7th sher jyada pasand aaye

Nirmla Kapila said...

आब मै तो किसी एक शेर के बारे मे कह नहीं सकती क्यों कि मुझे तो सभी शेर बहुत पसंद आये।पूरी गज़ल लाजवाब है । आपकी लेखनी तो पठक को हर विधा मे बाँध लेती है फिर गज़ल हो तो सोने पे सुहागा है बहुत बडिया बधाई

Mansoor Ali said...

sundar bhav, laajawab adaaygi.

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

"फूल तितली रंग खुशबू जल हवा धरती गगन
सब दिया रब ने नहीं पर हम झुके आभार से"
नीरज जी ,
आप की इस ग़ज़ल के बारे में क्या कहूँ.......हर शेर लाजवाब...पए ये शेर बहुत ही पसन्द आया।आप के बारे में तो पंकज जी ने जो वहाँ कहा है, अब उसके बाद और किसी के तारीफ़ की आवश्यकता मैं नही समझता कि है....फिर भी.....बहुत सुन्दर रचना....बहुत बहुत बधाई....

राज भाटिय़ा said...

जो दिया था आपने, लौटा रहा है ये वही
किसलिए फिर कर रहे इतना गिला संसार से

जानब हमारे शव्द भी कम पड रहे है तारीफ़ के, बहुत सुंदर..
धन्यवाद

Yogesh said...

जब तलक है पास कीमत का पता चलता नहीं
आप उनसे पूछिए जो दूर हैं परिवार से

ज़िन्दगी में यूँ सभी से ही मिली खुशियाँ मगर
जो बिताये साथ तेरे दिन थे वो त्यौहार से


वाह नीरज जी, आपने तो कमाल कर दिया
बहुत बढ़िया गज़ल बनाई है आपने।
गज़ल की खासियत इन दोनो शेरों से पता लगती है। पहली लाइन पढ़ कर कोई अन्दाज़ा नहीं लगा सकता के आप अगली लाइन में क्या कहेंगें। यही होना चाहिये गज़ल में। जो आपकी गज़ल में बखूबी है।

http://tanhaaiyan.blogspot.com

शरद कोकास said...

जो बिताये साथ तेरे दिन थे वो त्यौहार से" बस यह पंक्ति दिल ले गई -शरद कोकास ,दुर्ग

venus kesari said...

पूरी गजल शारदार

मक्ता डबल शानदार

झूठ कहने का हुनर 'नीरज' अगर सीखा नहीं
आप सहरा में नज़र आओगे फिर गुलज़ार से

वाह ....

वीनस केसरी

Apoorv said...

जब तलक है पास कीमत का पता चलता नहीं
आप उनसे पूछिए जो दूर हैं परिवार से

आपकी इन पंक्तियों से खुद को कहीं जुड़ा पाता हूँ..बधाई

Ratan said...

जब तलक है पास कीमत का पता चलता नहीं
आप उनसे पूछिए जो दूर हैं परिवार से ....

Waise ye pahli baar ho raha hai ki. I cant decide which one is these lines are best..
Bahut achcha likha aapne sach mein.. bahut hinn achcha..

Nitish Raj said...

बहुत खूब नीरज भाई
नाम तो लेता नहीं मेरा मगर लगता है ये
रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से
सुंदर फिर वो ही बात। धन्यवाद।

Mrs. Asha Joglekar said...

फूल तितली रंग खुशबू जल हवा धरती गगन
सब दिया रब ने नहीं पर हम झुके आभार से
bahut gambheer bat bahut hee sahajta se kehana aapkee khaseeyat hai.

अनूप शुक्ल said...

जय हॊ। आप इत्ता धांसू लिख दिये कि परेशान हो रहे हैं कि किसकी तारीफ़ करें किसको छोड़ दें।परेशानी से बचने के लिये हम पूरी की पूरी गजल की तारीफ़ कर दे रहे हैं सो जानना। एक मुश्किल आपने ई भी खड़ी कर दी कि इसकी पैरोडी बड़ी मुश्किल होगी अगर बनाते हैं। आपने अपनी गजल में पैरोडी लाक लगा दिया! :)

मानसी said...

बहुत खूबसूरत ग़ज़ल। बिना किसी बेहद मुश्किल अल्फ़ाज़ के, सीधे दिल में उतरने वाली...वाह!

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

:-)
अनूप सुकुल जी की बात पढ़के हंस रहे हैं और क्या गज़ब लिखे हैं आप इस बारी वाह जी वाह ..
शानदार एक से बढ़कर एक ...मधुबाला की जितनी तारीफ़ की जाए , सब कम है ...
आपकी पसंदीदा नायिका हैं क्या ? :)
She is , simply, sublime
- लावण्या

seema gupta said...

नाम तो लेता नहीं मेरा मगर लगता है ये
रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से
मन को छु लेने वाली पंक्तियाँ....

regards

आशुतोष दुबे 'सादिक' said...

बहुत खूबसूरत ग़ज़ल।
हिन्दीकुंज

नीरज गोस्वामी said...

E-mail received from Om Prakash Sapra Ji:

Shri neeraj ji
Namastey

Your gazal "phool titli rang khushboo" is really nice
and i wish to appreciate it.
The following lines are very touching and need special
appreciation:-

जो दिया था आपने, लौटा रहा है ये वही
किसलिए फिर कर रहे इतना गिला संसार से

दूर से भी दूर है वो पास से भी पास है
आप पर है आप करते याद किस अधिकार से
जब तलक है पास कीमत का पता चलता नहीं
आप उनसे पूछिए जो दूर हैं परिवार से

again congratulations,
-om sapra, delhi-9
9818180932

KNKAYASTHA "नीरज" said...

नीरज जी,
बहुत ही गहरी बात कही है आपने...
ग़ज़ल तो खैर बहुत खूब कही है आपने...
और इन पंक्तियों की तो बात ही निराली है...

जो दिया था आपने, लौटा रहा है ये वही
किसलिए फिर कर रहे इतना गिला संसार से...

झूठ कहने का हुनर 'नीरज' अगर सीखा नहीं
आप सहरा में नज़र आओगे फिर गुलज़ार से...

kshama said...

इन दिग्गजों के बाद अलग से मै क्या कहूँ ? इतनी क़बिलियत नही ...कई बार पढ़ती हूँ ..लेकिन comment नही कर पाती ..!

Dr. Amar Jyoti said...

बहुत ख़ूब! हर शेर एक से बढ़ कर एक।
बधाई

दिगम्बर नासवा said...

जब तलक है पास कीमत का पता चलता नहीं
आप उनसे पूछिए जो दूर हैं परिवार से

पीठ से मासूम की, लादा हुआ बस्ता हटा
दब रहीं किलकारियां हैं देख उसके भार से

NEERAJ JI ........ AAPKI KLAM KE JAADOO KE TO SAB DIWAANE HAIN .... KYON HAIN YE BAAT IS GAZAL AUR ITNE LAJAWAAB SHERON SE BIN KAHE HI SAMAJH AA JAATI HAI ......

AAPKI KALAM KO AAPKE HAATH KO CHOOMNE KO MAN KARTA HAI .... KAMAAL KE SHER KAHTE HAIN AAP

M.A.Sharma "सेहर" said...

फूल तितली रंग खुशबू जल हवा धरती गगन
सब दिया रब ने नहीं पर हम झुके आभार से


जब तलक है पास कीमत का पता चलता नहीं
आप उनसे पूछिए जो दूर हैं परिवार से


ज़िन्दगी में यूँ सभी से ही मिली खुशियाँ मगर
जो बिताये साथ तेरे दिन थे वो त्यौहार से


पीठ से मासूम की, लादा हुआ बस्ता हटा
दब रहीं किलकारियां हैं देख उसके भार से

Amazing Neeraj ji
har sher moti sa khoobsurat !!!

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

जो दिया था आपने, लौटा रहा है ये वही
किसलिए फिर कर रहे इतना गिला संसार से
कितना सच कहा आपने , बिलकुल वैसा ही बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से हो

Apoorv said...

नीरज जी..ब्लोग पर प्रतिक्रिया व्यक्त कर उत्साह बढाने के लिये तहे-दिल से शुक्रिया..ब्लोगिंग मे अभी शैशवावस्था मे हूँ..काफ़ी कुछ समझना बाकी है..आप जैसे वरिष्ठ ब्लोगर और साहित्यप्रेमी से प्रतिक्रिया पा कर मन बल्लियों उछलता है..और क्या कहूँ..आगे भी आपके स्नेह और मार्गदर्शन की अपेक्षा रहेगी..बहुत बहुत आभार!

Sudhir (सुधीर) said...

ज़िन्दगी में यूँ सभी से ही मिली खुशियाँ मगर
जो बिताये साथ तेरे दिन थे वो त्यौहार से

क्या सहज अभिव्यक्ति हैं...मन को भाया आपका यह शेर

साधू!

रविकांत पाण्डेय said...

आदरणीय नीरज जी,
आपके शेरों की तारीफ़ के लिये शब्द ढूंढना मुश्किल हो जाता है। हर शेर ही दमदार है। आनंद आ गया।

Babli said...

बहुत ख़ूबसूरत ग़ज़ल लिखा है आपने! सुंदर भाव और शानदार प्रस्तुती के लिए बधाई! खासकर मुझे ये पंक्तियाँ बेहद पसंद आया -
फूल तितली रंग खुशबू जल हवा धरती गगन
सब दिया रब ने नहीं पर हम झुके आभार से

अंकित "सफ़र" said...

नमस्कार नीरज जी,
एक बेहतरीन ग़ज़ल, शुरुआत ही इतनी शानदार है.
मतला में मासूमियत इतनी सहज है की हर कोई आपका दीवाना हो जाये, बचपन की मुश्किलों को बयान करता ये शेर अपने आप में उम्दा है.............
"पीठ से मासूम की, लादा हुआ बस्ता हटा
दब रहीं किलकारियां हैं देख उसके भार से"
जाते जाते मकते ने ग़ज़ल के हर शेर के बुनियाद बता दी है.

pallavi trivedi said...

जब तलक है पास कीमत का पता चलता नहीं
आप उनसे पूछिए जो दूर हैं परिवार से

पीठ से मासूम की, लादा हुआ बस्ता हटा
दब रहीं किलकारियां हैं देख उसके भार से

बहुत खूब...सच्ची बात कही आपने!

डॉ .अनुराग said...

पीठ से मासूम की, लादा हुआ बस्ता हटा
दब रहीं किलकारियां हैं देख उसके भार से

subhan allah ye to aapne vahi baat kahi jo roj subah ham mahsoos karte hai....der se aaya hun taab tak kai haazreen apni baat kah chuke hai ....

नीरज गोस्वामी said...

Comment received through e-mail from Sh. Sarvat Zamal:

नीरज भाई, नमस्कार.
एक बेहद खूबसूरत गजल आपके ब्लॉग पर देखने के बाद खुद को रोक नहीं पाया. मैं आपकी शान में एक गुस्ताखी कर रहा हूँ. एक मिसरा मुझे थोड़ा सा खटका, इसी लिए यहाँ आ गया. गजल तो पोस्ट हो चुकी है और मैं उस्ताद या गुरु बिलकुल नहीं हूँ. पहले मिसरा देख लें:
सब दिया रब ने मगर हम कब झुके आभार से
मुझे लगा कि शायद मैं कहता तो ऐसे ही कहता. अगर आप इस मशविरे से दुखी हुए हों, आहत हो, नाराज़ हों तो साफ़ कह दीजियेगा. मुझे आपके टैलेंट, अनुभव, ज्ञान पर किसी भी तरह का शक नहीं है और न ही मैं अपनी विद्वता-ज्ञान का प्रदर्शन कर रहा हूँ.
एक चीज़ मेरी निगाह में खटकी वो मैं ने बता दी. आगे आपका मन और इन्साफ. अनाधिकार चेष्टा की है, इसकी सजा के लिए भी तैयार हूँ.
क्षमा प्रार्थी
सर्वत एम. जमाल

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

क्या खूब नीरज जी। एक बार तो सस्वर पढ़ गया हैं!
वहुत धन्यवाद।

पारूल said...

नाम तो लेता नहीं मेरा मगर लगता है ये
रात भर आवाज़ देता है कोई उस पार से

ज़िन्दगी में यूँ सभी से ही मिली खुशियाँ मगर
जो बिताये साथ तेरे दिन थे वो त्यौहार से...:)

Manish Kumar said...

आप ने बड़ी कुशलता से ठेठ हिंदी शब्दों का इस ग़ज़ल में प्रयोग किया है।

Manish Kumar said...

घरवालों की जरूरतों का ध्यान रखते रखते अपनी जरूरतें कब गायब हो जाती हैं या यूँ कहें बेमायनी हो जाती हैं इसका पता ही नहीं चलता।

Udan Tashtari said...

जब तलक है पास कीमत का पता चलता नहीं
आप उनसे पूछिए जो दूर हैं परिवार से

-गज़ब एवं अद्भुत!!

यूँ पूरी गज़ल ही बेजोड़ है..लाजबाब!!

बहुत बधाई!

सुशील कुमार छौक्कर said...

हर शेर शानदार नीरज जी।
ज़िन्दगी में यूँ सभी से ही मिली खुशियाँ मगर
जो बिताये साथ तेरे दिन थे वो त्यौहार से

वाह जी वाह क्या बात है।

Prem Farrukhabadi said...

ज़िन्दगी में यूँ सभी से ही मिली खुशियाँ मगर
जो बिताये साथ तेरे दिन थे वो त्यौहार से

नीरज भाई,
बहुत कुछ कह दिया आपने.ग़ज़ल बहुत ही रोचक है.मुझे बहुत अच्छी लगी .बधाई!!

Dr. Chandra Kumar Jain said...

नीरज जी,
सही कहा आपने...
मतला मन को छू गया....
सच है की सच के हिस्से सहरा आता है
अक्सर...लेकिन झूठ के गुलज़ार से हर हाल में
बेहतर है वह.........शुक्रिया....इस अनोखी प्रस्तुति के लिए.
===================================
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

कंचनलता चतुर्वेदी said...

बहुत ही अच्छी लगी ये रचना...

neera said...

बहूत बढ़िया!

जब तलक है पास कीमत का पता चलता नहीं
आप उनसे पूछिए जो दूर हैं परिवार से

पीठ से मासूम की, लादा हुआ बस्ता हटा
दब रहीं किलकारियां हैं देख उसके भार से

Prem said...

bahut achchi rachna

संजय सिंह said...

भैया प्रणाम

आपकी सभी गजलें मुझे बहुत अच्छा लगा.
आपकी यह गजल बहुत सामायिक है.
" पीठ से मासूम की, लादा हुआ बस्ता हटा
दब रहीं किलकारियां हैं देख उसके भार से"

डॉ.भूपेन्द्र कुमार सिंह said...

bhai ji,ghazal hai ya jeevan darshan,aankhe num ho gai aapke andaz se,behad umda ,tareef ke paar ki ghazal,lafz nahi hai prashansha ke.
Bahut dino baad koi umda baat haath lagi.
Dhanyavaad aapka,
sadar,
dr.bhoopendra

Devi Nangrani said...

Kahan hai vo maasoomiyat bachpanon mein
jo kal tak pali mere ghar aanganon mein

पीठ से मासूम की, लादा हुआ बस्ता हटा
दब रहीं किलकारियां हैं देख उसके भार से
daad ke saath balfaaz meri nishabd soch
Devi