Monday, May 18, 2009

तुम भूखे को रोटी दो




गर हिम्मत हो तो बदलो
मत कोसो यूं किस्‍मत को

प्यार वफ़ा इन्साफ दया
किस दुनिया में रहते हो

छोडो मज़हब की बातें
तुम भूखे को रोटी दो

देश जले नेता खेलें
अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बो

देखो हाल सियासत का
लगती है सर्कस का शो

उसको बरकत मिलती है
बिन मांगे ही देता जो

''नीरज' नश्वर जीवन में
क्या तेरा 'ये' मेरा 'वो'

(गुरु पंकज सुबीर जी का आर्शीवाद प्राप्त किये बिना, इस ग़ज़ल का रूप निखारना संभव नहीं था)

56 comments:

vijay kumar sappatti said...

aadarniya neeraj ji ,
namaskar

main kya kahun .. gazal ne to bheetar tak jhakjhor diya hai .. aaj ke samajik parivesh par kya khoob likha hai aapne .. pahla sher to jaandar hai aur hausla paida karta hai ..

aapki lekhni ko naman. bus aur kuch nahi kah paane ki himmat hai ..

vijay

कुश said...

लगता है कलम की धार लगवाई है आपने.. बड़ी धारधार गजल लिख मारी है... एक एक शेर बड़ा ही मारक है..

महेन्द्र मिश्र said...

उसको बरकत मिलती है
बिन मांगे देता जो
नीरज जी
आपकी यह रचना मन को छू गई है . बहुत ही उम्दा . आभार

Shiv said...

बहुत बढ़िया गजल. कुछ अलग-अलग सी लगी आज. गुरुदेव का आर्शीवाद मिलता रहे, यही कामना है.

विजय जी से सहमत हूँ. गजल ने भीतर तक झकझोर दिया. आपकी लिखनी को मेरा भी नमन, भैया.

Ashok Pandey said...

बहुत खूब। रचना सुंदर भी है, सामयिक भी।

अभिषेक मिश्र said...

Bahut hi sarthak panktiyan!

"अर्श" said...

PYAR WAFAA INSAAF DAYAA..
KIS DUNIYAA ME RAHTE HO...

NEERAJ JI IS SHE'R PE TO NICHHAWAR HUYE HAM... HAALAAKI PURI GAZAL HI AAPNE KAMAAL LIKHI HAI AB AAPKE BAARE ME MERE JAISAA NAACHIJ KYA KAHE.. APNI DUYAAYEN HI DE PAUNGAAA AAPKO... CHHOTI BAH'R ME AAPKI LEKHANI JAADUEE HOTI HAI... GURU DEV KO SAADAR CHARAN SPARSH... AAPKO TATHAA AAPKE LEKHANI KO SALAAM..


ARSH

रंजन (Ranjan) said...

बहुत खुब...

दिगंबर नासवा said...

वाह नीरज जी..............लाजवाब, तेज और व्यंग की तीखी धार चलाई है आपने आज........
अलग अंदाज नज़र आ रहा है आपका

प्यार वफ़ा......इस शेर में आज की हकीकत
छोडो मजहब की बातें.........इस में ऐसा सन्देश दिया है..जो मजहब सिखाता है
सियासत का सही लेखा जोखा........
वैसे तो सभी शेर कुछ न कुछ कह रहे हैं..............अब क्या बताऊँ

Vinay said...

kyaa haal hai janaab ke? aaj kal kavitaayein kam paDhwa rahein hai, baDe din baad koi rachana paDHne ko mili hai, shukriya

रश्मि प्रभा... said...

बहुत ही सरलता से गहरे विचार रखे हैं,
वाह

पंकज सुबीर said...

एक शब्‍द होता है टटकापन । उसका अर्थ होता है जस का तस बिना किसी श्रंगार के । आपका एक शेर जिसमें अक्‍कड़ बक्‍कड़ बम्‍बे बो आया है वो कुछ इसी प्रकार का शेर है । उसमें एक प्रकार का निर्मल आनंद है । जिसे सुन कर एक बारगी तो मुंह से निकल ही जाता है अहा ।

संजय सिंह said...

भैया प्रणाम
आपकी लेखनी को भी मेरा नमन.
क्या लिख देते हैं, बहुते उतेजित टाइप हो गया हूँ.

ghughutibasuti said...

नीरज जी, बहुत सहजता से आपने आज का सच व जीवन से शाश्वत मूल्यों की बात की है। यह कहने के लिए तो न जाने कितना कहना पड़ता।
घुघूती बासूती

मोना परसाई said...

उसको बरकत मिलती है
बिन मांगे ही देता जो
वाह ...नीरज जी ,कितनी खरी पर सीधी बात .

Anonymous said...

छोडो मजहब की बातें
तुम भूखे को रोटी दो ....


... अच्छा दर्शन

हरकीरत ' हीर' said...

गर हिम्मत हो तो बदलो
मत कोसो यूँ किस्मत को

नीरज जी ये हुई न एक अनुभवी मर्दों वाली बात ....बहुत खूब....!!

उसको बरकत मिलती है
बिन मांगे ही देता जो

वाह ...वाह.....हमने तो ताऊ जी द्वारा लिए गए साक्षात्कार में नीरज जी को कुछ ऐसा ही पाया है ....!!

Gyan Dutt Pandey said...

उसको बरकत मिलती है
बिन मांगे ही देता जो
इससे असहमति का तो प्रश्न ही नहीं। बहुत मनभावन लिखा नीरज जी।

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत ही शानदार, ऐसी रचनाधर्मिता आपके ही वश में है और जिन पर गुरुओं का आशिर्वाद हो उनकी लेखनी तो जादूई हो जाती है.

शुभकामनाएं.

रामराम.

PREETI BARTHWAL said...

बहुत ही सुन्दर और सच्चाई को बंया करती रचना है आपकी नीरज जी। बधाई ।

Yogesh Verma Swapn said...

wah neeraj ji, akkad bakkad bambe bon,,,,,,,,,,,,,,,

aur last ki char panktian to kamaal kar rahi hain. dheron badhai sweekaren.

अनिल कान्त said...

dil ko chhoo gayi ye rachna
bilkul sahi baat kahi aapne

dhiru singh { धीरेन्द्र वीर सिंह } said...

दिल को झकजोरती सी है यह ग़ज़ल

शेफाली पाण्डे said...

.बहुत खूबसूरत ..ruk नहीं sakee लिख dala isse prerit hokar
..मेरे लिए कुछ बन पाओ न पाओ
बस तुम भूखे की रोटी बन जाओ ...

निर्मला कपिला said...

छोडो मज़हब की बातें
तुम भूखे को रोटी दो

देखो हल सियसत का
लगती है सर्कस का शो
क्या खूब कहा है

मीनाक्षी said...

चित्र और रचना दोनो ने मर्म छू लिया..

कडुवासच said...

छोडो मज़हब की बातें
तुम भूखे को रोटी दो
...behad khoobasoorat abhivyakti !!

Udan Tashtari said...

बड़े जबरदस्त शेर कहे-सर्कस का शो तो मानो आज ही लिखा होगा!! :) बधाई.

वीनस केसरी said...

देश जले नेता खेलें
अक्कड़ बक्कड़ बाम्बे बो

इस शेर की क्या बात करून जो कहूँगा कम होगा
बहुत सुन्दर और ख़ास कर समय के अनुरूप गजल

वीनस केसरी

गौतम राजऋषि said...

गुरूजी की "अहा" के बाद सब बेमानी है नीरज जी।

एक लंबे अर्से के बाद एक नयी सी ग़ज़ल देख्नने को मिली है।

एकदम अनूठी और बेमिसाल गज़ल।

Ratan said...

Bahut khub..
Another good one!

I wish sooner you gonna get an award for your great contribution to the world of Hindi Literature.

Regards,
Ratan

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

क्या कस के खीँचा है शेर का कान ! वाह ! :)
सर्कस तो होते रहेँगेँ ,
भूखे को खाना पहले मिले
कितना सही कहा नीरज भाई
स स्नेह,
- लावण्या

नीरज गोस्वामी said...

e-mail received from Om Prakash Sapra ji:

dear neeraj ji
namastey
after a gap of so many days i am writing to yo.
your poem is very good and heart touching, especially the following lines:


''नीरज' नश्वर जीवन में
क्या तेरा 'ये' मेरा 'वो'

again congratulations.
regards,
om sapra, delhi-9
9818180932

श्रद्धा जैन said...

Desh jale
wala sher wah kamaal kaha hai

aur bhukhe ko roti do bhi bahut khoob raha

Aapki kalam ki dhaar aur taazgi se hamesha se prabhavit hoti rahi hoon

डॉ .अनुराग said...

आप उन्हें शेर कहते है .हम जिंदगी.....बस यही फर्क है........

Nitish Raj said...

अल्फाजों में बाध दिया है,
आपने जिंदगी की असलियत को।
बेमिसाल नगमा...वाह।

संध्या आर्य said...

आपने बहुत सही बात कही है .........कमाल की रचना है.

रविकांत पाण्डेय said...

कुछ भी टिप्पणि करूं तो इससे सिर्फ़ मेरी अज्ञअनता ही सिद्ध होगी...आखिर अब ऐसे सुंदर गज़ल का बार-बार पढ़कर आनंद लूं या टिपियाऊं...आप ही बताइये?

Science Bloggers Association said...

hamesha ki tarah SHANDAAR GHAZAL.

-Zakir Ali ‘Rajnish’{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

Alpana Verma said...

’उसको बरकत मिलती है
बिन मांगे देता जो”

वाह!बहुत खूब !अच्छी लगी गज़ल.

Dr. Amar Jyoti said...

बहुत ख़ूब!

Prem Farukhabadi said...

क्या खूब कहा है!!
छोडो मज़हब की बातें
तुम भूखे को रोटी दो

अनुपम अग्रवाल said...

विलक्षण, और सुन्दर
बधाई

Unknown said...

क्या कहें, हर बार वही कहेंगे आप का जवाब नही ।

Mumukshh Ki Rachanain said...

कम शब्दों में गहरी और सपाट बातें.......

समझ -समझ भी हम न समझे
अक्कड़-बक्कड़ बम्बे बो में उलझे

प्यार वफ़ा इंसाफ ,दया, इंसानियत ..... जैसे लफ्ज किस दुनिया के हैं, मालूम हो गया.
फिर भी क्यों रखते इसकी आस...................

छोडो मज़हब की बातें
तुम भूखे को रोटी दो

कहना चाहिए था कि

छोडो भूखों की बातें
अब मज़हब की बोटी दो

और क्यों ये सन्देश

उसको बरकत मिलती है
बिन मांगे ही देता जो

इस कपटी दुनिया के लिए कहना चाहिए था

उसको बरकत मिलती है
बिन मांगे ही छीने जो

मेरी ध्रष्टता को मुआफ करना जो गुरूजी द्वारा संवारी ग़ज़ल से छेड़छाड़ की जुर्रत की ..........

चन्द्र मोहन गुप्त

Urmi said...

नीरज जी, आप जैसे महान लेखक का टिपण्णी मिलने पर लिखने का उत्साह और बढ जाता है पर आपके कविता के सामने मेरी शायरी कुछ भी नहीं है! आप एक उम्दा लेखक हैं और आपकी जितनी भी तारीफ की जाए कम है!
आपका ये रचना बेहद पसंद आया क्यूंकि आपने सच्चाई बयान किया है जो दिल को छू गई!

vandan gupta said...

aapki rachna ko kuch kahna to sooraj ko roshni dikhana hoga.....aapki rachnayein to hamari margdarshika hain.
bahut hi shandar.

Dr. Chandra Kumar Jain said...

बहुत सुन्दर रचना....सहज भावाभिव्यक्ति.
===============================
नीरज जी,
लोक सभा चुनाव में महत्वपूर्ण शासकीय
कर्तव्य से जुडे होने के कारण ये अन्तराल रहा.
अब फिर आना-जाना लगा रहेगा....वैसे आपके ब्लाग
पर आता रहा पर दिल की बात न कह पाया इस बीच.

आपका
चन्द्रकुमार

manu said...

देश जले नेता खेलें,,,,
अक्कड़ बक्कड़ बाम्बे बो ,,,,,,,
कमाल,,,,कमाल,,,,कमाल,,,,,
ये नया पण लिए हुए शेर बेहद बेहद पसंद आया,,,,,

संजीव गौतम said...

दादा प्रणाम
एक तो आज सुहावना मौसम फिर ये गज़ल और उसमें ये शेर........
देखो हाल सियासत का
लगती है सर्कस का शो.
और
देश जले नेता खेलें
अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बो
शाम को हसीन बनाने के लिये और क्या चाहिये..
कहन का ये अनूठापन ही गज़ल को गज़ल बनाता है जिसे सीखने में जिन्दगियां गुजर जाती हैं और फिर भी हर किसी को ये हासिल नहीं होता.....
ढेरों बधाइयां...........

योगेन्द्र मौदगिल said...

वाह नीरज जी वाह बधाई स्वीकारें बेहतरीन ग़ज़ल के लिये

सुशील छौक्कर said...

सुन्दर ग़ज़ल।
छोडो मज़हब की बातें
तुम भूखे को रोटी दो

काश ऐसा हो जाए।

Omnivocal Loser said...

बहुत ही खूबसूरत इन्तेख़ाब है हुज़ूर, बेहतरीन...

शोभना चौरे said...

man ko chu lene vale bhav .

अजित वडनेरकर said...

देश जले नेता खेलें
अक्कड़ बक्कड़ बम्बे बो

क्या बात है? एकदम नया प्रयोग,नई अर्थवत्ता...
बहुत खूब

Unknown said...

Niraj ji aise hi dhute dhudhte ek din mai aapke blog pe aagya aur us din se aapke bloga ka hi ho kar rah gaya . aap kya likhte hai uska jawab nahi. You are great. Mai hamesha aap ki kavito ke khuchch paktiyo ko kahi na kahi quot karta rata hu. you are great.