Monday, December 15, 2008

धुंआ नफरत का



भेडिओं से खामखा ही डर रहा है आदमी .
काटने से आदमी के मर रहा है आदमी

दुश्मनी की बात करता है कभी मज़हब नहीं
क़त्ल उसके नाम पर क्यों कर रहा है आदमी

प्यार की खुशबू से यारो जो महकता था चमन
अब धुंआ नफरत का उस में भर रहा है आदमी

मिट गया है हर निशां उसका हमेशा के लिए
बिन उसूलों के कभी भी गर रहा है आदमी

कातिलों को दे चुनौती बात "नीरज" तब बने
अब कहाँ महफूज़ अपने घर रहा है आदमी

(आदरणीय प्राण शर्मा साहेब के आशीर्वाद से संवरी ग़ज़ल)

39 comments:

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

"प्यार की खुशबू से यारो जो महकता था चमन
अब धुंआ नफरत का उस में भर रहा है आदमी"
सच से भरपूर एक बहुत सुंदर रचना, बधाई!

ताऊ रामपुरिया said...

दुश्मनी की बात करता है कभी मज़हब नहीं
क़त्ल उसके नाम पर क्यों कर रहा है आदमी

बहुत सटीक और सामयिक कहा आपने !

राम राम !

अल्पना वर्मा said...

'काटने से आदमी के मर रहा है आदमी'

bahut hi sahjta se itni ganbhir baaten apni is ghazal mein kah gaye aap!
bahut khuub!
badhayee!

seema gupta said...

भेडिओं से खामखा ही डर रहा है आदमी .
काटने से आदमी के मर रहा है आदमी
""उफ़ इन्सान की हैवानियत का कितना सजीव चित्रण "
Regards

अजित वडनेरकर said...

बहुत खूब कहा आपने...

दुश्मनी की बात करता है कभी मज़हब नहीं
क़त्ल उसके नाम पर क्यों कर रहा है आदमी

ये वो सच है जिसे जानबूझ कर वो नहीं समझना चाहते। वर्ना इतनी आसान सी बात क्या वो नहीं समझते ?

संगीता पुरी said...

बहुत सामयिक रचना है...सुंदर तो है ही।

संगीता पुरी said...

बहुत सामयिक कविता .... सुंदर भी है।

सुशील कुमार छौक्कर said...

प्यार की खुशबू से यारो जो महकता था चमन
अब धुंआ नफरत का उस में भर रहा है आदमी

बिल्कुल सटीक समकालीन रचना। कोई वोट के नाम पर, कोई धर्म के नाम, कोई देश के नाम पर, कोई अपने स्वार्थ के नाम पर ,नफरत का धुंआ भर रहे हैं।

बवाल said...

कातिलों को दे चुनौती बात "नीरज" तब बने
अब कहाँ महफूज़ अपने घर रहा है आदमी

आह करती हुई ग़ज़ल और बहुत ही बेहतरीन मक्ता उस पर दर्ज कर दिया नीरजजी आपने. क्या कहना ! वाह वाह !

कंचन सिंह चौहान said...

aap ka kya kahana...un logo me hai.n jo kuchh bhi likhe achchha hi hota hai

परमजीत बाली said...

नीरज जी,बहुत ही बेहतरीन गजल है।बधाई स्वीकारे।
कातिलों को दे चुनौती बात "नीरज" तब बने
अब कहाँ महफूज़ अपने घर रहा है आदमी

Vijay Kumar Sappatti said...

bahut sundar rachana neeraj ji

aaj ke desh ke haalat ho ek dum darshati hui rachana..

bahut badhai

vijay

रश्मि प्रभा said...

प्यार की खुशबू से यारो जो महकता था चमन
अब धुंआ नफरत का उस में भर रहा है आदमी
...........
बहुत खूब......काश !इस नफरत से बाहर निकले आदमी

डॉ .अनुराग said...

भेडिओं से खामखा ही डर रहा है आदमी .
काटने से आदमी के मर रहा है आदमी


सच कहा नीरज जी......आदमी अपनी नफरतों में इस कदर मसरूफ है की इबादत घर में इबादते ख़त्म हो रही है......

दिगम्बर नासवा said...

नीरज जी
बधाई, एक और लाजवाब ग़ज़ल के लिए
पूरी ग़ज़ल मैं खूब रवानगी है, हर शेर पर वाह वाह निकलता है मुहं से

भेडिओं से खामखा ही डर रहा है आदमी .
काटने से आदमी के मर रहा है आदमी
दुश्मनी की बात करता है कभी मज़हब नहीं
क़त्ल उसके नाम पर क्यों कर रहा है आदमी

क्या बात है

विनय said...

kamaal likha hai aapne badhaai!

रंजना [रंजू भाटिया] said...

प्यार की खुशबू से यारो जो महकता था चमन
अब धुंआ नफरत का उस में भर रहा है आदमी

बहुत सही ..बहुत बढ़िया लिखते हैं आप नीरज जी ..

रचना said...

दुश्मनी की बात करता है कभी मज़हब नहीं
क़त्ल उसके नाम पर क्यों कर रहा है आदमी

mae gazal ki taareef kar saku is laayak apne ko nahin samjhtee hun par is kae peechay chhupi hui bhavan ki mae bahut kadr kartee hun

kaas ham sab is bhavna ko samjh sake aur is ko aagey lae jaa sakey

niranter likhae neeraj ji easa hi kuch

तरूश्री शर्मा said...

दुश्मनी की बात करता है कभी मज़हब नहीं
क़त्ल उसके नाम पर क्यों कर रहा है आदमी...
बात वाजिब है आपकी.... सवाल सटीक। कब सुधरेंगे ये

Gyan Dutt Pandey said...

बहुत सुन्दर।
निश्चय ही आदमी आदमी का सबसे बड़ा मित्र है और सबसे बड़ा शत्रु भी।

अभिषेक ओझा said...

'काटने से आदमी के मर रहा है आदमी' बहुत खूब !

गौतम राजरिशी said...

मिट गया है हर निशा उसका हमेशा के लिए
बिन उसूलों के कभी भी गर रहा है आदमी

...वाह उस्ताद वाह

"अर्श" said...

ना आंसू बहेंगे आंखों से किसी के
गर कटे कोई आदमी आदमी सा

ग़ज़ल का मकता तो मुझे अपने इस शे'र को याद दिलाया है कुछ कुछ . बहोत ही खूब लिखा है आपने नीरज बेहद भावपूर्ण रचना..ढेरो बढ़िया स्वीकारें...

अर्श

Manish Kumar said...

सीधी सच्ची बात कही है आपने इस ग़ज़ल में !

sandhyagupta said...

Satik shabdon me gehri baat.

bhoothnath said...

bahut umdaa saahab...laazavaab...!!

राज भाटिय़ा said...

कातिलों को दे चुनौती बात "नीरज" तब बने
अब कहाँ महफूज़ अपने घर रहा है आदमी
इस सुंदर गजल के लिये आप का धन्यवाद

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

इस नफरत की आँधी को कैसे दूर करेँ ?
आपने हमेशा की भँति बढिया लिखा है
- लावण्या

Dr. Amar Jyoti said...

'काटने से आदमी के मर रहा है आदमी"
आज का कठोर सत्य!
बधाई।

कुश said...

बिल्कुल ठीक कहा आपने..

Zakir Ali 'Rajneesh' said...

एक सामयिक एवं सार्थक गजल।

Shiv Kumar Mishra said...

बहुत खूब...हमेशा की तरह बढ़िया गजल.

अक्षय-मन said...

कातिलों को दे चुनौती बात "नीरज" तब बने
अब कहाँ महफूज़ अपने घर रहा है आदमी

क्या बात है सर हकीक़त है आज पहले तो लोग रात को अपने द्वार भी बंद करना भी भूल जाते थे अब बार-बार जाकर चेक करते हैं कहीं कुछ खुला छुट तो नही गया....

शायरी मेरी तुम्हारे ज़िक्र से मोगरे की यार डाली हो गयी...
dhanywaad sabki taraf se......

hem pandey said...

माला (ग़ज़ल) का हर मोती (शेर) सुंदर है. बधाई !

अनुपम अग्रवाल said...

दुश्मनी की बात करता है कभी मज़हब नहीं
क़त्ल उसके नाम पर क्यों कर रहा है आदमी

काश कि यह बात लोगों की समझ में आ जाए

योगेन्द्र मौदगिल said...

वाहवा.... नीरज जी, क्या बात है.... बेहतरीन रचना... आनंद आ गया. बधाई...

प्रकाश बादल said...

क्या खूब नीरज जी,

आपकी ग़ज़ल बेहद अच्छी है। एक स्थान पत ध्यान दें कि 'निशा' लिख गया है जबकि "निशां" होना चाहिए था शायद। आप लिखते ही अच्छा नहीं बल्कि लिखने वालो को बेहद प्रोत्साहन भी देते जो बेहद सराहनीय है।

अंकित "सफ़र" said...

नमस्कार नीरज जी,
बहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल है, हर शेर अपने में उम्दा है.

Dr. Chandra Kumar Jain said...

ज़िंदगी के उसूलों की तरह
साफ़-सुथरी, सुलझी हुई प्रस्तुति.
बधाई नीरज जी.
आप सचमुच कविता में जीने वाले
कलमकार और कलाकार भी है.
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डॉ.चन्द्रकुमार जैन