Tuesday, May 20, 2008

तितलियों की बात हो



तीर खंजर की ना अब, तलवार की बातें करें
ज़िंदगी में आईये बस प्यार की बातें करें

टूटते रिश्तों के कारण जो बिखरता जा रहा
अब बचाने को उसी घर बार की बातें करें

थक चुके हैं हम बढ़ा कर यार दिल की दूरियाँ
छोड़ कर तकरार अब मनुहार की बातें करें

दौड़ते फिरते रहें, पर ये जरूरी है कभी
बैठ कर कुछ गीत की झंकार की बातें करें

तितलियों की बात हो या फ़िर गुलों की बात हो
क्या ज़रूरी है की हरदम खार की बातें करें

कोई समझा ही नहीं फितरत यहाँ इंसान की
घाव जो देते वोही उपचार की बातें करें

काश "नीरज" हो हमारा भी जिगर इतना बड़ा
जेब खाली हो मगर सत्कार की बातें करें


(प्राण शर्मा जी और पंकज जी का एहसानमंद हूँ जिन्होंने मेरा मार्गदर्शन किया)

20 comments:

Dr. Chandra Kumar Jain said...

नीरज जी.
तितली और गुलों की
बात हो तो इस तरह !
=========================
प्यार......घर बार
मनुहार...झंकार
के दम पर
खार के उपचार
और
सत्कार के संस्कार का
मुक़म्मल बयान है आपकी ये पेशकश.
हर शेर पूरी ग़ज़ल है.
और ग़ज़ल है पूरी ज़िंदगी.
=========================
जी भर के बधाई !
आपका
डा.चंद्रकुमार जैन

रंजू ranju said...

थक चुके हैं हम बढ़ा कर यार दिल की दूरियाँ
छोड़ कर तकरार अब मनुहार की बातें करें

दौड़ते फिरते रहें, पर ये जरूरी है कभी
बैठ कर कुछ गीत की झंकार की बातें करें


बहुत ही सुंदर नीरज जी ..सरल लफ्जों में दिल की बात लिखी है आपने .बहुत सुंदर लगी यह गजल भी आपकी ..

राजीव रंजन प्रसाद said...

नीरज जी,

तितलियों की बात हो या फ़िर गुलों की बात हो
क्या ज़रूरी है की हरदम खार की बातें करें

कोई समझा ही नहीं फितरत यहाँ इंसान की
घाव जो देते वोही उपचार की बातें करें

आपकी यह बेहद उम्दा रचना काश हर किसी की समझ का सच हो जाये..

***राजीव रंजन प्रसाद

पंकज अवधिया Pankaj Oudhia said...

वाह! क्या बात है


नीरज जी इतनी सुन्दर रचनाओ मे कुछ सर्वाधिकार सुरक्षित जैसा निशान लगाये। ये आसानी से चोरी हो सकती है। मेरे ब्लाग पर पर्यावरण पर कविता की तलाश मे लोग आते है और फिर खबर आती है कि अमुक स्थानीय अखबार मे यह किसी और के नाम से छपी है। दिनेश जी बेहतर मार्गदर्शन कर सकते है।

शोभा said...

नीरज जी
बहुत ही सुन्दर गज़ल लिखी है-
तितलियों की बात हो या फ़िर गुलों की बात हो
क्या ज़रूरी है की हरदम खार की बातें करें

कोई समझा ही नहीं फितरत यहाँ इंसान की
घाव जो देते वोही उपचार की बातें करें
वाह़ सही खयाल है।

Gyandutt Pandey said...

जेब खाली हो मगर सत्कार की बातें करें
----------------------------
यह तो भारत की सांस्कृतिक विरासत में विश्वास की सशक्त अभिव्यक्ति हो गयी। बहुत जमी यह बात।

अभिषेक ओझा said...

जेब खाली हो मगर सत्कार की बातें करें.
बहुत खूब !

आशीष कुमार 'अंशु' said...

बहुत खूब !

Shiv Kumar Mishra said...

अद्भुत!
बहुत बढ़िया गजल...बहुत अच्छी बातें.

DR.ANURAG ARYA said...

दौड़ते फिरते रहें, पर ये जरूरी है कभी
बैठ कर कुछ गीत की झंकार की बातें करें

ये शेर बहुत पसंद आया.....

डॉ.सुभाष भदौरिया. said...

लहूलुहान मंजर हों,शाम को लौट कर घर वापिस पहुँचेंगे या नहीं की फिक्र आम हो चली हो ऐसे दौर में आप तितलियों और गुलों पर महरबां हैं जनाब.
लगता है आपको गुलों के दंश और तितलियों की फितरत का इल्म नहीं .
राजस्थान में हाल में ही एक तितली ने अपनी मासूम अदा से कइयों की जान ले ली और कई अभी अस्पताल में कराह रहे हैं.
और हमारे देश के कर्णधार गुलों की खुश्बू में मधुहोश पड़े हैं .तितलियों और गुलों ने ही तो देश की मिट्टी खराब कर रखी है.

जोशिम said...

बिल्कुल करें, बेशक करें, बेबाक की बातें करें
इस पार बैठे रिंद से, उस पार की बातें करें ?- rgds - manish

seema gupta said...

'bhut sunder bhavnatmk kaveeta ek sunder pic ke sath"

Regards

haidabadi said...

जयपुर के हवाले से
एक चिता की आग में साजिश का घी डाला गया
वोह गुलाबी शहर तेरा करबला लगता रहा
लग गईं उनको गुलों की बद दुआएं देख लो
तित्लिओं का कतल जिनको खेल सा लगता रहा

चाँद शुक्ला हदियाबादी
डेनमार्क

योगेन्द्र मौदगिल said...

badhaiii, manyawar badhai
sunder rachna

Mumukshh Ki Rachanain said...

भाई नीरज जी,

आपके ग़ज़ल के निम्न शेर पर
काश "नीरज" हो हमारा भी जिगर इतना बड़ा
जेब खाली हो मगर सत्कार की बातें करें
हमें वह बात याद आ गई, जो शायद आप सब ने भी सुन ही रक्खी होगी.......
" अरे भाई दो चाय लाना , मलाई मार के " और फिर चाहे बाते करते एक घंटा भले ही बीत जाय पर चाय नही आती .शायद जेब खाली थी, पर सत्कार की अदा तो निभानी थी.
..........शायद यही वह अदा है जिसे कहीं न कहीं झेलने के बाद आपने अपने संस्कारित दिल को वैसा ही बड़ा बनाने की ख्वाहिश तो कर डाली पर वर्षों से आप में रचा-बसा संस्कार आपको ऐसा करने देगा क्या?
शेष फिर ,
आपका अनुज
चंद्र मोहन गुप्ता "मुमुक्ष"
जयपुर

mahendra mishra said...

चित्र देखकर गाँव के मेलो की याद तरोताजा हो गई . कविता मनभावन लगी धन्यवाद

महावीर said...

नीरज जी
पंकज अवधिया जी की राय से मैं बिल्कुल सहमत हूं। आप कॉपी राइट वगैरह के चिन्ह अवश्य लगाएं। आपकी रचनाएं स्तरीय हैं, चोरों को ललचाने के लिए काफ़ी हैं। यही ग़ज़ल देख लीजिए, इतनी टिप्पणियां आप को केवल प्रसन्न करने के लिए नहीं हैं। पढ़ कर पाठकों के मस्तिष्क और हृदय में एक गहरी छाप छप जाती है और उनका अक्स टिप्पणियों के रूप में नज़र आता है।
यह ग़ज़ल बहुत पसंद आई, नज़र न लगे।
यहां मेरी कुछ अशिष्टता लगे तो क्षमा करना।
शुभकामनाओं सहित
महावीर

bavaal said...

Priy Neerajjee,
Kya zarooree hai ke hardum khar kee batain karain.yahee kah sakta hoon ke main kayal ho gaya. Bahut khoob gazal kahee saheb.

sab kuch hanny- hanny said...

neeraj aaj aapka blog dekh rahi thi, aap k samose sab par bhari pade.sach me, bhai! kavitao, gagal or lekho me v swad hai par pal bhar ko to jeev par samosa hi smosa taira,aaj inhen banana hi hoga. dusre jayak v ache hain. antar aatma ki aawaj pasand aai.