Monday, March 10, 2008

चाँद आशा का


मुम्बई में रहते उसकी भाषा से परिचित होना जरूरी हो जाता है। सोचा क्यों नहीं मुम्बईया भाषा को काफिये में इस्तेमाल किया जाए. एक प्रयोग ही सही. मुम्बईया भाषा में "ला" का अर्थ "हुआ" से है जैसे "थकेला" याने थका हुआ। आप ग़ज़ल पढिये और अगर आनंद आए तो लीजिये.

गर जवानी में तू थकेला है
साँस लेकर भी फ़िर मरेला है

सच बयानी की ठान ली जबसे
हाल तब से ही ये फटेला है

ताजगी मन में आ न पायेगी
गर विचारों से तू सड़ेला है

हो ज़रूरत तो ठीक है प्यारे
बे-ज़रूरत ही क्यों खटेला है

रात काली हो बेअसर ग़म की
चाँद आशा का गर उगेला है

लोग सीढ़ी है काम में लेलो
पाठ बचपन से ये रटेला है

दिल भिखारी से कम नहीं उसका
ताज जिसके भी सर सजेला है

रोक पाओगे तुम नहीं "नीरज"
वो गिरेगा जो फल पकेला है

(वक्त कैसे बीत जाता है पता ही नहीं चलता, ये मेरी 51वीं पोस्ट है )

29 comments:

Shiv Kumar Mishra said...

भैया, गजब है....वाह! वाह!

भाषा का ये कमाल? क्या कहने!
जो किया करते हैं, 'करेला' है

काकेश said...

वाह वाह तो यहाँ से भी है बाप...

लेकिन


भाईगिरी करने का शौक चढ़ा है क्या बेड़ू
या फिर माथा तेरा हटेला है

भाई से पंगा नहीं लेने का क्या...

वरना तू भी पूरा फंसेला है

मीत said...

मानना ही पड़ेगा "भाई" को
देख तो क्या गज़ब कियेला है ..
मस्त है सर.

Sanjeet Tripathi said...

मामू, शब्दों से मस्त खेला है
पन तुमीच खेलेंगा तो अपन लोग क्या करेंगा।
भाई बोला झकास लिखेला है।

Dr. Chandra Kumar Jain said...

NIRALI KALAM...NIRALA PRAYOG
EK AUR BADHAI.

mahendra mishra said...

झकास उकेला भाई

रंजू said...

रात काली हो बेअसर ग़म की
चाँद आशा का गर उगेला है


क्या लिखेला है नीरज जी आपने मान गए :)

Gyandutt Pandey said...

नीरज जी, यहां तो "ला" की तुक का रेला लग गया है! लोगों में कवित्व जगा दिया आपने!

पंकज सुबीर said...

रात काली हो बेअसर ग़म की
चाँद आशा का गर उगेला है
नीरज जी आपने जो कुछ लिखा हे वो भाषा का एक नया ही प्रयोग है ओर ये प्रयोग ही भाषा के हित में होते हैं । आपने समां बांध दिया है । विशेष कर ऊपर जो शेर मैंने कोट किया है उसमें तो तो आपने चांद आशा का गर उगेला कह के जाने क्‍या ही कर दिया है । मैं जानता हूं कि कई विशेषज्ञों को ये ग़ज़ल पसंद नहीं आएगी पर मैं तो ये ही जानता हूं कि
ग़ज़ल को ले चलो अब गांव के दिलकश नजारों में
मुसल्‍सल फन का दम घुटता है इन अदबी इदारों में
मैं आपकी प्रशंसा इसलिये नहीं कर रहा हूं कि आप मेरे मित्र हैं बल्कि इसलिये कि मैं हमेशा से ही साहित्‍य को आम आदमी तक पहुंचाने का हामी रहा हूं । ऐसी कविता किस काम की जो आम आदमी से ही बात न कर पाए । आपको पुन: बधाई

पंकज सुबीर said...

नीरज जी अभी पोस्‍ट लगाने के बाद आपकी अन्‍य पोस्‍ट भी देखीं आपने कई जगहों पर मेरा नाम लगा रखा है । मान और सम्‍मान देने के लिये आभार । मगर मैं इस टिप्‍पणी के जरिये कवल ये ही दूसरों को बताना चाहता हूं कि मैं तो वास्‍तव में आपकी ग़जलों में कुछ कर ही नहीं पाता हूं क्‍योंकि वे पहले से ही मुकम्मिल होती हैं । फिर भी आप कुछ नहीं करने के बाद भी मेरा नाम दे रहे हैं ये आपका बड़प्‍पन है। पुन: आभार

Udan Tashtari said...

वाह वाह..मुम्बईया प्रभु की जय हो.

anitakumar said...

वाह नीरज जी इस झमेले को क्या जमेला है
बहुत ही बड़िया लिखेला है

Chandra Mohan said...

Maharastra me rahte -rahte vanha ki Boli par bhi , lagta hai, achchhi pakad ho gai hai. 51ve Post me local bhasha ko mahatva dene ke liye dhanyavad ke patra hai aap.

Prayas ek se badh kar eak nazar aa rahein hain. vah din door nahin jab ham 101ve post se bhi nazare inayat karenge.

Chandra Mohan Gupta, Jaipur

अजित वडनेरकर said...

क्या कमाल की मुंबईया ग़ज़ल लिखी है नीरज जी आपने।
इसी अंदाज़ का एक पूरा दीवान हो जाए।

haidabadi said...

नीरज भाई किसी झाकास्कर से
यह ग़ज़ल पहले ठीक करवा लेते तो अच्छा रहता
अमूमन ऐसा होता है हिन्दी में
श्री मति कुलकर्णी आज कल अपने
शोहर से बहुत परेशान हैं कहती हैं
हाय रे उनकी ब्लोगिन मेरी सौतन हो गई
अर्ज़ किया है
ब्लॉग में पड़ गया है तू नीरज
जान ले यह बड़ा झमेला है
घर की सब्जी कहाँ तू लाएगा
तेरा बाटा का शु फटेला है
अब ब्लोगिन का घर ही तेरा है
तू तो हम सभ से अब कटेला है
नीरज भाई अपना ख्याल रखें
ना चाहते हुए भी हम आपके शुभचिंतक हैं
चाँद शुक्ला हदियाबादी डेनमार्क

अनूप भार्गव said...

उसकी गज़लों में ताजगी देखो
बात नीरज नई कहेला है ।

नीरज गोस्वामी said...

में अपने सभी पाठकों का नमन करता हूँ जिन्होंने इस रचना को पढ़ा और पसंद किया. ऐसी उत्साहवर्द्धक टिप्पणियों से अच्छा और अलग हट कर लिखने की प्रेरणा मिलती है. आप सब का स्नेह यूँ ही मिलता रहे यही कामना है.
नीरज

Dr. Chandra Kumar Jain said...

POST EKYAVAN KIYE PURE BADHAI LIJIYE,
SHABDA KI DUNIYA KO NISHDIN NAYA TOHFA DIJIYE.
KAMNA KARTE HAIN AAGE SHATAK BHI PURA KAREN,
AUR HAR EK PRASTUTI,MUSKAN BAN
JUG-JUG JIYE.
NEERAJ JI...SHUBHKAMNAYEN...

Priyankar said...

जिसे मवाली भाषा समझता था उसमें भी गज़ल लिखी जा सकती है यह देख कर ताज्जुब हुआ . सुखद आश्चर्य ! सच में छोटी बहर की यह गज़ल बहुत अच्छी बन पड़ी है .

मीनाक्षी said...

आपका यह नया अन्दाज़ भी निराला है... बहुत खूब !

सूरज प्रकाश का रचना संसार said...

नीरज भाई तुम ये क्‍या करेला है
ये क्‍या नया झमेला है
ग़ज़ल तो बहुत प्‍यारी सी वि‍धा है
तुम कहां इसे बंबइया इस्‍टाइल में धकेला है
पन बात तो फि‍र भी बनेला है

जोशिम said...

क्या भाय गुगली फेंकेला है
सब टपोरी मस्त लिखेला है
अपुन को नईच सम्झेला है
टिच है मस्त सिखेला है
- मनीष
p.s. - हाफ सेंचुरी अप का बधाई लियेला है

महावीर said...

ग़ज़ल अब उस पुराने ढर्रे से निकल कर, पुरानी ज़ुबान की कैद से बाहर निकल कर सांस ले रही है। यह प्रयास सराहनीय है, बहुत पसंद आया।

रजनी भार्गव said...

आपका ये अनोखा अंदाज़ बहुत खूब है.

नीरज गोस्वामी said...

ये कमेंट मुझे सीधे मेरे ई मेल से मिले सोचा इन्हे भी आप तक पहुँचा दूँ.
१. मेरी दीदी "देवी नागरानी " जी का कमेंट:
bahut khoob prayog kiya hai
dekh Neeraj ne kya karela hai( Do matlab)
kaun kahta hai tu aakela hai.
daad ke saath Tejendraji aur neeraj ko is prastuti ke liye
Devi
are is par nazar gayi hai
रोक पाओगे तुम नहीं "नीरज"
वो गिरेगा जो फल पकेला है
kahti maaN hai doodh pi jaaO
kaise pee lein vo, jo fatela hai.
thanks for the incentive
देवी

२. यू.के. से ज़किया जी का कमेंट:
Gajal aapki jo padhela haye
Aa gaya bahut majela haye
Gajal ki taNg aisi tutela haye
Galib sir pakday baithela haye
Mazedar haye
Experiment tak hi theek haye.
Aisa lagta haye asli ghzal aap achchhi likh latay hoNgay.
Best wishes
Zakia

महावीर said...

एक बार फिर इस ग़ज़ल के बारे में लिखना चाहता हूं। हिन्दी साहित्य में प्रदेशीय और प्रांतीय भाषाओं का योग हमेशा से रहा है। बृज और राजस्थानी के उदाहरण सामने हैं।
यह तो सिद्ध हो चुका है कि साहित्य में प्रांतीय भाषाओं के समावेश से हिंदी साहित्य का विस्तार ही हुआ है। मुम्बईया भाषा भी हिन्दी का ही एक अंग है, इसको असाहित्यिक कह कर या अन्य रूप में लेना नाइंसाफ़ी होगी। नीरज जी ने इस प्रयास
में ग़ज़ल का खिलवाड़ न कर, बहरो-वज़न आदि नियमों का पालन करते हुए ग़ज़ल को पूरा सम्मान दिया है। भाषा का रूप देखते हुए इसे 'हज़ल' की श्रेणी में न लाई जाए, यह एक ख़ूबसूरत ग़ज़ल है।

नीरज गोस्वामी said...

श्रधेय महावीर जी की उक्त टिपण्णी से इस ग़ज़ल पर भविष्य में होने वाली किसी भी बहस पर विराम लग गया है. पसंद या नापसंद सब की अपनी होती है और उसे व्यक्त करने की पूर्ण स्वतंत्रता का मैं हामी हूँ. मैं श्री महावीर जी का तहे दिल से शुक्र गुज़ार हूँ जिन्होंने मुझे इतना हौसला दिया है.
एक दिलचस्प टिपण्णी मुझे मेरी ई मेल पर मिली है जिसे आप भी पढ़ें इसे यू .के. से दिव्या माथुर साहिबा ने भेजा है:
Your gazal made my day, I have a big smile on my face. well written, I don't know whether they will treat it as a masterpiece in literature but it is wonderful, entertained me one hundred per cent.
With all good wishes,
Divya Mathur
The Nehru Centre

Ila said...

मुम्बई की हिन्दी को कभी गम्भीरता से नहीं लिया । सुनकर हँसी ही आई हमेशा , लेकिन आपकी गजल ने सोचने पर मजबूर कर दिया। सचमुच अभिव्यक्ति महत्वपूर्ण है, सिर्फ़ भाषा नहीं ।
बधाई ।
इला

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

bhasha ke sath sath thoughts me bhi nayapan hai ...kai sher behad pasand aaye.... :)