Friday, October 19, 2007

मुद्दा मिल गया


क्रिकेट खेलने के बाद मैदान में एक तरफ़ खड़े बरगद के पेड़ की नीचे जा बैठा.क्रिकेट खेलता हूँ, इससे ये अंदाजा लगाने का जोखिम न लें कि भारतीय टीम में अभी भी चांस मिलने की हसरत दिल में है. वो तो पाँच पहले तक थी, अब जाती रही.बैठा ही था कि मेरी नजर वहाँ बैठे कुत्ते पर पड़ी जो हमारे मोहल्ले का मुखिया था और खुजिया रहा था . मुझे याद है कैसे उसने कुछ अपने जैसे पिल्लों के साथ मिल कर टौमी जो पहले मोहल्ले का दादा था को एक रात कालोनी से भगा दिया था, जबकि उसका काम पहले टौमी की चमचा गिरी करना हुआ करता था. तब से उसका नाम हमने गुरु रख दिया था. चूँकि वो मेरे ही घर के सामने बैठा करता था सो उस से दोस्ती हो गयी और हम ने बात करने का तरीका भी दूंद लिया. एक दिन जब मैंने उसे उसकी सफलता का राज पूछा तब उसने बताया की सफलता का एक ही तरीका है वो ये की "आप जिसके पैरों मैं लौट लगाते हैं उसी के पैर मौका देख के खींच दो, बस जैसे ही वों गिरा समझो सत्ता आप के पक्ष मैं स्थानांतरित हो गयी. ये सबसे आसन तरीका है सफल होने का, बाकि तरीके भी हैं लेकिन वे लंबे और उबाऊ हैं जैसे मेहनत करना , सेवा करना ,ईमानदार बने रहना , सच्ची का पक्ष लेना आदि." मैंने सोचा की अगर ये कुत्ता ना होता तो किसी देश का मुखिया होता. मुझे देखकर मुस्कुराया.
मैंने पूछा; "क्या हाल है? क्या कर रहे हो?"
बोला; "सुबह-सुबह राग भीम पलासी गा रहा हूँ. तुम्हें प्रॉब्लम है कोई?"
मैंने कहा; "यार बिदकते क्यों हो. मूड ख़राब है क्या?"
बोला; "बिदकने वाली बात ही है. तुम भी रह गए इंसान के इंसान. जब देख रहे हो कि खुजली कर रहा हूँ, तो पूछ क्यों रहे हो?" मैंने सोचा ग़लत नहीं कहा इसने. ये खुजला ही तो रहा था. बेवकूफ मैं ही था, जो इससे पूछ लिया.फिर मैंने हिम्मत करके कहा; "और गुरु, क्या चल रहा है? आजकल कोई ख़बर नहीं है तुम्हारी?
बोला; "कुछ नहीं चल रहा है. इसीलिए यहाँ बैठे बोर हो रहा हूँ. अब तुम्हारी तरह क्रिकेट तो खेल नहीं सकता सो बोर हो रहा हूँ. वैसे भी कल से कोई मुद्दा नहीं है, सो कुत्ता और क्या करेगा, बोर होने के अलावा?"
मैंने कहा; "मुद्दा नहीं है! क्या हुआ क्या, खुलकर बताओ."
उसने कहा; "अरे यार वो सामने वाले मुहल्ले का कुत्ता कालू था न, कल रात वो ट्रक के नीचे आ गया."
मैंने कहा; "लेकिन ये तो दुखी होने वाली बात है और तुम हो कि बोर हो रहे हो."वो बोला; "दुखी इसलिए नहीं हूँ, क्योंकि कालू से मेरा कम्पीटीशन था. बोर इसलिए हूँ कि जब वही नहीं रहा तो लड़ना-झगड़ना किसके साथ करूं. वो रहता था तो दिन में दो-चार घंटे लड़ाई करके समय कट जाता था. कभी मैं उसे धकियता कभी वो मुझे .कभी हम दोनों अपनी अपनी सीमा में खड़े हो कर गुर्राते रहते. ये हमारा तरीका था सत्ता को बनाये रखने का. हमारे दल के बाकि कुत्ते और पिल्ले हमारे इस तरह लड़ने से हमेशा डरे डरे से रहते. अब तो जिंदगी से आनंद जाता रहा."
मैंने कहा; "यार तुम्हें लड़-झगड़ के आनंद मिलता है. ये तो बड़ी अजीब बात है.
"तुम समझे नहीं मेरे भाई? ये लड़ाई ओ केवल दिखाने के लिए होती थी. सचमुच की लड़ाई थोड़े न थी".
मुझे उसके द्वारा किया गया 'भाई' संबोधन बहुत बुरा लगा. मैंने सोचा ये कुत्ते भी अजीब होते हैं. जरा पुचकार दो तो सीधा सर पर चड जाते हैं . फिर भी मैंने उससे बात-चीत जारी रखी. मैंने कहा "देखो अब बोर होकर कुछ मिलेगा नहीं. चलो और कुछ देखो, यहाँ बैठकर कब तक खुजलाते रहोगे."
वो बोला; "नहीं मैं यहाँ पर किसी का वेट कर रहा हूँ. मैंने एक मैसेंजर भेजा है, सामने वाले मुहल्ले के शेरू कुत्ते के पास. अगर शेरू राजी हो गया तो ये टाइम पास वाली लड़ाई उसके साथ शुरू करूंगा."
मैंने पूछा; "लेकिन अगर वो न माना तो?"
"तो क्या. अपने ख़िलाफ़ किसी अपने किसी चमचे भड़का दूँगा"; उसने बड़े आत्मविश्वास के साथ सूचित क्या.
"और अगर उसी चमचे ने तुम्हारे खिलाफ भी वो ही किया जो तुमने टौमी के साथ किया था तो? ""इतना जोखिम तो लेना ही पड़ता है. अगर तुम सजग हो तो ये नौबत नहीं आती.किसी पे आँख बंद कर के भरोसा नहीं करना चाहिए, ये मुझे मालूम है. "
मैंने अचंभित होते हुए कहा; "गजब है यार. तुम लोग भी इंसानों की तरह सोचते हो."
वो बोला; "क्या करेंगे. इंसानों की कालोनी में रहते-रहते न चाहते हुए भी सीख आ ही जाती है. कभी-कभी आत्मचिन्तन करके देख लेता हूँ कि इंसानों के ज्यादा गुण तो नहीं आ गए अपने अन्दर. इंसानों का थोड़ा बहुत गुण चलेगा, लेकिन ज्यादा नहीं आने चाहिए. आत्मचिन्तन से आश्वस्त हो जाता हूँ तो अपने काम पर लग जाता हूँ."
मुझे उसकी ये बात बड़ी नागवार गुजरी. उसने शायद मेरे चहरे का भाव भांप लिया. फिर बोला; "बुरा मत मानो यार. हम भी ताक़तवर और दाना-पानी देने वाले को देखकर दुम हिलाते हैं और तुम लोग भी. ये अलग बात है कि तुम्हारी दुम दिखती नहीं. लेकिन जिसके सामने हिलाते हो, उसे तो दिखती ही है. तुम लोग भी तो बात-बात पर लड़ते हो. हाँ लेकिन एक मामले में हम तुमसे अच्छे है, और आगे भी रहेंगे. हम लोग तुम्हारी तरह धर्म-वर्म, जाति-वाति को लेकर नहीं लड़ते. भाषा-वाषा को लेकर भी अपने यहाँ कोई झमेला नहीं है. क्या सही कह रहा हूँ तो? क्या हुआ कुछ बोलते क्यों नहीं?"
मैं क्या बोलता. उसने तो मुझे निरुत्तर कर ही दिया था.बात गंभीर हो चली थी. तभी उसका भेजा हुआ मैसेंजर आ धमका. हांफते हुए बोला; "उस्ताद उस शेरू ने तो दुश्मनी करने से मना कर दिया. बोल रहा था कि वो दुश्मनी का रिश्ता तभी रखेगा, जब उसका बॉर्डर बढ़ा दोगे."
वो कुछ देर सोचता रहा. फिर अपने मैसेंजर को घूरते हुए बोला; "अच्छा, तो शेरू ने अभी से ब्लैकमेल करना शुरू कर दिया." फिर कुछ देर सोचकर उसने मैसेंजर से कहा; "तू एक काम कर. ये दुश्मनी वाला रिश्ता तू कायम कर ले मेरे साथ."
मैसेंजर बोला; "क्या उस्ताद ऐसा क्यों बोल रहे हो. मैं और आपके ख़िलाफ़! मुझे मरवावोगे क्या?"
"अबे झूठ-मूठ की लड़ाई करनी है, सच्ची की थोड़े न. दिन में हम दोनों लडेंगे और रात को साथ में रहेंगे. मेरे हिस्से का माल तुझे खिलाऊंगा"; उसने अपने मैसेंजर को समझाते हुए कहा. मैसेंजर मान गया.
मैं अब तक अपने दोस्त से फुली इम्प्रेस्ड हो चुका था. थोडी देर बाद मैं उठा उसे बाय कहा और घर चला आया. कुछ देर बाद मुझे मेरे दोस्त और उसके मैसेंजर के भौकने की आवाजें सुनाई दीं. मैं समझ गया कि गुरु को मुद्दा मिल गया था और वे अपने काम पर लग चुके थे. गुरु के जीवन में आनंद लौट आया था.

4 comments:

Udan Tashtari said...

चलिये, गुरु प्रसन्न हुआ, आप प्रसन्न हुए. :)

बहुत करारा व्यंग्य है, हम प्रसन्न हुए. :)

Sanjeet Tripathi said...

शानदार, धारदार!!

Gyandutt Pandey said...

अरे नीरज भाई (माफ कीजिये, नीरज जी - ये आपकी पोस्ट के भाइत्व ने भेजा खराब कर दिया!); आपके साथ यह प्रॉबलम है कि आप बहुत स्पोराडिक (sporadic) लेखन कर रहे हैं।
आपका लिखा इत्ता दमदार होता है कि न पढ़ने पर मजा नहीं आता।
नियमित नहीं लिखेंगे तो हम खपोली नहीं आने वाले और शिवकुमार को अलग भड़का देंगे! :-)

Shiv Kumar Mishra said...

बहुत मस्त...जबरदस्त...