"किताबों की दुनिया" श्रृंखला फिलहाल कुछ समय के लिए रुकी हुई है जब तक कोई नयी किताब हाथ में आये तब तक आप ख़ाकसार की बहुत ही सीधी, सरल मामूली सी, अर्से बाद हुई इस ग़ज़ल से काम चलाएं, क्या पता पसंद आ जाए , आ जाए तो नवाज़ दें न आये तो दुआ करें कि अगली बार निराश न करूँ :
बाद मुद्दत के वो मिला है मुझे
डर जुदाई का फिर लगा है मुझे
आ गया हूँ मैं दस्तरस में तेरी
अपने अंजाम का पता है मुझे
दस्तरस = हाथों की पहुँच में
क्या करूँ ये कभी नहीं कहता
जो करूँ उसपे टोकता है मुझे
तुझसे मिलके मैं जब से आया हूँ
हर कोई मुड़ के देखता है मुझे
अब तलक कुछ वरक़ ही पलटे हैं
तुझको जी भर के बांचना हैं मुझे
ठोकरें जब कभी मैं खाता हूँ
कौन है वो जो थामता है मुझे
सोचता हूँ ये सोच कर मैं उसे
वो भी ऐसे ही सोचता है मुझे
मैं तुझे किस तरह बयान करूँ
ये करिश्मा तो सीखना है मुझे
नींद में चल रहा था मैं ‘नीरज’
तूने आकर जगा दिया है मुझे
(कुछ लोग ग़ज़ल के साथ लगायी फोटो पर आपत्ति कर सकते हैं लेकिन ज़िन्दगी सिर्फ़ संजीदगी से नहीं चलती उसमें हंसना मुस्कुराना भी जरूरी होता है , ये ग़ज़ल उसी ज़िन्दगी का अक्स है )

