Monday, April 25, 2011

फिर परिंदा चला उड़ान पे है


फिर परिंदा चला उड़ान पे है
तीर हर शख्स की कमान पे है

फ़स्ल की अब खुदा ही खैर करे
पासबाँ आजकल मचान पे है

तब बदलना नहीं ग़लत उसको
जब लगे रहनुमां थकान पे है

हैं निगाहें बुलन्दियों पे मेरी,
क्या हुआ पाँव गर ढलान पे है

धार शमशीर पर करो अपनी
ज़ुल्म का दौर फिर उठान पे है

शहर के घर में यूं तो सब कुछ है’
पर सुकूँ, गाँव के मकान पे है

बात “नीरज” तेरी सुनेंगे सभी
जब तलक चाशनी ज़बान पे है