Monday, March 28, 2011

क्या अजब, ये अश्क का दस्तूर है

देखिये जिसको, वही मगरूर है
मौत को, शायद समझता दूर है

मुस्कुराकर देखते हैं, फिर नया
हो गया ग़र ख्वाब, चकनाचूर है

आलमे तन्हाई का दोज़ख है क्या
पूछ उस से, जो बहुत मशहूर है

जो उसूलों पर टिका, उसके लिए
बस यही समझे सभी, मजबूर है

धूल झोंकी है उसी ने, आँख में
हम जिसे कहते थे, इनका नूर है

गम ख़ुशी में फर्क ही करता नहीं
क्या अजब, ये अश्क का दस्तूर है

जो मिले अपनो से 'नीरज', उम्र भर
दर्द वो होता नहीं काफूर है