Monday, July 27, 2009

किताबों की दुनिया - 14

दोस्तों मैं एक कोलोनी में रहता हूँ जहाँ बहुत सारे फ्लैट्स हैं. जब भी शाम या सुबह मैं अपनी खिड़कियाँ खोलता हूँ तो उसमें से मुझे बाहर बाग़ में खिलते फूल, टूटे पत्ते, सड़क पर सर झुकाए चलते मजदूर, खिलखिलाते बच्चे, परेशानियों को बांटती गृहणियां, भाग कर बस पकड़ते लोग, फेरीवाले, अल्हड चाल में चलती लड़कियां, अपने आपको घसीट कर चलते वृद्ध और भी बहुत से अलग अलग दृश्य नज़र आते हैं. इन खिड़कियों से दिखने वाले दृश्यों की विविधता से ही ये महसूस होता है की मैं एक बस्ती में हूँ किसी बियाबान जंगल में नहीं.




आज जिस किताब का जिक्र मैं कर रहा हूँ वो मेरे फ्लेट की खिड़की तरह ही है जिसमें जिंदगी के अलग अलग मंज़र नज़र आते हैं. आम जिंदगी के सुख दुःख को खूबसूरती से समेटती किताब "आँखों में कल का सपना है" जिस के शायर हैं जनाब "अमर ज्योति 'नदीम'". इस किताब की सबसे बड़ी खासियत है इसकी भाषा, बिना कलिष्ट शब्दों का आडम्बर ओढे जिंदगी के सारे रंगों को बेबाकी से प्रस्तुत करती है .

दीवारों का ये जंगल जिसमें सन्नाटा पसरा है
जिस दिन तुम आ जाते हो, सचमुच घर जैसा लगता है

उसका चर्चा हो तो मन में लहरें उठने लगती हैं
उसका नाम झील में गिरते कंकर जैसा लगता है

छोटी बहर में हर शायर की कोशिश होती है बेहतर शेर कहने की क्यूँ की छोटी बहर में ही शायर का असली कौशल नज़र आता है. कम शब्दों में गहरी बात करना इतना आसान नहीं होता जितना की लगता है.

पानी, धूप, अनाज जुटा लूं
फिर तेरा सिंगार निहारूं

दाल खदकती, सिकती रोटी
इनमें ही करतार निहारूं

तेज़ धार ओ' भंवर न देखूं
मैं नदिया के पार निहारूं

आज हम बहुत बुरे दौर से गुज़र रहे हैं, इंसान इंसान के खून का प्यासा हो रहा है, इंसानियत सिसकती हुई दम तोड़ रही है ऐसे में शायर का दुखी होना जायज़ है. वो ना चाहते हुए भी इनके बारे में लिखने को मजबूर है. शायर आँखें बंद करके आशिक़ और माशूक़ के किस्से नहीं लिख सकता शराब और शबाब की शान में क़सीदे नहीं पढ़ सकता, अपनी इसी मजबूरी को नदीम साहेब के इन शेरों में देखें:

खेत में बचपन से खुरपी फावडे से खेलती
उँगलियों से खून छलके, मेंहदियाँ कैसे लिखें

हर गली से आ रही हो जब धमाकों की सदा
बांसुरी कैसे लिखें , शहनाइयाँ कैसे लिखें

दूर तक कांटे ही कांटे, फल नहीं, साया नहीं
इन बबूलों को भला अमराइयाँ कैसे लिखें

पाठकों को याद होगा की मैंने जनाब "आलोक श्रीवास्तव" साहेब की किताब "आमीन" के बारे में लिखते हुए उनकी मशहूर ग़ज़ल "अम्मा" का जिक्र किया था. इस ग़ज़ल ने आलोक साहेब को बुलंदी पर पहुंचा दिया था. उनकी ग़ज़ल ने 'नदीम' साहेब को भी अम्मा पर लिखने को प्रोत्साहित किया, आईये उनके अम्मा पर लिखे चंद शेरों पर नज़र दौडाएं और दाद दें....

कभी शाम को ट्यूशन पढ़ कर घर आने में देर हुई तो
चौके से देहरी तक कैसी फिरती थी बोराई अम्मा

भूला नहीं मोमजामे का रेनकोट हाथों से सिलना
और सर्दियों में स्वेटर पर बिल्ली की बुनवाई अम्मा

बासी रोटी सेंक चुपड़ कर उसे परांठा कर देती थी
कैसे थे अभाव, और क्या क्या करती थी चतुराई अम्मा

जीवन की त्रासदियों पर हर शायर ने अपने अशआरों में खूब कहा है और अलग अलग अंदाज़ में कहा है. नदीम साहेब के ये शेर पढने के बाद जिस्म में सिहरन पैदा कर देते हैं, आँखें गीली हो जाती हैं . ये एक शायर की सच्ची आवाज़ का असर ही तो है:

बच्चा एक तुम्हारे घर भी कचरा लेने आता है
कभी किसी दिन, उसके सर पर, तुमने हाथ फिराया क्या ?

बिटिया है बीमार गाँव में, लिक्खा है - घर आ जाओ
कैसे जाएँ! घर जाने में, लगता नहीं किराया क्या?

इस किताब में आपको कचरा बीनने वाले बच्चे, तेज धूप में रिक्शा हांकते इंसान, परेशानियों से झूझते बेरोजगार, धर्म और देश के ठेकेदार, लफ्फाजी और चापलूसी करने वाले लेखक, किसान, फुटपाथ पर जिंदगी बसर करते लोग सभी अपनी दास्ताँ सुनाते मिल जायेंगे. ये किताब हमारे आज के हिन्दुस्तान की सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करती है.

महकते गेसुओं के पेच-ओ-ख़म गिनने से क्या होगा
सड़क पर घूमते बेरोजगारों को गिना जाये

वो मज़हब हो, की सूबा हो, बहाना नफरतों का है
वतन में दिन-ब-दिन उठती दिवारों को गिना जाये

कोई कहता है 'गाँधी का वतन' तो जी में आता है
कि गाँधी की अहिंसा के शिकारों को गिना जाये

"आँखों में कल का सपना है" किताब को "अयन प्रकाशन, 1/20, महरौली, नयी दिल्ली ने प्रकाशित किया है. .इस किताब का विमोचन इक्कीस जून को पदम् भूषण श्री गोपाल दास 'नीरज' जी ने किया था.(देखें चित्र) आप में से बहुत से लोग शायद न जानते हों की जनाब "अमर ज्योति 'नदीम' " साहेब का अपना ब्लॉग "random rumblings" है जिसमें समय समय पर वो अपनी रचनाओं से हमें नवाजते हैं. अमर साहेब ने अग्रेजी और हिंदी में एम्. ऐ.करने के बाद अंग्रेजी भाषा में पी.एच.डी. भी की है आप अलीगढ में रहते हैं. उनसे आप 09756720422 नंबर पर संपर्क कर इस किताब के लिए बधाई दे सकते हैं.

शुरू से आखिर तक एक से बढ़ कर एक कमाल के अशआरों से भरी इस किताब को पढना एक सुखद अनुभूति है. सिर्फ 86 ग़ज़लों में नदीम साहेब ने सारी दुनिया समेट दी है. इस से पहले की मैं अगली किताब की खोज पर निकलूं 'नदीम' साहेब का शुक्रिया अदा करना चाहूँगा जिन्होंने मुझे इस नायाब किताब को तोहफे के रूप में भेजा.

दे दीजियेगा बाद में औरों को मशविरा
फ़िलहाल अपना गिरता हुआ घर समेटिये

फूलों की बात समझें, कहाँ हैं वो देवता
ये दानवों का दौर है, पत्थर समेटिये