सच बात मान लीजिये चेहरे पे धूल है
इलज़ाम आइनों पे लगाना फ़ुज़ूल है
उस पार अब तो कोई तेरा मुन्तज़िर नहीं
कच्चे घड़े पे तैर के जाना फ़ुज़ूल है
जब भी मिला है ज़ख्म का तोहफा दिया मुझे
दुश्मन जरूर है वो मगर बा-उसूल है
उर्दू गुलिस्तां में एक से बढ़ एक बुलबुले हुई हैं जिनकी शायरी को लोगों ने पसंद तो किया लेकिन याद नहीं रखा। कारण ये रहा कि उन्होंने अपनी शायरी में कमो-बेस वो ही सब कुछ कहा जो की मर्द शायर कह रहे थे। फ़र्क इतना था कि शायर मेहबूबा को लेकर आंसू बहा रहे थे और शायरायें महबूब को लेकर। मुशायरों के मंच पर शायरा को एक सजी धजी गुड़िया के रूप में पेश किया जाता रहा है जो तरन्नुम और अपने हुस्न से सामयीन के दिलों पर कब्ज़ा करने की कोशिश करती थीं। आज भी हालात कुछ कुछ वैसे ही हैं लेकिन आधी आबादी की नुमाइंदगी कर रहीं शायराओं में से कुछ ने अपनी शायरी में उन अहसासात और ज़ज़्बात को पिरोना शुरू किया जो शायर की सोच के बाहर थे। इस सिलसिले में लिए जाने वाले नामों में पाकिस्तान की शायरा परवीन शाक़िर का नाम सबसे ऊपर है उन्होंने शायरी में जो मुकाम हासिल किया है उसकी कोई मिसाल नहीं। आज हमारे यहाँ भी गिनती की कुछ शायरा हैं जिनका कलाम उर्दू शायरी के किसी भी मोतबर शायर के कलाम से कम नहीं आँका जा सकता।
कौन चक्कर लगाए दुनिया के
कम नहीं होते सात फेरे भी
मेरी साँसों को जोड़ने वाले
है तुझे हक़ मुझे बिखेरे भी
इतनी ज़हरीली साज़िशें होंगी
डस लिए जायेंगे सपेरे भी
मेरी आँखों में जागने वाले
टूट सकते हैं ख़्वाब तेरे भी
हमारी आज की शायरा भी उसी फेहरिश्त में हैं जिनके कलाम ने सामिईन के दिल में जगह बनाई हुई है लोग उन्हें देखने सुनने को हमेशा मुशायरों में मौजूद रहते हैं। बात सन 1977 के एक मुशायरे की है जब मंच से एक नाम पुकारा जाता है और मंच पर बैठी एक पंद्रह साल की कमसिन सी लड़की माइक के सामने आ खड़ी होती है। उसके चलने और माइक के सामने खड़े होने में उसका अपने आप पर बला का भरोसा नज़र आता है। उसकी उम्र को देखते हुए लोग उसे बहुत ज्यादा तवज्जो नहीं देते लेकिन इस बात की परवाह न करते हुए वो अपना गला साफ़ कर तरुन्नम में अपना कलाम पढ़ती है. लोग हैरान हो जाते हैं और उनकी सारी तवज्जो अब उस लड़की के कलाम पर हो जाती है। तालियां हैं कि थमने का नाम नहीं लेती। उस मुशायरे में जिस लड़की ने उर्दू अदब में अपनी शिरकत करने का ऐलान सरे आम कर दिया था उसका नाम है "अंजुम रहबर " जिनकी किताब "मलमल कच्चे रंगों की " मेरे सामने है।
कहीं रास्ते में उसने मेरा हाथ छू लिया था
तो कलाइयों के कंगन कई रोज़ खन-खनाये
तुझे क्या खबर कि मैंने शबे हिज़्र कैसे काटी
कभी नाविलें पढ़ी हैं कभी गीत गुनगुनाये
मेरी इक तमन्ना 'अंजुम' कभी हो सकी न पूरी
कि मैं उससे रूठ जाऊँ मुझे आके वो मनाये
"अंजुम रहबर" मध्य प्रदेश के गुना जिले में 17 सितम्बर 1962 को पैदा हुईं। पढ़ने में होशियार अंजुम ने उर्दू में एम्. ऐ की डिग्री हासिल की। अंजुम जैसे शायरी के लिए ही पैदा हुई हैं। 1977 से आज तक याने लगभग 40 वर्षों से लगातार उनकी मंच पर मौजूदगी किसी भी मुशायरे की कामयाबी मानी जाती है। कारण जानना बहुत आसान है उन्हें सुन कर ही आपको उनकी सफलता का राज़ पता चल जायेगा। दरअसल अंजुम रहबर के गीतों और ग़ज़लों की भाषा सरल और स्पष्ट है जिसे हिन्दी का आम पाठक श्रोता भी आसानी से समझ सकता है।
मेरी आँखों तुम्हें रोने का सलीका भी नहीं
रोज दरियाओं में सैलाब नहीं आते हैं
कुछ तो दुनिया ने यहाँ मौत बिछा रक्खी है
कुछ हमें जीने के आदाब नहीं आते हैं
ये भी इक किस्म का संगीन मरज़ है 'अंजुम'
नींद आती है मगर ख़्वाब नहीं आते हैं
उनकी सभी रचनायें जीवन और जगत के विभिन्न रस-रंगों, सुख-दुख, दर्द और आनन्द की लहरों में अविरल गतिमान रहती हैं तथा हर आम और हर खास इंसान को उसकी हकीकत से रुबरु कराती हैं। यह जज़्बाती पाकीज़गी के साथ मुहब्बत का अहसास कराती हुई चलती है। इस किताब के बारे में बशीर बद्र लिखते हैं कि " ग़ज़लों की ये किताब शायरी की शानदार कद्रों का बेहतरीन नमूना है, जिसमें बोली जाने वाली सादा और तहदार ज़बान में उनका फन गज़ल की खूबसूरत ज़िन्दा रिवायतों और सच्ची जिद्दतों के मिले-जुले रंगों से वुजूद में आया है। हमारे अहद की शायरात की शायरी की तारीख़ इस किताब के ज़िक्र के बग़ैर नामुक्कमल रहेगी "
तूफ़ान पर लिखे थे मेरे दोस्तों के नाम
कश्ती को साहिलों की तरफ मोड़ना पड़ा
मेरी पसंद और थी सबकी पसंद और
इतनी ज़रा सी बात पे घर छोड़ना पड़ा
'अंजुम' मैं क़ैद जिस्म की दीवार में रही
अपने बदन से अपना ही सर फोड़ना पड़ा
अंजुम की बढ़ती लोकप्रियता से प्रभावित हो कर उस काल में बहुत सी शायराओं ने उनके जैसी बनने की कोशिश की। आप यूँ समझें कि लता मंगेशकर के काल में न जाने कितनी गायिकाओं ने उनके जैसे गाने की कोशिश की है लेकिन लता लता ही रही। लता के पास सुर तो थे ही सबसे बड़ी बात उनके गाने में जो अदायगी थी जो भावनाएं पिरोयी गयीं थीं वो सुनने वाले को अपनी लगती थीं तभी तो वो लता बनी रहीं। आप सुर में उनकी भले नक़ल कर लें लेकिन गायन में वैसे भाव कैसे लाएंगे , ठीक इसी तरह अगर कोई अंजुम जैसी तरन्नुम से या उस से भी बेहतर तरन्नुम से अपनी रचनाएँ सुनाएँ उसको क्षणिक सफलता तो भले ही मिल जाए लेकिन लगातार सफलता नहीं मिल सकती। अंजुम साहिबा के पास बेहतरीन तरन्नुम तो है ही साथ में वो अलफ़ाज़ और अहसासात हैं जो उनके फ़न में चार चाँद लगा देते हैं।
तन्हाइयों के दोश पे यादों की डोलियाँ
जंगल में जैसे निकली हों हिरणों की टोलियां
दोश =कंधे
कुर्बान मैं तुम्हारे लबों की मिठास पर
अंगूर जैसी लगती हैं कड़वी निबोलियाँ
यूँ गुदगुदा रहे हैं मेरे दिल को तेरे हाथ
आंगन में जैसे कोई बनाये रंगोलियां
सन 1988 में उनकी शादी लाज़वाब शायर जनाब राहत इंदौरी साहब से हुई. उनसे उन्हें एक बेटा "समीर राहत" भी हुआ लेकिन ये शादी अधिक टिकी नहीं और 1993 में दोनों अलग हो गये। अंजुम साहब की ज़िन्दगी अब अपने बेटे और शायरी को समर्पित हो गयी। देश-विदेश से उन्हें शिरकत के लिए पैगाम आने लगे और वो शोहरत की बुलंदियों पर जा बैठीं। देश के प्रसिद्ध कवि स्वर्गीय गोपाल दास 'नीरज' ने उनके बारे में लिखा है कि " अंजुम रहबर की रचनाओं में जहां वैयक्तिक अनुभूतियों की मिठास, कड़वाहट और रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का रसपूर्ण मिश्रण है, वहीं आज के सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक विकृतियों और विद्रुपताओं की भी मार्मिक अभिव्यक्ति है। निश्चित ही जो भी पाठक इन रचनाओं में झांकेगा उसे अवश्य ही अपना और अपने समाज का कोई न कोई रुप अवश्य दिखाई देगा।’
बस्ती के सारे लोग ही आतिश परस्त थे
घर जल रहा था और समन्दर करीब था
दफ़्ना दिया गया मुझे चांदी की कब्र में
मैं जिसको चाहती थी वो लड़का ग़रीब था
अंजुम मैं जीत कर भी यही सोचती रही
जो हार कर गया है बहुत खुश नसीब था
तेरी पलक पे इक आंसू की तरह ठहरी हूँ
मैं कहीं ख़ाक न हो जाऊं बचाले मुझको
तेरे चेहरे पे नज़र आती है सूरत मेरी
अब तुझे देखते हैं देखने वाले मुझको
है मोहब्बत की लड़ाई भी मोहब्बत 'अंजुम'
जब भी जी चाहे वो आ जाये मना ले मुझको
अंजुम साहिबा की शायरी मोहब्बत में डूबी हुई शायरी है उन्हें पढ़ते सुनते हुए वही आनंद आता है जो शहद चखते हुए आता है क्यूंकि उसमें पता नहीं चलता की गुलाब चंपा चमेली गुलमोहर रातकी रानी मोगरे का रस कितना और कहाँ घुला हुआ है। मधुमख्खी की तरह वो अलग अलग ज़ज़्बातों के फूलों का रस अपनी शायरी में बहुत हुनर से घोल देती हैं। मशहूर शायर जनाब मुनव्वर राणा साहब लिखते हैं कि " अंजुम रहबर उम्र के उस हिस्से से निकल आई हैं जहां संजीदगी पर हँसी आती है, बल्कि अब उनकी हँसी में भी एक संजीदगी होती है और संजीदगी को जब ग़ज़ल की शाहराह मिल जाती है तो गज़ल इक बाविकार औरत की सहेली बन जाती है। जज़्बात की पाकीज़ा तरजुमानी, लहजे का ठहराव और अश्कों की रौशनाई से ग़ज़ल के हाथ पीले करने के हुनर ने उन्हें सल्तनत-ए-शायरी की ग़ज़लज़ादी बना दिया है। वो जिस सलीके, एहतराम और यकीन के साथ दिलों पर हुकूमत करती हैं, अगर सियासतदां चाहें तो उनसे हुकूमत करने का हुनर सीख सकते हैं .
दिन रात बरसता हो जो बादल नहीं देखा
आँखों की तरह कोई भी पागल नहीं देखा
तुमने मेरी आँखों के क़सीदे तो लिखे हैं
लेकिन मेरा बहता हुआ काजल नहीं देखा
उसने भी कभी नींद से रिश्ता नहीं रखा
मैंने भी कोई ख़्वाब मुकम्मल नहीं देखा
"मलमल कच्चे रंगों की " का प्रकाशन सबसे पहले सं 1998 में रहबर साहिबा ने खुद ही करवाया था बाद में इसे मंजुल प्रकाशन भोपाल से प्रकाशित किया गया। आप इस किताब को जिसमें अंजुम साहिबा की लगभग 63 ग़ज़लें कुर कुछ गीत भी संकलित किये गए हैं, अमेज़न से तो ऑन लाइन मंगवा ही सकते हैं यदि ऐसा न करना चाहें तो मंजुल पब्लिशिंग हॉउस को 'सेकंड फ्लोर, उषा प्रीत काम्प्लेक्स ,42 मालवीय नगर भोपाल-462003 "के पते पर लिख सकते हैं। मंजुल की साइट www. manjulindia.com से भी इसे मंगवाया जा सकता है। अंजुम साहिबा को इस किताब के लिए आप उनके फेसबुक पेज पर जा कर बधाई दे सकते हैं। मेरे पास उनका मोबाईल नंबर नहीं है वरना जरूर देता। नयी किताब की तलाश पे निकलने से पहले मैं पढ़वाता हूँ आपको उनकी कुछ ग़ज़लों से चुने हुए ये शेर :
पाजेब तोड़ देने में साज़िश उन्हीं की थी
जो लोग कह रहे हैं कि झनकार भी गई
***
अंजुम तुम्हारा शहर जिधर है उसी तरफ
इक रेल जा रही थी कि तुम याद आ गए
***
वो चाह कर भी किसी का शिकार कर न सका
वो एक तीर था लेकिन मेरी कमान में था
***
रौशनी आँखें जलाकर कीजिये
चाँद को कब तक निचोड़ा जाएगा
***
छुपती कभी नहीं है मोहब्बत छुपाये से
चूड़ी हो हाथ में तो खनकती जरूर है
***
वादा अगर करें तो भरोसा न कीजिये
खुलकर नहीं बरसते वो बादल हैं लड़कियाँ
***
जो बिखरा था कभी सारे जहाँ में
वो ग़म अब एक औरत बन गया है
***
हर क़दम देखभाल कर रखिये
हादसे बेज़बान होते हैं
***
आँखों में मामता है तो घुँघरू हैं पाँव में
रक्कासा है कहीं, कहीं मरियम है ज़िन्दगी
आपके कीमती वक्त को देखते हुए वैसे तो क़ायदे से तो इन फुटकर शेरों के साथ ही बात ख़तम हो जानी चाहिए थी लेकिन साहब कम्बख्त दिल कब क़ायदे मानता है ? तो क़ायदे को बाक़ायदा तोड़ते हुए मैं आपको अंजुम साहिबा की एक छोटी बहर की ग़ज़ल के ये शेर पढ़वा कर आपसे रुख़सत होता हूँ :
तेरा फेरा तेरा चक्कर लगेगा
न जाने कब मेरा घर, घर लगेगा
वो पल भर के लिए आयेगा लेकिन
संवरने में मुझे दिनभर लगेगा
जो है बिक जाने को तैयार 'अंजुम'
वो कुछ दिन बाद सौदागर लगेगा।

