
दीपावली के शुभ अवसर पर हमेशा की तरह इस बार भी गुरुदेव पंकज सुबीर जी के ब्लॉग पर एक शानदार तरही मुशायरे का आयोजन हुआ था. तरही का मिसरा था "दीप खुशियों के जल उठे हर सू". इस मुशायरे में देश-विदेश के नामी गरामी शायरों /कवियों ने अपनी एक से बढ़ कर एक एक ग़ज़लें/ काव्य रचनाएँ प्रस्तुत कीं. उसी मुशायरे में खाकसार ने भी अपनी इस ग़ज़ल के साथ, जिसे मैं आप सब के लिए यहाँ ले आया हूँ, शिरकत की थी.
ढूंढते हो कहाँ उसे हर सू
बंद आँखें करो दिखे हर सू
दीप से दीप यूँ जलाने के
चल पड़ें काश सिलसिले हर सू
एक रावण था सिर्फ त्रेता में
अब नज़र आ रहे मुझे हर सू
छत की कीमत वही बताएँगे जो
रह रहे आसमां तले हर सू
आप थे फूल टहनियों पे सजे
हम थे खुशबू बिखर गए हर सू
वार सोते में कर गया कोई
आँख खोली तो यार थे हर सू
दिन ढले क़त्ल हो गया सूरज
सुर्ख ही सुर्ख दिख रहा हर सू
(ये दो शेर मेरी हाल ही में जन्मी छोटी पोती जिसके निमकी/मधुरा/इष्टी/मिश्री जैसे कई नाम हैं के लिए)
दीप खुशियों के जल उठे हर सू
जब कभी छुप के मुस्कुराती है
फूटते हैं अनार से हर सू
है दिवाली वही असल 'नीरज'
तीरगी दूर जो करे हर सू
