बेज़रूरत सही, पहचान तो कर लें अपनी
या'नी ख़ुद को कभी आईना दिखाया जाए
नोच लें चाँद को, सूरज को बहा कर रख दें
ये तमाशा भी ज़माने को दिखाया जाए
शे'र गोई की है ता'रीफ़ बस इतनी 'पाशी'
अपने एहसास को लफ़्ज़ों में सजाया जाए
एहसास को लफ़्ज़ों में सजाने की कला, ख़ुद को आईना दिखाने की हिम्मत,चाँद को नोचने और सूरज को बहाने का ज़ज्बा बहुत कम किस्मत वालों को नसीब होता है,उन्हीं चंद किस्मत वालों में से एक हैं हमारी आज की "किताबों की दुनिया" श्रृंखला के शायर मरहूम जनाब "कुमार पाशी” साहब जिनकी किताब "तुम्हारे नाम लिखता हूँ" का हम जिक्र करेंगे।

हर शख्स यहाँ दर्द के रिश्ते में बंधा है
सब दूर सही फिर भी जुदा कोई नहीं है
अब काट दिए पाँव हर इक शख्स के उसने
इस शहर में अब उस से बड़ा कोई नहीं है
"पाशी" जी अजब बज़्म है ये नक्दो-नज़र* की
आलिम** तो हैं सब लिख्खा-पढ़ा कोई नहीं है
नक्दो-नज़र*=आलोचना वाली आँखों **आलिम=विद्वान
कुमार पाशी साहब ४ जुलाई १९३५ को पाकिस्तान के बग़दाद उल ज़दीद में पैदा हुए थे , विभाजन के बाद भारत आये ,पहले जयपुर और बाद में दिल्ली में बस गए जहाँ १७ सितम्बर १९९२ को उनका देहावसान हुआ. आधुनिक उर्दू शायरी का जिक्र उनके बिना अधूरा है. उन्होंने मुशायरों में ही नहीं उर्दू शायरी के गंभीर पाठकों और आलोचकों के बीच अपनी अलग पहचान बना ली. आप उनकी शायरी की शैली में नया पन और प्रतीकों में अनूठा पन पायेंगे।
उसके बदन की धूप का आलम न पूछिए
जलता हो जिस तरह कोई जंगल कपास का
है आँधियों का ज़ोर चमकती है बर्क भी
और हम बनाये बैठे हैं इक घर कपास का
गर्मी है जैसे धूप में उसके ही जिस्म की
और चांदनी में नूर है उसके लिबास का
जो कुछ नज़र पड़ा, मेरा देखा हुआ लगा
ये जिस्म का लिबास भी पहना हुआ लगा
जो शे'र भी कहा वो पुराना लगा मुझे
जिस लफ्ज़ को छुआ वही बरता हुआ लगा
दिल का नगर तो देर से वीरान था मगर
सूरज का शहर भी मुझे उजड़ा हुआ लगा
वाग्देवी प्रकाशन –बीकानेर से प्रकाशित इस किताब में पाशी साहब की लगभग अस्सी ग़ज़लें और लगभग साठ नज्में हैं जिनका चयन श्री नन्द किशोर आचार्य जी ने शीन काफ निजाम साहब के साथ मिल कर किया है. इस पुस्तक की प्राप्ति के लिए आप वाग्देवी प्रकाशन को vagdevibooks@gmail.com पर मेल लिख सकते हैं।
तू अपने चारों तरफ़ मौत का अँधेरा लिख
पर उसके गिर्द शिगूफे खिला,उजाला लिख
शिगूफे: कलियाँ
बला की प्यास है दम तोड़ते हैं बेबस लोग
जो हो सके तो मुकद्दर में उनके दरिया लिख
क्यों अपनी ज़ात के जंगल में खो गया 'पाशी'
कभी तो ख़ुद से निकल, दूसरों का किस्सा लिख
जैसा मैं हमेशा कहता आया हूँ छोटी बहर में अपनी बात मुकम्मल तौर पर कहना मुश्किल होता है , सतसई के दोहों की तरह जो "देखन में छोटे लगें घाव करें गंभीर" लेकिन शायर की असली पहचान भी इसी से बनती है. इस किताब में पाशी साहब की छोटी बहर में बहुत अधिक ग़ज़लें तो नहीं हैं लेकिन जो हैं वो कमाल की हैं:
लोग जुरअत कभी दिखाते नहीं
आइनों से नज़र मिलाते नहीं
जानते हैं खरे न उतरेंगे
इसलिए ख़ुद को आजमाते नहीं
खौफ तारी है इस कदर ग़म का
अब ख़ुशी में भी मुस्कुराते नहीं
याद रखते हैं अपने हर ग़म को
हम किसी दोस्त को भुलाते नहीं
वो हुक्मे-ज़बाँबंदी* लगाने भी न देगा
पर दिल की कोई बात सुनाने भी न देगा
देगा वो दुआएं भी कि साया रहे मुझ पर
राहों में मगर पेड़ उगाने भी न देगा
कह देगा न अब याद करूँ मैं उसे 'पाशी'
जब भूलना चाहूँ तो भुलाने भी न देगा
हुक्मे-ज़बाँबंदी = अभियक्ति पर पाबन्दी की आज्ञा
भूलेंगे न हम उनका करम, उन की इनायत
हम ज़ख्म को रख्खेंगे हरा, सोच लिया है
अब उस से किसी तौर हमारी न निभेगी
ढूढेंगे कोई और खुदा, सोच लिया है
चुपचाप से हम देखेंगे जाते हुए उन को
लेकिन न उन्हें देंगे सदा, सोच लिया है
