घर से गए जो एक बार आज के बच्चे
वापिस वो ज़िन्दगी में दुबारा न घर गए
समझा के थक गए तो स्वयं मौन हो गए
कहने लगे बच्चे कि पापा सुधर गए
फुर्सत नहीं मरने की बहुत काम है बाकी
फुर्सत मिली तो ऐसी कि फुर्सत में मर गए
बोलचाल की भाषा में वज़नदार शेर कहना सजीवन साहब की खूबी है. सादा सादा लफ़्ज़ों से सजी संवरी ग़ज़लों में ज़िन्दगी के रंग भर देने की कलाकारी सजीवन मयंक को खूब आती है. आज की ग़ज़लों को विषयों का टोटा नहीं है इसीलिए मयंक जैसे पारखी शायर बंधी बंधाई लीक पर न चलते हुए नए नए विषय अपने अशआरों में पिरोते हैं.
जिस कुएं में आज डूबे जा रहे हैं हम
वो हमारे ही पसीने से बना है
ठोकरों से सरक सकता है हिमालय
जो अपाहिज हैं ये उनकी कल्पना है
खोल दो पिंजरा मगर उड़ न सकेगा
कई वर्षों से ये पंछी अनमना है
इस किताब की भूमिका में श्री मोहन वर्मा जी ने बहुत सच्ची बात मयंक जी के लिए कही है " मयंक शायरी में अरूज़, बहर, शेर मिसरा काफिया रदीफ़, मतला-ओ-मकता और खास तौर से शेर के वज्न को ख्याल रखते हुए शायरी करते हैं. शायरी में वज्न, फूल में खुशबू और जिस्म में जान की तरह होता है और इस लिहाज़ से ये शर्तिया कहा जा सकता है कि सजीवन मयंक की शायरी जानकार की शायरी है." तल्ख़ सच्ची बातों को व्यंग का जामा पहनना आसान नहीं होता, खास तौर पर शायरी में.इसीलिए देखा गया है के अक्सर शायरी में तंज़ बहुत कम देखने को मिलता है. सजीवन मयंक ने लेकिन इस विधा पर भी शेर कहे हैं और क्या खूब कहे हैं:-
गीता रामायण की बातें किसे भली अब लगती हैं
अब तो हर जुबान से सुन लो चलती क्या खंडाला है
सोच समझकर बात करो अब राहों में भिखमंगों से
वरना तुम को समझा देगा वो भी इज्ज़त वाला है
नर्मदा के किनारे बसे होशंगाबाद, मध्य प्रदेश, निवासी सजीवन जी ने एम्.एस.सी.(रसायन शास्त्र ) और हिंदी विशारद करने के बाद शिक्षण कार्य किया और आचार्य के पद से सेवा निवृत हुए. सजीवन जी पिछले पचास वर्षों से निरंतर लिख रहे हैं और उनकी अब तक चार किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. ग़ज़ल लेखन के लिए उन्हें सन 2006 में शिव संकल्प साहित्य परिषद् द्वारा ग़ज़ल गौरव सम्मान भी मिल चुका है. आपकी रचनाएँ भारत की लगभग सभी महत्व पूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में छपती रहती हैं. पाठक सजीवन जी से प्रेम करते हैं क्यूँ की उनकी ग़ज़लों में हम सब की दास्ताँ जो छुपी होती है:
अपनों से कुछ भी कह पाना मुश्किल होता है
कोई बिगड़ी बात बनाना मुश्किल होता है
नहीं चाहता अपने दुःख को अपनों में बांटू
पर चेहरे का भाव छुपाना मुश्किल होता है
कैसे कह दूं आज मेरे घर कोई नहीं आया
तेरी खुशबू को झुठलाना मुश्किल होता है
"दिन अभी ढला नहीं" को मयंक प्रकाशन नरसिंह गली होशंगाबाद ने प्रकाशित किया है. इस किताब में मयंक जी की लगभग नब्बे ग़ज़लें संगृहीत हैं और सभी ग़ज़लें दिल को छूती हैं. आप सजीवन से उनके मोबाईल 9425043627 पर संपर्क करके अथवा उन्हें sajeevanmayank@rediffmail.com पर मेल से निवेदन करके ये अद्भुत किताब मंगवा सकते हैं.
बदली न जा सके कोई आदत नहीं होती
कमज़ोर दीवारों पर कोई छत नहीं होती
दौलत के पीछे भागते न ज़िन्दगी गुज़ार
दिल के सुकून से बड़ी दौलत नहीं होती
सब जानते हैं फिर भी कोई मानता नहीं
दो गज ज़मीन से अधिक जरूरत नहीं होती
मुझे लगता है के हमको ऐसे साहित्य आराधक की प्रशंशा में कंजूसी नहीं करनी चाहिए जो नाम और दाम के पीछे न भागते हुए सच्चे मन से साहित्य को समृद्ध कर रहा है. इसलिए आपसे उम्मीद करता हूँ के आप कमसे कम सजीवन को फोन पर इस किताब और और इसमें छपी ग़ज़लों के लिए बधाई तो देगें ही, किताब मंगवाएं न मंगवाएं ये आपकी मर्ज़ी है. चलते चलते इसी किताब की एक ग़ज़ल के चंद शेर और पढवाए देता हूँ और निकलता हूँ अगली किताब की तलाश में:
यहाँ ज़िन्दगी है सरकस सी केवल खेल तमाशा है
सच पूछो तो सभी हवा में लटक रहे हैं बाबूजी
सर पर लटक रहीं तलवारें केवल कच्चे धागों से
कितनी बेफिक्री से हम सब मटक रहे हैं बाबूजी
जीने का अधिकार हमें है मरने पर है पाबन्दी
इसीलिए बहुतेरे मुर्दे भटक रहे हैं बाबूजी
