Monday, December 6, 2010

किताबों की दुनिया - 42

शायद आप जानते ही होंगे और अगर नहीं जानते तो बता दूँ के मेरा घर जयपुर में है लेकिन मैं मुंबई-पुणे के मध्य स्थित खोपोली नामक सुरम्य स्थान पर नौकरी की वजह से पिछले सात सालों से रह रहा हूँ. यहाँ कंपनी की तरफ से सभी सुविधाओं से युक्त घर मिला हुआ है लेकिन मेरा हफ्ते भर के लिए जयपुर जाना लगभग हर दूसरे माह तय होता ही है. ये सुविधा भी कंपनी ने ही दे रखी है. ये सब लिखने का कारण अपने बारे में आपको बताना नहीं बल्कि कुछ और है. जयपुर एयरपोर्ट की दूसरी मंजिल पर एक किताबों की दुकान खुली है जिसमें अंग्रेजी की तो खैर सैंकडों किताबें हैं ही लेकिन हिंदी की किताबें भी मिली जाती हैं और उन किताबों में शायरी की किताबों भी होती हैं जिनका वहां मिलना किसी अजूबे से कम नहीं.अजूबा इसलिए क्यूंकि अभी भी भारत में हवाई यात्रा पढ़े लिखे, सभ्रांत और धनी लोगों की बपौती मानी जाती है जो शायरी जैसी विधा को हिकारत की नज़र से देखते हैं और क्यूँ न देखें शायरी का रिश्ता दिल से होता है, दिमाग से नहीं, और दिल...पढ़े लिखे, सभ्रांत और धनी लोगों में अपवाद स्वरुप ही मिलता है. हकीकत बदल चुकी है इसका प्रमाण है एयरपोर्ट पर किताबों की दूकान में शायरी की किताब का मिलना याने अब चिथड़ा प्रसाद, थान सिंह जी के साथ कंधे से कन्धा मिला कर हवाई यात्रा करता है और शायरी की किताबें पढता है...लगता है समाजवाद आ गया.

मेरे हिंदी में पूछने पर काउंटर पर खड़े सज्जन ने अग्रेज़ी में बताया के महीने में शायरी की तीन चार किताबें तो बिक ही जाती हैं. ये आंकड़ा मेरे हिसाब से बहुत उत्साहवर्धक है. उर्दू शायरी की किताबें एयरपोर्ट पर बिकना हर्ष का विषय है, इस से अनुमान लगाया जा सकता है की हमारे समाज में उच्च वर्ग, उच्च मध्य वर्ग और मध्य वर्ग की आपसी दूरी कम हो रही है.

लौटती यात्रा में उस दुकान पर जाना मेरा प्रिय काम है. वहीँ मुझे जो किताब मिली उसी का जिक्र मैं आज यहाँ कर रहा हूँ. किताब है ,पटना, बिहार के हर दिल अज़ीज़ शायर जनाब आलम खुर्शीद साहब की ग़ज़लों की जिनका संकलन “एक दरिया ख्वाब में” शीर्षक से जनाब सुरेश कुमार जी ने किया है. किताब के पन्ने पलटते ही जब मुझे ये शेर दिखे तो फिर इसे खरीदने में एक क्षण भी नहीं लगा :-


बहुत चाहा कि आँखें बंद करके मैं भी जी लूँ
मगर मुझसे बसर यूँ जिंदगी होती नहीं है

लहू का एक-इक क़तरा पिलाता जा रहा हूँ
अगरचे ख़ाक में पैदा नमी होती नहीं है

मैं रिश्वत के मुसल्ले पर नमाज़ें पढ़ न पाया
बदी के साथ मुझसे बंदगी होती नहीं है
मुसल्ले : नमाज़ पढ़ने कि चटाई

ऐसे सीधे सच्चे शेर कहने के बेमिसाल हुनर के कारण ही समकालीन उर्दू शायरी के फ़लक पर पिछले बीस सालों में जिन शायरों ने अपने कलाम से गज़ल प्रेमियों और समीक्षकों को आकर्षित किया है उनमें आलम खुर्शीद जी का नाम बहुत ऊपर है. डायमंड बुक्स वालों द्वारा प्रकाशित ये किताब हिंदी में उनकी गज़लों का पहला संकलन है. एक बेहतरीन शायर को हर खास-ओ-आम तक पहुँचाने के लिए सुरेश कुमार जी और डायमंड बुक्स वाले बधाई के हकदार है।

ग़लत ये बात है रोशन कहीं दिमाग़ नहीं
जहाँ अँधेरा बहुत है वहीँ चिराग़ नहीं

मैं उनको शक की निगाहों से देखता क्यूँ हूँ
वो लोग जिनके लिबासों पे कोई दाग़ नहीं

आम बोलचाल के ये शेर पढ़ने सुनने वालों के साथ सीधा सम्बन्ध कायम कर लेते हैं और उनके दिलों में गहरे उतर जाते हैं. हमारे समाज की आज की जटिलताओं और विद्रूपताओं को जिस सहजता और सरलता के साथ वे अपने शेरों में ढालते हैं वो पढते सुनते ही बनता है, और उनकी शायरी पर गहरी पकड़ को प्रमाणित भी करता है.

घर के जितने भी झगडे हैं प्यार से हल हो सकते हैं
क्यूँ हम तकिया कर बैठे हैं तीरों पर तलवारों पर
तकिया: विशवास

बाजू की ताक़त भी इक दिन साहिल तक पहुंचा देगी
लोग भरोसा करते क्यूँ हैं कश्ती पर, पतवारों पर

पानी लाख उछालें मारे, पानी में मिल जाता है
एक नज़र तो डालो ‘आलम’ बागों के फव्वारों पर

आलम खुर्शीद साहब की शायरी पढते हुए लगता है जैसे वो हमारे मन की परतें खोल रहे हैं. वो जीवन को लेकर शंकित भी हैं लेकिन आशा का दामन कभी नहीं छोड़ते. एक बेहतर दुनिया का ख्वाब उनकी शायरी में हमेशा जिंदा रहता है और येही चीज़ उनकी शायरी को जीवंत बनाती है.

पीछे छूटे साथी मुझको याद आ जाते हैं
वर्ना दौड में सबसे आगे हो सकता हूँ मैं

इक मासूम-सा बच्चा मुझमें अब तक जिंदा है
छोटी छोटी बातों पे अब भी रो सकता हूँ मैं

सोच-समझ कर चट्टानों से उलझा हूँ वर्ना
बहती गंगा में हाथों को धो सकता हूँ मैं

वक्त आ गया है जब मैं आपको इस संकलन में से कुछ छोटी बहर की गज़लों के अशआर पढ़वाऊँ, जैसा के मैं हमेशा अपनी श्रृंखला में कहता आया हूँ छोटी बहर की ग़ज़लें पढ़ने वाले के साथ जल्द ही अपना नाता जोड़ लेती हैं और उनके दिल में घर कर लेती है, अगर जबान सादा हो तो फिर क्या कहने अशआरों के लिए पढ़ने वालों के दिल तक पहुँचने का रास्ता छोटा और सुगम हो जाता है.

दिल रोता है चेहरा हँसता रहता है
कैसा-कैसा फ़र्ज़ निभाना होता है

तन्हाई का ज़हर तो वो भी पीते हैं
हर पल जिनके साथ ज़माना होता है

बढ़ती जाती है बैचैनी नाखुन की
जैसे-जैसे ज़ख्म पुराना होता है

आसानी से राह नहीं बनती कोई
दीवारों से सर टकराना होता है

आलम साहब के उर्दू में तीन काव्य संग्रह “नए मौसम की तलाश”, “ज़हर-ए-गुल” तथा “ख्याल-आबाद” आ चुके हैं उन्हीं संग्रहों से चुन कर इस किताब में सुरेश कुमार जी ने लगभग सौ अद्भुत ग़ज़लें संकलित की हैं इस के आलावा भी उनकी कुछ ऐसी ग़ज़लें भी हैं जो इस से पहले कहीं प्रकाशित नहीं हुईं. इस किताब की ग़ज़लें ताज़ा हवा के सुखद झोंके की तरह पढ़ने वालों के दिलो दिमाग को खुशनुमा कर देंगीं.

फूल, खुशबू, हवा, तितलियाँ हर तरफ़
तू नहीं तेरी परछाइयाँ हर तरफ़

मेरे जलते दिए मुस्कुराते रहे
हाथ मलती रहीं आंधियां हर तरफ़

झूट के वास्ते तख़्त-ओ-ऐवान हैं
और सच के लिए सूलियाँ हर तरफ़

यूँ तो "डायमंड बुक्स" सभी बुक्स स्टाल्स पर उपलब्ध हैं (जैसा के प्रकाशक का दावा है) लेकिन आपको अपने शहर के किसी बुक्स स्टाल पर इस पुस्तक के न मिलने पर जयपुर एयरपोर्ट तक जाने कि जरूरत नहीं है इसके लिए आसान उपाय ये है के आप डायमंड बुक्स वालों को अपने मोबाईल या लैन लाइन से 011-51611861-865 नंबर पर फोन करें या फिर अपने लैपटाप/ पी..सी. को इन्टरनेट से जोड़ कर उन्हें sales@diamondpublication.com पर मेल करें या उनकी वेब साईट www.diamondpublication.com पर लाग-इन करें. अब आप ये पोस्ट पढ़ रहें हैं तो उम्मीद करता हूँ के आप इन्टरनेट से जरूर जुड़े हुए होंगे और मेल करने कि स्तिथि में भी होंगे. ये सब अगर आपके पास नहीं है तो दिल्ली में किसी मित्र बंधू रिश्तेदार को कहिये के “डायमंड पाकेट बुक्स x-30, ओखला इंडस्ट्रियल एरिया ,फेज-2, नयी-दिल्ली” वाले पते पर जाय और आपके लिए किताब खरीद कर कोरियर या फिर साधारण डाक से भिजवा दे. अब आप पुस्तक मंगवाने के ऊपर दिए गए या अन्य स्वयं द्वारा इज़ाद किये गए विकल्पों पर गंभीरता पूर्वक विचार करें. हम आपको आलम साहब के ये अशआर पढवा कर विदा लेते हैं और निकलते हैं एक और पुस्तक कि तलाश में...

देख रहा है दरिया भी हैरानी से
मैंने कैसे पार किया आसानी से

नदी किनारे पहरों बैठा रहता हूँ
क्या रिश्ता है मेरा बहते पानी से

हर कमरे से धूप हवा की यारी थी
घर का नक्शा बिगड़ा है नादानी से