लीजिये मेरी और से प्रस्तुत है इस विश्व विख्यात शायर की देवनागरी लिपि में छपी पहली किताब "मेरा क्या" के बारे में अदना सी जानकारी.

खुली छतों के दिये कब के बुझ गये होते
कोई तो है, जो हवाओं के पर कतरता है
शराफतों की यहाँ कोई अहमियत ही नहीं
किसी का कुछ न बिगाड़ो, तो कौन डरता है.
उसूलों पर जहाँ आंच आये, टकराना जरूरी है
जो जिंदा हो, तो फिर जिंदा नज़र आना जरूरी है
थके हारे परिंदे जब बसेरे के लिए लौटें
सलीका मंद शाख़ों का लचक जाना जरूरी है
मेरे होटों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो
कि इसके बाद भी दुनिया में कुछ पाना जरूरी है
अच्छा है, जो मिला वो कहीं छूटता गया
मुड़ मुड़ के ज़िन्दगी की तरफ देखता गया
मैं , खाली जेब, सब की निगाहों में आ गया
सड़कों पे भीख मांगने वालों का क्या गया
अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपायें कैसे
तेरी मर्ज़ी के मुताबिक नज़र आयें कैसे
घर सजाने का तसव्वुर तो बहुत बाद का है
पहले यह तय हो कि इस घर को बचाएं कैसे
लाख तलवारें बढीं आती हों गर्दन की तरफ
सर झुकाना नहीं आता, तो झुकाएं कैसे
"परंपरा बुक्स प्राइवेट लिमिटेड, ४१२, कोणार्क, अपार्टमेन्ट. २२, पटपड़गंज रोड, आई.पी. एक्टेंशन दिल्ली " द्वारा प्रकाशित मात्र सौ रुपये मूल्य की ये किताब वसीम साहब की एक सौ चालीस ग़ज़लों को समेटे हुए है. इसके अलावा उनके ढेरों फुटकर शेर भी हैं. इन ग़ज़लों को पढ़ते हुए लगता है पूरी की पूरी किताब आपको पढवा दूं क्यूँ की हर ग़ज़ल बल्कि उनका लिखा हर शेर क़यामत ढाता है और दिल पर बहुत गहरा असर डालता है:
तुम्हारा प्यार तो साँसों में सांस लेता है
जो होता नश्शा, तो इक दिन उतर नहीं जाता
'वसीम' उसकी तड़प है, तो उसके पास चलो
कभी कुआँ किसी प्यासे के घर नहीं जाता
रघुपति सहाय फ़िराक गोरखपुरी साहब के महबूब शायर हैं वसीम साहब, वो उनसे और उनके कलाम दोनों से मोहब्बत करते हैं.उनका कहना है "वसीम की शायरी में ज्ञान और विवेक की तहों का जायजा है".उनके चाहने वाले दुनिया भर में हैं और वो जहाँ जाते हैं लोग उन्हें सर आँखों पर बिठाते हैं. ये मुकाम बहुत कम शायरों को नसीब हुआ है.
मैं इस उम्मीद पे डूबा कि तू बचा लेगा
अब इसके बाद मेरा इम्तिहान क्या लेगा
मैं उसका हो नहीं सकता, बता न देना उसे
लकीरें हाथ की अपनी वह सब जला लेगा
हज़ार तोड़ के आ जाऊं उससे रिश्ता 'वसीम'
मैं जानता हूँ वह जब चाहेगा, बुला लेगा
मुझे यकीन है की उर्दू शायरी के प्रेमी होने के नाते आप ये किताब जरूर अपनी किताबों की अलमारी में रखना चाहेंगे. ये ऐसी किताब है जिसको न खरीदने के बारे में सोचना भी पाप है. अब आखिर में चलते चलते आईये पढ़ते हैं वसीम साहब के कुछ फुटकर शेर जिन्हें आप बरसों नहीं भूल पाएंगे.
वो झूठ बोल रहा था बड़े सलीके से
मैं ऐतबार न करता, तो और क्या करता
***
उसी को जीने का हक़ है, जो इस ज़माने में
इधर का लगता रहे और उधर का हो जाए
***
बिछड़ के मुझसे तुम अपनी कशिश न खो देना
उदास रहने से चेहरा ख़राब होता है
***
ये सोचकर कोई अहदे वफ़ा करो हमसे
हम एक वादे पे उम्रें गुज़ार देते हैं
***
मुझे पढता कोई तो कैसे पढता
मेरे चेहरे पे तुम लिक्खे हुए थे
***
वो मेरी पीठ में खंज़र जरूर उतारेगा
मगर निगाह मिलेगी, तो कैसे मारेगा
***
ग़रीब लहरों पे पहरे बिठाये जाते हैं
समन्दरों की तलाशी कोई नहीं लेता
