Monday, August 10, 2009

वंदना

(ये एक टाईम पास पोस्ट है...इसे सीरियसली ना लें)

राम शरण जी पिछले पांच साल से मेरी शरण में हैं...इस से पहले तीस साल किसी और की शरण में थे...वो ऐसी महान विभूति हैं जो हमेशा किसी न किसी के चरणों में ही जीवन व्याप्त करती है...उनकी एक और खूबी है की वे जिसके चरणों में रहते हैं उसकी निरंतर वंदना करते रहते हैं...ऐसा उन्होंने मुझे खुद तो नहीं बताया लेकिन मेरे विश्वस्त सूत्रों से ये जानकारी मुझे मिल गयी ...पिछले पांच सालों से वे मुझे रिझाने का भागीरथी प्रयास करते आ रहे हैं...मैं उन्हें हमेशा कहता हूँ की राम शरण जी आप का काम ही आपको उचित स्थान दिलाएगा...उस पर ध्यान दीजिये...लेकिन आदतानुसार उनका ध्यान मेरी वंदना पर अधिक रहता है...आखिर उनका पिछला तीस साल का तजुर्बा उन्हें और कोई काम करने ही नहीं देता...उन्हें लगता है की मैं उन्हें पथ भ्रष्ट कर रहा हूँ....वंदना से उनके अब तक के सारे काम होते आये हैं अब मैं उन्हें कह रहा हूँ की वंदना मत कीजिये तो भला वो मांनेगे? आप उनकी जगह होते तो क्या मानते....सच सच बताईयेगा.

वैसे सच्ची बात तो ये है की उनकी वंदना से मुझे अपने बारे में गलत फ़हमी भी होने लगी है. मुझे लगने लगा है की वो मेरे बारे में जो कहते हैं शायद सच है. मैं उनके कहे अनुसार सर्वगुण संपन्न हूँ.उन्होंने ही मेरी प्रतिभा और महानता को पहचाना है. किसी ने कहा है की झूठ अगर बार बार बोला जाये तो वो सच लगने लगता है. कुछ भी हो राम शरण जी ने मेरी कमजोरी को भांप लिया है तभी तो वो बे-धड़क जब चाहे मेरे केबिन में दुआ सलाम करने चले आते हैं.
मैंने दिमाग को काम में लेना ही बंद कर दिया क्यूँ की दिमाग कभी मुझे फटकार लगाता है तो कभी मेरी नासमझी पर हँसता है

वो मेरे पास क्या काम करते हैं या ये पूछें की उनका काम क्या है तो मेरे लिए इस बात का जवाब देना जरा मुश्किल है क्यूँ की आप उन्हें जो भी काम देंगे वो नहीं करेंगे . उनका एक मात्र उद्देश्य उस काम को किसी और के गले में डाल कर मस्त घूमने का है और काम हुआ या नहीं हुआ इसकी सूचना मुझे दे कर वंदना में लीन होने का है.

एक दिन वो मेरी केबिन में आये और हाथ जोड़ कर खड़े हो गए...ये उनकी चिर परिचित मुद्रा थी इसलिए मैंने बिना अपना सर कम्पूटर की स्क्रीन से उठाये पूछा
"कहिये राम शरण जी कैसे आये?"
उन्होंने अपना गला साफ़ किया और जितनी मिठास अपनी बात में ला सकते थे ला कर कहा
"सर आपने सुना है लोग क्या कह रहे हैं?"
"किस बारे में?"
"आपके बारे में में सर"
"मेरे बारे में?" अब मैंने सर उठा लिया, बात मेरी जो हो रही थी
"क्या कह रहे हैं?" मैंने जितनी लापरवाही बात में लाई जा सकती ला कर कहा.जिज्ञासा दर्शाने का अर्थ था उनके भाव बढ़ाना.
"आप को कोई फर्क नहीं पढता क्या सर"
"किस बात से" .
"लोग आपके बारे में जो कह रहे हैं उस से सर"
"क्या कह रहे हैं राम शरण जी सीधे सीधे बताईये पहेलियाँ बुझाने का वक्त मेरे पास नहीं है" मैंने खीजते हुए कहा.
" ये ही की आपका एक ब्लॉग है सर" उन्होंने गर्दन झुका कर कहा.
"ब्लॉग?" मैंने हैरानी से कहा.
"जी सर जिसमें आप शायरी लिखते हैं"
"आप को किसने कहा?"
"किसने? किसने नहीं कहा ये पूछिए सर."
"फिर?"
"फिर क्या मत पूछिए सर. आप मुझे बताईये ना की क्या आपका कोई ब्लॉग है? लोगों की बातों में कोई दम नहीं है ना सर...आप एक बार ना कह दें सर फिर देखिये मैं इन सब का क्या हाल करता हूँ...आप का चरण दास हूँ सर..." राम शरण जी वंदना के मूड में आ चुके थे.
"ब्लॉग है तो इसमें क्या बुराई है ? आप बेकार परेशां हो रहे हैं." मैंने कहा.
मुझे अपनी ही बात में कोई दम नहीं आ रहा था. राम शरण जी की नज़रों से मैं गिर चूका था.
राम शरण जी गर्दन झुकाए खड़े रहे.
"क्या हुआ? आप ऐसे क्यूँ खड़े हैं?"
"सर आप कह दीजिये की लोग जो कह रहे हैं सब झूठ है"
"अरे इसमें झूठ कहने जैसा क्या है? ब्लॉग है तो है..." मैं कुछ मुस्कुराता हुआ बोला.
"अच्छा सर मान लेते हैं की आपका ब्लॉग है लेकिन आप उसमें शायरी थोडी ना लिखते हैं"
"शायरी ही लिखते हैं राम शरण जी, हाँ कभी कभार शायरी की किताबों के बारे में भी लिख देते हैं...क्यूँ?"
"शायरी की किताबों के बारे में भी ?" राम शरण जी चौंके.
"आपकी परेशानी क्या है राम शरण जी सीधे सीधे बताईये ना" मैंने लगभग झुंझलाते हुए कहा.
राम शरण जी कुछ नहीं बोले बस सर झुका कर केबिन से बाहर चले गए.
तीन दिनों तक जब उनके दर्शन नहीं हुए तो मैंने लोगों से पता लगवाया. पता चला की वो आये ही नहीं हैं काम पर तबियत ठीक नहीं है. चौथे रोज वो मेरे केबिन में सर झुकाए खड़े थे.
"क्या हुआ आप कहाँ रहे तीन दिन?"
"सदमें में"
"सदमें में?" मैं चौंका..."सब कुशल तो है?"
"कुशल नहीं है सर..."
"क्या हुआ है"
"क्या नहीं हुआ? हमारी धारणा का कचरा हो गया सर.."
"कौनसी धारणा?"
"आपके बारे में की गयी धारणा...आप हम को गलत सिद्ध कर दिए सर"
मैंने प्रश्न चिन्ह निगाहों से उनकी और देखा
"हम सोचते थे की हमारा तो जीवन ही धन्य हो गया जो इतने कर्मठ इंसान के पास काम करने का मौका हमें भगवान् दिए हैं. जब भी आपको देखते कम्पूटर स्क्रीन पर नजरें जमाये ही देखते. हमेशा कुछ सोचते टाईप करते देखते. सभी को कहते फिरते थे हम की ये कंपनी जो इतना मुनाफा कमा रही है वो हमारे साहब की मेहनत की वजह से है. हम हमेशा सब को आप जैसा बनने की सलाह दिया करते थे सर लेकिन...लेकिन..अब सर मेरा ट्रांसफर कहीं दूसरी जगह करवा दीजिये" राम शरण जी सुबकते हुए बोले.
"ट्रांसफर? क्यूँ ?अचानक?"
"अचानक नहीं सर हम आपकी बहुत इज्ज़त करते हैं सर, आप को कर्मठ मानते हैं सर..हम तीन दिनों तक सोचते रहे सर, तब कहीं आपको बदनामी से बचाने का बस येही एक हल निकला...हमारा यहाँ से ट्रांसफर.
"बदनामी? कैसी बदनामी? आप कहना क्या चाहते हैं राम शरण जी?"
"सर अगर हम आपके पास ही काम करते रहे तो लोग जो कहना शुरू कर देंगे उसे हम बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे.
"क्या कहना शुरू कर देंगे?" मैंने पूछा
वो हिचकिचाए...बोलने का प्रयास किया फिर रुक गए.
"अरे बोलिए बोलिए राम शरण जी घबराईये मत." मैंने हिम्मत बंधाते हुए कहा.
"सर वो कहेंगे...वो कहेंगे..."
"हाँ हाँ बोलो बोलो क्या कहेंगे?"

" एक निठ्ठले का बॉस भी निठ्ठला "

इस से पहले की मैं कुछ कहता राम शरण जी केबिन से तेजी से निकल गए.

मैं तब से सोच में बैठा हूँ क्या करूँ ? निठ्ठला की पदवी ग्रहण कर ब्लॉग पर शायरी करता रहूँ या फिर राम शरण जी को अपनी ही शरण में रक्खे रहने के लिए इसे बंद कर दूं? आप मेरी जगह होते तो क्या करते बताईये न? प्लीज. :))