मुझे मालूम था की खोपोली के बारे में लोग प्रेम से पढेंगे जरूर लेकिन आयेंगे नहीं.....ऐसा होता है हम पढ़ तो लेते हैं किसी जगह के बारे में फ़िर कहते हैं..."देखेंगे...", सोचेंगे... " "चलेंगे...","कैसे जायें?"..."बड़ी दूर जगह है यार" "बड़ा मुश्किल काम है..." बच्चों के स्कूल खुलने वाले हैं..."" शेयर मार्केट ठीक नहीं है... " यार वाईफ की तबियत ढीली है..." अभी पिछली पोस्ट की टिप्पणियां भी पूरी तरह से नहीं आयीं..." " क्या करें अपना बॉस बड़ा खुडुस है (किसका नहीं होता...), छुट्टी मांगो तो काटने दौड़ता है...." याने ना जाने के हजारों बहाने....और जब बात किसी अनजान जगह की हो तो ये बहाने दस गुना बढ़ जाते हैं...आप जैसों के लिए एक शेर है सुनिए..
" धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो,
जिंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो"
खोपोली में इन दिनों धूप का मौसम नहीं है. घटाओं में नहाने का है. मुम्बई से लोग सिर्फ़ भीगने और घटाओं में नहाने के लिए यहाँ दौडे चले आते हैं...ऐसा नहीं की मुम्बई में बरसात नहीं हो रही...हो रही है लेकिन उस बरसात से कीचड और गंदगी का साम्राज्य स्थापित हो जाता है. हमारे घर के ब्लोक की छत से देखिये घटायें कैसे नजर आती है....
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घर की बाल्कोनी से लोनावला और खंडाला की पहाडियों पर उड़ते बादल दिखाई देते हैं, थोडी ही देर में बरसात शुरू हो जाती है और पता भी नहीं चलता...अगर आप को इस शेर
" गुनगुनाती हुई गिरती हैं फलक से बूँदें,
कोई बदली तेरी पाजेब से टकराई है"
का सही मतलब समझना है तो खोपोली आना ही होगा.
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हलकी सी बरसात के बाद खोपोली की पहाडियाँ से झरनों के स्वर मुखर हो उठते हैं, कहीं एकल तो कहीं झरनों का समूह गान शुरू हो जाता है. अभी तो बारिश की शुरुआत है और देखिये ना ये झरना कहीं अलग ही अपनी मस्ती में धीमे धीमे आलाप ले रहा है...
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और कहीं अल्हड़ लड़कियों के समूह की तरह एक साथ खिलखिलाते हुए झरने अलग ही समां बांधते हैं. आप लाख अपने कदम बढ़ने की कोशिश करें लेकिन इन झरनों की आवाजें आप को ठिठकने पर मजबूर कर देती हैं. आप रुकते हैं मुस्कुराते हैं और आगे बढ़ जाते है....लेकिन मन वहीं ठिठका रह जाता है...
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खोपोली की खास बात ये है की आप इन दिनों जिधर नजर घुमायेंगे वहीं आप की आँखें उधर ही चिपक जाएँगी. प्रकृति के ये नज़ारे किसी भी बस्ती के इतनी पास मिलना इतना आसान नहीं होता. खोपोली का अर्थ है कटोरा याने ये स्थान एक कटोरे की तरह है जिसके चारों और पहाड़ हैं. इन पहाडों पर चड़े बिना आप पुणे नहीं जा सकते. खोपोली तलहटी में बसा हुआ है, इसीलिए ऐसे खूबसूरत दृश्य देखने को मिलते हैं:
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समंदर खोपोली से ज्यादा नहीं येही कोई ६०-७० की.मी. दूर होगा बस...घटायें यहाँ की पहाड़ियों से टकरा कर बरसती हैं और पानी बन कर समंदर में जा मिलती हैं. छोटा सा रूट है इनका , जरा ये शेर सुनिए
"जुदा हो कर घटायें फ़िर तुझे रो रो के मिलती हैं,
समंदर आब( पानी) तेरा फ़िर ये कैसे मीठा हो तो कैसे हो"
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अब ऐसा भी नहीं है की हर एक को खोपोली पसंद ही हो. बारिशें हैं सीलन है सब कुछ गीला गीला है और तो और सूरज देवता के दर्शन कभी कभी तो ४-५ दिनों तक ना होना बड़ी आम सी बात है, हर वक्त शाम का सा एहसास रहता है याने
:" घटा में कैद है सूरज सवेरा हो तो कैसे हो,
हुकूमत है अंधेरों की उजाला हो तो कैसे हो"
वाला हिसाब रहता है.
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लगातार होती बरसात से दरो दीवार पर सब्ज़ा उग आता है..जिसको देख कर चाचा ग़ालिब ने कहा था " हम बियाबां में हैं और घर में बाहर आयी है..." मुझे लगता है की मशहूर शायर एहमद फ़राज़ शायद खोपोली आ कर रहे होंगे तभी उन्होंने कहा है की
" इन बारिशों से दोस्ती अच्छी नहीं फ़राज़,
कच्चा तेरा मकान है कुछ तो ख्याल कर"
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कभी कभी ऐसा होता है की बारिश के बाद मौसम खुल जाता है तब ऐसे में सूर्यास्त देखना भी एक सुखद अनुभव है, यूँ लोनावला में याने मेरे घर से कोई १८-१९ की.मी दूर एक पॉइंट है जहाँ से सूरज को डूबते देखना लोगों को बहुत अच्छा लगता है लेकिन अपने घर से देखने जैसे तो कोई बात ही नहीं होती ना.
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अभी तो सिर्फ़ खोपोली के पहाडों और झरनों का जिक्र किया है खोपोली कुछ दर्शानिये स्थलों से भी भरी पड़ी है खास तौर पर श्रधालुओं के लिए यहाँ बहुत कुछ है. मेरे घर से ५ की.मी. दूर आठ अष्टविनायक में से एक गणपति का मन्दिर है तो दूसरे अष्टविनायक पाली याने मेरे यहाँ से कोई २० की.मी दूर स्तिथ हैं , २०० साल पुराना शिव मन्दिर और गगन गिरी आश्रम के बारे में अगली किश्त में..अगर आप जानना चाहेंगे तो...जरूर बताऊंगा.
चलते चलते मेरी भविष्य में पोस्ट पर आने वाली ग़ज़ल का एक शेर सुनाता चलता हूँ:
खिड़कियों से झांकना बेकार है
बारिशों में भीग जाना सीखिए
तो श्रीमान, मेहरबान, कदरदान...सोच क्या रहे हैं? खिड़कियों से झांकना है या बारिशों में भीगना है.... ? ? ? ?
