Monday, November 12, 2018

किताबों की दुनिया - 203

तुझको शैतान के हो जायेंगे दर्शन वाइज़ 
डालकर मुंह को गिरेबाँ में कभी देखा है 
*** 
ज़िन्दगी को ज़िन्दगी करना कोई आसाँ न था
 हज़्म करके ज़हर को करना पड़ा आबे-हयात
 *** 
हज़ार शुक्र कि मायूस कर दिया तूने 
ये और बात कि तुझसे भी कुछ उमीदें थीं
 *** 
तू एक था मेरे अशआर में हज़ार हुआ
 इस इक चिराग से कितने चिराग़ जल उट्ठे 
*** 
जो ज़हरे-हलाहल है अमृत भी वही नादाँ 
मालूम नहीं तुझको अंदाज़ ही पीने के 
***
 मज़हब कोई लौटा ले और उसकी जगह देदे 
तहज़ीब सलीके की, इंसान करीने के
 *** 
मौत का भी इलाज़ हो शायद
 ज़िन्दगी का कोई इलाज़ नहीं 
*** 
वो आलम और ही है जिसमें मीठी नींद आ जाये 
ग़मो-शादी में सोने के लिए रातें नहीं होतीं 
ग़मो-शादी =ग़मी और ख़ुशी 
*** 
अगर मुमकिन हो तो सौ-सौ जतन से 
अज़ीज़ो ! काट लो ये ज़िन्दगी है 
*** 
कुछ नहीं वो निगाहें मगर 
बात पहुँचती है कहाँ-से-कहाँ 

 साल 1982 ,काफी ठण्ड थी , जनवरी में दिल्ली में होती ही है ,तभी तो सुबह के दस बजे तक भी लोग कहीं न कहीं दुबके पड़े थे माहौल सुस्ती से भरा हुआ था कि एम्स में सरगर्मियां अचानक बढ़ गयीं। अफ़रातफ़री का सा माहौल हो गया। एम्स आप जानते ही होंगें दिल्ली का सबसे बड़ा सरकारी हस्पताल है । डाक्टर नर्से और दूसरे सभी विभाग के लोग कमरा नंबर 104 जो वी आई पी रूम था की और दौड़ रहे थे। तभी एम्स के रजिस्ट्रार मिस्टर सिंह धड़धड़ाते हुए कमरे में घुसे, उनके साथ ही आठ दस लोग भी। उन लोगों ने आते ही तुरतफुरत कमरे के परदे बदल दिए, सारा सामान करीने से सजा दिया और बैड पर बैठे बुजुर्ग को उठाकर, पलंग पर बिछी बैडशीट, तकिये के गिलाफ, कम्बल आदि बदल दिए और बुजुर्ग को भी हॉस्पिटल की और से नयी पोषक पहना दी गयी।ये काम आधे घंटे में निपट गया। बुजुर्ग इन सब हरकतों से परेशान नज़र आ रहे थे आखिर गुस्से में बोले 'कोई मुझे बताएगा की ये सब क्या हो रहा है ?' सिंह साहब ने बड़े आदर से जवाब दिया सर प्राइम मिनिस्टर श्रीमती इंदिरा गाँधी साहिबा आप से मिलने आ रही हैं।

 मोहब्बत में मेरी तन्हाइयों के हैं कई उनवाँ 
तेरा आना, तेरा मिलना, तेरा उठना, तेरा जाना 
उनवाँ =शीर्षक 
*** 
कुछ आदमी को हैं मज़बूरियां भी दुनिया में 
अरे वो दर्दे-मोहब्बत सही, तो क्या मर जाएँ ? 
*** 
गरज़ की काट दिए ज़िन्दगी के दिन ऐ दोस्त 
वो तेरी याद में हो या तुझे भुलाने में 
*** 
हज़ार बार ज़माना इधर से गुज़रा है 
नई-नई सी है कुछ तेरी रहगुज़र फिर भी 
*** 
मैं देर तक तुझे खुद ही न रोकता लेकिन
 तू जिस अदा से उठा है उसी का रोना है 
***
 ये ज़िन्दगी के कड़े कोस, याद आता है 
तेरी निगाहे-करम का घना-घना साया 
*** 
शबे-विसाल के बाद आईना तो देख जरा 
तेरे जमाल की दोशीज़गी निखार आई 
शबे-विसाल=मिलान की रात , जमाल की=सौंदर्य की , दोशीज़गी =कौमार्य
 *** 
हम क्या हो सका मोहब्बत में 
खैर तुमने तो बेवफ़ाई की 
*** 
आज आँखों में काट ले शबे-हिज़्र
 ज़िंदगानी पड़ी है सो लेना 
*** 
रहा है तू मेरे पहलू में इक ज़माने से
 मेरे लिए तो वही ऐन हिज़्र के दिन थे
 हिज़्र के=जुदाई के 

 प्राइम मिनिस्टर किसी बुजुर्ग से मिलने हॉस्पिटल आये मतलब वो कोई खास ही शख़्स होगा वरना कौन किसे मिलने आता है ? हॉस्पिटल में इसी बात को लेकर खुसुरपुसुर सी हो रही थी कि ऐसा बुजुर्ग है कौन ? दोपहर ठीक एक बजकर पद्रह मिनिट पर इंदिरा जी कमरे में दाखिल हुईं और आते ही दोनों हाथ जोड़ते हुए बोलीं -नमस्कार जी। बुजुर्ग ने बिस्तर पर बैठे बैठे सर ऊपर किया और पूछा कौन ? आंखों में मोतिया बिंद उतर आने की वजह से शायद वो चेहरा पहचान नहीं पाए होंगे। किसी ने उनके कान में कहा ' इंदिरा जी आयी हैं ' . बुजुर्ग की आँखों में आंसू छलछला आये बोले 'बेटी इंदिरा मैं ठीक हूँ , मैंने सिगरेट भी छोड़ दी है ज़िन्दगी में पहली बार'. इंदिरा जी हँसते हुए बोली 'लेट इट भी द फर्स्ट एन्ड लास्ट टाइम' फिर पूछा 'आपको यहाँ कोई तकलीफ तो नहीं है न ?' बुजुर्ग ने कहा -नहीं, बिलकुल नहीं , तुम्हारी वजह से मेरा यहाँ बहुत ख्याल रखा जा रहा है, लेकिन बेटी यहाँ जो गरीब हैं ,बेसहारा हैं अगर उनका भी ऐसे ही इतना ही ख्याल रखा जाय तो ही जवाहर जी के हिंदुस्तान का सपना साकार होगा। बेटी मेरी एक बात गौर से सुनो 'गो टू द पुअरेस्ट ऑफ दी पुअर'. इंदिरा जी ने उनकी इस बात को गांठ बांध लिया और बाद में इंदिरा जी का बयान अखबार में छपा जिसमें उन्होंने अपनी पार्टी के अधिकारीयों को मुखातिब करते हुए कहा था कि 'गो टू द पुअरेस्ट ऑफ दी पुअर '

 रश्क है जिस पर ज़माने भर को है वो भी तो इश्क 
कोसते हैं जिसको वो भी इश्क ही है , हो न हो 

 आदमियत का तकाज़ा था मेरा इज़हारे-इश्क 
भूल भी होती है इक इंसान से, जाने भी दो 

 यूँ भी देते हैं निशान इस मंज़िले-दुश्वार का 
जब चला जाए न राहे-इश्क में तो गिर पड़ो 

 अब तक तो आपको इस बात का अंदाज़ा हो ही गया होगा कि जिस बुजुर्ग की हम बात कर रहे हैं वो और कोई नहीं उर्दू अदब के कद्दावर शायर जनाब 'फ़िराक गोरखपुरी' हैं। फ़िराक जिनका नाम 'रघुपति सहाय' था गोरखपुर की बाँसगाँव तहसील के बनवारपार गाँव में 28 अगस्त 1896 को पैदा हुए थे। इनके पिता गोरखपुर और आसपास के जिलों में सबसे बड़े दीवानी के वकील थे लिहाज़ा घर में किसी चीज़ की कमी नहीं थी। एक विशाल कोठी लक्ष्मी भवन जो आज भी मौजूद है में दर्जनों नौकर चाकरों के बीच वो अपने विशालकाय परिवार के साथ रहते थे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा घर पर ही हुई। स्कूली पढाई गोरखपुर के विभिन्न स्कूलों करने के बाद आगे की पढाई के लिए वो इलाहबाद आ गए 1918 में बी.ऐ की परीक्षा देने के बाद वो स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। सं 1930 में आगरा विश्विद्यालय से उन्होंने अंग्रेजी में एम् ऐ किया और प्रथम स्थान प्राप्त किया। उन्हें बिना कोई अर्ज़ी दिए ही इलाहबाद युनिवेर्सिटी में अंग्रेज़ी के उस्ताद की हैसियत से नौकरी मिल गयी. सं 1959 में फ़िराक विश्वविद्यालय से रिटायर हुए लेकिन यू.जी.सी ने इन्हें रिसर्च प्रोफ़ेसर नियुक्त कर दिया जिस पर वो 1966 तक काम करते रहे।

 वो चुपचाप आँसू बहाने की रातें 
वो इक शख़्स के याद आने की रातें

 शबे-मह की वो ठंडी आँचें वो शबनम 
तिरे हुस्न के रसमसाने की रातें 

 फुहारें-सी नग्मों की पड़ती हो जैसे 
कुछ उस लब से सुनने-सुनाने की रातें 

 मुझे याद है तेरी हर सुबह-रुख़्सत
 मुझे याद हैं तेरे आने की रातें 

 फ़िराक की शायरी में निखार इलाहबाद जा कर आया जब उनका संपर्क प्रोफ़ेसर 'नासरी, साहब से हुआ। नासरी साहब ने न केवल उनकी ग़ज़लों में संशोधन किया बल्कि उर्दू शायरी के नियमों पर नियमपूर्वक लेक्चर भी दिए और इस तरह उनके दिल में जल रही शायरी की ज्वाला को विधिवत भड़का दिया। फ़िराक साहब के सबसे प्रिय शिष्य और साये की तरह उनके साथ रहने वाले 'रमेश चंद्र द्विवेदी' साहब ने उनके बारे में लिखा है कि ' बहुत से दृश्य, वस्तुएं, विचार, कहानियां और घटनाएं उन्हें ध्यानमग्न कर देते थे और उनकी दशा एक समाधिस्त योगी की तरह हो जाती थी. वो वस्तुओं को देख आत्मविभोर हो जाया करते थे। प्रकृति का प्रत्येक दृश्य, गाँव की पगडंडियां, हरे भरे खेत, अमराइयाँ, बाग़ बगीचे, कीड़े-मकोड़े, पशु-पक्षी, हवा और बारिश, रात और दिन का हर पल, वनस्पति संसार, तारों भरी रात और सन्नाटा, पहाड़ उनकी चोटियां और घाटियां, स्त्री-पुरुष और बच्चे, अंडे सेते हुए और अपने बच्चों को दाना चुगाते हुए पक्षी, तालाब में तैरती और जीवन-उमंग से उछलती हुई मछलियां,पशुओं के शिशुओं की कूदफाँद और अपने बच्चों को ढूढ़-पान कराते हुए पशु, घर-गृहस्ती के सामान, निर्माण कार्य में रत मजदूर, खेतों में दौड़ता हुआ पानी आदि फ़िराक की चेतना को जागरूक करते बल्कि उसे और भी समृद्ध और भरपूर बना देते'. आज हम उनकी लाजवाब किताब 'सरगम' की बात करेंगे जिसमें फ़िराक साहब ने अपनी पसंद की 120 ग़ज़लों से ज्यादा का चयन किया है।


 जिन्हें शक हो वो करें और खुदाओं की तलाश 
हम तो इंसान को दुनिया का खुदा कहते हैं 

 तेरी रूदादे-सितम का है बयाँ नामुमकिन 
फायदा क्या है मगर यूँ ही ज़रा कहते हैं 

 औरों का तजुर्बा जो कुछ हो मगर हम तो ' फ़िराक' 
तल्खी-ए-ज़ीस्त को जीने का मज़ा कहते हैं 
तल्खी-ए-ज़ीस्त =जीवन की कटुता

 फ़िराक जैसी शख़्सियत को किसी एक लेख या किताब में समेटना बहुत मुश्किल काम है। इतनी बहुमुखी प्रतिभा के व्यक्ति बहुत कम हुए हैं। उन पर बहुत से लेख और किताबें लिखी गयीं हैं जिनमें प्रोफ़ेसर शमीम हनफ़ी साहब की किताब "इंतिखाब -फ़िराक गोरखपुरी" लाजवाब है। चलिए फिर से लौटते हैं उनके जीवन प्रसंगों पर। स्वतंत्रता संग्राम में कूदने के एवज में अंग्रेजी सरकार ने उन्हें आगरा जेल में डाल दिया जहाँ वो लगभग दो साल रहे। इस जेल में कांग्रेसी कार्यकर्ताओं के साथ बहुत से काव्य प्रेमी भी बंद थे। फ़िराक साहब जेल की बालकोनी से ताजमहल को निहारा करते और ग़ज़लें कहा करते। और तो और उन्होंने जेल में बाकायदा हर हफ्ते मुशायरा रखना शुरू कर दिया जिसमें मिसरा-ऐ-तरही पर ग़ज़लें पढ़ी जातीं। ये साप्ताहिक मुशायरा बाकायदा 10-12 हफ़्तों तक लगातार चलता रहा बाद में इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया। दो साल की जगह जेल की अवधि को घटा कर ढेड़ साल कर दिया गया, जब फ़िराक जेल से बाहर आये तो पाया कि उनके घर की आर्थिक दशा बहुत खराब है। पिता तो लम्बी बीमारी के बाद जेल जाने से पहले ही गुज़र चुके थे जेल के दौरान उनके जवान भाई को भी टी.बी. ने अपना शिकार बना लिया था। इसी दौरान जवाहर लाल नेहरू उनके घर ठहरने आये और फ़िराक साहब के बिना कुछ कहे ही सारा माज़रा समझ गए। उन्होंने फ़िराक से इलाहबाद में कांग्रेस पार्टी के अंडर सेकेट्री के पद पर काम करने की पेशकश की। फ़िराक ने उनका कहा माना और ढाई सौ रूपए माहवार की पगार पर इलाहबाद में कांग्रेस पार्टी के अंडर सेकेट्री के पद पर काम करने लगे।

 मैंने सोचा था तुझे इक काम सारी उम्र में 
वो बिगड़ता ही गया, ऐ दिल, कहाँ बनता गया  

मेरी घुट्टी में पड़ी है हो के हल उर्दू जबाँ 
जो भी मैं कहता गया हुस्ने-बयाँ बनता गया 
हल=घुलमिल कर 

 वक्त के हाथों यहाँ क्या क्या ख़ज़ाने लुट गए
 एक तेरा ग़म कि गंजे-शायगां बनता गया 
 गंजे-शायगां=बहुमूल्य खज़ाना 

 वो लोग जो उर्दू जबाँ को एक खास मज़हब के लोगों की बपौती मानते हैं फ़िराक की शायरी को बर्दाश्त नहीं कर पाते। फ़िराक साहब ने ये सिद्ध किया कि उर्दू भी बाकि दूसरी ज़बानों की तरह एक ज़बान है जिसे कोई भी बोल सकता है लिख या पढ़ सकता है ,इसके लिए किसी ख़ास मज़हब का होना जरूरी नहीं। ये देखा गया है कि जब आप किसी की बराबरी नहीं कर पाते तो उसकी बुराई करने लगते हैं। यूँ किसी की तारीफ़ करने से कोई महान नहीं हो जाता और किसी की बुराई करने से कोई बुरा नहीं हो जाता। लोगों ने फ़िराक साहब के शेरों को काने, लूले और लंगड़े साबित करने की कोशिश की लेकिन जब वो कामयाब नहीं हो पाए तो उन्होंने उनके व्यक्तिगत जीवन पर कीचड़ उछालना शुरू कर दिया। ये बात सच है कि फ़िराक साहब का गृहस्त जीवन शांत नहीं था। पत्नी की बदसूरती और उनके अधिक पढ़े लिखे न होने का मलाल उन्हें जीवन भर सालता रहा। दरअसल फ़िराक बचपन से ही खूबसूरती के दीवाने थे अच्छी और दिलकश चीज़ें और मंज़र उन्हें आकर्षित करते थे। कुरूप महिलाओं की गोद में जाते ही वो रोने लगते। जब स्वयं की पत्नी उन्हें बदसूरत मिली तो वो इस सदमे को सहन नहीं कर पाए ,पत्नी को लेकर उनके मन में आदर नहीं था लेकिन उन्होंने कभी उनकी अवहेलना नहीं की। उन्हें किसी चीज़ की कमी नहीं होने दी। फ़िराक साहब को दो बेटियां और एक बेटा इसी पत्नी से मिला। उनके और उनकी पत्नी के संबंधों पर लिखी रमेश चंद्र द्विवेदी जी की किताब 'कोयला भई न राख़' पठनीय है। लोग उनके सामने बोलने में भी कतराते थे क्यूंकि फ़िराक साहब मुंहफट होने की हद तक स्पष्टवादी और कलमफट होने की हद तक साहित्य योद्धा थे। 

मैं आस्माने मुहब्बत से रुख्सते-शब हूँ
 तिरा ख़्याल कोई डूबता सितारा है 

कभी हयात कभी मौत के झरोखे से 
कहाँ-कहाँ से तेरे इश्क ने पुकारा है 

 बयाने-कैफ़ियत उस आँख का हो क्या जिसने 
हज़ार बार जिलाया है और मारा है

 फ़िराक ने 1923 से 1927 तक कांग्रेस के अंडर सेकेट्री पद पर काम करने के बाद गाँधी जी से गोरखपुर में जनजागरण पैदा करने की अनुमति मांगी जिसे गाँधी ने सहर्ष प्रदान कर दिया। गोरखपुर में चलने वाली सभी राष्ट्रीय आन्दोलनों की बागडोर फ़िराक साहब ने अपने हाथ में ले ली। फ़िराक का मौलिक चिंतन ग़ज़ब का था। वो अपनी रोजमर्रा की बातचीत में ऐसे वाक्य बोल जाते थे जो बड़े से बड़े शिक्षित लोगों को चौंका देते थे। उनके वाक्यों ने, भाषणों और लेखों ने अंग्रेजी हकूमत के दिल में भय उपजा दिया। उन्होंने फ़िराक की सभाओं और लेखों पर पाबन्दी लगा दी। गोरखपुर छोड़ वो 1930 से इलाहबाद यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी पढ़ाने लगे। उनका लेक्चर सुनने के बाद विद्यार्थी ये अनुभव करने लगता था कि वो लाइब्रेरी हज़्म करके उठा है। वो बच्चों से कहते 'सोचो चिंतन करो मनन करो सोचो विचारो' फ़िराक अपने अनूठे सेन्स ऑफ ह्यूमर के चलते पूरी यूनिवर्सिटी के सबसे चहेते अध्यापक थे। फ़िराक तुलसीदास जी को विश्व का सबसे बड़ा कवि मानते थे उन्होंने एक बार कहा था कि रामचरितमानस पढ़ कर मैं राम का तो नहीं लेकिन तुलसीदास जी का पुजारी जरूर बन गया हूँ।

 ये तो नहीं कि ग़म नहीं 
हाँ मेरी आँख नम नहीं

 मौत अगरचे मौत है 
मौत से ज़ीस्त कम नहीं 

 अब न ख़ुशी की है ख़ुशी 
ग़म भी अब तो ग़म नहीं 

 कीमते हुस्न दो जहाँ 
कोई बड़ी रकम नहीं 

 बहुत कम लोग जानते हैं कि फ़िराक ने उर्दू के अलावा हिंदी और अंग्रेजी में भी किताबें लिखी हैं। उन्हें उनकी उर्दू किताब 'गुले नग्मा' जिसमें उनकी अधिकांश रचनाएँ संगृहीत हैं , पर साहित्य अकादमी और बाद में ज्ञानपीठ सम्मान से सम्मानित किया गया था। फ़िराक साहब को बातें करने का बेहद शौक था और वो घंटों बिना किसी और को मौका दिए किसी भी विषय पर पूरी ऑथरिटी से बोल सकते थे। उनके जैसे ज़हीन वक्ता बहुत कम हुए हैं। सुना है कि इलाहबाद के कॉफी हाउस में जब वो दोपहर बाद जाया करते थे तो वहां बैठे सभी लोग उन्हें घेर कर बैठ जाते और उनकी बातें सुनते। लगभग 630 ग़ज़लों के अलावा नज़्मों, रुबाइयों और कतआत के रचयिता फ़िराक साहब को उनके सैंकड़ों शेरों जो अब क्लासिक का दर्ज़ा पा चुके हैं के कारण बरसों बरस याद रखा जायेगा। एक नयी उर्दू ज़बान को को अपनी ग़ज़लों में ढालने वाले फ़िराक आखिर 3 मार्च 1982 को इस दुनिया-ऐ-फ़ानी से रुखसत फरमा गए। फ़िराक उर्दू साहित्य की वो शख़्शियत थे जिसकी भरपाई आने वाले सालों में तो नामुमकिन लगती है. उनके साथ के और बाद के शायरों ने फिर वो भारत के हों या पाकिस्तान के उनकी स्टाइल को खूब कॉपी किया है। पाकिस्तान के लोकप्रिय शायर 'नासिर काज़मी' फ़िराक साहब के बहुत बड़े दीवाने थे।

 भरम तेरे सितम का खुल चुका है
 मैं तुझसे आज क्यों शर्मा रहा हूँ 

 तेरे पहलू में क्यों होता है महसूस 
कि तुझ से दूर होता जा रहा हूँ 

 मुहब्बत अब मुहब्बत हो चली है 
तुझे कुछ भूलता-सा जा रहा हूँ 

 'सरगम' जिसे राजपाल एन्ड सन्स 1590 मदरसा रोड कश्मीरी गेट दिल्ली -6 ने प्रकाशित लिया था को आप उनसे 011-23869812 पर फोन करके मंगवा सकते हैं , ये किताब अमेजन पर ऑन लाइन भी उपलब्ध है। इसमें आपको फ़िराक साहब की कुछ ऐसी ग़ज़लें भी पढ़ने को मिलेंगी जो अमूमन कहीं पढ़ने को नहीं मिलती। कुछ ग़ज़लों में तो 15-20 से भी ज्यादा शेर हैं। इन ग़ज़लों को पढ़ते हुए आप फ़िराक साहब को बहुत अधिक तो नहीं लेकिन थोड़ा बहुत समझ सकते हैं। उन्हें समझने के लिए आपको उनकी सारी याने हिंदी अंग्रेजी और उर्दू में लिखी किताबें पढ़नी पड़ेंगी तब कहीं जा के हो सकता है की आपको उनके लेखन की गहरायी का अंदाज़ा हो पाए। लीजिये आखिर में पेश है फ़िराक साहब की एक बहुत मशहूर ग़ज़ल जिसे ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह और उनकी पत्नी चित्रा सिंह ने गा कर अमर कर दिया ,के ये शेर :

 बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं 
तुझे ऐ ज़िन्दगी हम दूर से पहचान लेते हैं 

 तबियत अपनी घबराती है जब सुनसान रातों में 
 हम ऐसे में तेरी यादों की चादर तान लेते हैं 

 खुद अपना फ़ैसला भी इश्क में काफ़ी नहीं होता 
उसे भी कैसे कर गुज़रें जो दिल में ठान लेते हैं

Monday, November 5, 2018

किताबों की दुनिया - 202

दरिया की ज़िन्दगी पर सदके हज़ार जानें 
मुझको नहीं गवारा साहिल की मौत मरना 
*** 
इधर से भी है सिवा कुछ उधर की मज़बूरी 
कि हमने आह तो की उनसे आह भी न हुई 
सिवा=ज्यादा
 *** 
हर एक मकाँ में कोई इस तरह मकीं है 
पूछो तो कहीं भी नहीं देखो तो यहीं है 
*** 
हाँ, हाँ, तुझे क्या काम मेरे शिद्दते ग़म से ? 
हाँ, हाँ, नहीं मुझको तेरे दामन की हवा याद 
*** 
निगाहों में कुछ ऐसे बस गए हैं हुस्न के जलवे 
कोई महफ़िल हो लेकिन हम तेरी महफ़िल समझते हैं 
*** 
मजबूरी-ऐ-कमाले मुहब्बत तो देखना 
जीना नहीं कबूल , जिए जा रहा हूँ मैं
 *** 
क्या बताऊँ, किस कदर ज़ंज़ीरे पा साबित हुए 
चंद तिनके जिनको अपना आशियाँ समझा था मैं 
*** 
काँटों का भी हक़ है आखिर 
कौन छुड़ाए अपना दामन 
*** 
यह है इश्क की करामत यह कमाले शायराना 
अभी बात मुंह से निकली अभी हो गयी फ़साना
 *** 
मुहब्बत की बातें मुहब्बत ही जाने 
मुअम्मे नहीं हैं ये समझाने वाले 
मुअम्मे =गुत्थी 

 अलीबाबा पेड़ के पीछे खड़ा सब देख रहा था। उसने चोरों के सरदार ने गुफा के दरवाज़ा को खोलने के लिए जो बोला था वो भी रट लिया। जब चोर गुफा से बाहर आकर वापस चले गए तो वो पेड़ के पीछे से निकला ,गुफा के सामने खड़ा हुआ और बोला "खुल जा सिम सिम " दरवाज़ा खुला अलीबाबा अंदर गया और उसके बाद उसने जो देखा उसे देख उसकी जो हालत हुई होगी उसे मैं समझ सकता हूँ। इतना विशाल खज़ाना उसके सामने था। ऊपर वाले के दिए दो हाथों से वो जितना उठा सकता था उसने उस ख़ज़ाने से हिस्सा उठाया और चल दिया। मैं भी तो वोही कर रहा हूँ आज। सारे ख़ज़ाने को एक साथ न उठा पाने का जो मलाल अलीबाबा को उस वक्त हुआ होगा वो मुझे अब हो रहा है। ये किताब जो मेरे सामने है उस ख़ज़ाने से कम नहीं ,इसमें इश्क के बेजोड़ हीरे, हुस्न की चमचमाती सोने की अशर्फियाँ ,शराब के पन्ने की तरह खूबसूरत ज़ेवर ग़म के सच्चे मोतियों की मालाओं के ढेर और न जाने क्या क्या है। दिल तो मेरा भी यही कर रहा है कि सारे का सारा खज़ाना आपके कदमों पे धर दूँ लेकिन मजबूरी है, अकेला इतना बोझ उठा नहीं सकता। जो जितना उठा पाया हूँ आपके सामने है :

 हुस्न की जल्वागरी से है मुहब्बत का जुनूँ 
शमा रोशन हुई , पर लग गए परवानों के
 *** 
मुझको शिकवा है अपनी आँखों से 
तुम न आए तो नींद क्यों आई ? 
*** 
आपस में उलझते हैं अबस शेखो-बिरहमन 
काबा न किसी का है न बुतखाना किसी का 
अबस =बेकार 
*** 
इश्क जब तक न कर चुके रुसवा 
आदमी काम का नहीं होता
 *** 
तौबा तो कर चुका था मगर इसका क्या इलाज
 वाइज़ की ज़िद ने फिर मुझे मजबूर कर दिया 
*** 
जुनूने मुहब्बत यहाँ तक तो पहुंचा
 कि तर्के मुहब्बत किया चाहता हूँ 
*** 
हाय ये मजबूरियां महरूमियाँ नाकामियां 
इश्क आखिर इश्क है तुम क्या करो हम क्या करें 
*** 
कमाले हुस्न की का आलम दिखा दिया तूने
 चिराग़ सामने रख कर बुझा दिया तूने
 *** 
यूँ दिल के तड़पने का कुछ तो है सबब आखिर 
या दर्द ने करवट ली या तुमने इधर देखा 
*** 
हुदूद कूचा-ए-महबूब हैं वही से शुरू 
जहाँ से पड़ने लगे पाँव डगमगाए हुए 

 चलिए 19 वीं शातब्दी के शुरूआती दौर में चलते हैं यही कोई 1910 के आसपास, किसी मोहल्ले में मुशायरा चल रहा है आधी रात का वक्त होगा , एक नामचीन शायर साहब अपना कलाम उछल उछल कर पढ़ रहे हैं दाद के लिए हाथ फैलाये हुए हैं लेकिन सामिईन उन्हें उखाड़ने को कमर कसे बैठे हैं , शायर मुशायरे के आर्गेनाइजर की और मुख़ातिब हो कर धीरे से कहते हैं कैसे ज़ाहिल गँवार लोगों को मुझे सुनने को बुलाया हुआ है आपने। कोई शेर उनके पल्ले ही नहीं पड़ रहा , इस से तो मैं अगर गधों को सुनाता तो कम से कम दुम तो हिलाते। आर्गेनाइजर धीरे से बोलै शुक्र कीजिये सामिईन में गधे नहीं हैं वरना हो सकता है दुलत्तियाँ चलाने लगते। मुशायरा उखड चुका था ,तभी एक नौजवान नशे में धुत्त लड़खड़ाता हुआ मंच की और बढ़ा। उसकी बेतरीब बढ़ी दाढ़ी और महीनों से कंघी को तरसती हुई लम्बी जुल्फें देख कर लगता था जैसे वो किसी पागलखाने से सीधा चला आया है। नौजवान को तेजी से माइक की तरफ आता देख वो शायर साहब तो फ़ौरन खिसक लिए लेकिन आर्गेनाइजर की बांछे खिल उठीं। नौजवान ने गला साफ़ किया और लाजवाब तरन्नुम में ये कलाम पढ़ा :

 दिल में किसी के राह किये जा रहा हूँ मैं 
कितना हसीं गुनाह किये जा रहा हूँ मैं 

 गुलशन परस्त हूँ मुझे गुल ही नहीं अज़ीज़ 
काँटों से भी निबाह किये जा रहा हूँ मैं 

 यूँ ज़िन्दगी गुज़ार रहा हूँ तेरे बगैर 
जैसे कोई गुनाह किये जा रहा हूँ मैं 

 अब इसके बाद क्या हुआ ,आप तो समझदार हैं जान ही गए होंगे। सामिईन ने और किसी को पढ़ने ही नहीं दिया ,ये नौजवान सारा मुशायरा लूट के ले गया। सच तो ये है कि ऐसा कोई भी मुशायरा किसी को याद नहीं जिसमें इन हज़रत ने पढ़ा हो और उसे लूट न ले गए हों। मुशायरा लूटने का ये सिलसिला इस शायर की मौत के बाद ही ख़तम हुआ। तो चलिए आज इसी शायर की बात करते हैं जिसने उर्दू शायरी को हुस्न और इश्क के नए पाठ पढ़ाये। इनकी शायरी में हुस्न और इश्क की धीमी धीमी आंच पर इंकलाब और नए नज़रियात की आहट सुनाई देती है। 6 अप्रेल 1890 में मुरादाबाद में जन्में इस शायर का नाम है अली सिकंदर जो उर्दू शायरी के फ़लक पर आफ़ताब की चमक रहा है और आने वाले वक्त में भी इसी आब के साथ चमकता रहेगा ,हम इस शायर को "जिगर मुरादाबादी" के नाम से जानते हैं। उनकी ग़ज़लों के संकलन की जिस किताब "मेरा पैगाम मुहब्बत है जहाँ तक पहुंचे " की हम बात कर रहे हैं ,उसे "किताब घर" प्रकाशन दिल्ली द्वारा प्रकाशित किया गया है।


 आ कि तुझ बिन इस तरह ऐ दोस्त घबराता हूँ मैं 
जैसे हर शय में किसी शय की कमी पाता हूँ मैं 

 हाय रे मजबूरियां तरके मुहब्बत के लिए
 मुझको समझाते हैं वो और उनको समझाता हूँ मैं 

 मेरी हिम्मत देखना मेरी तबियत देखना 
जो सुलझ जाती है गुत्थी फिर से उलझाता हूँ मैं

 जिगर को शायरी विरासत में मिली थी। उनके पिता मौलाना अली 'नज़र' तो शायर थे ही उनके दादा हाफिज मोहम्मद 'नूर' भी शायर थे। जैसा कि अमूमन होता है उस दौर में कोई कोई शायर ही खाते-पीते घर के होते थे जबकि अधिकांश की माली खस्ता ही होती थी।आज भी वैसे कोई खास फ़र्क नहीं पड़ा है जो सच्चे और अच्छे शायर हैं उनकी हालत खस्ता ही है, हाँ जो शायरी को बेचने के हुनर से वाकिफ़ हैं उन्हें कोई कमी नहीं। जिगर के परिवार वाले ये हुनर नहीं जानते थे इसलिए किसी तरह गुज़ारा करते रहे। ऐसे माहौल में जिगर की शिक्षा ढंग से नहीं हो पायी ,वो कुछ साल ही मदरसे गए बाद में घर पर ही फ़ारसी सीखी। जिगर का ये मानना था कि शायरी के लिए किसी स्कूल कॉलेज की डिग्री लेना जरूरी नहीं। जिगर साहब ने तो बिना डिग्री के बेहतरीन शायरी कर ली लेकिन उनकी इस बात को उनके बाद के बाकि शायरों ने भी गले बांध लिया और आज भी आपको इस सोच के शायर मिल जायेंगे जो मुशायरों के मंचों पर धूम मचा रहे हैं लेकिन अगर उनसे उनकी डिग्री पूछेंगे तो बगलें झांकते नज़र आएंगे। जिगर ने माना कि अधिक पढाई नहीं की लेकिन उन्होंने ज़िन्दगी के तल्ख़ तजुर्बों से बहुत कुछ सीखा और उन्हीं तजुर्बों को अपनी शायरी में ख़ूबसूरती से ढाला।अब आपके पास अगर तजुर्बे भी ना हों सिर्फ दूसरों की नक़ल करने का हुनर आता हो तो अपनी नौटंकी से मंचों पे आप बेशक तालियां पिटवा लेंगे लेकिन मंच से हटते ही आपको याद रखने वाला कोई नहीं होगा।

 हमको मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं 
 हमसे ज़माना खुद है ज़माने से हम नहीं 

 यारब ! हुजूमे दर्द को दे और वुसअतें 
 दामन तो क्या अभी मेरी आँखें भी नम नहीं 
 हुजूमे=भीड़, वुसअतें=फैलाव 

 ज़ाहिद कुछ और हो न हो मैखाने में , मगर 
 क्या कम ये है कि फ़ितना-ए-दैरो हरम नहीं 

 जिगर की ज़िन्दगी में अगर झांकेंगे तो आपको दो बातें खास तौर पे मिलेंगी पहली मयनौशी और दूसरी आशिकी। जिगर ने या तो शराब पी या इश्क किया और दोनों ही काम करने में किसी तरह की कोई कंजूसी नहीं की। ज़नाब इश्क फरमाते नाकामयाब होते तो शराब में गर्क हो जाते और शायरी करने लगते, शायरी करते तो किसी न किसी को उनसे इश्क हो जाता जो थोड़े दिन चलता और जिगर साहब फिर से शराब से नाता जोड़ लेते। फक्कड़ तबियत कुछ मिला तो ठीक न मिला तो भी ठीक। पढ़े लिखे होते तो कहीं नौकरी भी मिलती ,दुबले पतले मरियल से बदसूरत चेहरे वाले जिगर को कोई ढंग का काम किसी ने दिया ही नहीं इसलिए जब जो काम मिला कर लिया और पेट की आग बुझा ली। जनाब ने स्टेशन स्टेशन घूम के चश्मे बेचने का काम भी किया है। ये ही मरियल दुबला-पतला बदसूरत इंसान बकौल शौक़त थानवी "जब मुशायरे में तरुन्नम से अपना कलाम पढ़ते तो दुनिया के सबसे हसीन और दिलकश इंसान नज़र आने लगते।चेहरे पर मासूमियत छा जाती " इसी मासूमियम के चलते हसीनाएं उन्हें अपना दिल दे बैठतीं जिसे कबूल करने में जिगर साहब कभी कोताही नहीं बरतते।

 मुहब्बत में ये क्या मक़ाम आ रहे हैं 
 कि मंज़िल पे हैं और चले जा रहे हैं 

 ये कह कह के हम दिल को बहला रहे हैं 
 वो अब चल चुके हैं वो अब आ रहे हैं 

 जफ़ा करने वालों को क्या हो गया है 
 वफ़ा करके भी हम तो शर्मा रहे हैं 

 जिगर साहब एक बार आगरे की तवायफ़ 'वहीदन' से इश्क कर बैठे , लोगों ने समझाया कि मियां अपनी हैसियत तो देखें कहाँ आप और कहाँ वो लेकिन कहते हैं न कि प्यार अँधा होता है और जिगर साहब का प्यार तो जनम से अँधा था , नहीं माने। वही हुआ जो होना था 'वहीदन' का धंधा जब ठप्प होने लगा तो उन्होंने कड़के जिगर साहब को बाहर का रास्ता दिखा दिया। दिल तो टूटना ही था ,टूटा और जिगर शराब पी कर ग़म गलत करते हुए शायरी करने लगे। ये किस्सा फिर से दोहराया गया सुना है मैनपुरी की गायिका 'शीरज़न' जिस तेजी से उनपे फ़िदा हुईं उतनी ही तेजी से रुखसत भी हो गयीं। यहाँ ये भी बता दें कि मशहूर ग़ज़ल गायिका अख़्तरी बाई फैज़ाबादी उर्फ़ बेग़म अख़्तर ने भी उन्हें शादी का पैगाम भेजा था जिसे जिगर साहब ने न जाने क्या सोच के ठुकरा दिया। बेग़म अख़्तर साहिबा ने जिगर की बहुत सी ग़ज़लों को बहुत दिलक़श अंदाज़ में अपनी खनकती आवाज़ में गाया है। अगर हम अली सरदार ज़ाफ़री साहब की उन पर बनी डाक्यूमेंट्री पे यकीन करें तो इस तरह के किस्सों के लगातार चलते रहने की वज़ह से उनकी बीवी उन्हें छोड़ अपनी बहन के पास गौंडा चली गयी। गौंडा निवासी शायर जनाब 'असगर गौंडवी' जिगर के जिगरी दोस्त थे उन्हीं की बीवी जिगर साहब की बीवी की बड़ी बहन थी। 'असगर' साहब की सोहबत से जिगर की शायरी हुस्न-ओ-इश्क की गिरफ़्त से निकल कर गमें-दौरां की नुमाइंदगी करने लगी। जिगर की असली पहचान इसी बदलती शायरी की वजह से है।

 कभी हुस्न की तबियत ना बदल सका ज़माना
 वही नाज़े बेनियाज़ी वही शाने ख़ुसरुवाना
 ख़ुसरुवाना=शाहाना 

 मेरी ज़िन्दगी तो गुज़री तेरे हिज़्र के सहारे 
 मेरी मौत को भी प्यारे कोई चाहिए बहाना 

 मैं वो साफ़ ही न कह दूँ है जो फ़र्क मुझ में तुझमें 
 तेरा दर्द दर्दे तन्हा मेरा ग़म ग़मे ज़माना 

 जिगर बेतहाशा शराब पीते थे ये तो आपको बता ही चुके हैं ,मुशायरों में लोग लड़खड़ाते हुए जिगर साहब को बड़ी मुश्किल से पकड़ कर माइक के सामने लाते थे ,माइक के सामने आते ही उनकी लड़खड़ाहट बेहतरीन तरुन्नम की ओट में दब जाती और वो मुशायरा लूट कर ही उठते। जिगर के दौर में ही बहुत से शायरों ने जिगर के लिबास हुलिए और तरन्नुम की नक़ल करके नाम कमाने की कोशिश की लेकिन जिगर जैसा बनना आसान नहीं था। लोग समझते हैं कि जिगर शराब पी कर ही ग़ज़लें कहते हैं जबकि हकीकत जिगर साहब ने कुछ यूँ बयाँ की है : " ये ख्याल कि जब मैं शराब पीता था तो बहुत अच्छे शेर कहता था ग़लत है, एक साथ दो महबूब नहीं हो सकते जो इंसान शराब में कभी पानी मिलाने का रवादार न हो वो भला अपने ऊपर शेर मुसल्लत कर सकता है ?एक बात ये भी है कि मैं शेर उस वक्त कहता था जब शराब छोड़ देता था। दो-दो तीन-तीन- महीने से एक बूँद नहीं पीता था और उसी ज़माने में ग़ज़ल कहता था। शराब पी कर सिर्फ दो या तीन ग़ज़लें कहीं हैं " मेरा ख्याल है कि उन सभी शायरों को जो सोचते हैं कि शायरी और शराब का रिश्ता अटूट है जिगर साहब की इस बात को ज़ेहन में रखना चाहिए।

 एक लफ्ज़ मुहब्बत का अदना ये फ़साना है 
 सिमटे तो दिले आशिक़, फैले तो ज़माना है 

 ये इश्क नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे 
 इक आग का दरिया है और डूब के जाना है 

 आँसू तो बहुत से हैं आँखों में जिगर ,लेकिन 
 बिंध जाए सो मोती है रह जाए सो दाना है 

 फिर हुआ यूँ कि एक दिन जिगर साहब ने शराब से तौबा कर ली और मरते दम तक उसे छुआ तक नहीं। ये करिश्मा कैसे हुआ ये तो पता नहीं शायद उनके अज़ीज़ दोस्त असगर साहब के इसरार के कारण या फिर बीवी के दुबारा घर लौट आने के कारण ,कारण कुछ हो, नतीजा सही रहा। बेतरतीब जिगर अब सलीके से रहने लगे.उन्होंने ग़ज़ल को एक नई ज़िन्दगी बक्शी। उनकी ग़ज़लें मदहोशी और रंगीनी के छलकते हुए सागर हैं उनमें किस्म-किस्म के ज़ज़्बात जलवागर हैं जिनका मुताअला ज़िन्दगी के नशे को गहरा कर देता है ,कायनात के हुस्न में इज़ाफ़ा हो जाता है और ज़िन्दगी एक नए रूप में नज़र आने लगती है। उनके कलाम के सैंकड़ों अशआर ऐसेहैं जिनमें ज़िन्दगी और वक्त के धड़कनों की आवाज़ें सुनाई देती हैं। आने वाली नस्लें और तारीख़ जिगर को भुला नहीं सकती। जिगर पर लिखने बैठे तो लिखते ही चले जाएँ लेकिन बात ख़तम न हो लेकिन हम ऐसा कर नहीं सकते मजबूरी है इसलिए। सं 1958 में उन्हें उनकी किताब "आतिशे गुल " पर साहित्य अकादमी का पुरूस्कार दिया गया। उसके 2 साल बाद उर्दू जगत का ये चमकता हुआ सितारा 9 सितम्बर 1960 को अस्त हो गया।

 पाँव उठ सकते नहीं मंज़िले-जाना के ख़िलाफ़ 
 और अगर होश की पूछो तो मुझे होश नहीं 

 कभी उन मद भरी आँखों से पिया था एक जाम 
 आज तक होश नहीं होश नहीं होश नहीं 

 अपने ही हुस्न का दीवाना बना फिरता हूँ 
 मेरी आगोश को अब हसरते आगोश नहीं

 जिगर साहब ने खुद तो फिल्मों के लिए गाने नहीं लिखे लेकिन उनकी ग़ज़लों से मुत्तासिर हो कर बहुत से नामी गीतकारों ने गीत लिखे जैसे 'अजी रूठ कर अब कहाँ जाइएगा' ,'निगाहें मिलाने को जी चाहता है ', उनके ख्याल आये तो आते चले गए ---वगैरह। अब बात करते हैं किताब की तो जैसा मैंने शुरू में ही बता दिया था कि इस लाजवाब किताब को 'किताबघर प्रकाशन अंसारी रोड दरियागंज दिल्ली ने प्रकाशित किया है। आप उनसे 011-23266207 या 23255450 पर फोन करके पूछ सकते हैं। ख़ुशी की बात ये है कि ये किताब अमेज़न पर भी उपलब्ध है इसलिए आप इसे आसानी से ऑन लाइन मंगवा सकते हैं। ये रहा लिंक : https://www.amazon.in/Mera-Paigaam-Muhabbat-Jahan-Pahunche/dp/8170168058 इस किताब में जिगर साहब की 200 ग़ज़लें संग्रहित हैं जो बार बार पढ़ने लायक हैं। सोचिये मत तुरंत आर्डर करिये और शायरी के इस दिलकश समंदर में गोते लगाइये। आखिर में पेश हैं उनकी एक ग़ज़ल के ये शेर :

 दिल को सुकून रूह को आराम आ गया 
 मौत आ गई कि दोस्त का पैग़ाम आ गया 

 दीवानगी हो, अक्ल हो, उम्मीद हो कि यास 
 अपना वही है वक्त पे जो काम आ गया 
 यास =निराशा 

 ये क्या मक़ामे इश्क है ज़ालिम कि इन दिनों 
 अक्सर तेरे बग़ैर भी आराम आ गया