Monday, May 21, 2018

किताबों की दुनिया - 178

इच्छाओं पर प्रश्नचिन्ह हैं अरमानों पर पहरे हैं 
संबंधों से हमें मिले जो घाव बहुत ही गहरे हैं 

सहमत जो न हुआ राज्य से दंड मृत्यु का उसे मिला 
राजमहल की नींव के पत्थर नरमुंडों पर ठहरे हैं 

नई क्रांति की आज घोषणा कर दी है कुछ गूंगों ने 
सुनकर जो दौड़े आये वे सब के सब ही बहरे हैं 

अब 'क्या अर्ज़ करूँ..." अर्ज़ करने से होगा भी क्या ? आप तो मान ही बैठे हैं कि आज किसी हिंदी ग़ज़लों वाली किताब की चर्चा होने वाली है क्यूंकि हमने ग़ज़ल को भाषाओँ में बाँट दिया है। हिंदी ग़ज़ल उर्दू ग़ज़ल, गुजराती ग़ज़ल, हरियाणवी ग़ज़ल, पंजाबी ग़ज़ल, ब्रज ग़ज़ल आदि आदि जबकि ग़ज़ल ग़ज़ल होती है। हर ग़ज़ल में बहर काफिया रदीफ़ और भाव का होना जरुरी होता है। सम्प्रेषण की भाषा अलग हो सकती है बाकि कुछ नहीं। सम्प्रेषण की भाषा कोई भी हो अगर कमज़ोर है तो उसमें कही ग़ज़ल भी कमज़ोर ही होगी। भाषाएँ अलग हो सकती हैं लेकिन उनसे व्यक्त भाव तो एक ही होते हैं। क्यूंकि बोलने वाला या लिखने वाला इंसान है जो इस दुनिया का हिस्सा है और इस दुनिया के लोगों के ,वो चाहे किसी भी जगह के हों दुःख-सुख परेशानियां कमोबेश एक जैसी होती हैं। खैर !! तो आपको ये बता दूँ कि हमारी आज के शायर सिर्फ हिंदी ग़ज़ल वाले नहीं हैं बल्कि वो भाषा विशेषज्ञ हैं और हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू और सिरायकी -जो पाकिस्तान के मुल्तान इलाके में बोली जाती है -में समान अधिकार से लिखते हैं।

जो खुल के हँस नहीं सकते जो खुल कर रो नहीं सकते 
ये दुनिया क्या कभी उनकी भी मजबूरी समझती है 

किनारे बैठ कर तुम तब्सिरा करते रहो लेकिन 
है पानी सर्द या फिर गर्म बस मछली समझती है 

ख़िरद हर चीज़ से इंकार करने पर है आमादा 
अक़ीदत गोल पत्थर को भी ठाकुर जी समझती है 
ख़िरद=बुद्धिमता, अक्ल ,अक़ीदत =श्रद्धा 

हमारे आज के शायर खूबसूरत शख्शियत के स्वामी मृदुभाषी 28 दिसम्बर 1952 को देहरादून में जन्में जनाब ओम प्रकाश खरबंदा हैं ,जो पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तरप्रदेश,उत्तराखंड, बिहार, हिमाचलप्रदेश में होने वाले राष्ट्रीय और अंतर राष्ट्रिय हिंदी और उर्दू के कार्यक्रमों का कभी आयोजन भी करते हैं तो कभी उनमें शायर या नाज़िम याने संचालक की हैसियत से "अम्बर खरबंदा" के नाम से शिरकत करते हैं.आज हम "अंबर खरबंदा" साहब की ग़ज़लों, कत'आत, नज़्मों ,गीतों और दोहों से सजी किताब "क्या अर्ज़ करूँ " की बात करेंगे जिसे "असीम प्रकाशन , 602 मालीवाड़ा, ग़ाज़ियाबाद ने एक बेहद खूबसूरत आवरण के साथ सन 2014 में प्रकाशित किया था। इस किताब में खरबंदा साहब की 50 ग़ज़लें 45 कत'आत 9 नज़्में और गीत तथा 20 दोहे संकलित किये गए हैं।ये किताब हमें खरबंदा साहब की बहुमुखी प्रतिभा से रूबरू करवाती है। इसे पढ़ कर लगता है कि ऊपर वाला किसी किसी को वाकई जब कुछ देने पे आता है तो छप्पर फाड़ कर देता है।



ये सच है मैं वहां तनहा बहुत था 
मगर परदेश में पैसा बहुत था

वो कहता था बिछुड़ कर जी सकोगे 
वो शायद अबके संजीदा बहुत था

बिछड़ते वक्त चुप था वो भी, मैं भी
हमारे हक़ में ये अच्छा बहुत था 

ये जो कम लफ़्ज़ों में गहरी बात करने का हुनर है ये ऐसे ही नहीं आता। गागर में सागर भरना हर किसी के बस का रोग नहीं। मुझे लगता है इस काम को अंजाम देने में अंबर जी का इलेक्ट्रॉनिक्स ज्ञान बहुत काम आया होगा। आपको को तो पता ही है कि इलेक्ट्रॉनिक्स ने किस तरह विज्ञान जगत में क्रांति का सूत्रपात किया है। एक छोटी सी माइक्रोचिप में हज़ारों लाखों सूचनाएँ इकठ्ठा की जा सकती हैं। उदाहरण के लिए आज मोबाईल से हम जो दुनिया भर की जानकारियां लेते हैं फ़िल्में देखते हैं गाने सुनते हैं एक दूसरे को देखते सुनते हैं इस सब के पीछे इलेक्ट्रॉनिक्स है और हमारे 'अंबर खरबंदा' जी इलेक्ट्रॉनिक्स के इंजीनियर हैं। उन्होंने न केवल इलेक्ट्रॉनिक्स पढ़ी है बल्कि बरसों बरस शिक्षण संस्थाओं में पढाई भी है।

कैसे कैसे क्या से क्या होते गए 
इब्तिदा थे इन्तिहा होते गए 
इब्तिदा =प्रारम्भ, इन्तिहा =अंत

ग़म मिले इसका भी बेहद ग़म रहा 
और फिर ग़म ही दवा होते गए 

हम नहीं समझे के क्या है ज़िन्दगी 
आप जीने की अदा होते गए

'अंबर' जी के जीन में शायरी है। इनका परिवार 'मियाँवाली' जो अब पाकिस्तान में है से, 1947 में देश को मिली खूनी आज़ादी के कारण ,पलायन कर देहरादून में आ कर बस गया। अंबर जी के पिता स्वर्गीय श्री 'जीवनदास खरबंदा' उर्दू से बेहद मुहब्बत रखते थे। उनके पास बेशुमार मयारी शायरी का खज़ाना था और उन्हें न जाने कितने ही शेर ज़बानी याद थे। मियांवाली के जिस स्कूल में वो पढ़ते थे वहां के हैडमास्टर उर्दू शायरी के कद्दावर शायर और स्कॉलर जनाब 'त्रिलोक चंद 'महरूम' साहब थे और सहपाठी जनाब 'जगन्नाथ' , जी हाँ वही जो बाद में 'जगन्नाथ आज़ाद' के नाम से उर्दू अदब में मशहूर हुए। अंबर साहब को घर और स्कूल में ऐसा माहौल मिला कि उनकी उर्दू से मोहब्बत दीवानगी की हद तक जा पहुंची।

मेरे लिए ऐ दोस्त ! बस इतना ही बहुत था 
जैसा तुझे सोचा था तू वैसा निकल आता 

मैं जोड़ तो देता तेरी तस्वीर के टुकड़े 
मुश्किल था के वो पहला-सा चेहरा निकल आता 

ऐसा हूँ मैं इस वास्ते चुभता हूँ नज़र में 
सोचो तो , अगर मैं कहीं वैसा निकल आता 

थोड़ा होश सँभालते ही खरबंदा जी देहरादून में होने वाले मुशायरों में रात रात भर बैठे रहते। उस वक्त रेकार्डिंग की आज जैसी सुविधा तो थी नहीं सो अपनी डायरी में मयारी शेरों को लिखते और गुनगुनाते रहते। मुशायरों में उनकी लगातार रहने वाली मौजूदगी से बहुत से शायर उन्हें पहचानने लगे थे। ऐसे ही किसी एक मुशायरे के बाद उनकी शायरों से हो रही उनकी गुफ्तगू के दौरान उन्हें देहरादून के मोतबर शायर जनाब 'कँवल ज़ियाई साहब का पता चला और वो जा पहुंचे उनकी शागिर्दी में। कँवल साहब ने अंबर साहब को अपने क़दमों में जगह दी और फिर बाक़ायदा उनके शेरी हुनर को तराशने लगे।कँवल साहब के यहाँ शायरों का आना जाना लगा ही रहता था एक दिन उनकी मुलाकात देहरादून के ही एक और उस्ताद शायर जनाब नाज़ कश्मीरी से हुई जिनकी मौजूदगी में उनका तख़ल्लुस 'अंबर' रखा गया।

गवाहों को तो बिक जाने की मजबूरी रही होगी 
हमें भी फैसला मंज़ूर हो ऐसा नहीं होता 

मुहब्बत जुर्म है तो फिर सज़ा भी एक जैसी हो 
कोई रुसवा कोई मशहूर हो ऐसा नहीं होता 

कोई मिसरा अगर दिल में उतर जाए ग़नीमत है 
तग़ज़्जुल से ग़ज़ल भरपूर हो ऐसा नहीं होता

"तग़ज़्जुल से ग़ज़ल भरपूर हो ऐसा नहीं होता" बहुत ही सही बात की है अंबर जी ने. उर्दू शायरी के बड़े से बड़े उस्ताद शायर की किसी भी ग़ज़ल को उठा कर देखिये आपको शायद ही उनकी कोई ऐसी ग़ज़ल मिलेगी जिसके सारे शेर ग़ज़ब के हों। सच तो ये है कि कभी कभी एक अच्छा या सच्चा मिसरा कहने में उम्र निकल जाती है शेर तो बहुत दूर की बात है। आप कितना लिखते हैं इस से कोई फर्क नहीं पड़ता आप क्या लिखते हैं ये बात मायने रखती है। अम्बर साहब ने अपने तवील शेरी सफर में बहुत ज्यादा नहीं लिखा लेकिन जो लिखा वो पुख्ता लिखा। शायरी में उन्हें जो मुकाम हासिल हुआ है वो उन्हें किताबें पढ़ने और अपने उस्ताद की रहनुमाई के साथ साथ मित्तर नकोदरी ,डा.श्यामनन्द सरस्वती 'रोशन' नाज़ कश्मीरी ,विज्ञान व्रत, शाहिद हसन 'शाहिद', सरदार पंछी,ओम प्रकाश 'नदीम', इकबाल आज़र, नरेश शांडिल्य, महेंद्र प्रताप 'चाँद' जैसे बहुत से कामयाब शायरों की सोहबत से हासिल हुआ।

कितना नफ़ा है, क्या है नुक्सान सोच लेगा 
फिर दोस्ती करेगा , आखिर वो आदमी है 

सब धर्म सारे मज़हब जब उसने रट लिए हैं 
मिल-जुल के क्यों रहेगा आखिर वो आदमी है 

भूले से भी न रखना आईना उसके आगे 
खुद से बहुत डरेगा आखिर वो आदमी है 

धर्म और मज़हब के कारण एक इंसान की दूसरे इंसान के बीच जो दूरी बढ़ी है, नफ़रत बढ़ी है उस पर आपको सैंकड़ों शेर मिल जाएंगे लेकिन अंबरी साहब ने उसी बात को बिलकुल अलग ढंग से अपने शेर में पिरोया है- 'मिल-जुल के क्यों रहेगा आखिर वो आदमी है '. शायरी दरअसल हज़ारों सालों से चली आ रही इंसानी फितरत को अलग अपने नज़रिये से शेर में पिरोने का नाम है। जो इस काम को सही ढंग से अंजाम दे देता है वो ही कामयाब शायर कहलाता है। आप कोई नयी बात नहीं कह सकते लेकिन नए ढंग से जरूर कह सकते हैं। अंबर साहब की इस किताब को पढ़ते हुए आप को कई जगह किसी बात को नए ढंग से कहने का हुनर नज़र आता है और यही इस किताब की कामयाबी भी है।

देखिये कैसे चमकती है नगीने की तरह 
सौ ग़मों के बीच छोटी सी ख़ुशी रख लीजिये 

रहबरों की रहबरी को आज़माने के लिए 
अपने क़दमों में जरा सी गुमरही रख लीजिये 

आप 'अंबर' जी न बन जाएँ फ़रिश्तें यूँ कहीं 
अपने किरदार-ओ-अमल में कुछ कमी रख लीजिये 

पहले सामिईन के बीच बैठ कर शायरों को सुनना और फिर शायरों के बीच बैठ कर सामिईन को सुनाना एक ऐसा अनुभव है जिसे लफ़्ज़ों में बयाँ नहीं किया जा सकता। इस सफ़र को तय करने में बहुत मेहनत लगती है। इस दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाना आसान काम नहीं है तभी तो अधिकतर लोग भीड़ का हिस्सा बनकर ही ज़िन्दगी काट देते हैं। जो मज़ा परचम उठा कर आगे आगे चलने में है वो पीछे पीछे चलते हुए नारे लगाने में नहीं। अंबर साहब की अब अपनी पहचान है और इसी के चलते उन्हें 2005 में अंतर्राष्ट्रीय प्रवासी सम्मलेन में 'अक्षरम सम्मान' , 2008 में गुंजन साहित्य सम्मान, 2009 में नागरिक परिषद् सम्मान, 2010 में एस.पी.गौहर सम्मान, 2011 में लोक लिखारी सम्मान, 2012 में हंसराज हंस सम्मान और 2013 में प्राइड ऑफ उत्तराखंड सम्मान से सम्मानित किया गया है। सम्मान प्राप्ति की ये लिस्ट अभी अधूरी है क्यूंकि उन्हें मिले सम्मानों की लिस्ट के लिए एक पोस्ट अलग से लिखनी पड़ेगी।

मौसम की तब्दीली कहिये या पतझड़ का बहाना था 
पेड़ को तो बस पीले पत्तों से छुटकारा पाना था 

रेशा-रेशा हो कर अब बिखरी है मेरे आँगन में
रिश्तों की वो चादर जिसका वो ताना मैं बाना था 

बादल,बरखा, जाम, सुराही, उनकी यादें, तन्हाई 
तुझको तो ऐ मेरी तौबा ! शाम ढले मर जाना था

रेडिओ -टीवी पर प्रसारित होने वाले शायरी से सम्बंधित लगभग सभी कार्यक्रमों में शिरकत करने वाले और देश के प्रसिद्ध रिसालों -अख़बारों में नियमित रूप से छपने वाले 'अंबर खरबंदा' साहब की किताब "क्या अर्ज़ करूँ ' को प्राप्त करने के लिए आपको 'असीम प्रकाशन ग़ाज़ियाबाद के आफिस नंबर 0120-4560628 पर फोन करना पड़ेगा या फिर अंबर साहब को उनकी लाजवाब शायरी के लिए बधाई देते हुए उनके मोबाईल न. 9411512333 पर फोन करना पड़ेगा। अंबर साहब, जो दून क़लम संगम के जनरल सेकेट्री भी हैं, को आप ई -मेल से ambarkharbanda@gmail.com से भी सम्पर्क कर सकते हैं। मैंने रास्ता बता दिया है ,चलने का काम तो आपको ही करना पड़ेगा। लीजिये आखिर में उनके दो कतआत पेश हैं :

यही इक जुर्म है ऐ मेरे हमदम 
के मैं खुशबू को खुशबू बोलता हूँ 
तेरी आँखों को देखा था किसी दिन 
उसी दिन से मैं उर्दू बोलता हूँ 
*** 
सर्दी बहुत है दोस्तो ! हालत ख़राब है 
बाज़ार चल के ढूंढ लें इसका कोई जवाब 
माँ के लिए खरीद लें सस्ती-सी एक शाल 
ले आएं अपने वास्ते मँहगी कोई शराब

Monday, May 14, 2018

किताबों की दुनिया - 177

मौन के ये आवरण मुझको बचा ले जायेंगे 
वरना बातों के कई मतलब निकले जायेंगे 

अब अंधेरों की हुकूमत हो चली है हर तरफ 
अब अंधेरों की अदालत में उजाले जायेंगे 

प्यार का दोनों पे आखिर जुर्म साबित हो गया 
ये फ़रिश्ते आज जन्नत से निकाले जायेंगे 

नशा कोई भी हो बुरा नहीं होता -आप सोचेंगे हैं ? ये क्या कह रहे हैं नीरज जी ?अरे सठियाये हुए तो ये थे ही लगता है अब पगलाय भी गए हैं क्यूंकि पगलाना सठियाने के बाद की सीढ़ी है ,वैसे कुछ कुछ लोग सठियाने से पहले भी पगला जाते हैं। नशा चाहे शराब का हो, भांग का, दौलत का हो या सत्ता का बुरा नहीं होता -अगर -जी हाँ इस अगर के बाद ही मेरी बात पूरी होगी - अगर-वो एक निश्चित सीमा में किया जाय। सीमा पार की नहीं कि इन सभी नशों में दोष दिखाई देने शुरू हो जायेंगे। लेकिन एक नशा है जिसकी सीमा का कोई निर्धारण नहीं किया जा सकता और वो है किताब का नशा। जिसे इसका नशा चढ़ गया उसके लिए बाकि के नशे धूल बराबर हैं। किसी लाइब्रेरी की खुली रेक्स पर सजी पुरानी किताबों के पास से गुज़रें उसमें से उठती गंध को गहरी सांस के साथ अपने भीतर खींचे-अहा-ये गंध आपको मदहोश कर देगी। मुझे तो करती है - सब को करे ये जरूरी तो नहीं। किताबों से उठने वाली ये खुशबू ही मुझे जयपुर की पुरानी लाइब्रेरियों और हर साल होने वाले दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले तक खींच के ले जाती है। इस गंध में डूबा हुआ मैं तलाशता हूँ शायरी, खास तौर पर ग़ज़ल की कोई किताब जिस पर लिखा जा सके।

अभी दीवारो-दर से दिल के, वीरानी नहीं झलकी
ग़मों के वास्ते इस घर में आसाइश अधूरी है
आसाइश = सुविधा

अभी से थक गए हो क्यूँ , अभी हारा नहीं हूँ मैं
सितम में भी इज़ाफा हो अभी सोज़िश अधूरी है
सोज़िश=जलन

मेरे लब सी दिए उसने क़लम है फिर भी हाथों में 
ये हाकिम से कहो जाकर तेरी बंदिश अधूरी है 

दिल्ली में सं 2018 की जनवरी को प्रगति मैदान में चल रही अभूतपूर्व प्रगति के कारण वहां आयोजित पुस्तक मेले तक पहुंचना एक टेढ़ी खीर थी। पुस्तक प्रेमी परेशान जरूर हुए लेकिन निराश नहीं। बड़ी तादाद में पहुंचे। देश में पुस्तकों के प्रति लोगों की दीवानगी देख कर बहुत अच्छा लगा। खास तौर पर युवाओं की। मेरे साथ मेरे प्रिय विकास गुप्ता थे। 'विकास' रेख़्ता के एडिटोरियल बोर्ड में कार्यरत हैं उनका उर्दू साहित्य के प्रति समर्पण और ज्ञान अभूतपूर्व है। किताब ढूंढने में वो भी मेरी मदद करते हुए इधर से उधर घूम रहे थे तभी उनकी भेंट एक चुंबकीय व्यक्तित्व के धीर गंभीर व्यक्ति से हुई। दोनों एक दूसरे को देख मुस्कुराये हाथ मिलाया और बातें करने लगे। विकास ने मेरी और देखा और कहा ' नीरज जी आप इन्हें नहीं जानते ? ये आलोक यादव है -बेहतरीन शायर और यादव जी ये नीरज जी है " हमने हाथ मिलाया और बातें करने लगे।बातों ही बातों में जब मैंने उनसे पूछा कि क्या आपकी कोई किताब मंज़र-ऐ-आम पर आयी है तो मुस्कुराते हुए वो मुझे स्नेह से हाथ पकड़ कर  उस स्टाल पर ले गए जहाँ उनकी किताब "उसी के नाम "रैक पर करीने से सजी हुई दिखाई दे रही थी। उन्होंने किताब उठाई उस पर कुछ लिखा अपने हस्ताक्षर किये और मुझे दी .मैंने उनके लाख मना करने के बावजूद तुरंत काउंटर पर जा कर उसका भुगतान किया। जहाँ तक संभव हो मुझे किताब खरीद कर पढ़ने में ही मज़ा आता है। जहाँ मेरा बस नहीं चलता वहां भेंट में मिली किताबें भी स्वीकार कर लेता हूँ। आज हम इसी किताब और इसके अनूठे शायर की चर्चा करेंगे।



 अब न रावण की कृपा का भार ढोना चाहता हूँ 
आ भी जाओ राम मैं मारीच होना चाहता हूँ 

 है हक़ीक़त से तुम्हारी आशनाई खूब लेकिन 
 मैं तुम्हारी आँख में कुछ ख़्वाब बोना चाहता हूँ 

 है क़लम तलवार से भी तेज़तर 'आलोक' तो फिर 
 मैं किसी मजबूर की शमशीर होना चाहता हूँ 

 राम रावण और मारीच के माध्यम से बहुत कुछ कहता उनकी एक ग़ज़ल के मतले का ये शेर विलक्षण है। ऐसे शेर कहाँ रोज रोज पढ़ने को मिलते हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी अलोक यादव का जन्म 30 जुलाई 1967 को उनके ननिहाल कायमगंज जनपद फर्रुखाबाद में हुआ। उनके पिता फर्रुखाबाद के मुख्यालय फतेहगढ़ में रहते थे जहाँ उन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा ग्रहण की और लख़नऊ विश्वविद्यालय से बी एस सी करने के बाद इलाहबाद विश्वविद्यालय से एम् बी ऐ किया। 1989 में कानपुर की लोहिया स्टार्लिंगर में अनमने से मन से नौकरी आरम्भ की क्यूंकि बचपन से ही उन्होंने सिविल सेवा में जाने की ठान रखी थी। लिहाज़ा इस नौकरी को उन्होंने साल भर में ही छोड़ दिया और अर्जुन की तरह अपना लक्ष्य सिविल सेवा रूपी मछली की आँख पर गड़ाए हुए इसको पाने के लिए संघर्ष का एक लम्बा दौर जिया। बच्चन जी की प्रसिद्ध रचना की इन पंक्तियाँ " लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती , हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती " को 9 सालों (1989 -1998 ) की अथक मेहनत से साकार करते हुए वो आखिर 1999 में संघ लोक सेवा आयोग से सहायक भविष्य निधि आयुक्त के पद पर चयनित हुए। (Regional Commissioner at Employees Provident Fund Organisation of India)

 तेरे रूप की उपमा मैं उसको दे तो देता 
 होता जो थोड़ा भी तेरे मुखड़े जैसा चाँद 

 चंचल चितवन मंद हास की किरणें बिखराता 
 मेरे घर, मेरे आँगन में मेरा अपना चाँद 

 सांझ ढली पंछी लौटे चल तू भी घर 'आलोक' 
बैठ झरोखे कब से देखे तेरा रस्ता चाँद 

संवेदनशील और अंतर्मुखी 'आलोक' को अपने भावों के सम्प्रेषण के लिए ग़ज़ल या गीत का सहारा लेना सुगम लगा। वो किशोर वय से ही कवितायेँ लिखने लगे थे जिनमें ग़ज़लों का अंश बीज रहा करता था। उन्हें ग़ज़ल कहने की विधिवत शिक्षा फतेहगढ़ के श्री कृष्ण स्वरुप श्रीवास्तव जी से मिली जो किसी सरकारी विभाग में कार्यरत थे। अभी उन्होंने रदीफ़ काफिया और बहर का ज्ञान लिया ही था कि कृष्ण जी का ट्रांसफर किसी दूसरे शहर में हो गया। अब जिस तरह अंग्रेजी के 'ऐ' से लेकर 'जेड' तक के वर्णाक्षर पढ़-लिख लेने से अंग्रेजी नहीं आती वैसे ही रदीफ़, काफिया और बहर के ज्ञान से ग़ज़ल कहनी नहीं आ सकती। ये तीन तो महज़ शरीर हैं जिसमें जब तक भाव की आत्मा न डाली जाय तब तक प्राण नहीं आते। तो हुआ यूँ कि नयी नौकरी और पारिवारिक जिम्मेदारियों ने उनकी संवेदनशील और रचनात्मक वृति को बैक फुट पे धकेल दिया। बैकफुट क्रिकेट की भाषा में उस स्थिति को कहते हैं जहाँ खिलाड़ी शॉट मारने की जगह अपना विकेट बचाने को खेलता है।

हवा के दम पे है जब ज़िन्दगी का दारोमदार 
तो क्यूँ ग़ुरूर तुझे ऐ हुबाब रहता है 
हुबाब =बुलबुला 

मेरे लिए हैं मुसीबत ये आईनाख़ाने
यहाँ ज़मीर मेरा बेनक़ाब रहता है 

हसीन ख़्वाब हों कितने ही पर कोई 'आलोक' 
तमाम उम्र कहाँ महवे-ख़्वाब रहता है 
महव=तल्लीन 

 जब परिस्थितियां थोड़ी अनुकूल हुईं तो आलोक जी की बरसों से दबी रचनात्मकता बाहर आने को छटपटाने लगी। तभी उनकी मुलाकात हुई मोतबर और मकबूल शायर जनाब 'अकील नोमानी' साहब से। अकील साहब ने न केवल उन्हें ग़ज़ल कहने का सलीका सिखाया बल्कि अपनी इस्लाह से उनकी ग़ज़ल में प्राण फूंके और वो बोलने लगी।आलोक जी की ग़ज़ल को निखारने में बरेली के जनाब सरदार जिया साहब ने भी बहुत मदद की।इन दो साहबान के सहयोग से आलोक की ग़ज़लों ने वो मुकाम हासिल किया जो किसी भी शायर का सपना होता है। 'उसी के नाम' में आलोक जी की महज़ तीन सालों याने 2012 से 2015 के बीच कही गयी ग़ज़लों का ही संग्रह किया गया है। बकौल आलोक " इस किताब में पाठक को एक शायर के शैशव से युवावस्था तक की यात्रा का आनंद मिलेगा , साथ ही वे रचनाकार के रूप में मेरी विकास यात्रा का भी अवलोकन कर सकेंगे "

नयी नस्लों के हाथों में भी ताबिन्दा रहेगा 
मैं मिल जाऊंगा मिटटी में क़लम ज़िंदा रहेगा 
ताबिन्दा=स्थाई 

ग़ज़ल कोई लिखे कैसे लबो-रुख़्सार पे अब
समय से अपने कब तक कोई शर्मिंदा रहेगा 

बना कर पाँव की बेड़ी को घुंघरू ज़िंदगानी 
करेगी रक्स जब तक दर्द साज़िन्दा रहेगा 

आज आलोक एक बेहतरीन ग़ज़लकार के रूप में स्थापित हो चुके हैं। उनकी ग़ज़लें इंटरनेट की सभी श्रेष्ठ ग़ज़ल या काव्य से सम्बंधित साइट्स जिसमें रेख़्ता भी है, पर उपलब्ध हैं। इन दिनों वो मयारी मुशायरों में कद्दावर शायर जनाब वसीम बरेलवी , ताहिर फ़राज़ , मंसूर उस्मानी और कुंअर बैचैन आदि के साथ शिरकत कर वाहवाहियां बटोरते नज़र आ जाते हैं। देश की लगभग सभी प्रतिष्ठित हिंदी-उर्दू की पत्र पत्रिकाओं में उनकी ग़ज़लें छपती रहती हैं। आकाशवाणी और दूरदर्शन के विभिन्न केंद्रों से उनकी ग़ज़लों का प्रसारण होता रहता है। इतना सब कुछ होने के बावजूद भी आलोक जमीन से जुड़े इंसान हैं ,अहम् उन्हें छू भी नहीं गया है। हर छोटे को प्यार और बड़े को सम्मान देना उनकी फितरत में है तभी उनकी लोकप्रियता बढ़ती ही जा रही है। अच्छा इंसान होना अच्छे शायर से ज्यादा जरूरी है और आलोक तो एक अच्छे इंसान भी हैं और बहुत अच्छे शायर भी । उनकी 'बेटी' पर कही एक मुसलसल ग़ज़ल बहुत लोकप्रिय हुई है जो उनके अच्छे इंसान और अच्छे ग़ज़लकार होने का पुख्ता सबूत है :

घर में बेटी जो जनम ले तो ग़ज़ल होती है 
दाई बाहों में जो रख दे तो ग़ज़ल होती है 

उसकी किलकारियों से घर जो चहकता है मेरा 
सोते सोते जो वो हँस दे तो ग़ज़ल होती है 

छोड़कर मुझको वो एक रोज़ चली जाएगी 
सोचकर मन जो ये सिहरे तो ग़ज़ल होती है 

यूँ तो अधिकतर सम्मान, वज़ीफ़े, उपाधियों और अवार्ड्स की कोई अहमियत नहीं होती लेकिन कुछ सम्मान या अवार्ड्स की वाकई कीमत होती है क्यूंकि वो जिन शख्सियतों को दिया जाता है उनमें खास बात होती है। आलोक को मिले सम्मान उन सम्मानों से अलग हैं जो थोक के भाव लोगों को खुश करने के लिए हर साल बाँटे जाते हैं। उन्हें वर्ष 2014 में 'इंटरनेशनल इंटेलेचुअल पीस अकेडमी ' द्वारा डा इक़बाल उर्दू अवार्ड एवं डा. आसिफ़ बरेलवी अवार्ड से नवाज़ा गया था. इसके बाद वर्ष 2015 में उन्हें प्रतिष्ठित 'दुष्यंत कुमार सम्मान 'मिला एवं वर्ष 2016 में विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ,भागलपुर द्वारा 'विद्या वाचस्पति' की मानद उपाधि प्रदान की गयी।

 ऐसे सिस्टम की अहमियत क्या है 
इसमें इन्सां की हैसियत क्या है

नौकरी जब मिले सिफ़ारिश पर 
कौन पूछे सलाहियत क्या है 
सलाहियत = योग्यता 

फूल से जिस्म बोझ बस्तों का 
क्या है तालीम तरबियत क्या है 

 उनके उस्ताद मोतरम जनाब अकील नोमानी साहब द्वारा उनके बारे में कहे इन अलफ़ाज़ को पढ़ने के बाद मेरे पास कहने को कुछ नहीं रह जाता कि "आलोक के पास काबिलीयत भी है और सलाहियत भी ,हस्सास दिल भी है और दुनिया को उसके तमाम रंगों के साथ देखने वाली नज़र भी। उनकी शायरी में ख़ुलूसो-मुहब्बत के ज़ज़्बों,समाजी क़द्रों, आला उसूलों और इंसानी रिश्तों का एहतराम भी है और ज़ुल्म,ज़ब्र ,नाइंसाफी और इस्तहाल के ख़िलाफ़ मोहज़्ज़ब एहतिजाज भी. उनके अशआर एक तरफ उर्दू से वालिहाना लगाव का एलान करते नज़र आते हैं तो दूसरी तरफ हिंदी से उनके मज़बूत रिश्ते और गहरी रग़बत के गम्माज़ भी है।"

   अपने ही जादू में जकड़े रखता है 
 जाने जंतर-मंतर मौसम बारिश का 

 बिछड़ गया जाते बसंत सा पल भर में 
 आखों को वो दे के मौसम बारिश का 

 उससे पूछो जिसकी मज़दूरी छूटी 
 काँटों का है बिस्तर मौसम बारिश का 

 आलोक जी ने ग़ज़लें थोक के भाव में नहीं कही हैं लेकिन जो कहीं है पुख्ता कहीं हैं तभी तो तीन साल के दौरान कही महज़ 74 ग़ज़लें ही इस किताब में शुमार की गयी हैं। इस किताब की प्राप्ति के लिए आप "लोक भारती प्रकाशन " दरबारी बिल्डिंग महात्मा गाँधी मार्ग इलाहाबाद को लिख सकते हैं या उन्हें info@lokbhartiprakashan.com पर मेल करें।ये किताब हार्ड बाउन्ड और पेपर बैक में भी उपलब्ध है जिसे आप www. pustak.org या फिर amazon.in से ऑन लाइन मंगवा सकते हैं। इस खूबसूरत किताब के लिए आलोक जी को उनके मोबाईल न. 9412736688 पर फोन करके बधाई दें या alokyadav1 @rediffmail.com पर मेल से बधाई सन्देश भेजें। आप अपना ये काम करें तब तक आलोक जी के चंद शेर आप तक पहुंचा कर मैं निकलता हूँ किसी और नयी किताब की तलाश में:

 अब भी सोफे में है गर्मी बाक़ी
 वो अभी उठ के गया हो जैसे
 ***
वाइज़ सफ़र तो मेरा भी था रूह की तरफ़
पर क्या करूँ कि राह में ये जिस्म आ पड़ा
 ***
न वो इस तरह बदलते न निगाह फेर लेते
 जो न बेबसी का मेरी उन्हें ऐतबार होता
 ***
तुम हुए हमसफ़र तो ये जाना
 रास्ते मुख़्तसर भी होते हैं
 ***
गोपियों ने सुनी राधिका ने पढ़ी
 बांसुरी से लिखी श्याम की चिठ्ठियां
 ***
कर लेंगे खुद तलाश कि मंज़िल है किस तरफ 
 उकता गए हैं यार तेरी रहबरी से हम 
 *** 
ख्वाइशों के बदन ढक न पायी कभी 
 कब मिली है मुझे नाप की ज़िन्दगी ?

Monday, May 7, 2018

किताबों की दुनिया -176

 हमें जब काटनी पड़ती हैं सारी रात आँखों में 
अँधेरे आसमाँ में इक सितारा ढूंढ लेते हैं 

बरामद होती है वो चीज आखिर कार कमरे में 
जब उसके वास्ते संसार सारा ढूंढ लेते हैं 

ख़सारे में हमें वो फ़ायदा बतलाने आये हैं 
किसी भी फ़ायदे में जो ख़सारा ढूंढ लेते हैं 
ख़सारा=नुक्सान 

ये कोई सन 2005-2006 की बात होगी जब मैंने पहली बार अपने एक मित्र से ब्लॉग का नाम सुना था। मेरी समझ में ही नहीं आया कि वो क्या कह रहा है। धीरे धीरे बात समझ में आने लगी तो देखा मेरी तरह बहुत से लोग ब्लॉग खोले बैठे हैं जो समझ नहीं पा रहे कि इस विधा का उपयोग किया कैसे जाय। कुछ लोग कवितायेँ लिख रहे थे कुछ लघुकथाएं कुछ व्यंग तो कुछ राजनीती से जुड़े लेख। इस भीड़ में हमारे जैसे कुछ लोग शायरी ,खास तौर पर ग़ज़ल सीखने में लगे हुए थे। ग़ज़ल सीखने वालों का एक बड़ा सा कुनबा बन गया था। इससे जुड़े लोग ग़ज़ल के उरूज़ से वाबस्ता होते और किसी एक तरही मिसरे पर ग़ज़ल कहते और टिप्पणियाँ करते। पुराने लोग नयों की हौसला अफ़ज़ाही करते। वो दिन बहुत अच्छे थे। उसी दौर के लोग अब फेसबुक पर छाये हुए हैं और वाहवाहियां बटोर रहे हैं। अब ब्लॉग की अपेक्षा फेसबुक पर बहुत त्वरित गति से टिप्पणियां आ जाती हैं और लोकप्रियता मिल जाती है। आज के शायर हमारे उसी ब्लॉग कुनबे के सदस्य थे जो अब ग़ज़ल की बारीकियां सीख कर एक पुख्ता ग़ज़लकार की श्रेणी में आ चुके हैं।

दीवार आहनी थी, सभी नाउमीद थे
धूप आई और उसमें भी रौज़न बना लिया 
आहनी :लोहे की ,रौज़न: झिर्री 

इक नींद में ज़रा सी इसे क्या पनाह दी 
इस ख़्वाब ने तो मुझमें नशेमन बना लिया 
नशेमन : घर 

अफ़्सुर्दगी पहन के निकलते हैं घर से लोग 
लोगों ने क्या उदासी को फैशन बना लिया 
अफ़्सुर्दगी=उदासी

एक बिलकुल ही अलहदा लबो लहज़े के 7 जनवरी 1977 में मुज़फ्फ़रपुर बिहार में जन्में इस युवा शायर का नाम है "सौरभ शेखर " जिनकी हाल ही में बोधि प्रकाशन जयपुर से प्रकाशित हुई ग़ज़लों की किताब "एक रौज़न" की हम बात कर रहे हैं। सौरभ ने अंग्रेजी साहित्य में एम् ऐ किया है और वर्तमान में राज्यसभा सचिवालय में अपर निदेशक के पद पर कार्य करते हुए ग़ज़लें कह रहे हैं। ग़ज़लों की तरफ उनका झुकाव दुष्यंत कुमार साहब की प्रसिद्ध किताब "साये में धूप" पढ़ने के बाद हुआ। कॉलेज के वो रुमानियत से भरपूर दिन और ग़ज़ल का साथ याने सोने में सुहागा। बीस बरस की जोशो-खरोश से भरी उम्र में उनकी ग़ज़लें पत्र पत्रिकाओं में छपने लगीं और लोगों के दिलों को गुदगुदाने लगीं। अब जवानी कब किसी नियम कानून को मानती है सो जनाब के जो दिल में आता उसे ग़ज़ल की शक्ल में पिरो कर वो यार दोस्तों को सुनाते ,ब्लॉग पर डालते और वाहवाहियां बटोरते।


मैं न कहता था कि थोड़ी सी हवस बाक़ी रखो 
देख लो अब किस तरह आसूदगी चुभने लगी 
आसूदगी : तृप्ति 

तीरगी का दश्त नापा रौशनी के वास्ते 
रौशनी फैली तो मुझको रौशनी चुभने लगी 
दश्त :जंगल 

सख़्त इक लम्हे की रौ में आ के तौबा कर लिया
हल्क़ में मेरे मगर अब तिश्नगी चुभने लगी 

इस से पहले कि तारीफ़ और वाह वाही के बेशुमार जुमले सौरभ का दिमाग सातवें आसमान पर पहुंचाते और वो भटकते, एक दिन किसी 'नीरज गोस्वामी' नाम के शख़्स ने उनके ब्लॉग पर उन्हें ग़ज़ल कहने से पहले उसके व्याकरण को अच्छे से सीखने की सलाह दे डाली। अक्सर युवा किसी बुजुर्ग की सलाह को भी हर फ़िक्र की तरह धुएं में उड़ा देने में विश्वास रखते हैं लेकिन सौरभ ने नीरज जी की बात को पता नहीं क्यों गंभीरता से लिया ( इस बात से नीरज जी अभी तक हैरान हैं क्यूंकि इससे पहले उनकी किसी बात को कभी किसी और ने गंभीरता से नहीं लिया था ) और संजीदगी से उरूज़ सीखने लगे। इसके नतीज़े जल्द ही सामने आने लगे। उनकी ग़ज़लों में निखार आने लगा और सोच में पुख़्तगी झलकने लगी. उनकी, ग़ज़ल से मुहब्बत अब दीवानगी की हद तक जा पहुंची।

ख़ता ज़रा भी नहीं रास्तों के काँटों की 
गुनाहगार मिरे पाँव का ही छाला है 

ये सर्द रात, ये ख़लवत,अलाव माजी का 
बदन पे गुज़रे दिनों का मिरे दुशाला है 
ख़लवत =एकांत

ज़माने भर की जुटा लेगा बदगुमानी वो 
उसे सचाई से क्या और मिलने वाला है 

उस्ताद ग़ज़लकार जनाब 'ज्ञानप्रकाश विवेक' इस किताब की भूमिका में लिखते हैं कि " सौरभ शेखर की ग़ज़लों में एक नई ज़मीन दिखाई देती है। एक ऐसा भावबोध जो जटिल होते संबंधों, मुश्किल होते जीवन और कुटिल होते तंत्र को बड़ी सूक्ष्मता से व्यक्त करने में सफल होता है। यहाँ नए समय का संज्ञान है और बदलते समय की गूँज। यथार्थ बेशक कर्कश हुआ है लेकिन इन ग़ज़लों में खुरदरे और कर्कश यथार्थ को बड़ी निपुणता से व्यक्त किया गया है। यहाँ वेदना भी अपने गाढ़े रूप में मौजूद है। लहजा बेतकल्लुफ अभिव्यक्ति में व्यंजना का पुट लेकिन शेर में थरथराती बैचनी। ये जो शेरगोई का अंदाज़ है यही सौरभ शेखर का मुहावरा है। वो नए प्रयोग करते हैं और सफल होते हैं

जिस से भी मिल रहा हूँ उसी को करार है 
चैनो-सुकूँ के शह्र में उजलत का क्या हुआ 
उजलत=जल्दबाज़ी  

सौ सदमे खा के ख़ैर मुहब्बत तो बच गई
तलवार भांजती हुई नफ़रत का क्या हुआ 

वो आदमी तो हो गया मशहूर इश्क में 
रुसवाइयों की आग में औरत का क्या हुआ 

हम तो हक़ीर थे हमें मिटटी निगल गई 
पर यार बादशाह सलामत का क्या हुआ 

सौरभ ने सन 2009 में औपचारिक तौर पर ग़ज़ल कहना शुरू किया अपने ब्लॉग से, धीरे धीर उनकी ग़ज़लें सन 2012 से लफ्ज़ के पोर्टल पर होने वाले तरही मुशायरों में भी दिखाई देने लगीं। उस पोर्टल पर ग़ज़ल का पोस्ट होना उसके मयार का सर्टिफिकेट हुआ करता था। सौरभ की ग़ज़लें वहां उर्दू के कामयाब शायरों की नज़रों में आयीं और वाहवाही बटोरने लगीं। बेहतरीन शायर और ग़ज़ल के पारखी जनाब मयंक अवस्थी साहब ने उनकी ग़ज़लों के बारे में कहा कि "नावल्टी सौरभ की ग़ज़लों की पहचान है। सामाजिक चैतन्य,शिल्पगत ख़ूबसूरती और ज़बान की कहन सौरभ की ग़ज़लों की विशेषता है। सौरभ ने कम समय में ही ग़ज़ल के दुश्वार मरहले सर कर लिए हैं। ये सौरभ की उपलब्धि है। दुष्यंत कुमार ने अपनी पुस्तक ” साये में धूप” में लिखा है कि हिन्दी और उर्दू जब आम आदमी के पास जाती हैं तो वो अपना सिंहासन छोड़ कर हिदुस्तानी बन जाती हैं ,सौरभ की ग़ज़लों की भाषा खालिस हिंदुस्तानी है।"

सच झूठ की कहानी मुकम्मल न जानिये
कुछ आखरी ग़लत है न कुछ आखरी सही

रहबर ने बार-बार ही भटका दिया मुझे
साबित हुई हमेशा मिरी गुमरही सही

इक आपके अलावा ग़लत है हरेक शख्स
अच्छा ये आप समझे हैं, अच्छा यही सही

उर्दू ग़ज़ल को हिंदी पाठकों तक ले जाने में लफ्ज़ पत्रिका और उसके संपादक बेहतरीन शायर जनाब 'तुफैल चतुर्वेदी " साहब का योगदान अविस्मरणीय रहा है. तुफैल साहब के शागिर्दों की संख्या बहुत बड़ी है और उन में कुछ एक नौजवान शायर तो आज उर्दू अदब में अपनी कलम का लोहा मनवा रहे हैं। तुफैल साहब ने ही सन 2016 में सौरभ की ग़ज़लों को लगातार चार साल पढ़ते रहने के बाद उन्हें लिखा कि " सौरभ आपका लहजा सबसे अलग सबसे जुदा जा रहा है। आपके बिम्ब अनोखे और आपके अपने हैं। आपका लहजा ग़ज़ल का भी है और उससे अलग भी है।आप के लिये बानी की पंक्ति कुछ तब्दील करके सादिक़ आती है-बोलता इक लफ़्ज़ मंज़र में मगर सबसे हटा सा. ये आपकी ज़बरदस्त कामयाबी है कि जहां मैं ग़ज़ल के 36 बरस पांव दबाने के बाद आ पाया हूं, वहां आप कुछ बरस के सफ़र में ही पहुँच गये। अब वक़्त आ गया है कि आपको किताब ले आनी चाहिये। " मैं समझता हूँ कि एक उस्ताद शायर द्वारा सरे आम ये कहना कि जिस मुकाम पर वो 36 सालों की मेहनत के बाद पहुंचे हैं वहां एक युवा शायर चंद सालों में ही पहुँच गया है ,बहुत बड़ी बात है। ये उस्ताद शायर का बड़प्पन तो है ही एक युवा शायर के लिए सबसे बड़ा ईनाम भी है।

पाक़ लोगों की सुहबतें तौबा 
कुफ़्र ही कुफ़्र सूझता है मुझे 

मुझको आँखें बचा के रखनी हैं
कितना कुछ और देखना है मुझे 

घर में फुर्सत का आज इक लम्हा 
इत्तिफ़ाक़न गिरा मिला है मुझे 

युवा सौरभ की इस पहली किताब को पढ़ते वक्त अंदाज़ा हो जाता है कि इनका भविष्य बहुत उज्जवल है. इस किताब में सौरभ की 88 ग़ज़लें संगृहीत हैं जो बार-बार पढ़ने लायक हैं. अधिकतर छोटी बहर की ग़ज़लों की मारक क्षमता का तो कहना ही क्या। ग़ज़ल में भाषा का सौंदर्य आपको बांध लेता है। उन्होंने हिंदी-उर्दू के अलावा अंग्रेजी के रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाले शब्दों को बहुत ख़ूबसूरती से अपनी ग़ज़लों में पिरोया है। यूँ अंग्रेजी शब्द आजकल की ग़ज़लों में खूब प्रचलन में हैं लेकिन सौरभ ने जिस तरह उन्हें बरता है उसे पढ़ कर लगता है कि जैसे इस लफ्ज़ के सिवाय अगर और किसी भाषा का लफ्ज़ आता तो वो मिसरे का सौंदर्य धूमिल कर देता।

बीच भंवर वालों की क्या हालत होगी 
ख़ौफ़ज़दा जब छिछले पानी में हूँ मैं 

ज़द में हूँ मैं दिल की सी.सी.टी.वी.की 
चौबीसों घंटे निगरानी में हूँ मैं  

महसूस हुआ कल इक नॉविल पढ़ कर 
ये मेरा क़िरदार, कहानी में हूँ मैं 

तुफैल साहब के अलावा एक और शख़्स का नाम लिए बिना बात पूरी नहीं होगी जिसने सौरभ को शायर सौरभ बनने में पूरी मदद की, वो हैं मशहूर शायर जनाब 'सर्वत जमाल' साहब। सर्वत मेरे मित्र हैं इसलिए नहीं कह रहा बल्कि वो हकीकत में जितने बेहतरीन शायर हैं उस से कहीं ज्यादा अच्छे इंसान हैं. उन्होंने सौरभ की हर उस कदम पर मदद की जहाँ जहाँ उसे अपने सफर का रास्ता उबड़-खाबड़ और दुश्वार लगा। चढाई पर चढ़ने वाले इंसान की लाठी बनना सर्वत जमाल की फितरत में है। उस्ताद लोग सिर्फ रस्ते में आयी रुकावटों को दूर करने में आपकी मदद करते हैं लेकिन अपनी मंज़िल का रास्ता खुद को ही तलाशना पड़ता है। सौरभ ने जो रास्ता तलाशा वो उसका अपना है जिस पर पहले किसी के चलने के निशान नहीं मिलते ,तभी तो उन्हें जो मंज़र दिखाई देते हैं वो बहुत अलग और दिलकश हैं।

उदासी के रुतों के फूल हैं हम 
ग़मों में देखना जलवा हमारा 

बहुत बारीक़ हैं उनके इशारे 
बढ़ाना तो ज़रा चश्मा हमारा 

खराबी कोई तो हम में है जिस से 
कहीं भी जी नहीं लगता हमारा 

इस किताब की सभी ग़ज़लें बेहद खूबसूरत हैं। मेरे देखे शायरी के प्रेमियों के पास ये किताब जरूर होनी चाहिए। आपसे गुज़ारिश है कि इन बेहतरीन ग़ज़लों के लिए सौरभ शेखर, जो फिलहाल इंद्रापुरम गाज़ियाबाद के निवासी हैं , को उनके मोबाईल न 9873866653 पर फोन करके बधाई दें और किताब प्राप्ति के लिए 'बोधि प्रकाशन जयपुर के जनाब 'माया मृग ' जी से 9829018087 पर संपर्क करें। सौरभ की ग़ज़लें आप 'रेख़्ता' की साइट पर भी पढ़ सकते हैं। ये किताब अमेज़न पर भी उपलब्ध है.सौरभ पर जितना लिखा जा सकता है उसका मात्र 20 -25 प्रतिशत ही आप तक पहुंचा पाया हूँ। पोस्ट की सीमा को नज़र-अंदाज़ भी तो नहीं किया जा सकता इसलिए उनके कुछ फुटकर शेर आपको पढ़वाता चलता हूँ:

लक़ीरें फ़क़त खेंचता जा वरक़ पर 
कोई शक्ल तैयार हो कर रहेगी
*** 
कुछ इच्छा भी तो हो मिलने-जुलने की 
वर्ना ऐसा थोड़ी है कि फुर्सत नईं 
*** 
वैसे पैसा ही सब कुछ है दुनिया में 
लेकिन पैसे पर भी थूका जा सकता है
*** 
वो बार-बार पूछ रहा था वही सवाल 
मजबूर हो के झूठ मुझे बोलना पड़ा
*** 
बच्चे ने सजाई है कोई और ही दुनिया 
खींचा है जहां बाघ वहीँ रक्खा हिरन भी
*** 
फ़िक्र मुझे अपने बच्चों के सर की होती थी 
जर्जर घर था सच्चाई का आखिर छोड़ दिया
*** 
मैं हकलाता नहीं हूँ बोलने में 
मैं नर्वस था तिरी मौजूदगी से 
*** 
यही एक मौका मिरे पास है 
गिराना है ग़म को इसी वार में
*** 
गौर से देखिये पाज़ेब की खुशफ़हमी में
आप जंज़ीर की झंकार संभाले हुए हैं