Monday, October 2, 2017

किताबों की दुनिया -145

आप तस्वीर में न मर जाएँ 
चलना फिरना बहुत जरूरी है 

ज़िन्दगी में बिना किताबो-क़लम 
पढ़ना-लिखना बहुत जरूरी है 

याद करना उसे जरूरी नहीं 
याद रखना बहुत जरूरी है 

मेरा होना पता नहीं चलता 
तुमको छूना बहुत जरूरी है 

जब कभी भी छोटी बहर में कही ग़ज़लों का जिक्र होगा तो वो जनाब "विज्ञान व्रत" का नाम लिए बिना मुकम्मल नहीं होगा। छोटी बहर में उन्होंने इतनी ग़ज़लें कही हैं कि आप सोच भी नहीं सकते तभी तो उनके पांच या शायद छै ग़ज़ल संग्रह छप कर चर्चित हो चुके हैं। आप सोचेंगे कि इस श्रृंखला में विज्ञान व्रत जी के ग़ज़ल संग्रह की चर्चा तो पहले हो चुकी है तो फिर आज दोबारा से उनका जिक्र क्यों ? वो इसलिए कि आज के हमारे शायर भी छोटी बहर में ग़ज़ल कहने वाले शायरों की फेहरिश्त में बहुत अहम् मुकाम रखते हैं। जैसा मैं हर बार कहता हूँ कि छोटी बहर में कही ग़ज़ल पढ़ने सुनने में बहुत आसान सी लगती है लेकिन होती नहीं। गागर में सागर भरने के लिए आपके पास अनोखा हुनर होना चाहिए, तभी बात बनेगी , थोड़ी सी चूक हुई और शेर ढेर हुआ।

तिरे नज़दीक आना चाहता हूँ 
मैं खुद से दूर जाना चाहता हूँ 

तुझे छूना मिरा मक़सद नहीं है 
मैं खुद को आज़माना चाहता हूँ 

वही तो सोचता रहता हूँ हर दम 
मैं तुमको क्या बताना चाहता हूँ 

अदाकारी बड़ा दुःख दे रही है 
मैं सचमुच मुस्कुराना चाहता हूँ 

ज़िला बदायूं के बिसौली क़स्बे के एक नीम सरकारी महकमे में मुलाज़िम ज़नाब अहमद शेर खां उर्फ़ मद्दन खां के यहाँ चार जनवरी 1952 को जिस बेटे का जन्म हुआ उसका नाम रखा गया " ज़मा शेर खान उर्फ़ पुत्तन खान " जो आगे चल कर शायर जनाब "फ़ेहमी बदायूंनी " के नाम से पहचाने जाने लगे, आज इस श्रृंखला में हम उनके "ऐनीबुक " गाज़ियाबाद द्वारा देवनागरी में बेहद ख़ूबसूरती से प्रकाशित पहले ग़ज़ल संग्रह "पांचवी सम्त " की बात करेंगे। पेपरबैक में छपे इस संग्रह का आवरण और छपाई बहुत दिलकश है , किताब हाथ में लेते ही इसे पढ़ने की चाहत बलवती हो उठती है।


 मिरी वादा-खिलाफ़ी पर वो चुप है 
उसे नाराज़ होना चाहिये था 

अब उसको याद करके रो रहे हैं 
बिछड़ते वक़्त रोना चाहिये था 

चला आता यक़ीनन ख़ाब में वो 
हमें इक रात सोना चाहिये था 

हमारा हाल तुम भी पूछते हो 
तुम्हें मालूम होना चाहिये था 

किताब की भूमिका में मशहूर शायर और आलोचक जनाब "मयंक अवस्थी" साहब लिखते हैं कि "फ़हमी साहब ने छोटी बहर में बेशतर ग़ज़लें कही हैं और लफ्ज़ को बरतने में भी और उसे मआनी देने में भी उनका जवाब नहीं। इनके हर शेर की रूह नूरानी है।ऊला-सानी का रब्त बेहद असरदार है और इनके शेर का जिस्म तो चुराया जा सकता है रूह कतई नहीं। बयान शफ़्फ़ाक़ पानियों जैसा है -किसी बेअदब ग़ैर जरूरी लफ्ज़ का रत्ती भर दख़्ल इनकी शायरी में नहीं हो सकता। इस बुलंद मफ़्हूम के नाख़ुदा ने बेहद आसान लफ़्ज़ों की नाव से गहरे अर्थों के बेशुमार समंदर सर किये हैं। "

जब रेतीले हो जाते हैं 
पर्वत टीले हो जाते हैं 

तोड़े जाते हैं जो शीशे 
वो नोकीले हो जाते हैं 

फूलों को सुर्खी देने में 
पत्ते पीले हो जाते हैं 

फ़हमी साहब ने बदायूं से इंटरमीडिएट तक की तालीम 1968 में हासिल की चूँकि उस वक्त बदायूं में कोई डिग्री कॉलेज नहीं था इसलिए तालीम हासिल करने के लिए तालिब-ऐ-इल्मों को बरेली या चंदौसी जाना पड़ता था ,फ़हमी साहब के घर की हालत इस लायक नहीं थी कि वो घर छोड़ कर बाहर जाते लिहाज़ा उन्होंने घर पर किताबें ला कर ग्रेजुएशन की पढाई करने की ठानी। घर पर पढाई चलती रही और इस बीच उन्हें 1970 में यू पी गवर्नमेंट के रेवन्यू महकमे में "चकबंदी लेखपाल" की नौकरी मिल गयी जो उन्हें हुए पीलिया के हमले के बाद ज़्यादा लम्बी नहीं खिंच पायी। इस बीच शादी भी हो गयी और बच्चे भी। बेरोज़गारी के आलम में उन्होंने स्कूली बच्चों के लिए गणित और साइंस विषयों की ट्यूशन लेनी शुरू की। उनके पढ़ाने का अंदाज़ और विषयों पर पकड़ इस कदर लोकप्रिय हुई की उनसे बीएससी और इंजीनियरिंग के छात्र भी ट्यूशन लेने आने लगे और ज़िन्दगी की गाड़ी पटरी पर दौड़ने लगी।

हर कोई रास्ता बताएगा 
कोई चल कर नहीं दिखायेगा 

जलना-बुझना भी और उड़ना भी 
चाँद जुगनू से हार जायेगा 

नाम दरिया है जब तलक तेरा 
हर समंदर तुझे बुलाएगा 

रिवायत से हट कर शायरी करना और बात कहने का नया सलीका ईज़ाद करना फ़हमी साहब की खासियत है।उनके बहुत से शेर मुहावरों की तरह इस्तेमाल किये जा सकते हैं। सब से बढ़िया बात जो उनकी शायरी में नज़र आती है वो ये कि आपको ऐसा एक भी लफ्ज़ उनकी शायरी का हिस्सा नहीं बनता नहीं दिखता जिसका मतलब खोजने के लिए पाठक को लुग़त मतलब डिक्शनरी का सहारा लेना पड़े. लियाकत ज़ाफ़री साहब ने फ़हमी साहब की शायरी के बारे में लिखा है कि "फ़हमी का शेर पहली ही रीडिंग में पकड़ लेता है... फिर सोचने पर मजबूर करता है.... उसके बाद परत दर परत खुलने लगता है ...और फिर जिस पाठक का जो मेयार है उसी के मुताबिक़ उसे मज़ा दे कर आगे निकल जाता है "

जब तलक तू नहीं दिखाई दिया 
घर कहीं का कहीं दिखाई दिया 

रोज़ चेहरे ने आईने बदले 
जो नहीं था नहीं दिखाई दिया

बस ये देखा कि वो परेशां है 
फिर हमें कुछ नहीं दिखाई दिया

"नदीम अहमद काविश" साहब ने इस संकलन में फ़हमी साहब की बेजोड़ 90 ग़ज़लें संगृहीत की हैं जो बार बार पढ़ी जाने योग्य हैं। बहुत से शेर तो पढ़ने के साथ ही आपके ज़ेहन में घर कर लेते हैं। लियाक़त ज़ाफ़री साहब ने इस किताब की भूमिका में फ़हमी साहब के लिए बहुत दिलचस्प अंदाज़ में लिखा है कि "फ़हमी एक ऐसा शायर जिसकी तबई-उम्र का अंदाज़ा उसकी शायरी से कर पाना तक़रीबन ना-मुमकिन है....फ़हमी की उम्र का उसके शेर से कोई लेना देना नहीं ... सिरे से उलट मामला है यहाँ.... आप में से पच्चीस-तीस वालों को ये साठ-सत्तर का कोई तज्रिबेकार बूढा लगेगा और साठ-सत्तर वालों को कोई नटखट रूमानी लौंडा जिसने अभी अभी इ-टीवी उर्दू के मुशायरे पढ़ने शुरू किये हैं....

लिख के रख लीजिये हथेली पर 
हाथ मलना शिकस्त खाना है 

ये जो तिल है तुम्हारे आरिज़ पर 
ये मुहाफ़िज़ है या खज़ाना है 
आरिज़=गाल , मुहाफ़िज़ =रक्षक 

बादलों से दुआ सलाम रखो 
हमको मिटटी का घर बनाना है 

आप कहते हैं पास तो आओ 
ये डराना है या बुलाना है

इस बाकमाल किताब के शेर पढ़वाने का लालच मुझे अब छोड़ना पड़ेगा क्यूंकि अगर सभी शेर यहाँ आपको पढ़वा दिए तो आप किताब मंगवाएंगे नहीं जबकि मेरा मक़सद इस किताब को आपकी किताबों की अलमारी में सजा हुआ देखना है। किताब मंगवाने के लिए आप अमेज़न की शरण में जा सकते हैं या फिर ऐनीबुक के पराग अग्रवाल से 9971698930 पर संपर्क करें.मेरी आपसे गुज़ारिश है कि आप फेहमी साहब से उनके मोबाईल न 9897454216 पर कॉल करके उन्हें इस बेहद खूबसूरत शायरी के लिए भरपूर दाद दें।देर मत कीजिये बस कोई सा भी रास्ता अख्तियार कर किताब मंगवा लीजिये उसे इत्मीनान से पढ़िए और फिर मुझे अगर चाहें तो धन्यवाद दीजिये। आखिर में उनकी कुछ और ग़ज़लों के चुनिंदा शेर आपकी खिदमत में पेश कर रुख़सत होता हूँ और निकलता हूँ अगली किताब की तलाश में :

छिपकली ने बचा लिया वरना 
रात तन्हाई जान ले लेती 
*** 
इक जनाज़े के साथ आया हूँ 
मैं किसी क़ब्र से नहीं निकला 
*** 
वहां फ़रहाद का ग़म कौन समझे 
जहां बारूद पत्थर तोड़ती है 
*** 
उसे लेकर जो गाड़ी जा चुकी है 
मैं शायद उसके नीचे आ गया हूँ 
*** 
बस वही लफ़्ज़ जानलेवा था 
ख़त में लिख कर जो उसने काटा था
*** 
शिकार आता है क़दमों में बैठ जाता है 
हमारे पास कोई जाल वाल थोड़ी है 
*** 
फूल को फूल ही समझते हो 
आपसे शायरी नहीं होगी 
*** 
तिरे मौज़े यहीं पर रह गए हैं 
मैं इनसे अपने दस्ताने बना लूँ 
*** 
नमक की रोज़ मालिश कर रहे हैं 
हमारे ज़ख़्म वर्जिश कर रहे हैं 
*** 
अदालत फ़र्शे-मक़्तल धो रही है 
उसूलों की शहादत हो गयी क्या 
फ़र्शे-मक़्तल = वध स्थल

12 comments:

vikas rana said...

kya kahne .. kitaab aur uspe ye tahreer dono bahut umdaa hain..
fahmi sahab pe aisi tahreeren roz aati rahni chhaiye'
ek sher ek achi khasi tahreer de sakta hai

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (03-10-2017) को "ब्लॉग की खातिर" (चर्चा अंक 2746) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Dheerendra Singh said...

Bahut behatreen .. Bahut Mubarak..aur shukriyah bhi ��

Navin C. Chaturvedi said...

I don't know whether to term aa. Vigyan vrat ji as intelligent poet or one of the most dynamic posts. Bahut kam waqt guzara hai in k saath. Shayd do ek baar hi baat hui hai. In ki poetry ne indian ghazals ko naya flavour diya. Zindabad. Thanks for writing and sharing about Him.

द्विजेन्द्र ‘द्विज’ said...

मुझे याद है एक उस्ताद साहिब कहा करते थे:

छोटी बह्र में ग़ज़ल कहना पावों से पत्थर बाँध कर पहाड़ चढ़ने की कोशिश करने जैसा है!

फ़हमी बदायूनी साहिब के जो शेर आपने पढ़वाए हैं वो इस बात की तस्दीक़ करते हैं कि
कि उनकी हर कोशिश कामयाब हुई है और यह भी कि उनके तमाम शेर फ़हमी साहिब को एक बड़ा शाइर साबित करते हैं क्योंकि उनकी शाइरी में पढ़ते ही ज़बानज़द हो जाने की सलाहियत है।हर शेर नायाब नगीना है!
फ़हमी साहिब को इस ख़ूबसूरत कलाम के लिए सलाम!

और सलाम आपकी दीदावरी और गौहरशनासी को भी जिसकी बदौलत इस कलाम की रानाई शाइरी के दीवानों तक पहुँचती है!

nakul gautam said...

क्या कहने sir
एक और किताब जो आपकी समीक्षा पढ़कर खरीदने चला हूँ। कुछ वक़्त पहले इस पुस्तक की चर्चा हुई और किसी वजह से खरीदी नहीं। लेकिन आज ये समीक्षा पढ़कर और ये सीपियों की तरह चुने गए अशआर पढ़ कर रहा नहीं जा रहा।

तोड़े जाते हैं जो शीशे
वो नोकीले हो जाते हैं

आहाहा

और

फूल को फूल ही समझते हो
आपसे शायरी नहीं होगी

क्या बात है।
ज़िंदाबाद

सादर
नकुल

नीरज गोस्वामी said...

Received on mail :-

इस बार उम्दा शायर का इन्तिखाब हुआ नीरज भाई !
फ़हमी साहिब आसान ज़बान में फड़कती हुई शायरी करते हैं जो मन को मोह लेती है.
ऐसी फड़कती शायरी पर दिलकश अंदाज़ में आप की पेशकश
मुबारकबाद ! मुबारकबाद!
दिली मुबारकबाद आप दोनों के लिए

Alam Khurshid

नीरज गोस्वामी said...

Received on Fb:-

बादलों से दुआ सलाम रखो
हमको मिट्टी का घर बनाना है
वाह नीरज जी। खूबसूरत आलेख।

गंगा शरण सिंह
Thane-Maharashtra

PRAN SHARMA said...

बेहतरीन समीक्षा . अच्छे अशआर के लिए शायर महोदय को बधाई। उनका

यह शेर ` बादलों से दुआ सलाम रखो , हमको मिट्टी का घर बनाना है `

पढ़ कर कई साल पहले कहा मेरा शेर याद आ गया है -

`मिट्टी के घर हों सलामत

तेज़ बारिश हो रही है

मेरा यह शेर ` ग़ज़ल कहता हूँ ` में दर्ज़ है

Pushpendra Dwivedi said...

अविस्मरणीय अतिरोचक भावनात्मक रचनात्मक अभिव्यक्ति

Anonymous said...

सटीक रोचक औऱ सारगर्भित समीक्षा के लिए बधाई, अगली के लिए इन्तजार!

Onkar said...

बहुत सुन्दर