Monday, July 24, 2017

किताबों की दुनिया -135

अच्छे बुरे का मेरे, जमा ख़र्च तुम रखो 
मैं तो जीऊंगा ज़िन्दगी अपने हिसाब से 

आदत सी पड़ न जाय कहीं जीत की मुझे 
सो चाहता हूँ खेलना बाज़ी जनाब से 

दौरे-ख़िज़ाँ का पहरा है गुलशन में चारसू 
कैसे मैं हाल खुशबू का पूछूं गुलाब से 

ऐसा नहीं है कि ये पहली बार हुआ है इस श्रृंखला में ऐसा पहले भी हो चुका है कि जिस शायर की किताब की हम चर्चा करने जा रहे हैं उस शायर के उस्ताद मोहतरम की किताब की चर्चा भी पहले कर चुके हैं। ये बात दोनों, याने उस्ताद और शागिर्द, के लिए बाइसे फ़क्र है। उस्ताद के लिए इसलिए कि उनका शागिर्द इस लायक हो गया है कि दुनिया उसकी शायरी की चर्चा करे और शागिर्द के लिए इसलिए कि उसकी किताब की चर्चा भी वहां हो रही हैं जहाँ उसके उस्ताद मोहतरम की हुई है,एक ही प्लेटफार्म पर। हमारे आज के शायर हैं जनाब 'चन्दर वाहिद' साहब जिनकी किताब 'समय कुम्हार है' की बात हम करेंगे। इनके उस्ताद दिल्ली के जाने माने शायर जनाब ' मंगल नसीम' साहब हैं जिनकी किताब ' तीतरपंखी ' की चर्चा हम पहले कर चुके हैं।


मैंने भूले से छू दिया गुल को 
पत्ती-पत्ती सिसक-सिसक उठ्ठी 

साज़ छेड़ा चटक के गुंचों ने 
ओस पत्तों पे फिर थिरक उठ्ठी 

याद क्या है? दरख़्त पर जैसे 
नन्हीं चिड़िया कोई चहक उठ्ठी 

याद को नन्हीं चिड़िया की चहक सा बताने वाले जनाब चन्दर वाहिद साहब का जन्म गाँव बादशाहपुर, जो उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड जिले में पड़ता है, में 5 अगस्त 1958 को हुआ। चन्दर साहब ने अपने शेरी सफर की शुरुआत सन 1996 में याने ज़िन्दगी के लगभग 38 वसंत देख चुकने के बाद की। इस से पहले उनके अहसास और तसव्वुरात ग़ज़ल की शक्ल में बाहर आने को बैचैन तो रहते थे लेकिन रास्ता नहीं मिल रहा था। चन्दर साहब को एक मुकम्मल उस्ताद की तलाश थी जो उनका हाथ पकड़ कर शायरी के जोख़िम भरे टेड़े मेढे रास्तों पर चलना सिखाये। उनकी ये तलाश उस्तादे मोहतरम जनाब मंगल नसीम साहब पर जा कर ख़तम हुई। उस्ताद ने हाथ क्या पकड़ा चन्दर साहब के दिल में घुमड़ते शायरी के बादल अशआर की शक्ल अख्तियार कर बरसने लगे।

झिलमिलाये जैसे लहरों पर किरन 
आस लेती दिल में यूँ अंगड़ाइयां 

पलक की पाज़ेब के घुँघरू थे अश्क 
टूटने पर बज उठी शहनाइयाँ 

जब नगर की धूप में जलना पड़ा 
याद आयी गाँव की अमराइयाँ 

'टूटने पर बज उठी शहनाइयां/ जैसे मिसरे बिना उस्ताद की रहनुमाई के दिमाग में नहीं आ सकते। ग़ज़ल के कारवां का हिस्सा होने की इजाज़त देते हुए मंगल साहब ने वाहिद साहब को सफर के तौर तरीके समझते हुए कहा था कि 'मेरे अज़ीज़ ग़ज़ल कहना आग के दरिया से गुज़ारना है. सब कुछ फूंक सकने का हौसला रखते हो तो आओ मेरे साथ वर्ना वापस लौट जाओ कि अनगिनत खुशियां तुम्हारी राह तकती हैं। वाहिद साहब ज़ाहिर सी बात है वापस लौटने के लिए तो मंगल साहब के पास आये नहीं थे सो बस उनके घुटनों पर सर रख कर अपना सब कुछ उन पर न्योछावर कर दिया। ऐसे धुनि शागिर्द को पा कर उस्ताद को कितनी ख़ुशी मिलती है इसका अंदाज़ा भी नहीं लगाया जा सकता।

समय कुम्हार है जो चाक पर नचाता है 
ये ज़िन्दगी तो सुराही का नाचना भर है 

जो खाली हाथ है आया वो क्या खरीदेगा 
उसे तो दुनिया के मेले को देखना भर है 

ग़मों की आग से खुद को ज़रा बचा रखना 
कि जिसमें रहते हो 'वाहिद' वो मोम का घर है 

ग़मों की आग से खुद को बचाये रखने का संदेशा देने वाले चन्दर साहब खुद उसकी लपटों में घिर गए और उनका मोम का घर पिघलने लगा। हुआ यूँ कि एक दिन सुबह जब बिस्तर से उठने लगे तो उन्होंने पाया कि उनका आधा जिस्म बेहरकत हो चुका है। पैरालिसिस के इस अटैक ने उनकी ग़ज़ल यात्रा को विराम सा लगा दिया। लगभग ढेड़ दो बरस के इस यातना भरे दौर का उन्होंने दवाओं ,दुआओं और दोस्तों रिश्तेदारों की सेवाओं के साथ डट कर मुकाबला किया और आखिर कार विजयी हुए। ये अलग बात है कि ज़िन्दगी वैसी नहीं रही जैसी फ़ाज़िल से पहले थी।

सूरत उतर न जाय कहीं माहताब की 
कह दो कि बात झूठ है उनके शबाब की 

मंज़िल क़रीब आई तो भटका दिया गया 
इन रहबरों ने ज़िन्दगी मेरी ख़राब की 

हालात ने बिगाड़ दी ' वाहिद' की शक्ल यूँ 
जैसे ख़राब जिल्द हो अच्छी किताब की 

'समय कुम्हार है' का प्रकाशन 2001 में हुआ था याने आज से 16 साल पहले लेकिन इसके अशआर आज भी उतने ही ताज़ा हैं जितने कि ये इन्हें लिखते वक्त थे। शायरी वही ज़िंदा रहती है जो इंसान की जद्दोजहद की उसके गुण-दोष की, ऊंच-नीच की उसकी फ़िक्र की नुमाइंदगी करे. पढ़ने वाले और सुनने वाले को उसमें अपना अक्स नज़र आना चाहिए । आज सदियों बाद भी तभी ग़ालिब को वैसे ही पसंद किया जाता है बल्कि ज्यादा पसंद किया जाता है जितना कि उसके वक्त में उसे पसंद किया गया होगा।

लौट आ जाती है पिंजरे में पलट कर बुलबुल 
ये जिस्मों-जां के भी क्या खूब ताने-बाने हैं 

बेबसी प्यास तड़प दर्द घुटन और थकन 
मैं जो टूटा तो सभी मोती बिखर जाने हैं 

खुद से हर रोज़ मैं लड़ता हूँ सुलह करता हूँ 
मेरे अशआर इसी जंग के अफ़साने हैं 

हिंदी और उर्दू दोनों लिपियों में याने एक पृष्ठ पर हिंदी और सामने वाले पर उर्दू में इस किताब को अमृत प्रकाशन शाहदरा दिल्ली ने प्रकाशित किया है जिसमें वाहिद साहब की लगभग 40 ग़ज़लें संगृहीत हैं ।आप अमृत प्रकाशन से 011 -223254568 पर बात करके किताब प्राप्त करने का तरीका पूछ सकते हैं। बेहतर तो ये रहेगा कि आप चन्दर वाहिद साहब को उनके मोबाइल न 09891782782 पर संपर्क करें और उन्हें उनकी लाजवाब शायरी पर बधाई दें और उनके उस्ताद मोहतरम जनाब मंगल नसीम साहब से उनके मोबाइल न 9968060733 संपर्क कर उनसे किताब प्राप्ति का रास्ता पूछें। चलते चलते उनकी एक ग़ज़ल के चंद शेर और पढ़वाता चलता हूँ :-

टूटे दीपक को हटा मत तू मिरे आगे से 
मेरी नज़रों को उजाले का भरम रहने दे 

अक्स अपना कोई देखे है मेरे अश्कों में 
और कुछ देर मिरी आँखों को नम रहने दे 

शाइरे-वक़्त हक़ीक़त में वही होता है 
अपने अशआर को जो आम फ़हम रहने दे

Monday, July 17, 2017

किताबों की दुनिया -134

"बीकानेर" - जिसका नाम लोकप्रिय बनाने में "बीकानेरवाला" के नाम से जगह जगह खुले रेस्टॉरेंट ने अहम् भूमिका निभाई है , राजस्थान का पाकिस्तान की सीमा से लगा एक अलमस्त शहर है। लगभग 8-10 लाख की जनसँख्या वाले बीकानेर शहर को आप शायद इसके स्वादिष्ट रसगुल्ले और चटपटी भुजिया सेव के कारण जानते होंगे लेकिन ये नहीं जानते होंगे कि इसके लगभग 500 साल पुराने इतिहास में एक बार भी साम्प्रदायिक दंगा फ़साद होने की वारदात दर्ज नहीं है। यहाँ के लोग गंगा-जमुनी तहज़ीब की सिर्फ बात ही नहीं करते बल्कि इसे जीते हैं और बड़ी बेफिक्री से अपना जीवन यापन करते हैं । हमारे आज के शायर इसी बीकानेर के निवासी है और गंगा जमुनी तहज़ीब को अपने अशआर में बहुत ख़ूबसूरती से पिरोते हैं :

वो जिनके जलने से हरसू धुआँ-धुआं हो जाय 
चिराग़ ऐसे जहाँ भी जलें, बुझा देना 

तुम्हें लगे कि यहाँ शान्ति हो गई क़ायम 
तो क्या हुआ कोई अफ़वाह फिर उड़ा देना 

ज़रूरत आपको जब भी पड़े उजाले की 
मैं कह रहा हूँ मेरा आशियाँ जला देना 

जिन्हें समझ ही नहीं इम्तिहान लेने की 
'अदीब' उनको कोई इम्तिहान क्या देना 

एक जुलाई 1963 को बीकानेर में जन्में ,जनाब 'ज़ाकिर अदीब" साहब जिनकी किताब "मैं अभी कहाँ बोला" की बात आज हम करेंगे, का नाम मैंने पहले नहीं सुना था। ये किताब मुझे जयपुर के प्रसिद्ध शायर जनाब 'लोकेश साहिल' साहब की निजी लाइब्रेरी में दिखाई दी। एक-आध पृष्ठ पलटने और कुछ अशआर पढ़ने के बाद ही मुझे लगा कि ये किताब मुझे पूरी पढ़नी चाहिए क्यों की इसमें हिंदी के शब्दों का उर्दू के साथ प्रयोग और गहरे भावों को सरलता से अशआरों में ढालने का हुनर अद्भुत लगा।


मुझको अना परस्त वो कहते हैं तो कहें 
क्यों सरफिरों के सामने सर को झुकाऊं मैं 

ले जा रहे हैं इसलिए मुन्सिफ़ के सामने 
मेरी खता नहीं है मगर मान जाऊं मैं 

पहलू में मेरे दिल है ये अहसास है मुझे 
तुम चाहते हो क्यों इसे पत्थर बनाऊं मैं 

मैंने या हो सकता है आपने भी ज़ाकिर भाई का कलाम या नाम न सुना पढ़ा हो लेकिन अपने शहर बीकानेर में उनकी मौजूदगी के बिना किसी नसिश्त या मुशायरे की कल्पना भी नहीं की जा सकती। अहमद अली खां जो राजस्थान उर्दू अकादमी के संस्थापक सदस्य हैं लिखते हैं कि "ज़ाकिर के निकट अलफ़ाज़ की जोड़-तोड़ या क़ाफ़िया पैमाई का नाम शायरी नहीं है, शायरी को वो अहसासो-ज़ज़्बात की भरपूर तर्जुमानी का बेहतरीन ज़रीआ समझता है, इसके शेरों में इस किस्म के अलफ़ाज़ जा-ब-जा मिलते हैं जो अलामत का काम और मा'नी की लहरें पैदा करते हैं "

उसे न घेर सकेंगे अँधेरे ग़ुरबत के 
हैं प्रज्वलित किसी घर में अगर हुनर के चिराग़ 

हमें भरोसा है इक रोज़ दूर कर देंगे 
तुम्हारे घर के अँधेरे हमारे घर के चिराग 

ये आरज़ू है कि ताज़िन्दगी रहें रोशन 
मेरी दुआओं की देहलीज़ पर असर के चिराग 

ज़माना याद रखेगा उसे हमेशा 'अदीब' 
वतन की राह में जिसने जलाये सर के चिराग

 "तुम्हारे घर के अँधेरे हमारे घर के चिराग " मिसरा अपने आप में कौमी एकता का जबरदस्त सन्देश देता है , जिस तरह इक बेहद अहम् बात को बिना लफ़्फ़ाज़ी के बहुत सरलता से 'ज़ाकिर' साहब ने बयां किया है वो बेजोड़ है।इस बात को कहने में हमारे हुक्मरां घंटो भाषण देते हुए भी असरदार ढंग से अवाम को नहीं कह पाते उसी बात को एक अच्छी शायरी एक मिसरे में कह देती है। ज़ाकिर साहब की शायरी की इस किताब में मुझे में ऐसे कई मिसरे पढ़ने में आये हैं जो सीधे दिल में उतर जाते हैं। भले ही ज़ाकिर भाई आज सोशल मिडिया के जरुरत से ज्यादा प्रचलित दौर में शामिल नहीं हैं क्यूंकि वो फेसबुक या ट्वीटर से कोसों दूर हैं लेकिन फिर भी उनकी शायरी की पहुँच दूर दूर तक है। फूल की खुशबू अपने चाहने वालों तक पहुँचने के लिए फेसबुक व्हाट्स ऐप या टवीटर की मोहताज़ नहीं होती।

इक्क्सीसवीं सदी का बहुत शोर था मगर 
इसमें किसी के चेहरे पे कुछ ताज़गी रही ? 

कांधों से सर गया अरे जाना ही था उसे 
दस्तार बच गई यही ख़ुशक़िस्मती रही 

जुगनू थे तेरी याद के हमराह इस क़दर 
जैसे सफ़र में साथ कोई रौशनी रही 

रक्खूँ न क्यों ख़्याल क़लम के वक़ार का 
अब तक मेरे क़लम से मेरी ज़िन्दगी रही 

 ज़ाकिर भाई ने क़लम के वक़ार का खूब ख़्याल रखा है तभी डा. मोहम्मद हुसैन, जो राजस्थान उर्दू अकादमी के सदस्य हैं उनके बारे में कहते हैं कि "ज़ाकिर बुनियादी तौर पर एक प्रतिरोधी शायर हैं ये प्रतिरोध राजनितिक और सामाजिक स्तर पर की जाने वाली नाइंसाफियों के ख़िलाफ़ अधिक तीव्र है। वो ज़ात के खोल में बंद नहीं हैं बल्कि समाज के दुःख दर्द से सरोकार रखते हैं। ज़ाकिर अगरचे अपनी प्रतिक्रिया को तुरंत अभिव्यक्त करते हैं फिर भी उन्हें शिकायत है कि " मैं अभी कहाँ बोला ", इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि उनके सीने में कैसे-कैसे तूफ़ान अंगड़ाई ले रहे होंगे, जिन्हें वो दबाये बैठे हैं।

जमीं निगल नहीं सकती हमें किसी सूरत 
हमारे सर पे अभी आसमान बाक़ी है 

उड़ान भरने नहीं दे रहा है अब मौसम 
परों में वरना अभी तक उड़ान बाक़ी है 

खुलेंगे राज़ कई और इस अदालत में 
मियां अभी तो हमारा बयान बाक़ी है 

अमीरे- शहर की नींदें उचाटता है "अदीब" 
अभी जो शहर में मेरा मकान बाक़ी है 

 ज़ाकिर भाई को शायरी विरासत में मिली है उनके वालिद जनाब 'रफ़ीक अहमद रफ़ीक साहब बहुत मकबूल शायर थे। जहाँ घुट्टी में मिली शायरी की बदौलत उन्होंने 18 -19 साल की उम्र से ही शेर कहने शुरू कर दिए वहीँ उन्हें जनाब दीन मोहम्मद 'मस्तान' बीकानेरी ,जनाब अहमद अली खां 'मंसूर चुरूवी और जनाब 'शमीम' बीकानेरी साहब जैसे उस्ताद मिले जिन्होंने उन्हें अपने रास्ते से कभी भटकने नहीं दिया, उनकी शायरी में जो लफ्ज़ बरतने का सलीका, नए विचारों को अपने शेरों का हिस्सा बनाने का हुनर, परम्परा का ख़्याल और नए रुझान की झलक दिखाई देती है वो इन्हीं उस्तादों की बदौलत है।

बच्चे नहीं थे घर में तो खामोश था ये घर 
लेकिन वो आये घर में तो घर बोलने लगा 

हमदर्द अपना जान लिया उसको दोस्तो 
कोई मेरे ख़िलाफ़ अगर बोलने लगा 

पतझड़ का दौर था तो वो गुमसुम खड़ा रहा 
फूटी जो कोपलें तो शजर बोलने लगा 

मैं फन के रास्ते पे था चुपचाप अग्रसर 
फिर यूँ हुआ कि मेरा हुनर बोलने लगा 

ज़ाकिर साहब के इसी हुनर का एहतराम करते हुए बीकानेर जिला प्रशासन ने उन्हें 2002 के स्वतंत्रता दिवस पर सम्मानित किया और 2011 के गणत्रंत्र दिवस पर नगर निगम बीकानेर ने उन्हें सम्मानित किया। ज़ाकिर साहब राजस्थान उर्दू अकादमी के सदस्य हैं , मस्तान अकेडमी बीकानेर के संस्थापक सदस्य हैं , कमेटी बज़्मे-मुसलमा, बीकानेर के कन्वीनर और समवेत बीकानेर संयुक्त सचिव हैं। माध्यमिक शिक्षा निदेशालय राज. बीकानेर में कार्यरत ज़ाकिर भाई बीकानेर की साहित्यिक विधियों की जान हैं. अपनी भावनाओं और एहसास को सच्चाई और ईमानदारी के साथ शेरों में ढाल कर लोगों तक पहुँचाने में सतत प्रयत्नशील रहते हैं।

अभी से किसलिए हंगामा हो गया बरपा 
हिले न लब ही मेरे मैं अभी कहाँ बोला 

जब अपने चेहरे को देखा है उसने हैरत से 
तब आईना जो बज़ाहिर है बेज़बाँ, बोला 

अमीरे-शहर की अपनी ज़बान क्या थी ''अदीब" 
वो जब भी बोला किसी ग़ैर की ज़बां बोला 

 " मैं अभी कहाँ बोला " किताब कामेश्वर प्रकाशन बीकानेर ने प्रकाशित की है जिसे आप उनके तेलीवाड़ा चौक ,बीकानेर -334005 पर लिख कर मंगवा सकते हैं या फिर इसे मंगवाने का तरीका ज़ाकिर साहब को उनके फोन न 09461012509 पर बधाई देते हुए पूछ सकते हैं। दिलकश कवर में हार्ड बाउंड वाली इस 80 पृष्ठों वाली किताब में ज़ाकिर साहब की लगभग 65 ग़ज़लें शामिल हैं। अगली किताब की तलाश में निकलने से पहले उनकी एक छोटी बहर की ग़ज़ल के ये शेर आपको पढ़वा देता हूँ :

इक दूजे के दुश्मन हैं 
साया-सहरा, पानी-आग 

सावन की ऋतु आते ही 
हो जाता है पानी आग 

सब्र के छींटे पड़ते ही 
हो गयी पानी पानी आग

Monday, July 10, 2017

किताबों की दुनिया - 133

सिर्फ बातों से ही मैं कितना भरम रक्खूँगा 
सामने आ कि मुझे होश हुआ जाता है 

कुछ तो रफ़्तार भी कछुवे की तरह है अपनी 
और कुछ वक्त भी खरगोश हुआ जाता है 

सोने वाले हमें किस्सा तो सुनाते पूरा 
यार ऐसे कहीं ख़ामोश हुआ जाता है 

जयपुर के लाजवाब शायर जनाब 'लोकेश सिंह 'साहिल' साहब ने मुझसे बातचीत के दौरान एक बार कहा कि "पुराने दौर में अगर 'ऐ नरगिसे मस्ताना ---" या " निगाहे गरामी दुआ है आपकी ---" या "हम हैं मताये कूचा --" जैसे गाने फिल्मों के लिए लिखे गए तो सिर्फ इसलिए क्यूंकि उस वक्त उर्दू मुल्क की ज़बान थी ,सरकारी या गैर सरकारी काम उर्दू में होते थे लोग उर्दू अखबार या रिसाले शौक से पढ़ते थे। आज हालात जुदा हैं आज इस तरह के गाने नहीं लिखे जा सकते क्यूंकि आज उर्दू की तो बात दूर की है लोग ढंग से हिंदी भी नहीं बोल पाते।

दरार और तिरे मेरे दरमियाँ आ जाय 
तिरी तरह जो मिरे मुँह में भी जबाँ आ जाय 

ये और बात कि खुद में सिमट के रहता हूँ 
उठाऊं हाथ तो बाहों में आसमाँ आ जाय 

मिरे पड़ोस में जलती हैं लकड़ियां गीली 
न जाने कब मिरे कमरे में धुआँ आ जाय 

ज्यादातर युवा आज जो ज़बान बोलते हैं वो न उर्दू है न हिंदी और ना ही अंग्रेजी , तभी फ़िल्मी गानों की ही नहीं कविता या शायरी की ज़बान भी बदल गयी है। इसमें कोई बुराई भी नहीं ,भाषा तो सिर्फ आपके ख्याल दूसरों तक प्रभावी रूप से पहुँचाने का माध्यम भर है अगर आप आसान समझी जा सकने वाली ज़बान में बात कहेंगे तो ज्यादा लोगों तक पहुंचेंगे और अगर आप भाषा की शुद्धि या भारी भरकम लफ़्ज़ों को बरतने को ही अहम् मानेंगे तो आपका लिखा या तो आप पढ़ेंगे या फिर आप जैसे मुठ्ठी भर लोग।"

छत दुआ देगी किसी के लिए ज़ीना बन जा 
डूबता देख किसी को तो सफ़ीना बन जा 

ज़िन्दगी देती नहीं सबको सुनहरे मौके 
तुझको अंगूठी मिली है तो नगीना बन जा 

शौक़ खुशबू में नहाने का बहुत है जो तुझे 
आ मिरे जिस्म से मिल मेरा पसीना बन जा 

मैं भी साहिल साहब की बात से सहमत हूँ और ये भी मानता हूँ -जो जरूरी नहीं सभी को मंज़ूर हो --कि सरल सीधी ज़बान में असरदार बात कहना बहुत मुश्किल हुनर है जो उस्तादों की रहनुमाई और सतत साधना से हासिल होता है।भाषा आसान हो और बात ऐसी हो की सुनने पढ़ने वाले के मुंह से अपने आप वाह निकल जाय तो ये सोने में सुहागा जैसा मामला होगा। शायरी में अचानक आये सोशल मिडिया वाले इस विस्फोटक दौर में शायरी किसी सैलाब की तरह सब को अपने आगोश में लिए हुए है। फेसबुक या व्हाट्सअप जहाँ देखो वहीँ शायरी ऐ.के फोर्टी सेवन की बन्दूक से निकली गोलियों की तरह तड़ातड़ लोगों पर दागी जा रही है। ये सुखद स्थिति भी है और दुखद भी। सुखद इसलिए क्यूंकि हमें कुछ बेहतरीन युवा और नामचीन शायरों को आसानी से पढ़ने सुनने का मौका मिल रहा है और दुखद बात -- अभी इसे जाने दीजिये इस पर चर्चा फिर कभी -- आप तो ये शेर पढ़ें : ।

तन-मन डोले, बर्तन बोले, छन-छन करता तेल है पैसा 
घर से बाहर तक की दुनिया जो भी है सब खेल है पैसा 

जेब में आकर आँख दिखाए , मूंछ बढाए , ताव धराये 
लाठी खड़के, गोली तड़के थाना-चौकी-जेल है पैसा 

तेरा है न मेरा है ये सदियों से इक फेरा है ये 
इस स्टेशन उस स्टेशन आती जाती रेल है पैसा 

जो शायर- साहिल साहब की बात को ज़ेहन में रखते हुए- आम बोलचाल की भाषा को अपनी शायरी की ज़बान बनाते हैं वो जल्द मकबूलियत हासिल कर सबके चहेते बन जाते हैं। अगर आपके पास साफ़ सुथरी ज़बान है और ख्यालों में पुख्तगी है तो फिर आपकी तरक्की को कोई नहीं रोक सकता-हमारे आज के शायर सीधी सरल भाषा में असरदार बात करने वालों की फेहरिश्त में आते हैं-- नाम है " शकील आज़मी " जिनकी देवनागरी में मंजुल पब्लिशिंग हाउस भोपाल से प्रकाशित किताब " परों को खोल " की बात हम करेंगे। "शकील" आज अदब और मुशायरों की दुनिया में एक चमकता हुआ नाम है।


हमारे गाँव में पत्थर भी रोया करते थे
यहाँ तो फूल में भी ताज़गी बहुत कम है

जहाँ है प्यास वहां सब गिलास ख़ाली हैं
जहाँ नदी है वहां तिश्नगी बहुत कम है

ये मौसमों का नगर है यहाँ के लोगों में
हवस ज़ियादा है और आशिक़ी बहुत कम है

20 अप्रेल 1971 को सहरिया ,आज़मगढ़ उत्तर प्रदेश में जन्में शकील मुंबई में रहते हैं. मात्र 13 साल की उम्र में अपनी पहली ग़ज़ल कहने वाले शकील ने अपना पहला मुशायरा जावेद अख्तर ,निदा फ़ाज़ली और बशीर बद्र जैसे दिग्गज शायरों के साथ सूरत में पढ़ा, तब वो महज़ 23 साल के थे। उस मुशायरे में शकील अपने कलाम की सादगी, ताज़गी और कहने के अंदाज़ से छा गए। उसके बाद शकील ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा। उनकी शायरी की खुशबू पूरे हिन्दुस्तान से होती हुई सरहद के पार तक पहुँचने लगी। विदेशों से बुलावों का ताँता लग गया। वो जहाँ जहाँ गए वहीँ के लोगों को अपनी शायरी का दीवाना बना दिया। ये सिलसिला बदस्तूर जारी है। कैफ़ी आज़मी साहब का ये बयान काबिले गौर है " शकील वहां से शायरी शुरू कर रहे हैं जहाँ पहुँच कर मेरी शायरी दम तोड़ने वाली है। उनकी शायरी में जो ताज़ाकारी है उसने खास तौर से मुझे मुतास्सिर किया है "

मैं अकेला कई लोगों से लड़ नहीं सकता 
इसलिए खुद से झगड़ना मिरी मजबूरी है 

वरना मर जाएगा बच्चा ही मिरे अन्दर का 
तितलियाँ रोज पकड़ना मिरी मजबूरी है 

कहाँ मिटटी का दिया और कहाँ तेज़ हवा 
जलते रहना है तो लड़ना मिरी मजबूरी है 

उर्दू के बहुत बड़े स्कॉलर "गोपी चंद नारंग" साहब ने कहा है कि " शकील आज़मी के यहाँ अहसास की जो आग नज़र आती है वो नयी नस्ल के बहुत कम शायरों यहाँ मिलती है " शकील साहब की उर्दू में "धूप दरिया" (1996 ), "ऐश ट्रे" (2000 ), "रास्ता बुलाता है "(2005 ), "ख़िज़ाँ मौसम रुका हुआ है "(2010), " मिटटी में आसमान"(2012), "पोखर में सिंघाड़े"(2014) किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं , "परों को खोल " देवनागरी में उनका पहला संकलन है। इसमें उनकी लगभग 85 ग़ज़लें ,40 के करीब नज़्में और 20 से अधिक फ़िल्मी अशआर भी संकलित हैं.
शकील की शायरी की छोटी सी बानगी प्रस्तुत करती है ये किताब, जो पाठक को उन्हें और और पढ़ने की प्यास जगा देती है। ये किताब अमेजन पर उपलब्ध है। आप चाहें तो शकील साहब को उनके मोबाईल न 9820277932 पर फोन करके मुबारक बाद देते हुए किताब पाने का आसान रास्ता पूछ सकते हैं।

परों को खोल ज़माना उड़ान देखता है 
ज़मीं पे बैठ के क्या आसमान देखता है 

कनीज़ हो कोई या कोई शाहज़ादी हो 
जो इश्क करता है कब ख़ानदान देखता है 

मैं जब मकान के बाहर क़दम निकलता हूँ 
अजब निगाह से मुझको मकान देखता है 

अपनी शायरी के छोटे से सफर में अब तक शकील साहब ने ढेरों अवार्ड हासिल किये हैं जिनमें गुजरात गौरव अवार्ड गुजरात उर्दू साहित्य अकादमी , कैफ़ी आज़मी अवार्ड , उत्तर प्रदेश उर्दू साहित्य अकादमी अवार्ड, बिहार उर्दू साहित्य अकादमी अवार्ड और महाराष्ट्र उर्दू साहित्य अकादमी अवार्ड उल्लेखनीय हैं। इन अवार्ड्स के साथ जो सबसे बड़ा अवार्ड उन्हें मिला है वो है अपने श्रोताओं और पाठकों का प्यार। वो जहाँ जाते हैं उनके दीवाने हमेशा वहां मौजूद हो जाते हैं।

फूल का शाख़ पे आना भी बुरा लगता है 
तू नहीं है तो ज़माना भी बुरा लगता है 

ऊब जाता हूँ ख़मोशी से भी कुछ देर के बाद 
देर तक शोर मचाना भी बुरा लगता है 

इतना खोया हुआ रहता हूँ ख्यालों में तिरे 
पास मेरे तिरा आना भी बुरा लगता है 

अब बिछुड़ जा कि बहुत देर से हम साथ में हैं 
पेट भर जाए तो खाना भी बुरा लगता है 

लगभग 20 सालों के छोटे से इस अदबी सफर में जो शोहरत शकील को मिली है वो किसी के लिए भी हैरत की बात हो सकती है। उनके प्रति उनके प्रशंशकों की भीड़ का राज़ है उनकी सादा बयानी , इंसानी फितरत और मसाइल से जुड़े उनके अशआर जो सबको अपने से लगते हैं।मजे की बात ये है शोहरत ने उन्हें सबका दोस्त हमदर्द और बेहतरीन इंसान बना दिया है। मुहम्मद अलवी साहब उनके लिए कहते हैं " शकील आज़मी की शायरी में उनका अपना रंग है जो दिल को भाता है ,इस कम उम्र में ये पुख्तगी बहुत कम लोगों को नसीब होती है "
शकील की ग़ज़ल के इन चंद अशआरों को आपकी नज़र कर के मैं अब निकलता हूँ अगली किताब की तलाश में :

आगे परियों का देश हो शायद
दूर तक राह में चमेली है 

अब भी सोते में ऐसा लगता है 
सर के नीचे तिरी हथेली है 

रंग के तजरबे में हमने 'शकील' 
एक तितली की जान ले ली है

Monday, July 3, 2017

किताबों की दुनिया -132

अमिताभ बच्चन की एक पुरानी फिल्म " नसीब" का ये गाना शायद नयी पीढ़ी ने न सुना हो लेकिन हम जैसे पुराने लोग इसे अब भी कभी कभी गुनगुना लेते हैं " ज़िन्दगी इम्तिहान लेती है...." ये गाना महज़ गाना नहीं एक सच्चाई है , दरअसल सच तो ये है कि ज़िन्दगी हर घड़ी इम्तिहान लेती है और मजे की बात ये है कि ये इम्तिहान सब के लिए एक सा नहीं होता ,किसी को बहुत सरल पेपर मिलता है तो किसी की किस्मत में हमेशा कठिन पेपर ही आता है। सरल पेपर वाले खुश होते हैं और कठिन पेपर वाले इम्तिहान में पास होने के तनाव में रहते हैं। लेकिन... लेकिन.... लेकिन.... कुछ लोग ज़िन्दगी के इम्तिहान में पास फेल की चिंता किये बगैर बैठते हैं और पास या फेल दोनों स्थितियों में प्रसन्न रहते हैं , ज़ाहिर सी बात है ऐसे लोग विरले ही होते हैं।

लोग हमसे पूछते हैं साथ क्या ले जाएंगे 
हाथ ख़ाली आए थे भर कर दुआ ले जाएंगे 

हाँ, बग़ावत भी करेंगे ज़िन्दगी के वास्ते 
इस मुहीम में सर हथेली पर कटा ले जाएंगे

है बहुत कुछ ख़ुल्द में, मुमकिन हुआ तो देखिये 
वापसी में साथ अपने इक ख़ुदा ले जाएंगे 
ख़ुल्द =स्वर्ग 

ख़ुल्द से अपने साथ इक खुदा को ले जाने वाले और ज़िन्दगी के इम्तिहान में पास फेल की चिंता किये बगैर हर स्थिति में मस्त रहने वाले हमारे आज के लाजवाब शायर हैं जनाब 'सुरेश स्वप्निल' साहब, लाजवाब इसलिए क्यूंकि इनकी शायरी मुझे लाजवाब लगी, उन्ही की एक छोटी सी पेपर बैक में "दखल प्रकाशन , पड़पड़ गंज दिल्ली" से छपी ग़ज़ल की किताब "सलीब तय है "की चर्चा आज हम करेंगे।


 मिट गयी तहज़ीब जबसे क़ैस-औ-फ़रहाद की 
रोज करते-तोड़ते हैं लोग वादा इश्क का 

कुछ बहारों की अना तो कुछ गुरुरे-बागबां 
आशिके-गुलशन सजाते हैं जनाज़ा इश्क का 

साफ़ कहिये आपको अब रास हम आते नहीं 
क्या ज़रूरी है किया जाए दिखावा इश्क का 

अगर कहूं कि मैं सुरेश जी को जानता हूँ तो ये बात झूठ होगी, मैं ही क्या मेरे बहुत से परिचित जो दिन रात शायरी ओढ़ते बिछाते हैं भी सुरेश जी के बारे में पूछने पर चुप्पी साध गए। ग़ज़ल के बड़े बड़े मठाधीश भी उनका नाम सुन कर बगलें झांकते नज़र आये , भला हो मेरी आदत का जिसके तहत मैं अनजान शायरों की किताब उठा कर उलटता पलटता हूँ मुझे ये किताब इसी साल के विश्व पुस्तक मेले दिल्ली में दिखाई दी जिसे मैंने उल्टा पलटा और खरीद लिया।।
उन्हें कोई जाने भी कैसे ? अत्यधिक संकोची स्वभाव के सुरेश जी को अपने आपको बेचने की कला शायद आती नहीं, तभी वो कहते हैं की " मुशायरों-कवि सम्मेलनों में लोग न बुलाते हैं, न मैं जाता हूं I " फेसबुक पर उनकी रचनाएँ और विचार जरूर पढ़ने को मिल जाते हैं।

वो आज शहंशाह सही, हम भी क्या करें 
होता नहीं है इश्क हमें ताज़दार से 

अल्लाह से कहें कि कहें आईने से हम 
उम्मीद नहीं और किसी ग़म-गुसार से 

आएँगे तिरि ख़ुल्द भी देखेंगे किसी दिन 
फ़ुर्सत कभी मिले जो ग़मे-रोज़गार से 

10 मार्च 1958 को झाँसी उत्तर प्रदेश में जन्में सुरेश साहब को ग़मे-रोज़गार से कभी फ़ुर्सत नहीं मिली ,रोज़ी-रोटी के लिए पहला जतन उन्होंने महज़ 5 (पांच) साल की उम्र में फुटपाथ पर बैठ कर भुट्टे बेचने से किया।सुरेश जी उन लोगों में शुमार रहे जिनको ज़िन्दगी ने इम्तिहान में कभी आसान सवाल नहीं दिए। उनकी क्षमताओं और धैर्य की हर पल परीक्षा ली। थोड़ा होश सँभालने पर कुछ दिन एक बैंक की केंटीन में लोगों को पानी चाय नमकीन बिस्कुट आदि पकड़ाने वाले छोटू की नौकरी की। बारह साल के सुरेश ने अपने से छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने के काम से किसी तरह गुज़ारा किया। इन सब अभावों के बावजूद उनकी आगे पढ़ते रहने की ललक कम नहीं हुई।

हम जरा और झुक गए होते 
अर्श के मोल बिक गए होते 

साथ देते तिरि हुकूमत का 
तो बहुत दूर तक गए होते 

राह की मुश्किलें गिनी होतीं 
सोचते और थक गए होते 

सच में सुरेश जी ने पीछे मुड़ कर देखा ही नहीं ,राह की मुश्किलों को याद भी नहीं रखा और आगे बढ़ते रहे। सोलह साल की उम्र में उन्होंने पत्रकारिता क्षेत्र का दामन थामा और 19 वर्ष की अवस्था में भोपाल के एक निजी विद्यालय में शिक्षक की नौकरी के साथ साथ सब्ज़ी और अखबार भी बेचे। ये सब करते हुए वो लगातार पढ़ते रहे और उन्होंने हिंदी साहित्य में एम्.ऐ के अलावा अर्थ शास्त्र में भी एम्.ऐ किया। जब 20 वर्ष के हुए तो एक बैंक में क्लर्की करना शुरू किया लेकिन उनका मन वहां रमा नहीं , जैसे तैसे लगभग दस साल वहां गुज़ारे और फिर एक दिन बैंक की नौकरी को राम राम बोल कर 1989 में पूना फिल्म इंस्टीट्यूट में निर्देशन का कोर्स करने चले गए।

तहज़ीब तिरे शह्र से कुछ दूर रुक गयी 
मिलते हैं लोग रस्म-अदाई के वास्ते 

अच्छे दिनों से क़ब्ल हमें अक़्ल आ गयी 
कासा मँगा लिया है गदाई के वास्ते 
क़ब्ल=पहले ,कासा=भिक्षा पात्र , गदाई =भिक्षा-वृत्ति 

फ़रमाने-शाह है कि सर-ब-सज्द सब रहें 
वो कत्ल कर रहे हैं भलाई के वास्ते 
सर-ब-सज्द =नतमस्तक 

रिश्वत से मुअज़्जिन की जिन्हें नौकरी मिली 
देते हैं अज़ाँ नेक कमाई के वास्ते 
मुअज़्जिन=अज़ान देने वाला 

विचारों से वामपंथी,नास्तिक और घोर अराजकतावादी सुरेश साहब ने कुछ समय पूना फिल्म संसथान में फिल्म शोध अधिकारी की नौकरी की अचानक नौकरी शब्द से मोह भांग हो गया। वो अपने बारे में कहते हैं कि " मैं एक बेहद मामूली इंसान हूं, किसी भी आम मज़दूर की तरह I फ़िलहाल, अनुवाद से रोज़ी-रोटी चला रहा हूं। "
लेखन उनका शौक है ,अभिव्यक्ति का माध्यम है । उन्होंने अब तक लगभग 300 कवितायेँ 50 के करीब व्यंग आलेख, कुछ कहानियां और तीन चार नाटक लिखे हैं। उन्होंने पहली ग़ज़ल 1975 में लिखी,बाद में 1996 में उर्दू ग़ज़लगोई की तरफ़ तवज्जो देना शुरू किया . ब्लॉग 'साझा आसमान' 2012 में और 'साझी धरती' उसके कुछ समय बाद लिखना शुरू किया.
"सलीब तय है" उनका पहला ग़ज़ल संग्रह है जिसमें उनकी मुख्य रूप से सन 2013 -14 में लिखी ग़ज़लें संगृहीत हैं।

मुश्किलें दर मुश्किलें आती रहीं 
जिस्म दिल ने कर दिया फ़ौलाद का 

मुफ़लिसी में कर रहा है शायरी 
क्या कलेजा है दिल-बर्बाद का 

वक्त मुंसिफ है, इसे मत छेड़िये 
सर कटेगा एक दिन जल्लाद का 

उनकी शायरी में वामपंथी तेवर बहुत उभर कर सामने आते हैं , व्यवस्था से उनकी सीधी टकराने की प्रवृति पढ़ने वाले को प्रभावित कर जाती है। इस किताब की लगभग 90 ग़ज़लों में से अधिकांश छोटी बहर में हैं और बहुत असरदार हैं. आज के हालात की नुमाइंदगी भी उनकी ग़ज़लें बहुत बेलौस अंदाज़ में करती हैं।

हो बात एक दिन की तो झेल लें जिगर पर 
जुल्मो-सितम ख़ुदा के दस्तूर हो न जाएँ 

सीरत से तरबियत से हैं आदतन लुटेरे 
ये रहनुमा वतन के नासूर हो न जाएँ 

अशआर पर हमारे सरकार की नज़र है 
सच बोल कर किसी दिन मंसूर हो न जाएँ 

जुझारू प्रवृति के सुरेश जी अपने बारे में आगे कहते हैं "अपनी रचनाओं के प्रसार-प्रचार के लिए कुछ नहीं करता I मित्र गण अपने पत्र-पत्रिकाओं में मेरे ब्लॉग्स से रचनाएं चुन कर छाप लेते हैं I सूचना आम तौर पर छपने के बाद मिलती है, कई बार कभी नहीं मिलती I " सुरेश जी विलक्षण प्रतिभा के धनी हैं, कविता, कहानियां, नाटक लिखने के अलावा उन्होंने दर्ज़नो नाटकों का निर्देशन किया है और कइयों में अभिनय भी। अभिनय की कार्य-शालाएं भी उन्होंने आयोजित की हैं.

लगो न शाह के मुँह ,दूर रहो हाकिम से 
ज़रा बताएं कि हम क्या करें सलाहों का

ख़्याल नेक नहीं है तिरि अदालत का 
मिज़ाज ठीक नहीं है मिरे गवाहों का 

कहीं बहार न बादे-सबा, न अच्छे दिन 
फ़रेब है हुज़ूर आपकी निगाहों का 

उनके और उनकी शायरी के बारे में मात्र एक पोस्ट में लिखना संभव नहीं। मेरी आप से गुज़ारिश है कि आप उनकी किताब "दख़ल प्रकाशन से ,08375072473 पर फोन करके मंगवाएं या सुरेश जी को मोबाइल न.09425624247 पर बधाई देते हुए इसे आसानी से मंगवाने का रास्ता पूछें।
और अब चलते चलते आप उनकी एक ग़ज़ल के कुछ शेर पढ़ते हुए अगली किताब की खोज में निकलने के लिए मुझे इज़ाज़त दें :-

अपने अंदर बच्चा रह 
गुरबानी सा सच्चा रह 

तूफाँ है पतवार उठा
गिर्दाबों से लड़ता रह
गिर्दाबों =भंवर

जिन्सों की महँगाई में 
खुशफ़हमी-सा सस्ता रह 
जिन्सों=वस्तु 

मुफ़लिस है लाचार नहीं 
सजता और सँवरता रह

‪#‎हिन्दी_ब्लॉगिंग‬

Saturday, July 1, 2017

अगर भीग जाने की चाहत नहीं है

" आया है मुझे फिर याद वो ज़ालिम ....गुज़रा ज़माना ब्लॉग्गिंग का " --- मैं तो ब्लॉग्गिंग से गया ही नहीं, बस ये गाना गाता रहा " तेरा पीछा न मैं छोडूंगा सोनिये --भेज दे चाहे जेल में " कुछ हलचल फिर से दिखाई दे रही है आज ब्लॉग्गिंग पर कितने दिन रहेगी कोई नहीं जानता --जैसे अच्छे दिन कब आएंगे कोई नहीं जानता। अब आ ही गए हैं तो एक पुरानी सी ग़ज़ल को धो पौंछ कर फिर से पेश कर रहा हूँ , पढ़ कर जो टिपियाये उसका भला और जो ना टिपियाये उसका भी भला।




नहीं है अरे ये बग़ावत नहीं है 
मुझे सर झुकाने की आदत नहीं है 

छुपाये हुए हैं वही लोग खंजर 
जो कहते किसी से अदावत नहीं है 

करूँ क्या परों का अगर इनसे मुझको 
फ़लक़ नापने की इज़ाज़त नहीं है 

इसी का नया नाम जम्हूरियत है 
यहाँ सर किसी का सलामत नहीं है 

तुम्हारे दिए ज़ख्म गर मैं भुला दूँ 
अमानत में क्या ये खयानत नहीं है 

अकेले नहीं तुम मियां इस जहाँ में 
किसे ज़िन्दगी से शिकायत नहीं है 

घटाओं का 'नीरज' भला क्या करोगे 
अगर भीग जाने की चाहत नहीं है