Monday, January 7, 2013

खार जैसे रह गए हम डाल पर

सभी पाठकों को नव वर्ष की शुभकामनाएं



सांप, रस्सी को समझ डरते रहे 
और सारी ज़िन्दगी मरते रहे 

खार जैसे रह गए हम डाल पर 
आप फूलों की तरह झरते रहे 

थाम लेंगे वो हमें ये था यकीं 
इसलिए बेख़ौफ़ हो गिरते रहे 

तिश्नगी बढ़ने लगी दरिया से जब 
तब से शबनम पर ही लब धरते रहे 

छांव में रहना था लगता क़ैद सा, 
इसलिये हम धूप में फिरते रहे 

रात भर आरी चलाई याद ने, 
रात भर ख़़ामोश हम चिरते रहे 

जिंदगी उनकी मज़े से कट गई 
रंग ‘नीरज’ इसमें जो भरते रहे


(ये ग़ज़ल श्री पंकज सुबीर जी के पारस स्पर्श से सोना हुई है )

36 comments:

सदा said...

सांप, रस्सी को समझ डरते रहे
और सारी ज़िन्दगी मरते रहे

खार जैसे रह गए हम डाल पर
आप फूलों की तरह झरते रहे
बेहद सशक्‍त भाव ... लाजवाब प्रस्‍तुति

सादर

Anita (अनिता) said...

नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ सर!:)

पूरी ग़ज़ल... बहुत ही बढ़िया !
तिश्नगी बढ़ने लगी दरिया से जब
तब से शबनम पर ही लब धरते रहे

रात भर आरी चलाई याद ने,
रात भर ख़़ामोश हम चिरते रहे ~ बहुत खूबसूरत !

~बात दिल की, दिल में ही दबकर रही
खामोश हम ... सबकी कही करते रहे...~
~सादर!!!

प्रवीण पाण्डेय said...

छाँव हमको पाश लगती,
धूप में नव आस लगती।

प्रदीप कांत said...

सांप, रस्सी को समझ डरते रहे
और सारी ज़िन्दगी मरते रहे

खार जैसे रह गए हम डाल पर
आप फूलों की तरह झरते रहे
_________________________


आज और अपने हालात को व्यक्त करते अच्छे शेर

रविकर said...

बढ़िया प्रस्तुती |
प्रभावी गजल |
शुभकामनायें भाई नीरज जी ||

दर्शन कौर धनोय said...

जिंदगी उनकी मज़े से कट गई
रंग ‘नीरज’ इसमें जो भरते रहे |"


सच कहा ..आपकी समीक्षा हमेशा साधारण को भी असाधरण बना देती है ..

"खार जैसे रह गए हम डाल पर
आप फूलों की तरह झरते रहे"

बहुत खुबसूरत

Shiv said...

छांव में रहना था लगता क़ैद सा,
इसलिये हम धूप में फिरते रहे

वाह!
एक-एक शेर बहुत बढ़िया।

नव-वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।

दिगम्बर नासवा said...

रात भर आरी चलाई याद ने,
रात भर ख़़ामोश हम चिरते रहे ...

यादों का घेरा ऐसा ही होता है ... लाजवाब शेर ... मज़ा आ गया नीरज जी ... कलाम की गज़ल है ... सुभान अल्ला ...

रविकर said...

आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति मंगलवार के चर्चा मंच पर ।।

Ashok Saluja said...

नीरज जी ..बधाई कबूलें !इस खुबसूरत गज़ल पर !
वाह!
थाम लेंगे वो हमें ये था यकीं
इसलिए बेख़ौफ़ हो गिरते रहे

शारदा अरोरा said...

badhiya lagi gazal...

रश्मि प्रभा... said...

थाम लेंगे वो हमें ये था यकीं
इसलिए बेख़ौफ़ हो गिरते रहे ...

चोट लगी तो जाना
कोई नहीं रहा अपना ...

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया said...

वाह वाह,खुबसूरत गज़ल के लिए बधाई नीरज जी,.

थाम लेंगे वो हमें ये था यकीं
इसलिए बेख़ौफ़ हो गिरते रहे ...

recent post: वह सुनयना थी,

राकेश कौशिक said...

"लाजवाब" गजल के लिए - आपको और आपकी कलम को नमन। पंकज सुबीर साहब का सादर वंदन

***Punam*** said...

वाह....
हर शेर मुकम्मल....
बहुत खूब...!

धर्मेन्द्र कुमार सिंह said...

इतनी अच्छी ग़ज़ल पर दाद दिए बगैर रहा नहीं गया।

Suman said...

सांप, रस्सी को समझ डरते रहे
और सारी ज़िन्दगी मरते रहे
सांप का भ्रम जिन्दगी को कहाँ खुलकर जीने देता है !
सुन्दर शेर है सभी लाजवाब !

Suman said...

तिश्नगी बढ़ने लगी दरिया से जब
तब से शबनम पर ही लब धरते रहे
vaah...

प्रतीक माहेश्वरी said...

"रात भर आरी चलाई याद ने,
रात भर ख़़ामोश हम चिरते रहे!"

वाह! क्या पंक्तियाँ हैं!

Kalipad "Prasad" said...

थाम लेंगे वो हमें ये था यकीं
इसलिए बेख़ौफ़ हो गिरते रहे ...
यही यकीं तो हमें गिरने की हिम्मत देती है. अति सुन्दर
New post: अहँकार

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

वाह!

Vinay Prajapati said...

अति सुंदर कृति
---
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Udan Tashtari said...

जिंदगी उनकी मज़े से कट गई
रंग ‘नीरज’ इसमें जो भरते रहे

वाह! अति सुंदर...

नीरज गोस्वामी said...

जिंदगी उनकी मज़े से कट गई
रंग ‘नीरज’ इसमें जो भरते रहे
Waaaah! achhi ghazal Neeraj ji!
Bahot Khoob!
Aalam Khursheed

नीरज गोस्वामी said...

नमस्कार नीरज जी,

आशा है आप कुशल होंगे।

"खार जैसे रह गये हम डाल पर ......" हमेशा की तरह ही बेहद खूबसूरत!


आँख के कोरों में रुक कर अश्क ये
मुस्कुराने का जतन करते रहे,


ज़िन्दगी मिसरी सी उनकी ही रहे
हम नमक की तरह बस खरते रहे!


सर्व

yashoda agrawal said...

आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 12/01/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

kanu..... said...

nav varsh ki aapko bhi shubhkamnaein sir

Onkar said...

कमाल की ग़ज़ल

Rajeev Sharma said...

bahut badiya gazal....

निहार रंजन said...

बेहतरीन ग़ज़ल.

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार said...



✿♥❀♥❁•*¨✿❀❁•*¨✫♥
♥सादर वंदे मातरम् !♥
♥✫¨*•❁❀✿¨*•❁♥❀♥✿


रात भर आरी चलाई याद ने
रात भर ख़़ामोश हम चिरते रहे

वाह ! वाऽह ! वाऽऽह !
क्या बात है !
आदरणीय नीरज जी
बहुत बढ़िया ग़ज़ल !
हमेशा की ही तरह बहुत सुंदर !


बधाई एवं
हार्दिक मंगलकामनाएं …
लोहड़ी एवं मकर संक्रांति के शुभ अवसर पर !

राजेन्द्र स्वर्णकार
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tbsingh said...

good ghazal

Maheshwari kaneri said...

बहुत खुबसूरत गजल..

प्रदीप कांत said...

सांप, रस्सी को समझ डरते रहे
और सारी ज़िन्दगी मरते रहे

खार जैसे रह गए हम डाल पर
आप फूलों की तरह झरते रहे

____________________________


Badhia

नीरज गोस्वामी said...

छांव में रहना था लगता क़ैद सा,
इसलिये हम धूप में फिरते रहे
ab to uncle 45degree ki garmee men bhee sadkon men swantra ghuma karenge.. aur aapaka ye sher yaad karenge.. sadhuwaad..

रात भर आरी चलाई याद ने,
रात भर ख़ामोश हम चिरते रहे
karvaten badalate huve katane walee raten yaad aayee..

जिंदगी उनकी मज़े से कट गई
रंग ‘नीरज’ इसमें जो भरते रहे

Aise chitere hain Hamare Neeraj Uncle.. aanand aa gaya.. Sadhuwaad.

aapaka
Vishal

shorya Malik said...

रात भर आरी चलाई याद ने,
रात भर ख़़ामोश हम चिरते रहे


शुभकामनायें भाई नीरज जी ||