Monday, October 10, 2011

पत्तों सा झड़ जाना क्या



( ये ग़ज़ल आपा "मरयम गज़ाला" जी को समर्पित है जो अब हमारे बीच नहीं हैं )


समझेगा दीवाना क्या
बस्ती क्या वीराना क्या

ज़ब्त करो तो बात बने
हर पल ही छलकाना क्या

हार गए तो हार गए
इस में यूँ झल्लाना क्या

दुश्मन को पहचानोगे ?
अपनों को पहचाना क्या

दुःख से सुख में लज्ज़त है
बिन दुःख के सुख पाना क्या ?

इसका खाली हव्वा है
दुनिया से घबराना क्या

फूलों की तरहा झरिये
पत्तों सा झड़ जाना क्या

किसने कितने घाव दिये
छोडो भी, गिनवाना क्या

'नीरज' सुलझाना सीखो
मुद्दों को उलझाना क्या





(तुकबंदी को ग़ज़ल में परिवर्तित करने का श्रेय गुरुदेव पंकज सुबीर जी को जाता है)

68 comments:

यादें....ashok saluja . said...

सुंदर और सच्चा सन्देश ....देती आप की प्यारी
गज़ल!!
दुश्मन को पहचानोगे ?
अपनों को पहचाना क्या
शुभकामनाएँ!

वन्दना said...

वाह वाह किन लफ़्ज़ो मे तारीफ़ करूँ …………गज़ब के ख्यालात पेश किये है……………बेहतरीन देखन मे छोटे लगे घाव करे गंभीर्।

saurabh she. said...

Neeraj jee chhote bahar ki lajawaab ghazal.Anand aa gaya padha kar.

घनश्याम मौर्य said...

फूलों की तरह झरिये, पत्‍तों सा झड़ जाना क्‍या। खूबसूरत ख्‍यालातों में ढले हुए अशआर। बेहतरीन गजल।

Rajeev Bharol said...

नीरज जी,
गजब की गज़ल कही है... लाजवाब!
एक भी शेर ऐसा नहीं जो किसी दूसरे शेर से रत्ती भर भी कम हो और हर शेर के बाद मुंह हसे वाह निकलती है.

शारदा अरोरा said...

bahut badhiya ....

सदा said...

फूलों की तरहा झरिये
पत्तों सा झड़ जाना क्या

किसने कितने घाव दिये
छोडो भी, गिनवाना क्या
वाह ...बहुत खूब कहा है आपने ..आभार ।

रश्मि प्रभा... said...

दुश्मन को पहचानोगे ?
अपनों को पहचाना क्या

दुःख से सुख में लज्ज़त है
बिन दुःख के सुख पाना क्या ?

इसका खाली हव्वा है
दुनिया से घबराना क्या
....
tareefekabil

ओमप्रकाश यती said...

bahut achchhee ghazal..badhaai.

S.N SHUKLA said...

बहुत सुन्दर , सादर

प्रवीण पाण्डेय said...

'नीरज' सुलझाना सीखो
मुद्दों को उलझाना क्या

काश यही सब सीख जायें।

Suman said...

बहुत सुंदर गजल !
फूलों की तरह झरिये
पत्तों सा झड जाना क्या !
वाह क्या बात है .....

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

बहुत उम्दा सर,
मतला तो वाह वाह... आनंद आ गया...
समझेगा दीवाना क्या
बस्ती क्या वीराना क्या

दुश्मन को पहचानोगे ?
अपनों को पहचाना क्या
यह शेर विशेष रूप से पसंद आया...
इस उम्दा ग़ज़ल के लिए सादर बधाई सर...

रविकर said...

अपनों को पहचाना क्या ??

बहुत सुन्दर प्रस्तुति ||
बधाई स्वीकार करें ||

अनूप शुक्ल said...

तुक बंदी और गजल दोनों चकाचक हैं जी!

मान जाऊंगा..... ज़िद न करो said...

छोटी बहर की बेहतरीन ग़ज़ल... किस शेर का जिक्र करें और किसे छोड़ें.... लाजवाब....

डॉ टी एस दराल said...

फूलों की तरहा झरिये
पत्तों सा झड़ जाना क्या

कम शब्दों में भावपूर्ण ग़ज़ल ।

Suman Dubey said...

नवीन जी नमस्कार, बहुत सुन्दर रचना -फूलों से झरिये -------

Suman Dubey said...

नीरज जी क्षमा कीजिएगा,ऊपर आपका नाम गलत छ्प गया है।

Mansoor Ali said...

सुन्दर गज़ल, # "दुख से सुख मे लज्ज़त है,
बिन दुख के सुख पाना क्या?"

दुरुस्त फर्माया, एक भूला हुआ शेर याद दिल दिया:-

"मायूसे इन्बिसात रहेगा तमाम् उम्र,
वो दिल जो इस ज़माने मे मानुसे ग़म नही."
------------------------

# "किसने कितने घाव दिये
छोडो भी, गिनवाना क्या"

'नीरज' क्या-क्या लिख बैठे !
फिर टूता पैमाना क्या ?
http://aatm-manthan.com

जयकृष्ण राय तुषार said...

बेहतरीन गज़ल कहने के लिए आपको बहुत -बहुत बधाई भाई नीरज जी

मुदिता said...

नीरज जी ,
छोटे बहर की उम्दा गज़ल..हर शे'र पे दिल से वाह निकलती है..बहुत बधाई

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है! आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

मनोज कुमार said...

यह ग़ज़ल दिल के साथ दिमाग में भी जगह बनाती है।

इस्मत ज़ैदी said...

दुश्मन को पहचानोगे ?
अपनों को पहचाना क्या

दुःख से सुख में लज्ज़त है
बिन दुःख के सुख पाना क्या ?

छोटी बहर को बहुत ख़ूबसूरती से निभाया है आप ने
बधाई

mahendra verma said...

किसने कितने घाव दिये
छोडो भी, गिनवाना क्या

जवाब नहीं, शानदार ग़ज़ल , दिल से लिखी है आपने।
बधाई नीरज साहब।

kanu..... said...

चर्चा मंच के माध्यम से यहाँ तक पहुंची आपकी ये रचना पढ़कर बहुत अच्छा लगा

तिलक राज कपूर said...

इतनी छोटी बह्र में शब्‍दों को सही-सही जगह बिठाना, उस्‍तादाना काम है।
बहुत से नये विचार और नये काफि़ये लिये खूबसूरत ग़ज़ल के लिये बधाई।

नीरज गोस्वामी said...

E-mail received from Janab Alam Khursheed sahab:-

Bahot Khoob Neeraj Ji!
Chhoti behr men
achhe she'r bahot rawani se hue hain.
Mubarakbad!
Alam Khursheed

parul singh said...

gajal ke sabhi sher kabile tarif hai
mariyam ji ke liye sun kar dukh hua aap hi se unke bare malum hua tha

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" said...

charcha manch ke madhyam se aap tak pahunchna hua,,,jeewan me sfurti bharti ..ek jaandaar shandar ghazal..har ashaar me nootan pan..khaylon me tajgi..sadar badhayee aaur amantran ke sath

अनुपमा पाठक said...

इसका खाली हव्वा है
दुनिया से घबराना क्या

बेहद सुन्दर!

दर्शन कौर said...

दुश्मन को पहचानोगे ?
अपनों को पहचाना क्या
bahut hi khubsurti se ise kaha hei ..niraj ji aapka bahut -bahut dhanywad ..

Navin C. Chaturvedi said...

छोटी बहर पर ग़ज़ल कहना दुष्कर होता है, उस पर भी सार्थक ग़ज़ल कहना। बहुत बहुत बधाई।

M VERMA said...

फूलों की तरहा झरिये
पत्तों सा झड़ जाना क्या

बहुत खूब

shikha varshney said...

फूलों की तरहा झरिये
पत्तों सा झड़ जाना क्या
वह ..बेहतरीन सन्देश देती रचना..

mark rai said...

हार गए तो हार गए
इस में यूँ झल्लाना क्या.........
.har fikr ko dhuyen me udata chala gaya .....bahut bahut bahut ....achchi rachna NITAJ JEE....

इमरान अंसारी said...

सुभानाल्लाह ........वाह....वाह......हर शेर बेहतरीन.....मुकम्मल ग़ज़ल के लिए दाद आपको|

योगेश शर्मा said...

bahut hi badiya,Gazal, bahar..jo bhi hai ye khudaa ki kasam lajawaab hai

Babli said...

दुश्मन को पहचानोगे ?
अपनों को पहचाना क्या
दुःख से सुख में लज्ज़त है
बिन दुःख के सुख पाना क्या ?
बहुत सुन्दर और सटीक पंक्तियाँ! लाजवाब ग़ज़ल!

सतीश सक्सेना said...

नीरज भाई !
यह बेहतरीन रचना संग्रहणीय रहेगी ! एक एक लाइन दिल को छू लेती है ! इस खूबसूरत और प्रभावी रचना के लिए बधाई स्वीकार करें !
सादर !

Maheshwari kaneri said...

बहुत खूबसूरत और बेहतरीन रचना ....बधाई

हास्य-व्यंग्य का रंग गोपाल तिवारी के संग said...

bahut hi behtarin gazal jo saral evm bhodhgamya hai.

रविकर said...

समय चाहिए आज आप से,
पाई फुर्सत बाढ़ - ताप से |
परिचय पढ़िए, प्रस्तुति प्रतिपल,
शुक्रवार के इस प्रभात से ||
टिप्पणियों से धन्य कीजिए,
अपने दिल की प्रेम-माप से |
चर्चा मंच

की बाढ़े शोभा ,
भाई-भगिनी, चरण-चाप से ||

आशा जोगळेकर said...

ज़ब्त करो तो बात बने
हर पल ही छलकाना क्या

हार गए तो हार गए
इस में यूँ झल्लाना क्या

दुश्मन को पहचानोगे ?
अपनों को पहचाना क्या

दुःख से सुख में लज्ज़त है
बिन दुःख के सुख पाना क्या ?


बेहद सुंदर ।

किस को चुनें किसको छोडें
मोती में चुनवाना क्या ।

prerna argal said...

किसने कितने घाव दिये
छोडो भी, गिनवाना क्या

'नीरज' सुलझाना सीखो
मुद्दों को उलझाना क्या
क्या बात है नीरज जी बहुत ही अच्छे शब्दों में लिखी बहुत ही गहराई लिए हुए शानदार रचना बहुत बहुत बधाई आपको /
मेरी नई पोस्ट पर आपका स्वागत है /जरुर पधारें /
www.prernaargal.blogspot.com

dheerendra11 said...

किसने कितने घाव दिए
छोडो भी गिनवाना क्या,
बहुत ही सुंदर गजल जो मेरे दिल को भा गई,
लगता इसे आपने बड़े दिल से लिखा है तभी तो इसमें आपके मन के भावनाओ की झलक दिखाई
पडती है,बधाई...
अगर समय निकाल सके तो मेरे ब्लॉग आइये आपका स्वागत है....

Udan Tashtari said...

मरयम गज़ाला जी के बारे में सुन कर दुख हुआ...शायद मुम्बई में आपके साथ ही मुलाकात हुई थी...


गज़ल बहुत उम्दा है.

Harshad Jangla said...

Very nice gazal.....

-Harshad Jangla
Atlanta, USA

Rohitas ghorela said...

Aap ki ye Gajal badi kamal ki hai or ye aakyee sochane par majboor karti h....

Thank You So Much

निवेदिता said...

फूलों की तरहा झरिये
पत्तों सा झड़ जाना क्या
.....बहुत उम्दा

नीरज गोस्वामी said...

Comment received from Sh. Vishal Mishra:-

मरयम आपा को आदरांजलि! (शायद इसीलिए आपके ब्लॉग पर आज 17 अक्टूबर सोमवार दिखाई नहीं दिया)।

अंकल, जिस विधा को आप श्रेष्ठ और दुष्कर मानते हैं, आपने फिर उसे मात दे दी। साधुवाद, बधाई!!

~ Vishal

Shiv said...

मरयम गजाला जी नहीं रहीं, यह जानकार दुःख हुआ. आपने अपने ब्लॉग पर उनके बारे में एक से ज्यादा पोस्ट लिखी हैं. आपके ब्लॉग पर उनकी गजलें के जरिये ही उन्हें जाना.

यह ग़ज़ल बहुत खूबसूरत है. छोटी बहर में आपकी शानदार गजलें पढ़कर अब आश्चर्य नहीं होता. ग़ज़ल की विधा को आप अपनी हथेलियों जितना जानते हैं. और जैसा कि मैं हर बार लिखता हूँ, हर ग़ज़ल जीवन जीने का तरीका सिखाती है.

हास्य-व्यंग्य का रंग गोपाल तिवारी के संग said...

दुश्मन को पहचानोगे ?
अपनों को पहचाना क्या

Kya khoob aapne likha hai, wastwkita ka bodh karati rachna

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

दुश्मन को पहचानोगे ?
अपनों को पहचाना क्या
......behtareen sher
........umda gazal

सदा said...

कल 19/10/2011 को आपकी कोई एक पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है . धन्यवाद!

दिगम्बर नासवा said...

दुश्मन को पहचानोगे ?
अपनों को पहचाना क्या

दुःख से सुख में लज्ज़त है
बिन दुःख के सुख पाना क्या ?
वाह नीरज जी ... दुःख के बुना तो सुख वैसे भी नहीं आता ...

इसका खाली हव्वा है
दुनिया से घबराना क्या
सच है जितना दुनिया से डरो वो उतना ही डराती है ...

फूलों की तरहा झरिये
पत्तों सा झड़ जाना क्या
ये तो कमाल का शेर है ... काश इंसान भी फूलों की तरह ही झरता ...

किसने कितने घाव दिये
छोडो भी, गिनवाना क्या
ये तो धमाका है ... घाव गिनवाने की बजाये छुपाना जरूरी है ...

नीरज जी ... हर शेर अलग अंदाज़ का है ... और आपके फन का तो वैसे भी जवाब नहीं ...

प्रतीक माहेश्वरी said...

वाह वाह! क्या खूब ग़ज़ल है..

"दुश्मन को पहचानोगे ?
अपनों को पहचाना क्या"
बेजोड़!

आभार

Ankur jain said...

sundar gazal....bhavpurn rachna...

Onkar said...

bahut komal, bahut sundar

Harsh said...

bahut khoob sir..........

Amrita Tanmay said...

हर्फ़-दर-हर्फ़ ..बेहतरीन

निर्मला कपिला said...

किसने कितने घाव दिये
छोडो भी, गिनवाना क्या
वाह हर एक शेर दिल को छूता हुआ\ बधाई सुन्दर गज़ल के लिये।

vandana said...

बहुत सुन्दर गज़ल

monali said...

Behad khubsoorat ghazal..
ज़ब्त करो तो बात बने
हर पल ही छलकाना क्या
yehi seekhne ki koshish me hain..

अंकित "सफ़र" said...

मरियम आपा से पहली दफा मुझे आपने ही मिलवाया था और वो मुलाकात यादगार है. सहज, शांत, स्वभाव की वो शख्सियत बीमारी और उम्र को धता बताते हुए हर काव्य-संध्या में ग़ज़ल का शहद घोल देती थी. ईश्वर उनकी आत्मा को शान्ति दे.

अंकित "सफ़र" said...

सर जी, मतला बहुत अच्छा कहा है.
जब्त करो तो..................वाह वा
हार गए तो................सीधा-साधा और सधा हुआ
दुश्मन को.............वाह वा
दुःख से सुख में............लाजवाब शेर, लाजवाब कहन
फूलों की तरह.......हासिल-ए-ग़ज़ल शेर. तालियाँ ही तालियाँ

मज़ा आ गया सर. बहुत बहुत बधाइयाँ.

दीपिका रानी said...

पहली बार आपके ब्लॉग पर आई। आपकी ग़ज़लें पढ़कर मज़ा आ गया।