Thursday, October 9, 2008

शब्दों के जादूगर



मैं उन्हें व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता...लेकिन क्या हम उन्हें भली भांति जानते हैं जिनसे हमारा व्यक्तिगत परिचय होता है?...आप कितना भी अपने आप को भुलावा दें आप को इसका उत्तर "नहीं" में ही मिलेगा. किसी को जानने या पहचानने के लिए उसका भौतिक रूप महत्वपूर्ण नहीं है. कोई बिना देखे, मिले भी अपना सा लगने लगता है...शब्दों के जादूगर राकेश जी के बारे में भी येही बात सच है. अगर कभी खुशनसीबी से वो सामने आ जायें तो मैं उन्हें शायद पहचान ना पाऊं लेकिन अगर उन्होंने आवाज दी जो जरूर पहचान लूँगा.

खोपोली में एक दिन देर रात मोबाइल बजा...देखा तो कोई अपरिचित नंबर था..हेल्लो कहने पर आवाज आयी "क्या नीरज गोस्वामी बोल रहे हैं?" मैंने कहा "हाँ" तो हँसते हुए किसी ने कहा "नमस्कार मैं राकेश खंडेलवाल बोल रहा हूँ वाशिंगटन से...आप को देर रात डिस्टर्ब तो नहीं किया ना "...मैं आसमान से गिरा और खजूर पर भी नहीं अटक पाया...हतप्रभ मेरी आवाज ही नहीं निकली. राकेश जी की रचनाएँ मैं लगातार उनके ब्लॉग "गीत कलश" पर पढता आया था और उनके शब्द और भाव कौशल का दीवाना था. ब्लॉग पर इतने उच्च स्तर की काव्य रचनाएँ अन्यत्र मिलनी असंभव हैं. औपचारिकता पहले दो एक संवादों की गर्मी से बर्फ सी पिघल गयी और फ़िर उसके बाद हमने खूब देर तक ढेरों विषयों पर बातें की.

इसके बाद अब उनका फ़ोन यदा कदा आता रहता है और वे अपने और मेरे बारे में बताते पूछते रहते हैं. उनकी रोज मर्रा की बातों में भी काव्य झरता है और दिल करता है की उन्हें बस सुनते ही रहें. माँ सरस्वती उनकी वाणी से प्रकट होती है.

राकेश जी का लेखन अद्भुत है. काव्य की सरिता कल कल करती उनकी लेखनी से जब बहती है तो पढने वाले उसके साथ बह कर आनंद की अतल गहराईयों में डूब डूब जाते हैं. उनके बिम्ब पाठकों को उन ऊचाइयों पर ले जाते हैं जहाँ उनकी कल्पनाएँ भी नहीं पहुँच पातीं. आज के इस आपाधापी भरे दौर में जब इंसान पत्थर सा संज्ञा शून्य हो चला है उसमें अपनी कविताओं से संवेदनाएं जगाना किसी भागीरथी प्रयास से कम नहीं है. राकेश जी ये प्रयास अनवरत कर रहे हैं. उनसा प्रतिभाशाली कवि आज ढूंढ़ना इतना सहज नहीं है. अपनी रचनाओं से उन्होंने न केवल ब्लॉग जगत को बल्कि हिन्दी साहित्य को भी समृध्द किया है.

बरसों के इन्तेजार के बाद अब उनकी एक पुस्तक शीघ्र ही पाठकों के हाथ में होगी. उनकी इस पुस्तक " अँधेरी रात का सूरज " के प्रकाशन की जिम्मेवारी आदरणीय पंकज सुबीर जी ने उठा कर हम सब काव्य प्रेमियों पर बहुत बड़ा उपकार किया है. यकीन है की उनकी ये पुस्तक हमारे जीवन के अनदेखे अंधियारों में हमें सूर्य बन कर राह दिखाईयेगी. ग्यारह अक्तूबर को सीहोर और वाशिंगटन में होने वाले विमोचन समारोह की अग्रिम बधाई मैं भाई राकेश जी और गुरुदेव पंकज जी को देता हूँ.मेरी हार्दिक अभिलाषा है की इस पुस्तक को हिन्दी, विशेष रूप से हिन्दी काव्य के प्रेमी अवश्य खरीद कर पढ़ें. पुस्तक प्राप्ति के लिये आप पंकज सुबीर जी से 09977855399 पर संपर्क करें.

32 comments:

फ़िरदौस ख़ान said...

आपकी पोस्ट से अच्छी जानकारी मिली...शुक्रिया...

रंजना [रंजू भाटिया] said...

राकेश जी की कविताएं सदैव ही प्रेरित करती हैं ...बहुत बहुत बधाई

शोभा said...

बहुत उपयोगी जानकारी दी है. आभार.

ताऊ रामपुरिया said...

बहुत बढिया जानकारी दी ! सुबह ही समीरजी के ब्लॉग पर इसकी जानकारी मिली थी ! और अभी आपने राकेश जी seनिजी
मुलाक़ात करवा कर इस अवसर की गरिमा और बढ़ा दी ! आपको दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएं !

रश्मि प्रभा said...

क्या हम उन्हें भली भांति जानते हैं जिनसे हमारा व्यक्तिगत परिचय होता है?...आप कितना भी अपने आप को भुलावा दें आप को इसका उत्तर "नहीं" में ही मिलेगा. किसी को जानने या पहचानने के लिए उसका भौतिक रूप महत्वपूर्ण नहीं है. कोई बिना देखे, मिले भी अपना सा लगने लगता है...
aapki in baaton ne mujhe prabhawit kiya........rakesh ji se baatchit ka anubhaw mahsoos kar sakti hun,unki pustak ki jaankari ke liye shukriyaa

अशोक पाण्डेय said...

राकेश खंडेलवाल जी को उनकी पुस्‍तक के लिए हार्दिक बधाई। यह उत्‍साहवर्धक लेख को पढ़कर अच्‍छा लगा।

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

तीर स्नेह-विश्वास का चलायें,
नफरत-हिंसा को मार गिराएँ।
हर्ष-उमंग के फूटें पटाखे,
विजयादशमी कुछ इस तरह मनाएँ।

बुराई पर अच्छाई की विजय के पावन-पर्व पर हम सब मिल कर अपने भीतर के रावण को मार गिरायें और विजयादशमी को सार्थक बनाएं।

Parul said...

ब्लॉग पर इतने उच्च स्तर की काव्य रचनाएँ अन्यत्र मिलनी असंभव हैं...puurn sahmati meri bhii

Udan Tashtari said...

बिल्कुल सही कहा-काव्य प्रेमियों को यह पुस्तक जरुर खरीदना चाहिये.

आपके द्वारा किए टिप्पणी निवेदन को आदेश मानते हुए आपकी शुभकामनाऐ‍ राकेश जी तक पहुँचा दूँगा. :०

विजयादशमी की शुभकामनाऐं.

पंकज सुबीर said...

राकेश जी के बारे में नीरज जी लिख रहे हैं तो फिर मंत्रमुग्‍ध होकर पढ़ने के इलावा किया ही क्‍या जा सकता है ।

Gyandutt Pandey said...

एक कवि की दूसरे कवि से यह वार्ता! आपका लिखा पढ़ना अच्छा लगा।

अंकित "सफ़र" said...

एक शब्दों के जादूगर का दूसरे जादूगर के बारे में बातों बातों में सारी बात कह देना.
मुझे इंतज़ार है उनकी पुस्तक का.

मीत said...

हार्दिक शुभकामनाएं राकेश जी को. और शुक्रिया आप का इस पोस्ट के लिए.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

हमारे कविराज राकेश जी को पुस्तक प्रकाशन पर बशाई और आप दोनोँ को विजया दशमी की शुभकामनाएँ भेज रही हूँ ........
स स्नेह्,
लावण्या

pallavi trivedi said...

अच्छी जानकारी दी आपने...ज़रूर पढेंगे ये किताब!दशहरे की शुभकामनाएं.....

anitakumar said...

इतनी तारीफ़, तब तो हम चले पंकज की ढूंढने , भई, अपनी कॉपी भी तो बुक करवानी है न कहीं उसके पहले ही खत्म हो गयी तो, क्या कहा, आप बता देगें पंकज जी को, थैंक्यु, थैंक्यु।

मीत said...

आदरणीय राकेश जी को बधाई. आप का शुक्रिया. और हर किसी को विजयदशमी की शुभकामनाएं.

seema gupta said...

"heartiest congrates and good luck to Mr rakesh jee for publishing his book, and thanks for sharing with us..'

regards

ज़ाकिर हुसैन said...

बहुत उपयोगी जानकारी दी है. आभार

कंचन सिंह चौहान said...

Parul ki tarah

ब्लॉग पर इतने उच्च स्तर की काव्य रचनाएँ अन्यत्र मिलनी असंभव हैं.

is se purna sahamat hu.n

योगेन्द्र मौदगिल said...

असाधारण एवं विलक्षण राकेश जी को बधाई
और आपको इस प्रस्तुति के लिये बधाई

रविकांत पाण्डेय said...

एक जादूगर दूसरे जादूगर के बारे में लिखे ...ऐसा लगता हो जैसे दो आईने आमने-सामने रख दिये गये हों ।

जितेन्द़ भगत said...

ब्‍लॉग में साहि‍त्‍य के प्रति‍ रूझान पैदा करने के लि‍ए आपका शुक्रि‍या। उपयोगी जानकारी।

Dev said...

Mere jeevan me Neeran Naam ka bahut mahtva raha hai, maine kavita samjhani, padhani aur man ke bhavon ko sabdon me likhana Mahan kavi Gopal Das "Niraj" ji se sikhi hai...aur ab mere jeevn me ek aur Niraj ka Prabhav pad raha hai, mai aap se sikh raha hoon ki kaise bate sahi dhang se prastut ki jaati hai, kahi jati hai....
Aadradiy rakesh ji ko badhi aur sath me aap ko bhi...

Aapke sneh ka aakanchhi..
Devesh

गौतम राजरिशी said...

...आपने कुछ इस तरह से तारिफ की है कि जाने कितने दिनों तक नशे में रहने वाला हूँ नीरज जी.बस आपलोगों का आशिर्वाद बनें रहने दें...

सतीश सक्सेना said...

बहुत अच्छा लिखा है नीरज भाई !

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

जानकारी के लिये आभार!
राकेश जी को बधाई!

swati said...

हार्दिक शुभकामनाएं राकेश जी को......आपको दशहरे की हार्दिक शुभकामनाएं !

PREETI BARTHWAL said...

नीरज जी आप बिलकुल सही कह रहे कि जिनसे हमारा व्यक्तिगत परिचय होता है हम सभी को अच्छे से नही जानते है। मिले बिना भी कभी कभी कोई अपना लगने लगता है।

अभिषेक ओझा said...

परिचय और जानकारी के लिए आभार.

राकेश खंडेलवाल said...

इतनी सारी शुभकामनायें, इतना अपनापन और बिखरते हुए शब्द हाथ में पकड़े
व्यस्तताओं से जूझता मैं. यद्यपि मेरा प्रयास होता है कि सभी को व्यक्तिगत
तौर पर संदेशों के उत्तर लिखूँ. इस बार ऐसा होना संभव प्रतीत नहीं हो रहा है
इसलिये सभी को सादर प्रणाम सहित आभार व्यक्त कर रहा हूँ. भाई समीरजी,
पंकज सुबीरजी, सतीश सक्सेनाजी. नीरज गोस्वामी जी, कंचन चौहान जी,
गौतमजी, रविकान्तजी, मीतजी, राजीव रंजन प्रसादजी, पारुलजी संजय पटेलजी.अभिनव शुक्लजी,स्वातिजी
पुष्पाजी, मोनिकाजी, रमेशजी, रंजनाजी, रंजूजी, सीमाजी,अविनाशजी,फ़ुरसतियाजी,
लवलीजी,अजितजी,योगेन्द्रजी,पल्लवीजी,लावण्यजी,शारजी,संगीताजी,अनुरागजी,मोहनजी,
तथा अन्य सभी मेरे मित्रों और अग्रजों को अपने किंचित शब्द भेंट कर रहा हूँ

मन को विह्वल किया आज अनुराग ने
सनसनी सी शिरा में विचरने लगी
डबडबाई हुई हर्ष अतिरेक से
दॄष्टि में बिजलियाँ सी चमकने लगीं
रोमकूपों में संचार कुछ यूँ हुआ
थरथराने लगा मेरा सारा बदन
शुक्रिया लिख सकूँ, ये न संभव हुआ
लेखनी हाथ में से फ़िसलने लगी

आपने जो लिखा उसको पढ़, सोचता
रह गया भाग्यशाली भला कौन है
आपके मन के आकर निकट है खड़ा
बात करता हुआ, ओढ़ कर मौन है
नाम देखा जो अपना सा मुझको लगा
जो पढ़ा , टूट सारा भरम तब गया
शब्द साधक कोई और है, मैं नहीं
पूर्ण वह, मेरा अस्तित्व तो गौण है

जानता मैं नहीं कौन हूँ मैं, स्वयं
घाटियों में घुली एक आवाज़ हूँ
उंगलिया थक गईं छेड़ते छेड़ते
पर न झंकॄत हुआ, मैं वही साज हूँ
अधखुले होंठ पर जो तड़प, रह गई
अनकही, एक मैं हूँ अधूरी गज़ल
डूब कर भाव में, पार पा न सका
रह गया अनखुला, एक वह राज हूँ

आप हैं ज्योत्सना, वर्त्तिका आप हैं,
मैं तले दीप के एक परछाईं हूँ
घिर रहे थाप के अनवरत शोर में
रह गई मौन जो एक शहनाई हूँ
आप पारस हैं, बस आपके स्पर्श ने
एक पत्थर छुआ और प्रतिमा बनी
आपके स्नेह की गंध की छाँह में
जो सुवासित हुई, मैं वो अरुणाई हूँ.

सादर

राकेश खंडेलवाल

बालकिशन said...

बधाई.
बधाई.
बधाई.