Monday, January 21, 2008

मैं तन्हा हूँ समंदर में



तुम्हे जो याद करता हूँ तो अक्सर गुनगुनाता हूँ
हमारे बीच की सब दूरियों को यूँ मिटाता हूँ

इबादत के लिए तुम ढ़ूंढ़ते फिरते कहाँ रब कों
गुलों कों देख डाली पर मैं अपना सर झुकाता हूँ

नहीं औकात अपनी कुछ मगर ये बात क्या कम है
मैं सूरज कों दिखाने को सदा दीपक जलाता हूँ

मुझे मालूम है तुम तक नहीं आवाज़ पहुँचेगी
मगर तन्हाईयों में मैं तुम्हे अक्सर बुलाता हूँ

मैं तन्हा हूँ समंदर में मगर डरता नहीं यारों
जो कश्ती डगमगाती है तुझे मैं साथ पाता हूँ

अँधेरी सर्द रातों में ठिठुरते उन परिंदों कों
अकेले देख कर कीमत मैं घर की जान जाता हूँ

घटायें, धूप, बारिश, फूल, तितली, चांदनी "नीरज"
इन्ही में दिल करे जब भी तुझे मैं देख आता हूँ

16 comments:

  1. बहुत खूबसूरत गजल....एक-एक शेर लाजवाब. इतनी सुंदर गजल याद रहेगी...हमेशा.

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  2. वाह! वाह! वाह!
    जबरदस्त! सुंदर! अति सुंदर!
    आप छा गए हो.
    निफ्टी और सेंसेक्स का गम भूल गए हम तो. कल भी आईयेगा.

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  3. ये पक्तियाँ विशेष रूप से पसन्द आयी।


    नहीं औकात अपनी कुछ मगर ये बात क्या कम है
    मैं सूरज कों दिखाने दिन में भी दीपक जलाता हूँ

    वाह क्या कहने

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  4. यह जिनके विषय में लिखा है आपने - उन्ही से मिलने का अभियान है यह जीवन। आपने बहुत सरलता से लिख दिया। हम तो पूरी फिलासफराना भाषा छांट कर भी यह नहीं कह सकते।
    बहुत सुन्दर।

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  5. मुझे मालूम है तुम तक नहीं आवाज़ पहुँचेगी
    मगर तन्हाईयों में मैं तुम्हे अक्सर बुलाता हूँ

    मुझे विदित है स्वर की सीमा द्वार तुम्हारे तक जाती है
    लेकिन क्या तुम सुन पाते हओ जो यह वाणी कह जाती है ?

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  6. मुझे मालूम है तुम तक नहीं आवाज़ पहुँचेगी
    मगर तन्हाईयों में मैं तुम्हे अक्सर बुलाता हूँ

    ध्रिष्ट्ता के लिए माफ़ी चाहूंगी.पर आपकी इस बात से मैं इत्तेफाक नही रखती.यह अपने विश्वाश पर संदेह करना हुआ.नही??
    बाकि सारी बातें अति सुंदर,मनमोहक............

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  7. बहुत सुन्दर लिखा हे ।
    घुघूती बासूती

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  8. तुम्हे जब याद करता हूँ मैं अक्सर गुनगुनाता हूँ
    हमारे बीच की इन दूरियों को यूँ मिटाता हूँ
    बहुत खूबसूरत गज़ल है.

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  9. मुझे मालूम है तुम तक नहीं आवाज़ पहुँचेगी
    मगर तन्हाईयों में मैं तुम्हे अक्सर बुलाता हूँ

    बहुत खूब !!

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  10. आपकी पोस्ट यहाँ भी है……नयी-पुरानी हलचल

    http://nayi-purani-halchal.blogspot.com/

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  11. इबादत के लिए तुम ढ़ूंढ़ते फिरते कहाँ रब कों
    गुलों कों देख डाली पर मैं अपना सर झुकाता हूँ

    वाह क्या बात कही सर!

    सादर

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  12. नहीं औकात अपनी कुछ मगर ये बात क्या कम है
    मैं सूरज कों दिखाने को सदा दीपक जलाता हूँ

    बहुत खूबसूरत गज़ल ..हर शेर बहुत खूबसूरत

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  13. मैं तन्हा हूँ समंदर में मगर डरता नहीं यारों
    जो कश्ती डगमगाती है तुझे मैं साथ पाता हूँ
    sunder abhivyakti ...!!

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  14. अँधेरी सर्द रातों में ठिठुरते उन परिंदों कों
    अकेले देख कर कीमत मैं घर की जान जाता हूँ

    बहुत बढ़िया...

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  15. घटायें, धूप, बारिश, फूल, तितली, चांदनी "नीरज"
    इन्ही में दिल करे जब भी तुझे मैं देख आता हूँ

    बहुत खूबसूरत ख्यालात हैं नीरज जी ! बहुत सुन्दर रचना है ! बधाई एवं शुभकामनायें !

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तुझको रक्खे राम तुझको अल्लाह रक्खे
दे दाता के नाम तुझको अल्लाह रक्खे