नीरज
Monday, March 28, 2011

क्या अजब, ये अश्क का दस्तूर है

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देखिये जिसको, वही मगरूर है मौत को, शायद समझता दूर है मुस्कुराकर देखते हैं, फिर नया हो गया ग़र ख्वाब, चकनाचूर है आलमे तन्हाई का दोज़ख है क्य...
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ये हूँ मैं

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नीरज गोस्वामी
जयपुर, राजस्थान, India
अपनी जिन्दगी से संतुष्ट,संवेदनशील किंतु हर स्थिति में हास्य देखने की प्रवृत्ति. इंजीनियरिंग करने के बाद ,जीवन के 44 साल स्टील कंपनियों में मौज मस्ती के साथ सफलता पूर्वक, गुज़ारने के बाद अब जयपुर अपने घर पूर्ण विश्राम की अवस्था को प्राप्त। कल का पता नहीं।लेखन, अपने को लेखक होने का भ्र्म पाले रखने के लिए।
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