Monday, July 6, 2020

किताबों की दुनिया -206 /2

'गुलाम अब्बास' जिस गांव में रहते थे वहाँ रहते हुए शायरी की दुनिया में आगे बढ़ने के रास्ते कम थे लेकिन घर की मज़बूरियों की वजह से उनका लाहौर जाने का सपना पूरा नहीं हो पा रहा था। कोई उन्हें राह दिखाने वाला नहीं था। बड़ा भाई वहीँ के एक स्कूल में पढ़ाया करता था उसी की शिफारिश पर गुलाम अब्बास भी स्कूल में पढ़ाने लगे। ये नौकरी उन्हें बहुत दिनों तक रास नहीं आयी। दिल में अच्छा शायर बनने और अपना मुस्तकबिल संवारने की ललक आखिर अक्टूबर 1981 में उन्हें उनके सपनों के शहर लाहौर में ले आयी. 'रोजनामा जंग' अखबार में उन्हें 700 रु महीने की तनख्वा पर प्रूफ रीडर की  नौकरी मिल गयी। नौकरी और शायरी दोनों साथ साथ चलने लगी। नया शहर, नए लोग, नए कायदे मुश्किलें पैदा करने लगे और गाँव की सादा ज़िन्दगी ,घर का सुकून उन्हें बार बार लौटने को उकसाने लगा। लेकिन गुलाम अब्बास आँखों में सपने लिए मज़बूत इरादों से लाहौर आये थे इस लिए डटे रहे। मुश्किलों ने उनकी शायरी को पुख्ता किया। 

इसलिए अब मैं किसी को नहीं जाने देता 
जो मुझे छोड़ के जाते हैं चले जाते हैं 
***
चाँदनी खंदा है अपने हुजरा-ऐ-महताब पर 
और मैं नाज़ाँ हूँ इस पर मेरा घर मिटटी का है 
खंदा : हंसती , हुजरा ऐ महताब : चाँद के कमरे नाज़ाँ :फ़क्र करने वाला 
***
ये तेरे बाद खुला है कि जुदाई क्या है 
मुझ से अब कोई अकेला नहीं देखा जाता 
***
पानी आँख में भर लाया जा सकता है 
अब भी जलता शहर बचाया जा सकता है 
***
उस को रस्ते से हटाने का ये मतलब तो नहीं 
किसी दीवार को दीवार न समझा जाए 
***
एक तो मुड़ के भी न जाने की अज़ीयत थी बहुत 
और उस पर ये सितम कोई पुकारा भी नहीं 
***
देखा न जाए धूप में जलता हुआ कोई 
मेरा जो बस चले करूँ साया दरख़्त पर 
***
अभी तो घर में न बैठो, कहो बुजुर्गों से  
अभी तो शहर के बच्चे सलाम करते हैं 
***
यकीं आता नहीं तो मुझ को या महताब को देखो 
कि रात उसकी भी कट जाती है जिस का घर नहीं होता 
***
बस यही देखने को जागते हैं शहर के लोग 
आसमाँ कब तेरी आँखों की तरह होता है 

गुलाम अब्बास लाहौर आ तो गए लेकिन इतने बड़े शहर में अपनी मंज़िल कैसे तलाश करें ये सोचने लगे। कोई मदद के लिए आगे नहीं आया। शहर के लोग बेमुरव्वत होते हैं, ऐसा नहीं है, ऐसा सोचना भी गलत होगा। दर असल शहर में लोग ज्यादा होते हैं सभी एक मैराथन दौड़ का हिस्सा होते हैं सभी को मंज़िल की तलाश और वहां तक पहुँचने की जल्दी होती है इसलिए किसी से भी ये उम्मीद रखना कि वो आपका हाथ पकड़ कर रास्ता दिखायेगा सही नहीं होगा। हाँ आपको धक्का दे कर आगे निकलने वाले बहुतायत में मिलेंगे। अब्बास साहब की ज़िन्दगी में शायरी और नौकरी के साथ साथ धक्के भी जुड़ गए लेकिन इन तकलीफ़ों ने उन्हें एक बेहतर इंसान बनने में मदद की। 

चलता रहने दो मियाँ सिलसिला दिलदारी का
आशिक़ी दीन नहीं है कि मुकम्मल हो जाए 

हालत-ऐ-हिज़्र में जो रक़्स नहीं कर सकता 
उस के हक़ में यही बेहतर है कि पागल हो जाए 

डूबती नाव में सब चीख रहे हैं 'ताबिश'
और मुझे फ़िक्र ग़ज़ल मेरी मुकम्मल हो जाए 

कहते हैं जब ऊपर वाला आप पर मेहरबान होता है तो वो खुद तो मदद को नहीं आता अलबत्ता अपना एक नुमाइंदा आपके पास भेज देता है। गुलाम अब्बास साहब की मदद के लिए ऊपर वाले ने जिन्हें भेजा वो थे पाकिस्तान के उस्ताद शायर जनाब खालिद अहमद साहब जो लाहौर ही में रहते थे ।खालिद साहब को उन्होंने अपना उस्ताद बनाया और उनकी रहनुमाई में ग़ज़ल कहने में खूब मेहनत करने लगे। मेहनत और लगन का नतीज़ा निकलना ही था। अब्बास ताबिश साहब की क़लम खूब चल निकली । खालिद साहब ने उन्हें एक अच्छा और कामयाब शायर बनने के गुर सिखाये और बताया कि शायरी फ़ुर्सत में किया जाने वाला काम नहीं है बल्कि ये पूरे वक्त किये जाने वाला काम है । अब आप हमेशा तो शेर नहीं कह सकते लेकिन शेर कहने के लिए आपको हमेशा शेर की कैफ़ियत में रहना होता है. अपने ही लिखे को बार बार खारिज़ करने का हुनर सीखना होता है। यूँ समझें शेर कहना मछली पकड़ने जैसा काम है आप को ख़्याल के दरिया में हमेशा जाल डाल के रखना होता है अब मछली तो मछली है फंसे तो अभी फंस जाय और न फंसे तो महीनों न फंसे।     

तुम मांग रहे हो मेरे दिल से मेरी ख़्वाइश 
बच्चा तो कभी अपने खिलौने नहीं देता 

मैं आप उठाता हूँ शब-ओ-रोज़ की ज़िल्लत 
ये बोझ किसी और को ढोने नहीं देता 
 शब-ओ-रोज़ :रात-दिन ,ज़िल्लत :बदनामी, तौहीन  

वो कौन है उससे तो मैं वाक़िफ़ भी नहीं हूँ 
जो मुझको किसी और का होने नहीं देता 

फिर वो वक्त आया जिसका हर शायर को बेताबी से इंतज़ार रहता है याने उसकी पहली किताब का मंज़र-ए-आम पर आना।  खालिद साहब ने ही उनकी पहली ग़ज़लों की किताब '"तम्हीद " शाया करवाई और उसके मंज़र-ऐ-आम पर आते ही 'अब्बास ताबिश' साहब के नाम खुशबू की पाकिस्तान ही नहीं पूरी दुनिया में फैले शायरी के दीवानों तक पहुँच गयी। 'तम्हीद' के बाद उनकी ग़ज़लों की पाँच और किताबें "आसमाँ ""मुझे दुआओं में याद रखना ",परों में शाम ढलती है ","रक्से दरवेश "और "शजर तस्बीह करते हैं "शाया हो चुकी हैं. आम तौर पर शायर की कुलियात उसके दुनिया से रुख़्सत होने के बाद ही शाया होती है लेकिन अब्बास ताबिश  "मुनीर नियाज़ी " साहब की तरह ये सोच कर कि अक्सर उनकी सभी किताबें उनके पाठकों को एक ही जगह नहीं मिल पातीं या फिर आउट आफ प्रिंट जाती हैं अपना कुलियात "इश्क आबाद "मंज़र -ऐ-आम पर ले आये."    
हिंदी में शायद उनकी पहली और एक मात्र ग़ज़लों की किताब 'राधा कृष्ण प्रकाशन से "रक्स जारी है " नाम से प्रकाशित हुई जिसका जिक्र हम अभी कर रहे हैं :   


यूँ ही ख्याल आता है बाँहों को देख कर 
इन टहनियों पे झूलने वाला कोई तो हो 

हम इस उधेड़बुन में मोहब्बत न कर सके 
ऐसा कोई नहीं मगर ऐसा कोई तो हो  

मुश्किल नहीं है इश्क का मैदान मारना 
लेकिन हमारी तरह निहत्था कोई तो हो 

 चलिए बात वहीँ से शुरू करते हैं जहाँ छोड़ी थी। जी हाँ लाहौर से।  लाहौर की ज़िन्दगी अब्बास साहब को रास आने लगी। प्रूफ रीडिंग की नौकरी पूरे चार साल करने के बाद गवर्मेंट लाहौर के कॉलेज में दाख़िला लेकर उर्दू में एम् ऐ किया और वहां से निकलने वाले मशहूर रिसाले 'रावी' का संपादन किया और फिर लाला मूसा के कॉलेज में लेक्चरर बन गए। आजकल गुलबर्गा कालेज में उर्दू विभाग के अध्यक्ष की हैसियत से नौकरी कर रहे हैं।

लाहौर में जितना वक्त मिलता वो खालिद साहब की सोहबत में बिताने लगे। गुफ़तगू के दौरान खालिद साहब की बातें अब्बास साहब गांठ बांध लेते। उनकी एक बात उन सबके लिए गाँठ बांधनी जरूरी है, जो शायरी करते हैं और उस में अपनी पहचान बनाना चाहते हैं। खालिद साहब का कहना था कि शायरी लम्बी कूद के खेल की तरह होती है जिसमें आगे कूदने के लिए पहले पीछे की और जाना होता है। उनका इशारा रिवायत की ओर जाने से था। याने ये जानना जरूरी है कि आप से पहले किसी मौज़ू पर उस्ताद लोग क्या कह गए हैं और कैसे कह गए हैं। उन्हें पढ़ कर आप बहुत कुछ सीख सकते हैं। भले ही दुनिया हर दिन बदल रही हो लेकिन इंसान अभी भी वैसा ही है जैसा बाबा आदम के ज़माने में हुआ करता था। उसकी सोच में बहुत अधिक अंतर नहीं आया है। उसकी परेशानियां भी कमोबेश वैसी ही हैं। आधुनिकता ने उसे बाहर से भले ही बदल दिया हो लेकिन भीतर से गौर करें तो कुछ नहीं बदला। शायरी में अब नए अल्फ़ाज़ आ गए हैं लेकिन मूल बात अभी भी वही रहती है जो पहले थी। इश्क, रुसवाई, बेवफ़ाई, रक़ीब, ज़माना, मुश्किलें जस की तस हैं। 

वर्ना कोई कब गालियाँ देता है किसी को 
ये उसका करम है कि तुझे याद रहा मैं 

इस दर्ज़ा मुझे खोखला कर रख्खा था ग़म ने 
लगता था गया अब के गया अब के गया मैं 

इक धोके में दुनिया ने मेरी राय तलब की 
कहते थे कि पत्थर हूँ मगर बोल पड़ा मैं 

अब तैश में आते ही पकड़ लेता हूँ पाँव 
इस इश्क़ से पहले कभी ऐसा तो न था मैं 

रिवायत की तरफ़ जाने के बाद हमें ये याद रखना चाहिए कि हमें वहीँ का नहीं हो कर रह जाना। दरअसल रिवायत एक जंगल है जिसमें भटकने कि सम्भावना ज्यादा हैं। लोग रिवायत के जंगल में जा कर या तो रास्ता भटक के वहीँ के हो जाते हैं या फिर खाली हाथ लौट आते हैं जबकि हमें रिवायत के जंगल की खुशबू और ताज़गी को अपने साथ लिए लौटना होता है। जो ऐसा कर पाते हैं उनकी शायरी में ताज़गी और रवानी देर तक बनी रहती है। बहुत से कामयाब शायरों को आप देखें कि वो आगाज़ बहुत शानदार करते हैं लेकिन कुछ वक्त के बाद खुद को दोहराने लगते हैं।  खालिद साहब ने समझाया कि जब तुम्हें लगने लगे कि शायरी में दोहराव हो रहा है या ताज़गी ख़तम हो रही है तभी ठीक तभी आपको अपनी कलम एक तरफ़ रख देनी चाहिए। लिखना छोड़ के दूसरों को पढ़ना शुरू कर देना चाहिए। इस से आप अपनी साख देर तक बनाये रखने में कामयाब होंगे।      
    
हमारे दुःख न किसी तौर जब ठिकाने लगे 
हम अपने घर में परिंदों के घर बनाने लगे 
***
बर्फ पिघलेगी तो हम भी चल पड़ेंगे उसके साथ 
देखने वाले यही समझेंगे कि दरिया जाए है 
***
घर टपकता देख कर रोती है माँ 
छत तले इक छत पुरानी और है 
***
कोई रोंदे तो उठाते हैं निगाहें अपनी 
वर्ना मिटटी की तरह राह से कम उठते हैं 
***
वो अपनी मर्ज़ी का मतलब निकाल लेता है 
अगरचे बात तो हम सोच कर बनाते हैं 
***
तुझे क़रीब समझते थे घर में बैठे हुए 
तिरि तलाश में निकले तो शहर फ़ैल गया 
***
जिस तरह पेड़ को बढ़ने नहीं देती कोई बेल 
क्या जरूरी है मुझे घेर के मारा जाए 
***
ये जमा ख़र्च ज़बानी है उसके बारे में 
कोई भी शख़्स उसे देख कर नहीं आता 
***
 कि जैसे उससे मुलाकात फिर नहीं होगी 
वो सारी बातें इकठ्ठी बताना चाहता है 
***
तन्हाई से थी मेरी मुलाक़ात आख़िरी 
रोया और इसके बाद मैं घर से निकल गया 

ताबिश साहब ने खूब पढ़ा है और आज भी मौका लगते ही पढ़ने लगते हैं चाहे शायर नया हो या पुराना। इसके अलावा सूफ़ी संत 'शाह हुसैन' को भी दिल से पढ़ा जिससे उनकी शायरी में इबादत  मुहब्बत के रंग आये। अब्बास साहब किसी के अच्छे शेर पर दाद देने से कभी नहीं चूकते। उनका मानना है कि अच्छा शेर ऊपर वाले की देन होता है वो चाहे जिसे अता करे,और हमें उसका एहतराम करना चाहिए। उम्मीद करनी चाहिए कि ऊपरवाला अच्छा शेर कभी आपको भी अता करेगा। ताबिश साहब नौजवान शायर,चाहे वो पाकिस्तान का हो या हिंदुस्तान का ,हौसला अफ़ज़ाही करना अपना फ़र्ज़ समझते हैं यही वजह है की दोनों मुल्कों के नौजवान शायर उन्हें बहुत पसंद करते हैं। दुनिया के गोशे गोशे में मुहब्बत का पैग़ाम देने वाले इस शायर के चाहने वाले सब तरफ़ फैले हुए हैं। ऐसा नहीं है कि इनके हिस्से में हमेशा फूल ही आये हों ,कांटे भी मिले हैं बल्कि मिलते रहते हैं लेकिन इनकी खूबी यही है कि ये जैसे फूल लेते वक्त मुस्कुराते हैं वैसे ही काँटों से ज़ख्म खाते वक्त भी। और इसी खूबी ने इन्हें बुलंदी पे पहुँचाया है।अब्बास साहब ने ये सिद्ध किया कि अगर आपकी शायरी में मयार है तो आप मुशायरों में बिना तरन्नुम और अदाकारी का सहारा लिए भी क़ामयाब हो सकते हैं  

कोई गठड़ी तो नहीं है कि उठा कर चल दूँ 
शहर का शहर मुझे रख़्त-ए-सफ़र लगता है 
रख्त-ए-सफ़र : सफ़र का सामान 

इस ज़माने में ग़नीमत है ग़नीमत है मियां 
कोई बाहर से भी दरवेश अगर लगता है 

काश लौटाऊँ कभी उसका परिंदा उसको 
अच्छा मिसरा मुझे टूटा हुआ पर लगता है 

आप सोच रहे होंगे कि मैं शायर के बारे में ही बताता जा रहा हूँ उसकी शायरी पे कुछ नहीं कह रहा तो हुज़ूर उसकी दो वजह है पहली ये कि मैं खुद को इस लायक़ नहीं समझता कि इस क़द्दावर शायर की शायरी पर तब्सरा करने की गुस्ताख़ी करूँ और दूसरी ये कि जिसे मैं पसंद या नापसंद करूँ उसे आप भी पसंद या नापसंद करें। इसलिए मैं उनकी किताब से यूँ ही जहाँ नज़र गयी वहां से कुछ अशआर आपको पढ़वा रहा हूँ यदि आपको पसंद आये तो आप खुद ब खुद राधाकृष्ण प्रकाशन दिल्ली को गूगल पे ढूंढ निकालेंगे और इस किताब को मंगवा कर पूरी पढ़ेंगे ,वैसे ये किताब अमेज़न से ऑन लाइन मंगवाई जा सकती है। वैसे मुझे लगता है कि शायरी के दीवानों की अलमारी में ये किताब जरूर होनी चाहिए। ऐसी किताब जिसमें एक भी शेर आपको नेगटिव नहीं मिलेगा।अब्बास साहब ने ये सिद्ध किया कि अगर आपकी शायरी में मयार है तो आप मुशायरों में बिना तरन्नुम और अदाकारी का सहारा लिए भी क़ामयाब हो सकते हैं.अब्बास साहब को 2017 में क़तर में "मलिक मुसीबुर्रहमान इंटरनेशनल अवार्ड और पाकिस्तान सरकार द्वारा 'तमगा-ए-इम्तिआज़' के ख़िताब से नवाज़ा गया है।     
 
अगली किताब की तलाश में निकलने से पहले चलते चलते ये अशआर भी पढ़वाता चलता हूँ। 

यूँ भी मंज़र को नया करता हूँ मैं 
देखता हूँ उसको हैरानी के साथ 

आँख की तह में कोई सहरा न हो 
आ रही है रेत भी पानी के साथ 

ज़िन्दगी का मसअला कुछ और है 
शेर के कह लेता हूँ आसानी के साथ 

अब अगर उनका एक शेर जो हमेशा जहाँ भी वो जाते हैं उनसे पहले ही वहां पहुँच जाता है और उनकी पहचान बन चुका है वो भी पढ़ लीजिये  

एक मुद्दत से मिरि माँ नहीं सोई 'ताबिश'
मैंने इक बार कहा था मुझे डर लगता है   
 

12 comments:

  1. "खालिद साहब का कहना था कि शायरी लम्बी कूद के खेल की तरह होती है जिसमें आगे कूदने के लिए पहले पीछे की और जाना होता है। उनका इशारा रिवायत की ओर जाने से था। याने ये जानना जरूरी है कि आप से पहले किसी मौज़ू पर उस्ताद लोग क्या कह गए हैं और कैसे कह गए हैं"

    सही तरीका यही है,मगर माने कौन

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  2. कमाल की शायरी है। अच्छी क़िताब के बेहतरीन अशआर से रू-ब-रू करवाने का बहुत शुक्रिया।

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (08-07-2020) को     "सयानी सियासत"     (चर्चा अंक-3756)     पर भी होगी। 
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  
    --

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  4. क्या ख़ूबसूरत शेर है, वाह।
    हर शेर ये तेरे बाद खुला है कि जुदाई क्या है
    मुझ से अब कोई अकेला नहीं देखा जाता।
    यह एक शेर ही काफ़ी है यह उम्दा शायरी कहने वाले शायर के परिचय के लिए।
    एक और उमड़ा शायर से परिचय करवाने के लिए बेहद शुक्रिया जनाब।

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  5. बहुत सुंदर शायरी - किताब में संजोई गया हर पेज पढ़ कर वाह वाह करने को जी चाहता है ।
    -- रेखा श्रीवास्तव

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  6. बहुत अच्छा लेख ।
    बहुत दिनों बाद ।

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  7. वाह, बहुत खूब

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  8. आपकी शायरी जारी है। मैं ही समय नहीं दे पाता। आज फुरसत से पढ़ पाया इस पोस्ट को। शायरों का संघर्ष हर तरफ एक सा है! बहुत अच्छा लगा, धन्यवाद।

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  9. बेहतरीन समीक्षा, लुत्फ़ आ गया पढ़ कर, मुबारक हो भैया, शाद ओ आबाद रहें ।

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  10. वाह वाह वाह के सिवा और कुछ नहीं । बेहतर अशआर नये शायरों के लिए रसद मुहैया करा रहे हैं ।

    ये जमा ख़र्च ज़बानी है उसके बारे में ।
    कोई भी शख़्स उसे देख कर नहीं आता ।।

    अब्बास ताबिश साहब ने अपनी सोच अपने अक़ीदे से कहा होगा यह शेर । मुझे यह शेर वृन्दावन की निधिवन सेवाकुंज जैसी जगहों पर ले जाता है ।

    नीरज भाई आप की लिंक्स मिलती रहती हैं । पढ़ने का मुहूर्त आज निकला । आप लिंक्स भेजते रहा करें ।

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  11. नीरज साहब आप किसी भी तबसिरे में बेहतरीन अशआर चुनकर पढवाते हुए शायर की खूबियां बहुत खूबसूरती से बयान करते चलते हैं और फिर उस में वो जादू जगाते हैं कि पढ़ने वाला किताब हासिल करने के लिए बेचैन तो होता ही है शायर से मिलने को भी बेताब हो जाता है हालांकि ये मुमकिन नहीं हो पाता | बहुत बधाई आपके इस नायाब फ़न के लिए |आपको नमन

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तुझको रक्खे राम तुझको अल्लाह रक्खे
दे दाता के नाम तुझको अल्लाह रक्खे