Friday, July 18, 2008

माँ की बोली



भाषा को ले कर अक्सर बवाल उठते रहे हैं लेकिन आदरणीय प्राण शर्मा साहेब ने भाषा को एक बहुत दिलचस्प ग़ज़ल नुमा नज़्म के अंदाज़ में प्रस्तुत किया है. आप भी इसका लुत्फ़ लीजिये और महसूस कीजिये की प्राण साहेब ने अपने हुनर का जलवा दिखाते हुए कितनी सादगी से मादरी जबान ( मदर टंग) की वकालत की है

पहले अपनी बोली बोलो
फ़िर चाहे तुम कुछ भी बोलो
इंग्लिश बोलो रुसी बोलो
तुर्की बोलो स्पेनिश बोलो
अरबी बोली चीनी बोलो
जर्मन बोलो डेनिश बोलो
कुछ भी बोलो लेकिन पहले
अपनी माँ की बोली बोलो
अपनी बोली माँ की बोली
हर बोली से न्यारी न्यारी
अपनी बोली माँ की बोली
मीठी मीठी प्यारी प्यारी
अपनी बोली माँ की बोली
अपनी बोली से नफरत क्यों
अपनी बोली माँ की बोली
दूजे की बोली में ख़त क्यों
अपनी बोली का सिक्का तुम
दुनिया वालों से मनवाओ
ख़ुद भी मान करो तुम इसका
औरों से भी मान कराओ
माँ बोली के बेटे हो तुम
बेटे का कर्तव्य निभाओ
अपनी बोली माँ होती है
क्यों ना सर पे इसे बिठाओ

21 comments:

  1. शुक्रिया नीरज जी ....इसे यहाँ पढ़वाने के लिए .सच कहा आपने जितने भी तरक्की पसंद देश है वे अपनी बोली नही छोड़ते...

    ReplyDelete
  2. बढिया प्रेरक रचना है।

    ReplyDelete
  3. आपका बहुत बहुत धन्यवाद इस रचना को यहा प्रकाशित करने के लिए.. सौ फीसदी सही बात है..

    ReplyDelete
  4. भाई नीरज जी,
    प्राण साहब की कविता "मां की बोली" से रू-ब-रू करवाने के लिय धन्यवाद.
    पर आर्थिक युग में जहाँ हर कार्य फायदे से जुड़ा है, वंहा जब कि लोग रिश्तों को शर्मिन्दगी का बाना पहनाने से नहीं चूक रहे हैं, वहां "मां की बोली" की परवाह कौन कर रहा है?
    आज हम -आप ही भले ही घर में "मां की बोली" में बात करें, पर सोसाईटी में इसी "मां की बोली" को तिरस्कार भरी निगाहों से क्यों कर देखने लग जाते हैं, शायद अपने को महत्वपूर्ण दिखाने का फायदा या अन्य कोई फायदा, पर "आर्थिक युग के फायदे" का डंका ही सर चढ़ कर बोल रहा है, यही अल्पकालिक हकीकत है और यही हमारी सारी बीमारियों, परेशानियों की जड़ भी है, संतोष शब्द तो जैसे शब्दावली से हे नेस्त-न- बूद कर दिया गया है. इसी विषय में मेरी "श्रद्धा" पर लिखी कविता पर गौर फरमाएं :
    श्रद्धा
    (३९)
    कहते हैं कि आज का जीवन
    अत्यधिक त्वरित हो गया है
    अमन-चैन, भाई-चारा तो अब
    आपाधापी को तिरोहित हो गया है
    हो सहज ज़रा प्रकृति तो निहारें
    बिखेरती स्फूर्ति जो संजोग के सहारे
    हो श्रद्धानत सीखोगे जीना संयम से
    लगेगा जीवन बाधा रहित हो गया है

    चन्द्र मोहन गुप्त

    ReplyDelete
  5. बहुत सुन्दर - पहले मां की बोली।
    शायद यही प्रेरणा है कि जोड़-तोड़ कर हिन्दी में लिखने लगे हैं।

    ReplyDelete
  6. बहुत सुंदर रचना है. प्राण साहेब ने माँ की बोली का महत्व बखूबी समझाया है.

    ReplyDelete
  7. अपनी भाषा में बात करना यानी की दिल की बात करना ..शुक्रिया इसको यहाँ पढ़वाने के लिए

    ReplyDelete
  8. इस अच्छी रचना के लिए आभार !

    ReplyDelete
  9. इसे यहाँ प्रस्तुत करने का आभार. आनन्द आ गया.

    ReplyDelete
  10. Bahut hi achha sandesh deti hui rachna
    Pran ji ko padhna naseeb ki baat hai

    ReplyDelete
  11. Pran ji ko badhai or is prastuti ke liye aapko sadhuwad.........

    ReplyDelete
  12. प्रेरक रचना ,,आभार..

    ReplyDelete
  13. bahut sundar kavita padhwai aapne...dhanyvaad.

    ReplyDelete
  14. माँ की बोली में ममत्व, मिठास और मान है
    जो उसे बोले समझ लो वह अदद इंसान है.
    ================================
    प्राण जी को बधाई....
    नीरज जी, आपका आभार.
    डा.चन्द्रकुमार जैन

    ReplyDelete
  15. माँ बोली के बेटे हो तुम
    बेटे का कर्तव्य निभाओ
    अपनी बोली माँ होती है
    क्यों ना सर पे इसे बिठाओ
    "atee sunder, very inspiring"
    Regards

    ReplyDelete
  16. मेरे दिल के ज़ख्म वोह सहला गई
    गुनगुनाती याद माँ की आ गई

    चाँद शुक्ला हदियाबादी डेनमार्क

    ReplyDelete
  17. प्राण जी शब्दों के शिल्पकार हैं। इस कविता में भी भावों में शब्दों को नगीने की तरह
    जड़ दिए हैं। प्राण जी की रचनाओं से नए पुराने कवियों को प्रेरणा तो मिलती है, उन्हें
    कुछ सीखने को भी मिलता है। पढ़ कर आनंद-विभोर होगया।
    नीरज जी को समय समय पर उनकी रचनाएं पढ़वाने के लिए साधुवाद।

    ReplyDelete
  18. Priy Neerajjee, Pranjee ki is sundar kavita se roo-b-roo karaane ke liye aabhaar.

    ReplyDelete
  19. Dil kee jagah sil type ho gaya muaf keejiyega.

    ReplyDelete
  20. अपनी बोली का सिक्का तुम
    दुनिया वालों से मनवाओ
    ख़ुद भी मान करो तुम इसका
    औरों से भी मान कराओ
    माँ बोली के बेटे हो तुम
    बेटे का कर्तव्य निभाओ
    अपनी बोली माँ होती है
    क्यों ना सर पे इसे बिठाओ
    नीरज जी आप का धन्यवाद इस कविता को हमारे तक पहुचाने का, ओर प्राण जी कॊ भी धन्यवाद, काश सभी भारतीयए ऎसा सोचते.

    ReplyDelete
  21. is rachana se rubaroo karwaane ke liye shukriya...

    bahut hi pyaari rachana ko sach ki aur aankhen kholti hahi..

    ReplyDelete

तुझको रक्खे राम तुझको अल्लाह रक्खे
दे दाता के नाम तुझको अल्लाह रक्खे