Monday, October 20, 2008
जो निशाने साधते थे कल तलक
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( दोस्तों पेश है एक और ग़ज़ल जिसके हुस्न को सँवारने में पंकज जी का ही योगदान है. जैसा की आप जानते हैं मुझे ग़ज़ल लिखने की बारीकी आदरणीय प्रा...
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