Monday, February 12, 2018

किताबों कीदुनिया -164

छल, कपट, पाखंड का कुछ झूठे आभासों का है 
सारा जीवन चन्द चालों और कुछ पासों का है 

ये मोहब्बत के तकाज़े दोस्ती रिश्तों की डोर 
वहम है सारा फ़क़त, ये खेल विश्वासों का है 

तैरती इक लाश को देखा तो दिल ने ये कहा 
आदमी का कुछ नहीं बस बोझ तो साँसों का है 

कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके बारे में कहा जाता है की फलां तो सर्व गुण संपन्न है या गुणों की खान है।ऊपर वाले का खेल भी अजीब है जिस पर मेहरबान हो जाये उसे छप्पर फाड़ कर देता है और साहब जिस पे नाराज़ हो जाए उसका रहा सहा छप्पर भी फाड़ देता है। हमारे आज के शायर पहली श्रेणी वाले हैं याने गुणों की खान हैं। जिन पर ऊपर वाले का करम रहा। मेरी ये समझ में नहीं आ रहा कि उनकी बात कहाँ से शुरू करूँ ? चलिए शुरू से उनकी बात शुरू करते हैं। 8 जुलाई 1946 को जयपुर के पास चौमूं में जन्मे हमारे शायर साहब ने अपने स्कूली जीवन का आगाज़ कालाडेरा, जो चौमूं से 10 कि.मी. की दूरी पर है, से किया। उसी स्कूल में 12 वीं पास करने के बाद अध्यापन का काम करते रहे। दस वर्ष याने सं 1964 से 1974 तक अध्यापन के साथ साथ अध्ययन भी करते रहे और एम्.ऐ., बी एड की डिग्री हासिल की।

पलकों पे आंसुओं को यूँ मेहमान मत रखो 
काग़ज़ की कश्तियों में ये सामान मत रखो 

दिल है,धड़क रहा है,कोई कम तो नहीं है 
पेशानी को हर वक़्त, परेशान मत रखो 

तुम चाहते हो घर को महकता हुआ अगर 
तो घर में फिर ये कागज़ी गुलदान मत रखो 

उसके बाद याने 1974 से आप उद्घोषक के रूप में आकाशवाणी की सेवा में प्रविष्ट हुए और निरंतर प्रगति करते हुए 2002 में आकाशवाणी के उपनिदेशक बन गए और सं 2006 में केंद्र निदेशक के पद से रिटायर हुए। बात अगर आकाशवाणी के कर्मचारी के रूप में उनकी लगातार प्रगति की होती तो मैं उसे बढ़ा चढ़ा कर प्रस्तुत करने वाला नहीं था लेकिन उन्होंने इस दौरान अपनी सृजन यात्रा को भी अनेक पड़ाव पार करते हुए शिखर तक पहुँचाया। चलिए पहले उनके लेखन की चर्चा करते हैं उन्होंने हिंदी, उर्दू और राजस्थानी भाषा में अधिकारपूर्वक लेखन किया। जिसमें गीत, नवगीत, ग़ज़ल, छंद, दोहे , रुबाइयाँ आदि पद्ध विधा के अलावा गद्य में नाटक, कहानी, व्यंग , बाल साहित्य को भी उन्होंने अपनी कलम से समृद्ध किया है।

ऐ मेरे दोस्त रोक ले अब मत बढ़ा इसे
मुझको तो तेरा हाथ भी खंज़र दिखाई दे

अब ढूंढ रहा हूँ मैं किसी ऐसे शख़्स को
काँधे पे जिसके अपना ही इक सर दिखाई दे

 लाज़िम है अपनी जान को छिप कर बचाइए 
जब भी बचाने वालों का लश्कर दिखाई दे

"अक्षरों के इर्द गिर्द" , "सुकून" , "दर्द के रंग "हमारे आज के शायर जनाब "इकराम राजस्थानी " साहब के लोकप्रिय ग़ज़ल संग्रह हैं , "इस सदी का आखरी पन्ना" , "एक रहा है एक रहेगा अपना हिंदुस्तान" , "अमर है जिनसे राजस्थान" और "खुले पंख" आदि अनेक विचारोत्तेजक काव्य संग्रह हैं। राजस्थानी भाषा में उनके काव्य संग्रह "तारां छाई रात", "पल्लो लटके", शब्दां री सीख", आदि बहुत चाव से पढ़े जाते हैं। हज़रत शेख सादी की "गुलिस्तां" , रविंद्र नाथ टैगोर की " गीतांजलि" और हरवंश राय बच्चन की "मधुशाला" का राजस्थानी में काव्यानुवाद करने वाले वो एकमात्र व्यक्ति हैं।उन्होंने श्रीमदभगवत गीता और उपनिषदों का भी राजस्थानी भाषा में काव्यानुवाद किया है। इसके अलावा वो जिस काम के लिए हमेशा याद किये जायेंगे वो है "क़ुरान शरीफ़" का हिंदी भाषा में भावानुवाद। ऐसा करने वाले वो विश्व के पहले कवि हैं।

मन काले काले उजले उजले भेष हो गए 
जो शेष भी नहीं थे वो विशेष हो गए 

मीनारें चूमती थीं जिनकी आसमान को 
वो ऊंचे ऊंचे महल भी अवशेष हो गए 

वाहन के बराबर भी नहीं जो गणेश के 
वो लोग ये समझते हैं, गणेश हो गए 

इकराम राजस्थानी साहब की चुनिंदा ग़ज़लों, गीतों रुबाइयों दोहों और फुटकर शेरों का अनूठा संग्रह "कलम ज़िंदा रहे " जिसकी आज हम चर्चा कर रहे हैं , वाणी प्रकाशन ने अपनी पेपर बैक श्रृंखला "दास्ताँ कहते कहते " के अंतर्गत प्रकाशित किया है। इकराम साहब के लेखन की चर्चा तो हमने कर दी अब उनके अगले गुण पर प्रकाश डालते हैं और वो है उनका संगीत के प्रति लगाव। संगीत के क्षेत्र में भी उन्होंने अपनी अप्रतिम मेधा शक्ति का परिचय दिया है। वो आकाशवाणी के उच्च श्रेणी मान्यता प्राप्त राजस्थानी लोक संगीत गायकरहे हैं।उनकी लिखी, गायी और संगीत बद्ध की गयी रचनाएँ जो 100 से अधिक सीडी में उपलब्ध हैं ,आज भी उतनी ही लोकप्रिय हैं जितनी पहले थीं।


आप के दिन जब सुहाने आ गए 
लोग कितने दुम हिलाने आ गए 

खोजी कुत्ते चोर निकले ढूंढने 
घूम फिर कर सारे थाने आ गए 

जीत कर लीडर ने चमचों से कहा 
लूट लो अपने ज़माने आ गए 

शायद ही कोई राजस्थानी होगा जिसने उनका लिखा "अंजन की सीटी में मारो मन डोले ...चल्ला चल्ला रे डलावर गाड़ी हौले हौले " गीत नहीं सुना हो। इसकी लोकप्रियता का अंदाज़ा आप इस बात से लगाएं कि इसके मुखड़े और धुन को मशहूर फिल्म "खूबसूरत" के एक गीत में पिरोया गया था। इस से अधिक एक और लोकप्रिय गीत जिसका उपयोग "नौकर" फिल्म में संजीव कुमार पर किशोर कुमार की आवाज में रिकार्ड किया गया था "पल्लो लटके गोरी को पल्लो लटके " भी इकराम साहब की कलम का कमाल था।

हम सब को इंसान बना दे, ऐ अल्लाह 
सबकी इक पहचान बना दे, ऐ अल्लाह 

मंदिर में क़ुरआन हो, गीता मस्जिद में 
ऐसा हिन्दुस्तान बना दे, ऐ अल्लाह 

खुशबू का तो कोई धर्म नहीं होता 
मुझको तू लोबान बना दे, ऐ अल्लाह 

इकराम साहब खुद को अमीर खुसरो,जायसी,रसखान और रहीम की परम्परा का कवि मानते हैं. अभी हाल ही में संपन्न हुए जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में उन्होंने अशोक वाजपेयी , अरुंधति सुब्रमण्यम,इरा टाक, एड्रिआना लिस्बोआ , जेलिना और मोहिनी गुप्ता के साथ मंच साझा करते हुए अपनी बातों से उपस्तिथ श्रोताओं को ताली बजाने पर मजबूर कर दिया। जिस व्यक्ति की कृतियों के प्रशंसकों की लिस्ट में डा.शंकर दयाल शर्मा , श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल, प्रणव मुखर्जी,श्री श्री रवि शंकर , ममता बनर्जी जैसी विभूतियों का नाम हो उसको सुन कर भला कौन अपने आपको ताली बजाने से रोक पायेगा ?

जो शख्स मुहल्ले में पहलवान था कभी 
उसको, उठा , बिठाते हैं , दो चार पकड़ कर 

दुनिया में इबादत के लिए भेजा था तुझको 
तू आके यहाँ बैठा है, घर बार पकड़ कर 

कुछ लोग तो दरबार जा के झांकते नहीं 
कुछ काट गए ज़िन्दगी ,दरबार पकड़ कर 

इकराम साहब की ग़ज़लें सौ फीसदी खरे सोने जैसी हैं जिसमें ज़रा भी मिलावट नहीं है। वो जैसा देखते सुनते महसूस करते हैं वैसा ही अपने अशआर में पिरो देते हैं। उनकी कृतियों में लफ़्फ़ाज़ी के लिए बिलकुल जगह नहीं है। जिस इंसान को अपने नाम और किसी तरह के ईनाम की परवाह नहीं है वो क्यूँकर लेखन में समझौता करेगा ? दुनिया में अथाह पैसा और ताकत होते भी जहाँ इंसान खुश नहीं हैं वहीँ इकराम राजस्थानी जैसे अल्लाह के बन्दे खुल कर मुस्कुरा रहे हैं ख़ुशी से झूम रहे हैं क्यूंकि वो इक फ़क़ीर हैं. उनके सैंकड़ों मित्र है प्रशंसक हैं भक्त हैं परन्तु धनोपार्जन या लाभ उठाना इकराम साहब के बस की बात नहीं या यूँ समझें उनकी फितरत में ही नहीं।

 इबादत, रोज़ करता है यहाँ तू 
मगर पहुंचा नहीं अब तक वहां तू 

तेरी फ़रियाद सुन लेगा खुदा फिर 
अगर बोले परिंदों की ज़बाँ तू 

खुदा से बात कर लेते थे सीधी 
कहाँ वो लोग थे और है कहाँ तू 

अब चाहे आपको ईनाम की चाह हो न हो अपना नाम कमाने की तमन्ना हो न हो लेकिन अगर आप कुछ अच्छा कर रहे हैं तो ईनाम और नाम दोनों आपको स्वतः मिल जाते हैं। इसीलिए इकराम साहब को लोकमान्य पुरूस्कार ,राधा देवी स्मृति पुरूस्कार, राष्ट्रीय एकता पुरूस्कार ,तुलसी रत्न, रोटरी सेवा पुरूस्कार जैसे अनेक पुरुस्कारों से नवाजा जा चुका है।

बड़े दिलचस्प मंज़र हो गए हैं 
कई कतरे समंदर हो गए हैं 

इन्हें संसद का पूरा हक़ है यारों 
हज़ारों बार अंदर हो गए हैं 

गधों को कृष्ण चन्दर ने चढ़ाया 
गधे सब कृष्ण चन्दर हो गए हैं 
 (कृष्ण चन्दर उर्दू के बड़े अफसाना निगार रहे हैं उनकी "एक गधे की आत्म कथा" और "एक गधे की वापसी" बहुत मकबूल उपन्यास हुए हैं )

 इकराम साहब ने लेखन गायन और संगीत निर्देशन के अलावा नाटक लिखे और उनका मंचन भी किया है। वो कुशल अभिनेता भी हैं। लगभग 30 साल तक लगातार उन्होंने राष्ट्रीय समारोहों का आँखों देखा हाल लाल किले और राष्ट्रपति भवन से सुनाने के अलावा हल्दी घाटी जयंती और ख्वाजा साहब के 86 वे उर्स की कमेंट्री भी की है। तभी तो मैंने उन्हें "गुणों की खान" कहा है। " इकराम" साहब कहते हैं कि "मुझे ग़ज़ल से बहुत प्यार है। शायद वो बचपन से मेरे साथ चल रही है , मेरी सारी मुसीबतों को महसूस करती हुई मेरे साथ ही जवान भी हुई और अब उम्र के साथ ज़िन्दगी में घुमड़ती रहती है"।

तन तो केवल तन होता है 
जो होता है मन होता है 

बरखा की बूंदों से कह दो 
भीतर भी सावन होता है 

जिसके पास नहीं हैं सपने 
वो सबसे निर्धन होता है 

किताब की कोई ग़ज़ल रुबाई दोहा ऐसा नहीं है जिसे आप तक पहुँचाने में मुझे आनंद न आये लेकिन सारी की सारी किताब तो यहाँ नहीं प्रस्तुत की जा सकती। इसके लिए तो आपको "वाणी प्रकाशन" वालों को लिखना होगा या उन्हें 01123273167 पर फोन करना होगा , वैसे ये किताब ऑन लाइन भी उपलब्ध है। आप पढ़ना चाहें तो जरूर मंगवा ले और कुछ नहीं तो इकराम साहब को उनके मोबाईल न 09829078682 पर फोन करके उन्हें इस लाजवाब किताब के लिए बधाई दें। चलते चलते आईये आपको पढ़वाता हूँ इकराम साहब के कुछ चुनिंदा शेर :

चमन के पास से गुज़रो तो खुशबू लगने लगती है 
मैं हिंदी ऐसे लिखता हूँ कि उर्दू लगने लगती है 
*** 
विदा करते हैं जब माँ बाप घर से अपनी बेटी को
किसी कोने में छिप कर उस का बचपन बैठ जाता है 
*** 
काश फिर से वही दादी वही नानी आये 
लौट कर फिर से रजाई में कहानी आये 
*** 
चन्दन बना के खुद को ही पछता रहे हैं हम
सारे के सारे सांप हमीं से लिपट गए 
*** 
बताया नाम उसने राम अपना और यूँ बोला 
मैं घर का पेट भरने के लिए रावण बनाता हूँ 
***
तेरी सूरत अगर एक पल सोच ली 
ऐसा लगता है पूरी ग़ज़ल सोच ली

10 comments:

yashoda Agrawal said...

आपकी लिखी रचना आज "पांच लिंकों का आनन्द में" मंगलवार 13 फरवरी 2018 को साझा की गई है......... http://halchalwith5links.blogspot.in/ पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (13-02-2018) को दही जमाना छोड़ के, रही जमाती धाक; चर्चामंच 2877 पर भी होगी।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
--
महाशिवरात्रि की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

MAHI said...

लाज़वाब व्यक्तित्व और लाज़वाब कृतित्व । उफ़ मेरे पास के कस्बे के हैं मगर मेरा सौभाग्य नहीं हो पाया लभी तक जनाब इकराम राजस्थानी साहब से मिलने का ।

लेखन की बात तो माशाल्लाह । अबके शायद मिल सकूँ । आपमें पुनः ध्यान दिला दिया ।

आभार आपका

mgtapish said...

Bakamaal bemisaal waaaaaah waaaaaah

Amit Thapa said...

जैसा नीरज जी ने लिखा की उनकी बात वो कहा से शुरू करे वैसे ही आज मुझे भी ये समझ नहीं आ रहा है की मैं अपनी टिप्पणी कहा से शुरू करू, हमेशा की तरह शुरुआत में लिखे गये अश’आर से या फिर बचपन में सुने गये गीतों से।

खैर इस उलझन से बचते हुए शुरुआत करते है इकराम राजस्थानी साहब के गीतों से जो ना जाने एक समय में मैंने कितनी बार सुने और गुनगुनाये है "अंजन की सीटी में मारो मन डोले", "पल्लो लटके गोरी को पल्लो लटके"; शायद ही उस समय पता था की इन गीतों के रचियता की गजलें और शेर भी एक दिन पढने को मिलेंगे।

अब आते है इकराम साहब की गजलों पे जों की उनके गीतों से कही भी कमतर नहीं है।

छल, कपट, पाखंड का कुछ झूठे आभासों का है
सारा जीवन चन्द चालों और कुछ पासों का है

जिन्दगी का शब्दों में बेहतरीन चित्रण, कैसे हम जिंदगी को आम तौर पे आगे ले जाते है।

ये मोहब्बत के तकाज़े दोस्ती रिश्तों की डोर
वहम है सारा फ़क़त, ये खेल विश्वासों का है

रिश्ते सिर्फ विश्वास पे चलते है चाहे दोस्ती के हो चाहे खून के बिना विश्वास के सब बेकार है

तैरती इक लाश को देखा तो दिल ने ये कहा
आदमी का कुछ नहीं बस बोझ तो साँसों का है

इस शेर को पढ़ कर मुझे पंजाबी के कवि 'शिव कुमाव बटालवी' का एक इंटरव्यू याद आ गया जिसमे उन्होंने कहा था हम सब स्लो सुसाइड कर रहे है धीरे धीरे आत्महत्या कर रहे।
हमे नहीं पता जिन्दगी क्यों और कैसे जीनी है बस जी रहे है और एक दिन मर रहे है फिर उसके बाद हमारा कोई नाम लेवा नहीं है; बस जिन्दगी का बोझ उठाये घूम रहे है।

पलकों पे आंसुओं को यूँ मेहमान मत रखो
काग़ज़ की कश्तियों में ये सामान मत रखो

दिल है,धड़क रहा है,कोई कम तो नहीं है
पेशानी को हर वक़्त, परेशान मत रखो

तुम चाहते हो घर को महकता हुआ अगर
तो घर में फिर ये कागज़ी गुलदान मत रखो

बहुत आसान शब्दों में खुशगवार जिन्दगी का ताना बाना बना दिया है शायर ने; गर आप एक बेहद खुशगवार और बेहतरीन जिन्दगी जीना चाहते है तो इस ग़ज़ल को अमल में लाये।

ऐ मेरे दोस्त रोक ले अब मत बढ़ा इसे
मुझको तो तेरा हाथ भी खंज़र दिखाई दे

आज की तारीख में किसी पे यकीं करे कैसे करे; दोस्त दोस्त ना रहे, विश्वास तो अब शायद बचा ही नहीं है।


अब ढूंढ रहा हूँ मैं किसी ऐसे शख़्स को
काँधे पे जिसके अपना ही इक सर दिखाई दे

आज की दुनिया का दोहरा चरित्र बताता ये शेर

लाज़िम है अपनी जान को छिप कर बचाइए
जब भी बचाने वालों का लश्कर दिखाई दे

पिछले अश’आर से बिलकुल अलग आज की दुनिया का वर्णन करते ये अश’आर; हम सब अब सिर्फ अपने स्वार्थ के वशीभूत है बस।

वास्तव में नीरज जी ने सही कहा है की इकराम साहब गुणों की खान, इतने गजल और काव्य संग्रह और साथ में ना जाने कितनी ही किताबों का राजस्थानी भाषा में काव्यानुवाद; साथ ही बड़ा काम ये की कुरान का हिंदी भाषा में भावानुवाद; इस से हटकर वो लोक संगीत गायक भी है और संगीतज्ञ भी; ऐसी बहुमुखी प्रतिभा को सादर नमन है।


आप के दिन जब सुहाने आ गए
लोग कितने दुम हिलाने आ गए

खोजी कुत्ते चोर निकले ढूंढने
घूम फिर कर सारे थाने आ गए

जीत कर लीडर ने चमचों से कहा
लूट लो अपने ज़माने आ गए

आज की राजनीति, कानून व्यवस्था, सुरक्षा तंत्र पे चोट करती ये ग़ज़ल बिलकुल सटीक है ।

हम सब को इंसान बना दे, ऐ अल्लाह
सबकी इक पहचान बना दे, ऐ अल्लाह

मंदिर में क़ुरआन हो, गीता मस्जिद में
ऐसा हिन्दुस्तान बना दे, ऐ अल्लाह

खुशबू का तो कोई धर्म नहीं होता
मुझको तू लोबान बना दे, ऐ अल्लाह


आज के कुलषित वातावरण में हम धर्म मजहब जात पात से ऊपर उठ इंसान बनने का सन्देश देती ये ग़ज़ल वास्तव में इंसान को इंसान से जुड़ने के प्रेरित करती है।

दुनिया में इबादत के लिए भेजा था तुझको
तू आ के यहाँ बैठा है, घर बार पकड़ कर

ऐसे ही ये शेर बतलाता हम ऐसे ही बेकार ही दुनिया के चक्रव्यूह में फसे रहते है बजाय अच्छे और भलाई के कर्म करने के।

इन्हें संसद का पूरा हक़ है यारों
हज़ारों बार अंदर हो गए हैं

राजनीति के अपराधीकरण पे शायर ने हास्य का पुट लिए हुए एक शानदार व्यंग्य कर दिया है।

चमन के पास से गुज़रो तो खुशबू लगने लगती है
मैं हिंदी ऐसे लिखता हूँ कि उर्दू लगने लगती है

शायर भी ये ही मानता है की हिंदी उर्दू कोई अलग जुबां नहीं है, हिंदी उर्दू के ऊपर ना जाने कितनी बाते की जा सकती है पता नहीं कब कैसे हिंदी हिन्दुओं और उर्दू मुसलमानों की जुबां में बदल गयी।
गर ऐसा होता तो प्रेमचन्द्र, आनंद नारायण मुल्ला,रघुपति सहाय फिराक गोरखपुरी,कृष्ण बिहारी नूर जैसे बड़े नाम उर्दू लेखन और उर्दू शायरी में ना होते।

Amit Thapa said...

काश फिर से वही दादी वही नानी आये
लौट कर फिर से रजाई में कहानी आये

आजकल के बच्चों के अनुभव से दूर और मेरी पीढ़ी के लोगों का फिर से जी जाने वाला समय; वो ऐसा समय था जिसमे सब कुछ था परिया थी, राजा रानी थी गुड्डे गुडिया का खेल था। उस बिछड़े हुए समय को फिर से याद दिला दिया इस शेर ने

तेरी सूरत अगर एक पल सोच ली
ऐसा लगता है पूरी ग़ज़ल सोच ली

इस बेहतरीन शेर के साथ नीरज जी का तहे-दिल शुक्रिया एक और बेहतरीन शायर से परिचय कराने के लिए और दिल से दुआ की वो ऐसे ही हर सोमवार एक बढ़ कर एक नगीना खोज कर लेट रहे और इकराम साहब को उनकी बेहतरीन रचनाओं के लिए बधाई और उम्मीद की आगे भी उनकी बेहतरीन गजले और नगमे हमे पढने के लिए मिलते रहेंगे।






Unknown said...

आप के दिन जब सुहाने आ गए
लोग कितने दुम हिलाने आ गए
वाकई शीर्ष पर बैठे लोग और उनके खुशामदी लोगो की भीड़ पर गहरा तंज है इकराम साहब की सख्शियत और बहु आयामी फन से रूबरू कराने का शुक्रिया

Arun Dwivedi said...

ऊपर का कमेंट अपना ही है जो नाम से प्रकाशित नही हुआ था आभार आपका इस अजीम शायर से रूबरू कराने का

SATISH said...

Waah waaaah Neeraj Sahib bahut khoob ... ek aur nayab heere se parichay karaya aapne haardik aabhar ... Raqeeb

प्रदीप कांत said...

इकराम साहब सादा ज़बान में बात करने वाले शायर हैं|

बढ़िया