Monday, October 15, 2018

किताबों की दुनिया - 199

अगर ये जानते चुन-चुन के हमको तोड़ेंगे 
 तो गुल कभी न तमन्नाए-रंगो-बू करते
 ***
 दिखाने को नहीं हम मुज़तरिब हालत ही ऐसी है
 मसल है -रो रहे हो क्यों ,कहा सूरत ही ऐसी है 
 मुज़तरिब=बैचैन , मसल =मिसाल 
 *** 
बाद रंजिश के गले मिलते हुए रुकता है जी 
 अब मुनासिब है यही कुछ मैं बढूं ,कुछ तू बढे
 *** 
समझ है और तुम्हारी कहूं मैं तुमसे क्या 
 तुम अपने दिल में खुदा जाने सुन के क्या समझो 
 *** 
 ज़ाहिदे-गुमराह के मैं किस तरह हमराह हूँ 
 वह कहे 'अल्लाह हू ' और मैं कहूं ' अल्लाह हूँ ' 
*** 
दिल वो क्या जिसको नहीं तेरी तमन्नाए - विसाल 
 चश्म क्या वो जिस को तेरी दीद की हसरत नहीं 
 *** 
उस हूरवश का घर मुझे जन्नत से है सिवा
 लेकिन रक़ीब हो तो जहन्नुम से कम नहीं
 *** 
न मारा तूने पूरा हाथ क़ातिल 
 सितम में भी तुझे पूरा न पाया
 *** 
एक दिन भी हमको जीना हिज़्र में था नागवार 
 पर उमीदे-वस्ल में बरसों गुज़ारा हो गया 
 *** 
दिल गिर के नज़र से तेरे उठने का नहीं फिर 
 यह गिरने से पहले ही संभल जाए तो अच्छा 

 नौकरी कैसी भी हो होती नौकरी ही है चाहे वो सरकारी ही क्यों न हो। यूँ सरकारी नौकरी भी आजकल बहुत मज़े की नहीं रह गयी ,प्राइवेट की बात तो छोड़ ही दें। प्राइवेट नौकरी करना ब्लेड की तेज़ धार पे चलने जैसा है ज़रा सा चूके तो या तो कटे या गिरे। प्राइवेट नौकरी मैंने 46 साल की है और मुझे मालूम है कि सबकी अपेक्षाओं पर हमेशा खरे उतरना कितना मुश्किल काम होता है। प्राइवेट नौकरी में एक बॉस होता है जो 98 % खड़ूस किस्म का होता है उसके हज़ारों चमचे होते हैं जो हमेशा उसे खुश रखने में लगे रहते हैं इसके बदले किसी की जान जाये या नौकरी इसकी परवाह उन्हें नहीं होती। कभी कभी प्राइवेट नौकरी में मालिक ही आपका बॉस भी होता है। ये सबसे ख़तरनाक स्थिति होती है. बॉस से तो जैसे तैसे निपटा जा सकता है लेकिन मालिक से ? तौबा तौबा !! उसके चमचों की भीड़ भी बॉस के मुकाबले सौ गुना होती है और ये भी देखा है कि ज्यादातर मालिक कान के कच्चे होते हैं उनके इस अवगुण की वजह से आपकी बरसों की मेहनत पल भर में धूल में मिल सकती है।

 मय्यत को ग़ुस्ल-दीजो न इस ख़ाकसार की 
 है तन पे ख़ाके-कूचाए-दिलबर लगी हुई 

 बैठे भरे हुए हैं खुमे-मै की तरह हम 
 पर क्या करें कि मुहर है मुंह पर लगी हुई 
 खुमे-मै =शराब का मटका 

 निकले है कब किसी से कि उसकी मिज़ा की नोक 
 है फांस सी कलेजे के अंदर लगी हुई 
 मिज़ा=पलक 

 दरअसल होता क्या है कि नौकरी में मिलने वाली सुविधाओं की तरफ तो लोगों का ध्यान जाता है लेकिन उन सुविधाओं को जुटाने में नौकरी पेशा इंसान को जो खतरा उठाना पड़ता है उसे सब नज़र अंदाज़ कर देते हैं. जो लोग ये समझते हैं कि अब प्राइवेट नौकरी करना बहुत मुश्किल और जानलेवा हो गया है वो हमारे आज के शायर के बारे में शायद नहीं जानते जो 1789 में दिल्ली के एक बेहद मामूली और ग़रीब सिपाही शैख़ मुहम्मद रमज़ान साहब के यहाँ पैदा हुए थे। घर पर खाने के लाले पड़े हुए थे ऐसे में उनकी पढाई-लिखाई की तरफ कौन ध्यान देता ? अपने बेटे को पढ़ने के लिए मदरसे भेजने की औकात रमज़ान साहब में थी नहीं लिहाज़ा उन्होंने मोहल्ले के ही एक उस्ताद जनाब हाफ़िज़ गुलाम रसूल साहब से दरख़्वास्त की कि वो उनके बेटे को अपने घर बुला कर जितनी भी जैसी भी दे सकते हैं तालीम दें। रसूल साहब नेक इंसान थे बच्चे की मासूमियत देख पिघल गए और हाँ कर दी।रसूल साहब के यहाँ शेरो शायरी की खूब चर्चा हुआ करती थी क्यूंकि रसूल साहब खुद शायर थे।

 अक्ल से कह दो कि लाये न यहाँ अपनी किताब 
 मैं हूँ दीवाना अभी घर से निकल जाऊँगा 

 दिल ये कहता है कि तू साथ न ले चल मुझको
 जा के मैं वां तेरे काबू से निकल जाऊँगा 

 जा पड़ा आग में परवाना दमे-गर्मीए-शौक़ 
 समझा इतना भी न कमबख़्त कि जल जाऊंगा 
 दमे-गर्मीए-शौक़=प्रेमालाप के क्षण में 

 रसूल साहब के यहाँ ही रमज़ान साहब के बेटे जनाब शैख़ इब्राहिम 'ज़ौक़', जिनकी शायरी के संकलन की किताब "शेख़ इब्राहिम ज़ौक़ -जीवनी और शायरी " जिसे डा राजेंद्र टोकी साहब ने सम्पादित किया है की चर्चा आज कर रहे रहे हैं , के साथ मीर काज़िम हुसैन 'बेकरार' भी पढ़ा करते थे। एक बार बेकरार साहब ने ज़ौक़ साहब को एक ग़ज़ल सुनाई , ग़ज़ल ज़ौक़ साहब को बहुत पसंद आयी और पूछा कि मियां आपके उस्ताद कौन हैं ? बेकरार साहब ने फ़रमाया कि जनाब 'शाह नसीर साहब'। ज़ौक़ साहब तब अपनी एक ग़ज़ल शाह नसीर साहब के पास ले गए और उन्हें अपना उस्ताद मान लिया। ज़ौक़ अपनी ग़ज़लें शाह साहब को दिखाने लगे. मियां इब्राहिम ज़ौक़ की शायरी अपने उस्ताद की शायरी से जब बेहतर होने लगी तभी शाह साहब में गुरु द्रोणाचार्य की आत्मा प्रवेश कर गयी और उन्होंने ज़ौक़ से एकलव्य की तरह अंगूठा तो नहीं माँगा लेकिन ये जरूर कहा कि तुम इतना बकवास कहते हो बरखुरदार मुझे यकीन हो गया है कि शायरी तुम्हारे बस की बात नहीं , अच्छा होगा कि तुम शायरी छोड़ कर जामा मस्जिद की सीढ़ियों पे जा के लोगों को चने बेचो। ज़ौक़ उदास वाकई जामा मस्जिद की सीढ़ियों पे बैठ रोने लगे। उन्हें रोता हुआ देख एक बुजुर्गवार जनाब मीर कल्लू 'हक़ीर'जो उधर से गुज़र रहे थे रुक गए। ज़ौक़ ने कारण बताया , हक़ीर तुरंत शाह साहब की नियत समझ गए। उन्होंने कहा बरखुरदार परसों ईद है और उस मौके पे जामा मस्जिद के पास होने वाले मुशायरे में तुम अपनी ग़ज़ल पढ़ना। ज़ौक़ साहब ने बात मान ली और मुशायरे में ये ग़ज़ल पढ़ी :


 हम रोने पे आ जाएँ तो दरिया ही बहा दें 
 शबनम की तरह से हमें रोना नहीं आता 

 हस्ती से ज़ियादा है कुछ आराम अदम में 
 जो जाता है वां से वो दोबारा नहीं आता 
 अदम=परलोक 

 किस्मत ही से नाचार हूँ ऐ 'ज़ौक़' वगर्ना 
 सब फ़न में हूँ मैं ताक़ मुझे क्या नहीं आता 
 ताक़=माहिर, दक्ष 

 एक सत्तर अठ्ठारह साल के लड़के के मुंह से ऐसी ग़ज़ल इस से पहले किसी ने नहीं सुनी थी। समझिये उन्होंने मुशायरा ही लूट लिया उस दिन। लोगों की ज़बान पर उनके शेर और नाम चढ़ गया। शहर में होने वाले मुशायरों में उन्हें बुलाया जाने लगा लेकिन उनकी शोहरत शहर की गलियों से क़िले तक नहीं पहुँच पायी जहाँ अकबर शाह द्वितीय बादशाह थे। बादशाह को तो शायरी से कोई लेना देना नहीं था लेकिन उनके बेटे बहादुर शाह ज़फर शायरी के दीवाने थे। ज़फर किले में अक्सर मुशायरे करवाते थे जिसमें वो दूसरे शायरों को सुनते कम और अपनी शायरी ज्यादा सुनाया करते थे। एक आम सिपाही के बेटे का क़िले की दीवारों को पार कर अंदर पहुंचा इतना आसान नहीं था। अगर सिर्फ़ पत्थर की दीवारें होतीं तो भी वो कोशिश करते लेकिन दीवारें तो रसूख़ वाले शायरों की थीं जो किसी हाल में एक नए शायर को अंदर नहीं आने देना चाहते थे। ये परम्परा तो वैसे आज तक चली आ रही है अगर आपको कोई प्रमोट करने वाला नहीं है फिर आप चाहे कितने ही बड़े शायर हों आपको कोई मान्यता नहीं देगा, सरकारी ईनाम मिलने की तो बात ही जाने दीजिये। आखिर कोशिशों के बाद किले के मुशायरों में शिरकत करने वाले एक नेक दिल शायर ने उनके बारे में ज़फर साहब को बता ही दिया। अगले ही मुशायरे में ज़फर साहब ने उन्हें शिरकत करने का न्योता भेज दिया। ज़ौक़ साहब तशरीफ़ लाये जिन्हें देख ज़फर हैरान रह गए , इतनी कम उम्र में ये लड़का क्या शायरी करेगा ?खैर अब बुलाया है तो सुन लेते हैं। मुशायरा शुरू हुआ और ज़ौक़ साहब ने शमा अपने सामने आने पे ये ग़ज़ल पढ़ी :

दरियाए-अश्क चश्म से जिस आन बह गया 
 सुन लीजिओ कि अर्श का ऐवान बह गया 
 दरियाए-अश्क=आंसू की नदी , ऐवान =महल 

 ज़ाहिद ! शराब पीने से क़ाफ़िर हुआ मैं क्यों 
 क्या डेढ़ चुल्लू पानी में ईमान बह गया 

 कश्ती-सवारे-उम्र है बहरे-फ़ना में हम 
 जिस दम बहा के ले गया तूफ़ान , बह गया 

 उसके बाद तो ज़ौक़ नियमित रूप से किले के मुशायरों में बुलाये जाने लगे। शहज़ादे ज़फर के पास बहुत धन दौलत तो थी नहीं ,बादशाह भी अपनी एक बेग़म की मोहब्बत में गिरफ्तार होने के कारण ज़फर की जगह उसके बेटे को गद्दी सौंपना चाहते थे। ज़फर को महज़ 500 रु महीने में अपना गुज़ारा करना होता था। ज़फर की माली हालत देख कर उनके उस्ताद एक एक कर के उनसे कनारा कर दूसरी रियासतों की तरफ जाने लगे थे। एक बार ज़फर ने अपनी एक ग़ज़ल ज़ौक़ साहब को दिखाई और उनकी इस्लाह से इतने मुत्तासिर हुए कि उन्हें अपना उस्ताद मान लिया और चार रूपये महीना तनख्वाह पर किले में ही मुलाज़िम रख लिया। दिन गुज़रते रहे ज़फर आखिर बादशाह सलामत बने तब ज़ौक़ सिर्फ सात रुपये महीना के मुलाज़िम ही थे। बादशाह बनते ही चमचों की भीड़ उनके चारों और खड़ी हो गयी। चमचों की चांदी हो गयी और अदीब भूखे मरते रहे। ये ही कल होता रहा है ये ही आज हो रहा है ये ही कल होता रहेगा। मुख्तार मिर्ज़ा मुग़ल जो बादशाह के मंत्री थे ज़ौक़ को पसंद नहीं करते थे उन्होंने अपने चमचे पूरे दरबार में भर लिए और शाही ख़ज़ाने को दीमक की तरह चाटने लगे। आखिर पाप का घड़ा फूटा मिर्ज़ा और उनके चमचों को धक्के दे कर किले से निकाल दिया। ज़ौक़ साहब की तनख्वाह पहले 30 रु और फिर 100 रु महीना कर दी जो दरबार के बाकि दरबारियों से बहुत ही कम थी लेकिन ज़ौक़ ने कभी इस बात का गिला नहीं किया।

 कहीं तुझको न पाया गरचे हमने इक जहाँ ढूँढा 
 फिर आखिर दिल ही में देखा बगल ही में से तू निकला

 खजिल अपने गुनाहों से हूँ मैं यां तक कि जब रोया  
तो जो आंसू मेरी आँखों से निकला सुर्खरू निकला 
 खजिल=शर्मिंदा 

 उसे अय्यार पाया यार समझे ज़ौक़ हम जिसको
 जिसे यां दोस्त हमने अपना जाना वो उदू निकला 
 अय्यार =चालाक , उदू =दुश्मन 

 ज़ौक़ अब शहज़ादे ज़फर के नहीं बादशाह ज़फर के उस्ताद हो गए थे लिहाज़ा लोगों की बद-नज़रों का शिकार होने लगे। बादशाह के चमचे उन्हें हर वक्त किसी न किसी वज़ह से नीचा दिखाने में लगे रहते और तो और बादशाह सलामत जो खुद सनकी थे उनकी ऊटपटांग ढंग से परीक्षा लिया करते। प्राइवेट नौकरी में आने वाली जो भी तकलीफें मैंने ऊपर बयां की हैं वो ज़ौक़ साहब रोज़ाना झेलने लगे। अब देखिये बादशाह सलामत अपने महल की खिड़की पे खड़े हैं चमचे भी हैं और उस्ताद ज़ौक़ भी तभी किले के बाहर से एक चूरन बेचने वाला अजब से तरन्नुम में आवाज़ लगा कर चूरन बेच रहा है तभी एक चमचा ज़ौक़ साहब से कहता है उस्ताद जी इस तरन्नुम पे एक ग़ज़ल हो जाये तो बादशाह सलामत खुश हो जायेंगे। बादशाह चमचे की बात पर सर हिलाते हुए कहते हैं हाँ हाँ क्यों नहीं -हो जाये उस्ताद। ज़ौक़ साहब मन ही मन चमचे को गलियां देते हुए लेकिन ऊपर से मुस्कुराते हुए उसी तरन्नुम में ग़ज़ल कहने लगते हैं और खुद को इस नौकरी के लिए लानत भेजते हैं।

 देखा आखिर को न फोड़े की तरह फूट बहे 
 हम भरे बैठे थे क्यों आपने छेड़ा हमको 

 तू हंसी से न कह मरते हैं हम भी तुझ पर
 मार ही डालेगा बस रश्क हमारा हमको 

 वस्ल का उसके तसव्वुर तो बंधा रहता है 
 तो मज़े हिज़्र में भी आते है क्या क्या हमको 

 प्राइवेट नौकरी की एक और त्रासदी देखिये अगर कहीं ज़ौक़ साहब ने कोई ग़ज़ल कही जो बादशाह सलामत तक पहुँच गयी तो बादशाह सलामत तुरंत उसी ज़मीन और रदीफ़ काफिये पर अपनी एक ग़ज़ल कह कर उस्ताद के लिए इस्लाह के लिए भेज देते अब उस्ताद अगर उस ग़ज़ल को अपने से घटिया मानें तो बादशाह की नाराज़गी मोल लेने का खतरा खड़ा हो सकता था और अगर अपने से बढ़िया कह दें तो अपना ही लिखा ख़ारिज करने का दुःख झेलना पड़ता था। इसके बावजूद ज़ौक़ साहब ने ग़ज़ल कहना नहीं छोड़ा और न ही छोड़ी नौकरी। अपने सरल स्वाभाव के कारण उन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी एक ही मकान में काट दी जो मकान कम कबूतरों का बाड़ा ज्यादा लगता था। अगर चाहते तो बादशाह सलामत से कह कर अपने लिए कोई ढंग का मकान ले सकते थे लेकिन अपने कम बोलने की आदत के चलते चुप ही रहे और बादशाह को कहाँ इतनी फुर्सत कि वो जाने कि उनके उस्ताद किस हाल में कहाँ रहते हैं। यूँ बादशाह अगर अपने मुलाज़िमों की खोज खबर लेने लगें तो हो गयी बादशाही। ये वो परम्परा है जो सदियों से चली आ रही है चलती रहेगी। आप ही बताएं हमारे आज के बादशाहों को कुछ ख़बर भी है कि उनकी अवाम किस हाल में रहती है ? अदीबों का हाल जो उस वक्त था उस से बदतर अब है।

 दिन कटा, जाइये अब रात किधर काटने को
 जब से वो घर में नहीं, दौड़े है घर काटने को 

 हाय सैय्याद तो आया मेरे पर काटने को 
 मैं तो खुश था कि छुरी लाया है सर काटने को 

 वो शजर हूँ न गुलो-बार न साया मुझमें 
 बागबां ने लगा रक्खा है मगर काटने को 

 ये तो आप जानते ही होंगे कि ग़ालिब मोमिन और ज़ौक़ साहब एक ही दौर के शायर हुए हैं और वो भी दिल्ली के और तीनो ही अपने फ़न में माहिर , कोई किसी से कम नहीं। तीनों में आपसी रंजिश भी थी लेकिन सौदा और मीर की तरह नहीं। तीनों एक दूसरे को पसंद नहीं करते थे लेकिन एक दूसरे की अच्छी शायरी की तारीफ़ जरूर किया करते थे। ग़ालिब, जो अपने आपको सर्वश्रेष्ठ समझते थे, को ये मलाल था कि किले में जो रुतबा ज़ौक़ साहब को मिला हुआ था उसके सच्चे हक़दार वो खुद थे। अवाम की तरह ग़ालिब को भी ज़ौक़ साहब हाथी पर चांदी के हौदे में बैठे तो नज़र आते थे लेकिन हाथी को पालने में ज़ौक़ साहब को क्या क्या पापड़ बेलने पड़ते थे उसका शायद अंदाज़ा नहीं था। जिस इंसान को अपना घर चलाने में दिक्कत महसूस हो रही हो उसे अगर साथ में हाथी भी पालना पड़े तो सोचिये क्या हाल होगा। बादशाह होते ही ऐसे हैं खुश हुए तो ज़ौक़ साहब को चांदी के हौदे के साथ हाथी ईनाम में दे दिया। प्राइवेट नौकरी में आप ये नहीं पूछ सकते कि हुज़ूर ये आप मुझे ईनाम दे रहे हैं या मुझसे हर्ज़ाना ले रहे हैं।

 अब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जायेंगे 
 मर गए पर न लगा जी तो किधर जाएंगे 

 हम नहीं वो जो करें खून का दावा तुझ पर 
 बल्कि पूछेगा खुदा भी तो मुकर जाएंगे

 'ज़ौक़' जो मदरसे के बिगड़े हुए हैं मुल्ला
 उनको मैखाने में ले आओ ,संवर जाएंगे 

 ज़ौक़ साहब को वर्तमान आलोचकों ने उनके समकालीन शायरों के मुकाबले बहुत कम आँका है ,उन्होंने इस बात को नज़र अंदाज़ कर दिया कि ज़ौक़ साहब ने उम्र भर अपने काँधे पर सल्तनते-मुग़लिया के भारी भरकम ताजिये बहादुर शाह ज़फर को ढोया है और साथ ही उर्दू अदब को कुछ ऐसी चीज़ें दे गए जिनका आज की अस्थिर मनोवैज्ञानिक पृष्ठ-भूमी में कुछ महत्त्व न मालूम हो किन्तु जिसमें बिला शक कुछ स्थाई मूल्य निहित हैं जिससे किसी ज़माने में इंकार नहीं किया जा सकता। ज़ौक़ अपने शागिर्दों से उम्र और रुतबे में कम थे। ज़ौक़ की शायरी में लफ़्ज़ों को बरतने का जो सलीका मिलता है वो कमाल है इसके साथ ही उनकी ग़ज़लों में ज़बान की सादगी और चुस्ती ग़ज़ब की नज़र आती है। ज़ौक़ जिस ज़माने के शायर थे उस ज़माने में मुश्किल बहरों में कहने की रवायत थी लेकिन ज़माने के चलन को दरकनार करते हुए उन्होंने आसान लफ़्ज़ों को चुना। रिवायतों के खिलाफ जाने के लिए आपमें ग़ज़ब का आत्मविश्वास होना चाहिए जो ज़ौक़ साहब में था.

 मरते हैं तेरे प्यार से हम और जियादा 
 तू लुत्फ़ में करता है सितम और जियादा 

 वो दिल को चुरा कर जो लगे आँख चुराने 
 यारों का गया उनपे भरम और जियादा 

 क्यों मैंने कहा तुझसा खुदाई में नहीं और
 मगरूर हुआ अब वो सनम और जियादा 

 ज़ौक़ साहब के बारे में इतना कुछ है बताने को कि ऐसी बहुत सी पोस्ट्स लिखनी पढ़ें। ज़ौक़ ता उम्र लिखते रहे , कहा जाता है कि वो अपनी मृत्यु, जो सं 1854 में हुई थी ,के तीन घंटे पहले तक शेर कहते रहे थे। अगर आपको ज़ौक़ साहब और उनकी शायरी पढ़ने की दिली तमन्ना है तो इस पुस्तक के लिए आप 'अंगूर प्रकाशन' W A -170 -A -6 शकरपुर, दिल्ली को लिखें या फिर उन्हें +91-11-22203411पर संपर्क करें , वैसे आसान तो ये रहेगा कि आप इस किताब को अमेज़न से ऑन लाइन मंगवा लें। चलते चलते आईये आपको ज़ौक़ साहब की वो ग़ज़ल पढ़वाते हैं जिसे कुंदन लाल सहगल साहब ने अपनी आवाज़ दे कर अमर कर दिया , अगर आपने ये ग़ज़ल नहीं सुनी तो अभी की अभी यू ट्यूब का सहारा लें , फिर न कहना बताया नहीं :

 लायी हयात आये , क़ज़ा ले चली , चले 
 अपनी ख़ुशी न आये न अपनी ख़ुशी चले 

 बेहतर तो है यही कि न दुनिया से दिल लगे 
 पर क्या करें जो काम न बे दिल-लगी चले 

 हो उम्रे-ख़िज़्र भी तो कहेंगे ब-वक्ते-मर्ग 
 हम क्या रहे यहाँ अभी, आये अभी चले 
 उम्रे-ख़िज़्र=अमर , ब-वक्ते-मर्ग=मरते समय

 दुनिया ने किस का राहे-फ़ना में दिया है साथ 
 तुम भी चले चलो यूँही जब तक चली चले

Monday, October 8, 2018

किताबों की दुनिया -198

"तशरीफ़ लाइए हुज़ूर" ख़िदमदगार फर्शी सलाम करता हुआ हर आने वाले को बड़े अदब से अंदर आने का इशारा कर रहा था। दिल्ली जो अब पुरानी दिल्ली कहलाती है में इस बड़ी सी हवेली, जिसके बाहर ये ख़िदमतगार खड़ा था, को फूलों से सजाया गया था। आने जाने वाले लोग बड़ी हसरत से इसे देखते हुए निकल रहे थे क्यूंकि इसमें सिर्फ वो ही जा पा रहे थे जिनके पास एक तो पहनने के सलीक़ेदार कपडे थे और दूसरे हाथ में वो रुक्का था जिसमें उनके तशरीफ़ लाने की गुज़ारिश की गयी थी ,उस रुक्के को आज की भाषा में एंट्री पास कहते हैं। जिस गली में ये हवेली थी उसे भी सजाया गया था। ये तामझाम देख कर इस बात का अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं था कि कोई खास ही मेहमान यहाँ आने वाला है. तमाशबीन खुसुर पुसुर करते हुए क़यास लगा रहे थे लेकिन किसी के पास भी पक्की खबर नहीं थी। कुछ रईस लोग घोड़े पर और कुछ बग्घियों में तशरीफ़ ला रहे थे। आईये हम भी अंदर चलते हैं ,यहाँ कब तक खड़े रहेंगे ?

 वां तू है ज़र्द-पोश , यहाँ मैं हूँ ज़र्दरंग 
 वां तेरे घर बसंत है याँ मेरे घर बसंत 
 ज़र्द-पोश =पीले कपडे पहने हुए , ज़र्द रंग =पीले रंग का (पीतवर्ण )  

ये किसके ज़र्द चेहरे का अब ध्यान बंध गया
 मेरी नज़र में फिरती है आठों पहर बसंत 

 उस रश्के-गुल के हाथ तलक कब पहुँच सके 
 सरसों हथेली पर न जमाये अगर बसंत 

अंदर घुसते ही हमें एक बड़ा सा दालान दिखाई देता है जिसके चारों तरफ़ खूबसूरत इमारत बनी हुई है। दालान में चांदनी का चमचमाता फर्श बिछा है और इमारत पर चारों और फूल मालाएं लटक रही हैं। एक और ख़िदमदगार सलाम करते हुए हमें और अंदर की तरफ जाने का इशारा करता है। अहा- अंदर के दालान की ख़ूबसूरती बयां नहीं की जा सकती। दालान के चारों और बने बरामदों पर रंगबिरंगे रेशमी परदे लटक रहे हैं। इत्र की खुशबू हर ओर महक रही है। दालान के बीचों बीच एक चबूतरा है जिसके चारों और मख़मली कालीन बिछे हैं ,थोड़ी थोड़ी दूरी पर उनपर रेशमी खोल चढ़े तकिये रखें हैं जिनपर कढ़ाई की गयी है। चबूतरे पर गद्दे बिछे हैं गद्दों पर कीमती चादर बिछी है और सफ़ेद रंग के रेशमी गाव तकिये रखे हैं. हमें भी सबकी देखा देखी चबूतरे पर बैठे एक निहायत खूबसूरत शख़्स को सलाम करना है और कालीन पर बैठ जाना है। आप बैठिये न, देखिये यूँ टकटकी लगाकर देखने की इज़ाज़त यहाँ किसी को नहीं है।

 थी वस्ल में भी फ़िक्रे-जुदाई तमाम शब् 
 वो आये तो भी नींद न आई तमाम शब 

 यकबार देखते ही मुझे ग़श जो आ गया 
 भूले थे वो भी होश रुबाई तमाम शब 

 मर जाते क्यों न सुबह के होते ही हिज़्र में 
 तकलीफ़ कैसी-कैसी उठाई तमाम शब

 मैं आपको दोष नहीं देता क्यूंकि चबूतरे पर गाव तकिये के सहारे बैठे शख्स की शख़्सियत है ही ऐसी कि बस देखते रहो मन ही नहीं भरता। जिसकी बड़ी बड़ी आँखें हैं ,लम्बी पलकें हैं ,पतले होंठ हैं जिन पर पान का लाखा जमा है ,मिस्सी लगे दांत हैं, हल्की मूंछे हैं सुन्दर तराशी हुई दाढ़ी है ,मांसल भुजाएं हैं ,चौड़ा सीना है ,सर पर घुंघराले बाल हैं जो पीठ और कंधे पर बिखरे हुए हैं ,बदन पर शरबती मलमल का अंगरखा है लेकिन उसके नीचे कुरता नहीं पहना हुआ है लिहाज़ा इस वजह से उनके शरीर का कुछ भाग खुला दिखाई देता है ,गले में काले धागे में बंधा सुनहरी तावीज़ है ,लाल गुलबदन रेशमी कपडे का मोहरियों पर से तंग लेकिन ऊपर जाकर थोड़ा सा ढीला पायजामा पहना है, सर पर दुपल्लू टोपी है जिसके किनारों पर बारीक लैस लगी है -ऐसे शख़्स को कोई टकटकी लगा कर न देखे तो क्या करे ?

 कुछ क़फ़स में इन दिनों लगता है जी 
 आशियाँ अपना हुआ बर्बाद क्या 
 क़फ़स =पिंजरा 

 है असीर उसके वो है अपना असीर 
 हम न समझे सैद क्या सय्याद क्या 
 असीर =बंदी , सैद =शिकार 

 क्या करूँ अल्लाह सब है बे-असर 
 वलवला क्या नाला क्या फ़रियाद क्या 

 अचानक सरगर्मियां कुछ तेज हो गयीं -हुज़ूर आ गए, हुज़ूर आ गए का शोर होने लगा। देखा तो पूरे लवाजमे के साथ मुग़लिया दरबार के शायर-ए-आज़म और नवाब बहादुर शाह ज़फर साहब के उस्तादे मोहतरम जनाब मोहम्मद इब्राहिम ज़ौक़ साहब तशरीफ़ ला रहे हैं। सब लोग अपनी जगह खड़े हो गए। चबूतरे पर से उतर कर उस हसीं नौजवान ने उनका इस्तक़बाल किया दुआ सलाम की और उन्हें बड़े एहतराम के साथ चबूतरे पर अपने पास बिठाया। उस दिलकश नौजवान की आँखें अभी भी दरवाज़े की और लगीं हुई थीं। किसी का इंतज़ार था शायद। किसका ? ज़ौक़ साहब ने नौजवान के कंधे पर हाथ रखा और कहा 'मोमिन' साहब कुछ सुनाइये ,भाई हमसे तो और इंतज़ार नहीं होता। आपको ये बता दूँ कि चबूतरे के नीचे बैठे साजिंदे जिनमें एक के पास हारमोनियम एक के पास तबला और एक के पास सारंगी एक के पास वीणा थी , ऊपर बैठे नौजवान के इशारे का इंतज़ार ही कर रहे थे. अब जब ज़ौक़ साहब ने उस नौजवान का नाम उजागर कर ही दिया है तो ये बताने के सिवा हमारे पास और चारा क्या है कि किताबों की दुनिया में इस बार जनाब 'कलीम आनंद' साहब द्वारा संकलित "मोमिन की शायरी" किताब ,जो हमारे सामने खुली हुई है, की बात हो रही है। इशारा हुआ, साज बजने लगे और मोमिन साहब ने गला खंखारते हुए लाजवाब तरन्नुम के साथ ये ग़ज़ल शुरू की :


 मैंने तुमको दिल दिया तुमने मुझे रुसवा किया 
 मैंने तुमसे क्या किया और तुमने मुझसे क्या किया 

 रोज़ कहता था कहीं मरता नहीं, हम मर गए 
 अब तो खुश हो बे-वफा तेरा ही ले कहना किया 

 रोइये क्या बख़्ते- खुफ्ता को कि आधी रात से 
 मैं इधर रोया किया और वो वहाँ सोया किया 
बख़्ते- खुफ्ता = सोया हुआ भाग्य  

सुरों की बरसात में भीगे ग़ज़ल के शेरों ने लोगों को वो कर दिया जो करना चाहिए था -पागल। सुभानअल्लाह सुभानअल्लाह की आवाज़ें चारों तरफ से आने लगीं ,तालियां रुकने का नाम ही नहीं ले रही थीं। 'मोमिन' के गले का जादू सब के सर चढ़ कर बोल रहा था। पूरी दिल्ली में ऐसा खूबसूरत ,सलीकेदार और सुरीला शायर दूसरा नहीं था. हकीम गुलामअली खां जो कश्मीर से दिल्ली आकर बस गए थे का ये बेटा मोमिन न सिर्फ अपनी 'शायरी' बल्कि एक योग्य चिकित्सक और जबरदस्त ज्योतिषी के रूप में भी पूरी दिल्ली में मशहूर थे। एक मशहूर कहावत कि "खुदा जब देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है" मोमिन साहब पर पूरी तरह सच उतरती थी। आज ये मजलिस उनके जनम दिन की ख़ुशी में उनकी हवेली में सजाई गयी थी जिसमें दिल्ली ही नहीं उसके आसपास के बड़े बड़े रईस और शायरी के दीवाने बुलाये गए थे। हम तो आप जानते हैं रईस तो हैं नहीं सिर्फ शायरी के दीवाने हैं लिहाज़ा इस वजह से बुलाये गए और आप क्यूंकि हमारे अज़ीज़ हैं इसलिए हम आपको भी साथ ले आये। ज़ौक़ साहब ने उठ कर मोमिन को गले लगा लिया और बोले भाई एक और -मोमिन ने सर झुकाया साजिंदों को इशारा किया और गाने लगे :

 वो जो हममें तुममें करार था तुम्हें याद हो कि न याद हो
 वही यानी वादा निबाह का तुम्हें याद हो कि न याद हो

 वो जो लुत्फ़ मुझपे थे पेश्तर वो करम कि था मेरे हाल पर
 मुझे सब है याद ज़रा-ज़रा तुम्हें याद हो कि न याद हो

 वो नए गिले वो शिकायतें वो मज़े-मज़े की हिकायतें
 वो हरेक बात पे रूठना तुम्हें याद हो कि न याद हो
हिकायतें =कहानियां  

हर शेर पर आसमान शोर से फट रहा था मुकर्रर सुभान अल्लाह वाह कहते लोग थक नहीं रहे थे किसे पता था कि ये ग़ज़ल उर्दू शायरी में मील का पत्थर कहलाएगी और बरसों बाद भी इसकी ताज़गी बनी रहेगी। लाजवाब अशआर बेमिसाल तरन्नुम। ज़ौक़ साहब ने मोमिन के लिए दुआओं के दरवाज़े खोल दिए। तभी एक दुबला पतला इंसान ढीली ढाली शेरवानी और तुर्की टोपी पहने नमूदार हुआ। 'मोमिन' को जैसे इन्हीं का इंतज़ार था, चबूतरे से तेजी से उठे और दौड़ते हुए उनके गले लग गए। कमर में हाथ डाले बड़े प्यार से उन्हें चबूतरे पर अपने साथ ही बिठाया। ज़ौक़ साहब ने उन्हें देख कर मुंह बिचकाया बोले आओ मियां असद, तुम्हारा ही इंतज़ार कर रहे थे शायद मोमिन मियां। मिर्ज़ा असद-उल्लाह बेग ख़ां उर्फ “ग़ालिब के आते ही महफ़िल और भी गरमा गयी। ग़ालिब ने मुस्कुराते हुए मोमिन को मुबारकबाद दी और ज़ौक़ साहब से पूछा हुज़ूर और सब खैरियत ? ज़ौक़ साहब हाँ और ना के बीच झूलते हुए कुछ बोल नहीं पाए। वो भले मानें न मानें लेकिन पूरी दिल्ली जानती थी कि ग़ालिब ज़ौक़ साहब से हर लिहाज़ से बड़े शायर हैं। ग़ालिब ने मोमिन से कहा आज कुछ ऐसी ग़ज़ल सुनाओ कि तबियत फड़क उठे। मोमिन ने इशारा किया साजिंदों ने साज संभाले और तरन्नुम के साथ अशआर का दरिया बहने लगा :

 असर उसको ज़रा नहीं होता
 रंज राहत-फ़ज़ा नहीं होता 
 राहत-फ़ज़ा =आराम पहुँचाने वाला 

 तुम हमारे किसी तरह न हुए 
 वर्ना दुनिया में क्या नहीं होता 

 उसने क्या जाने क्या किया लेकर
 दिल किसी काम का नहीं होता 

 हाले-दिल यार को लिखूं क्यूँकर 
 हाथ दिल से जुदा नहीं होता 

 तुम मेरे पास होते हो गोया 
 जब कोई दूसरा नहीं होता

 'तुम मेरे पास होते हो गोया ' ग़ालिब ये शेर सुनकर लपक के उठे और मोमिन को कस कर गले लगा लिया ,उन्हें कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि क्या बोलूं ? भर्राये गले से कहा 'मिसरे में गोया लफ्ज़ जोड़ कर मानो शेर को फर्श से अर्श पर बिठा दिया तुमने मोमिन -आह !!! ऐसा करो तुम मेरा पूरा दीवान ले लो और ये एक शेर मुझे दे दो। "आप समझ रहे हैं इस शेर का महत्त्व -जिसकी एवज में ग़ालिब अपना पूरा दीवान देने की बात कर रहे हैं। ग़ालिब जो अपने समकालीन किसी भी शायर की तारीफ़ झूठे मुंह भी नहीं किया करते थे उनके द्वारा इतनी बड़ी बात कहना क्या मायने रखता है आप समझ सकते हैं। छोटी बहर में इसकी टक्कर का शेर आपको पूरी उर्दू शायरी में बहुत कम मिलेंगे बल्कि शायद ही मिलें। कभी कभी एक शेर आपको अमर कर सकता है। मैं हमेशा कहता हूँ ज्यादा लिखना बड़ी बात नहीं अच्छा लिखना बड़ी बात होती है और वो भी सादा लफ़्ज़ों में। मोमिन साहब को तो जैसे ग़ालिब ने सब कुछ दे दिया। इस से बड़ा तोहफ़ा भला क्या होगा ? मोमिन की आँखें छलक गयीं। ग़ालिब को गले लगाते हुए बोले कि ये मेरी ख़ुशक़िस्मती है मैं आप जैसी शख़्शियत को रूबरू देख रहा हूँ आप को सुन रहा हूँ आपको छू सक रहा हूँ। आप बड़े शायर ही नहीं बहुत बड़े इंसान हैं। कैसे कैसे प्यार से भरे लोग हुआ करते थे तब।
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 लिक्खो सलाम ग़ैर के खत में ग़ुलाम को 
 बन्दे का बस सलाम है ऐसे सलाम को 

 अब शोर है मिसाल जो दी उस ख़राम को
 यूँ कौन जानता था क़यामत के नाम को
 ख़राम =चाल 

 जब तू चले जनाज़ाए-आशिक़ के साथ साथ 
 फिर कौन वारिसों की सुने इज़्न-ए-आम को 
 इज़्न-ए-आम=मुसलमानों में अर्थी के ले जाते वक्त मृतक के उत्तराधिकारी लोगों को सार्वजनिक आज्ञा देते हैं कि जो लोग घर जाना चाहें वो जा सकते हैं। 

 आप सोच रहे होने कि इतनी तामझाम और उस पर होने वाले खर्चे को मोमिन साहब किस तरह वहन करते होंगे ? सच ही सोच रहे हैं क्यूंकि इन्होने अपने हुनर को तो कभी पेशा बनाया नहीं। इतने योग्य चिकित्सक होने के बावजूद उन्होंने लोगों के इलाज़ के लिए पैसा नहीं लिया। ज्योतिषी तो ऐसे कि अगर कह दें कि सूरज आज पश्चिम से उगेगा तो सूरज की क्या मजाल जो उनके कहे को टाल दे. लोग उनकी ज्योतिष पर पकड़ देख कर दांतों तले उँगलियाँ दबा लिया करते थे। दरअसल इनके पूर्वज शाही चिकित्सक थे और बड़े जागीरदार थे बाद में उन्हें सरकार से इतनी पेंशन मिलने लगी जो उनके रईसाना ठाट बाट को बनाये रखने के लिए काफी थी। ये वो दौर था जब मुगलिया सल्तनत अपने उतार पर थी और उर्दू शायरी परवान चढ़ रही थी। उर्दू शायरी के स्वर्ण काल का आरम्भ था ये दौर। हिन्दुस्तान छोटी बड़ी रियासतों में बंटा हुआ था वहां के राजा और नवाब अच्छे फ़नकारों के कद्रदान हुआ करते थे। मोमिन साहब को भी रामपुर, टोंक, भोपाल, जहांगीराबाद और कपूरथला राज्यों के नवाब और राजाओं ने अपने यहाँ आने और रहने का निमंत्रण भेजा लेकिन स्वाभिमानी तबियत के चलते दिल्ली रहना ही पसंद किया।

 किसके हंसने का तसव्वुर है शबो-रोज़ कि यूँ 
 गुदगुदी दिल में कोई आठ पहर करता है 
 शबो-रोज़=रातदिन 

 ऐश में भी तो न जागे कभी तुम, क्या जानो 
 कि शबे-ग़म कोई किस तौर सहर करता है

 बख़्ते-बद ने यह डराया है कि काँप उठता हूँ 
 तू कभी लुत्फ़ की बातें भी अगर करता है 
 बख़्ते-बद =दुर्भाग्य 

 सुनो रखो सीख रखो इसको ग़ज़ल कहते हैं
 'मोमिन' ऐ अहले-फ़न इज़हारे-हुनर करता है 
 अहले-फ़न =कलाकारों 

 सच में ये 'मोमिन' का आत्मविश्वास ही है जो ग़ालिब और ज़ौक़ की मौजूदगी में अपने फ़न का इज़हार करते हुए कहता है कि ग़ज़ल कहना मुझसे सीखो। ग़ज़ब के खुद्दार, रसिक, विलासप्रिय, सलीकेदार 'मोमिन' शतरंज के भी उस्ताद थे। पूरी दिल्ली में उनकी टक्कर का शतरंज का कोई खिलाड़ी नहीं था। मोमिन सं 1800 में दिल्ली में पैदा हुए और यहीं सं 1851 में याने सिर्फ 51 साल की उम्र में इस दुनिया-ऐ-फ़ानी से रुख़सत हो गए।उन्होंने ऐलान किया था कि वो 5 दिन ,5 महीने या 5 साल में मर जायेंगे और ये ही हुआ इस एलान के ठीक 5 महीने बाद वो अपनी छत की सीढ़ी से गिर गए और फिर कभी नहीं उठे। वैसे आप क्या सोचते हैं ? मोमिन जैसे शायर कभी मर सकते हैं ? नहीं , जब तक उर्दू शायरी ज़िंदा रहेगी मोमिन उसमें ज़िंदा रहेंगे , वक्त में इतनी ताकत नहीं कि उनका वजूद मिटा दे।

 किसी का हुआ आज, कल था किसी का 
 न है तू किसी का , न होगा किसी का 

 किया तुमने कत्ले-जहाँ इक नज़र में
 किसी ने न देखा तमाशा किसी का 

 न मेरी सुने वो, न मैं नासहों की 
 नहीं मानता कोई कहना किसी का 
 नासहों =नसीहत करने वाले 

 मुझे लगता अब हमें इस महफ़िल से उठ जाना चाहिए क्यूंकि शाम ढलने को है और थोड़ी ही देर में यहाँ जाम छलकने लगेंगे। आप मेरे साथ आएं, आप हालाँकि सूफ़ी नहीं हैं लेकिन इन लोगों की तरह रईस भी नहीं जो इनके साथ बैठ कर जाम टकराएं ,इन्होने हमें यहाँ इतनी देर बैठने दिया ये क्या कम बात है ? हम रास्ते में मोमिन साहब की बात करते रहेंगे। आपको पता है फ़िराक गोरखपुरी साहब ने एक जगह लिखा है कि "मोमिन सूफी आध्यात्मिकता का सहारा लिए बिना ही ठेठ भौतिक प्रेम की बातें इतने चमत्कारपूर्ण प्रभाव के साथ करते थे कि उनके शेर देर तक सुनने वालों के कानों में गूंजते हैं और बहुत से अशआर तो उर्दू साहित्य में मुहावरों और कहावतों का रूप धारण कर चुके हैं। उनकी रचनाएँ काव्य नियमों का पालन करते हुए बहुत सरलता और गति से दिल में उतर जाती हैं। वो नासिख़ की तरह बाल की खाल नहीं निकालते। ग़ालिब और ज़ौक़ के समकालीन होते हुए भी उन्होंने अपनी राह खुद बनाई और क्या ही खूब बनाई "

 दोस्त करते हैं मलामत, गैर करते हैं गिला 
 क्या क़यामत है मुझी को सब बुरा कहने को हैं 

 मैं गिला करता हूँ अपना, तू न सुन गैरों की बात
 हैं यही कहने को वो भी और क्या कहने को हैं 

 हो गए नामे -बुताँ सुनते ही 'मोमिन' बेकरार 
 हम न कहते थे कि हज़रत पारसा कहने को हैं 

 मोमिन के बारे में उर्दू पढ़ने लिखने वालों के लिए तो इंटरनेट, किताबों और रिसालों में बहुत कुछ है लेकिन हिंदी लिख पढ़ने वालों के लिए बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। जो एक मात्र किताब बहुत मशक्कत के बाद मुझे हासिल हुई है उसी का जिक्र मैं कर रहा हूँ इसके अलावा इनकी कुलियात या संकलन देवनागरी में अगर कहीं है तो मुझे उसका इल्म नहीं ,अगर आपके पास कुछ जानकारी है तो जरूर बताएं। इस किताब की प्राप्ति के लिए आप 'मनोज पब्लिकेशन' 1583-84 दरीबां कलां ,चांदनी चौक दिल्ली -6 को लिख सकते हैं या फिर 9868112194 पर पूछ सकते हैं ,ये किताब अमेज़न पर ऑन लाइन भी उपलब्ध है।इस किताब में यूँ तो मोमिन साहब की 100 से ज्यादा ग़ज़लें संगृहीत हैं जिन्हें यहाँ आपको पढ़वा पाना संभव नहीं इसलिए उनकी ग़ज़लों से कुछ चुनिंदा शेर आपकी खिदमत में हाज़िर हैं :

 यारो ! किसी सूरत से तो अहवाल जता दो
 दरवाज़े पर उसके मेरी तस्वीर लगा दो
 अहवाल =हालत
 ***
ताबो-ताकत, सब्रो-राहत, जानो- ईमां, अक्लो-होश
 हाय क्या कहिए, कि दिल के साथ क्या-क्या जाए है
 *** 
मैं भी कुछ खुश नहीं वफ़ा करके 
 तुमने अच्छा किया निबाह न की 
 *** 
माँगा करेंगे अब से दुआ हिज्रे-यार की 
 आखिर तो दुश्मनी है असर को दुआ के साथ 
 *** 
ऐसी लज़्ज़त खलिशे-दिल में कहाँ होती है 
 रह गया सीने में उसका कोई पैकां होगा 
 पैकां =तीर 
 *** 
ग़ैर है बे-वफ़ा पै तुम तो कहो 
 है इरादा निबाह का कब तक 
 *** 
 नाम उल्फ़त का न लूँगा जब तलक है दम में दम 
 तूने चाहत का मज़ा ऐ फ़ित्नागर ! दिखला दिया 
 *** 
ख़ाक होता न मैं तो क्या करता 
 उसके दर का ग़ुबार होना था 
 *** 
देखिए किस जग़ह डुबो देगा 
 मेरी किश्ती का नाख़ुदा है इश्क 
*** 
 उम्र सारी तो कटी इश्के-बुताँ में 'मोमिन' 
 आख़री वक़्त में क्या ख़ाक मुसलमां होंगे

Monday, October 1, 2018

किताबों की दुनिया - 197

सिर्फ मंज़िल पे पहुँचने का जुनूँ होता है 
 इश्क में मील के पत्थर नहीं देखे जाते 
 *** 
जिसका पेट भरा है वो क्या समझेगा 
 भूख से मरने वाले कितने भूखे थे
 *** 
 इसके मजमे की कोई सीमा नहीं 
 आदमी दर्शक मदारी ज़िन्दगी 
 *** 
एक जलता हुआ चिराग हूँ मैं 
 मुझको मालूम है हवा क्या है
 *** 
जो कुछ है तेरे पास वही काम आएगा 
 बारिश की आस में कभी मटकी न फोड़ तू
 *** 
बढ़ी जब बेकली कल रात ,हमने 
 तुम्हारा नाम फिर गूगल किया है
 *** 
अर्दली हो के भी समझे है ये खुद को अफसर 
 ये मेरा जिस्म मेरी रूह का पैकर देखो 
 *** 
इश्क का मतलब समझ कर देखिएगा 
 क़ुरबतें महसूस होंगी फासलों में
 *** 
मिला तो सबक दूंगा इंसानियत का 
 मैं खुद में छुपा जानवर ढूंढता हूँ 
 *** 
जिस बशर की दस्तरस में कोई दरया था नहीं 
 प्यास की शिद्दत में वो आतिश को पानी लिख गया 

 बड़ा ही मुश्किल होता है एक तो किसी स्थापित प्रसिद्ध लोकप्रिय शायर पर लिखना और दूसरे किसी अनजान शायर पर लिखना। पहली श्रेणी के शायर के बारे में सभी को इतना कुछ मालूम होता है कि आप जो भी लिखें वही सबको पहले से पता होता है उसमें कुछ नया जोड़ना आसान नहीं होता और दूसरी श्रेणी के बारे में जब आपको कुछ पता ही नहीं होता है तो लिखेंगे कैसे और क्या ? ऐसे मामले में मैंने अक्सर देखा है कि सोशल मीडिया और सर्वज्ञानी गूगल बाबा भी अपना मुंह छुपा लेता है। आप उसके बारे में फिर यहाँ, वहां या जहाँ से भी थोड़ी सी सम्भावना दिखे जानकारी बटोरते हैं और इस अधकचरी जानकारी से मिले छोटे छोटे सूत्र इकठ्ठा करते हैं और फिर उन्हें आपस में जोड़ने की कोशिश करते हैं जिसमें कभी सफलता मिल जाती है तो कभी नहीं। हमारे आज के शायर दूसरी श्रेणी के हैं याने इनके बारे में मैंने न कभी सुना न कभी कहीं पढ़ा। किताब के कुछ पन्ने पलटे तो लगा कि इसे तो पूरा पढ़ना पड़ेगा। ये सरसरी तौर पर नज़र डाल कर रख देने वाली किताब नहीं है।

 रहगुज़ारे-दिल से गुज़रा शाम को उनका ख़्याल 
 रक़्स यादों का मगर अब रात भर होने को है 

 क्या पता मिटटी को अब वो कूज़ागर क्या रूप दे 
 हाँ मगर हंगामा कोई चाक पर होने को है 

 मुस्कराहट क्यों ज़िया की हो रही मद्धम 'दिनेश' 
क्या चिरागों पर हवाओं का असर होने को है 

 बात शुरू करते हैं कैथल से जो हरियाणा के शहर कुरुक्षेत्र से लगभग 54 की.मी की दूरी पर है। कैथल को हनुमान जी की जन्म स्थली भी माना जाता है और यही वो जगह है जहाँ भारत की पहली महिला शासक रज़िया सुल्तान की मज़ार स्थित है, लेकिन हम कैथल नहीं रुकेंगे उस से आगे चलेंगे ज्यादा नहीं ,यही कोई 18 -19 की.मी और पहुंचेंगे पूण्डरी गाँव। देखिये सावन का महीना है और ये सारा गाँव महक रहा है फिरनी की खुशबू से। कहते हैं जिसने पूंडरी गाँव की बनी फिरनी सावन में नहीं खाई तो फिर उसने जीवन में क्या खाया ? फिरनी एक तरह की मिठाई है जो मैदे और चीनी से बनाई जाती है और देश में ही नहीं विदेशों में भी सावन के महीने में पूंडरी से मंगवाई जाती है और बड़े चाव से खाई जाती है। इस फिरनी के अनूठे स्वाद के कारण ही पूंडरी का नाम लोगों की ज़बान पर है। इसी छोटे से गाँव के हैं हमारे आज के शायर जो देखने में पहलवान जैसे लगते हैं लेकिन हैं दिल के बहुत कोमल। जिस तरह की ग़ज़लें वो कह रहे हैं मुझे यकीन है कि आज नहीं तो कल पूंडरी को लोग उनके नाम 'दिनेश कुमार' की वजह से भी जानेंगे। दिनेश जी का पहला ग़ज़ल संग्रह 'तुम हो कहाँ ' अभी हमारे सामने है :


 नफ़स के इन परिंदों की कहानी भी अजीब है
 कि जब भी शाम हो गयी सफर तमाम हो गया 
 नफ़स =सांस 

 नसीब हम ग़रीबों का न बदला लोकतंत्र में 
 नया है हुक्मरां भले नया निज़ाम हो गया 

 सफर कलंदरों का कब है मंज़िलों पे मुनहसिर 
 जहाँ कहीं क़दम रुके वहीँ क़याम हो गया 
 मुनहसिर =आश्रित

 25 अक्टूबर 1977 को पूंडरी जिला कैथल में जन्में दिनेश ने कुरुक्षेत्र विश्विद्यालय से वाणिज्य विषय में स्नातक की डिग्री हासिल की। गाँव और घर का माहौल ऐसा नहीं था कि दिनेश जी कविताओं या शायरी की और झुकते लेकिन उसके बावजूद ऐसा हुआ और पत्थरों की दीवार से जिस तरह एक कोंपल फूट निकलती है कुछ वैसे ही शायरी उनमें से निकल कर बाहर आयी। कारण ढूंढने की कोशिश करेंगे तो शायद सफलता हाथ नहीं लगेगी कि क्यों बचपन में वो दूरदर्शन और रेडियो से प्रसारित होने वाले कवि सम्मेलनों और मुशायरों के जूनून की हद तक दीवाने थे। सन 2005 याने 28 वर्ष की उम्र में उन्होंने पहली तुकबंदी की और उसे करनाल की एक काव्य गोष्ठी में सुनाया तो लोगों ने खूब पसंद किया। उत्साह बढ़ा तो बिना ग़ज़लों का व्याकरण समझे 7 -8 ग़ज़लें कह डालीं लेकिन जल्द ही ग़मे रोज़गार ने उनके इस परवान चढ़ते शौक के पर क़तर दिए।

 घुप अँधेरे में उजाले की किरण सा जीवन 
 जो भी जी जाए वो दुनिया में अमर होता है 

 आपसी प्यार मकीनों में हो, घर तब तब होगा 
 दरो-दीवार का ढाँचा तो खंडर होता है 

 वो न सह पायेगा इक पल भी हक़ीक़त की तपिश
 जिसके ख़्वाबों का महल मोम का घर होता है 

 ज़िन्दगी, जीने की जद्दो जहद में गुज़रती रही मन में उठते विचार कागज़ पर उतरने को तरसते रहे। लगभग 9 साल बाद याने 2014 में दिनेश जी ने अपनी एक ग़ज़लनुमा रचना फेसबुक पर डाली तो उसके बाद उन्हें जो प्रतिक्रिया मिली उस से पता लगा कि ग़ज़ल के लिए बहर का ज्ञान बहुत जरूरी है। सोचिये पूंडरी जैसे छोटे गाँव में ग़ज़ल के नियमों की जानकारी उन्हें कौन देता ?लिहाज़ा उन्होंने इंटरनेट की शरण ली। किस्मत से उन्हें डा ललित कुमार सिंह , नीलेश शेवगांवकर और डा अशोक गोयल जैसे हमेशा मदद करने को तैयार रहने वाले लोगों का साथ मिला। मुहतरम अनवर बिजनौरी साहब की किताब 'शायरी और व्याकरण' ने भी उनकी बहुत मदद की। सीख वही सकता है जो अपनी गलतियों से सबक ले और अगर कोई आपकी कमियां बताये तो उसे सकारात्मक ढंग से स्वीकार करे । दिनेश जी ने ये ही रास्ता अपनाया। उनका ,सीखने का 2014 में चला ये सिलसिला आज भी जारी है।

 ढो रहे हैं बोझ हम तहज़ीब का 
 गर्मजोशी अब कहाँ आदाब में 

 कौन करता रौशनी की क़द्र अब 
 ढूंढते हैं दाग सब महताब में 

 सिर्फ इतना सा है अफ़साना 'दिनेश' 
 ज़िन्दगी मैंने गुज़ारी ख्वाब में 

 दिनेश जी के लिखने पढ़ने के इस सिलसिले को एक झटका तब लगा जब उन्हें सन 2016 में दिल की गंभीर बीमारी ने आ घेरा। बीमारी कोई भी हो इंसान को तोड़ देती है और अगर दिल की हो तो और भी। दिनेश इस बीमारी की चपेट में आकर मानसिक रूप से बहुत कमज़ोर हो गए। इलाज़ के लिए पर्याप्त धन का अभाव, बीमारी से और ऑपरेशन से पैदा हुई परेशानियों ने उनकी कलम एक बार फिर उनके हाथ से छीन ली। सोशल मिडिया के अपने फायदे नुक्सान हैं लेकिन इसकी बदौलत हमें जीवन में कुछ ऐसे लोग मिल जाते हैं जिनकी सोहबत में आपकी परेशानियां ,दुःख तकलीफें कम हो जाती है। दिनेश जी सौभाग्यशाली हैं कि मुसीबत की घडी में हौसला देने वालों की उन्हें कभी कमी नहीं रही और इसी हौसले की बदौलत वो ज़िन्दगी के मैदान-ए-जंग में फिर से ताल ठोक कर आ खड़े हुए।

 हमको तो क्यूंकि अपने सितमगर से प्यार था 
 ज़ोरो-जफ़ा का उस से गिला कर न सके हम 

 रंजो-अलम को सहने की आदत जो पड़ गई 
 फिर अपने सोज़े -दिल की दवा कर न सके हम 

 आज उनके तसव्वुरात का बंधन अजीब था 
 मरने तलक तो खुद को रिहा कर न सके हम

 'साहित्य सभा ' कैथल में चलने वाली उस मयारी मासिक काव्य गोष्ठी का नाम है जिसमें शिरक़त करना शायर के लिए फ़क्र की बात मानी जाती है. हर माह इस गोष्ठी द्वारा ग़ज़ल प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है जिसमें कैथल के ही नहीं पूरे हरियाणा और उसके आसपास के शायर भाग लेते हैं। दिनेश जी ने इस प्रतियोगिता में समय समय पर कभी तृतीय कभी द्वितीय तो कभी प्रथम स्थान ग्रहण किया है। श्री अमृत लाल मदान जो इस काव्यगोष्ठी के प्रधान हैं ने इस किताब की भूमिका में लिखा है कि "मेरी लिए यह हैरानी का सबब रहा है कि आज जबकि ख़ालिस उर्दू जानने वालों की तादाद बहुत कम हो गयी है ,कैसे वाणिज्य पढ़ा कस्बे का ये नौजवान स्नातक एहसासात से लबालब ग़ज़लें कह लेता है , कैसे मुश्किल से मुश्किल उर्दू के अल्फ़ाज़ को शायरी की दिलकश चाशनी के रूप में परोस कर सामने रख देता है "

 हक़-परस्ती की डगर पर है ख़मोशी छाई
 झूठ की पैरवी करते हैं ज़माने वाले

 अपने उपदेशों की गठरी को उठाले ज़ाहिद
 मयक़दे जाएंगे ही मयक़दे जाने वाले

 अपनी हिम्मत से नया बाब कोई लिखते हैं
 सर नहीं देखते, दस्तार बचाने वाले

 मजे की बात है कि बिना किसी उस्ताद की मदद लिए उर्दू ज़बान दिनेश जी ने इंटरनेट के माध्यम से सीखी। उनके पास और कोई रास्ता भी नहीं था क्यूंकि कस्बे में उर्दू सिखाने वाला कोई ढंग का उस्ताद मिला नहीं ,नौकरी की वजह से रोज रोज कैथल तो जा नहीं सकते थे लिहाज़ा इंटरनेट की शरण ले ली। उनका कहना है कि अभी उनको उर्दू लिखने में दिक्कत आती है अलबत्ता वो धीरे धीरे पढ़ जरूर लेते हैं। इस से उनकी झुझारू प्रवृति का पता चलता है, उनके जूनून की खबर लगती है। मुझे ऐसे सुदूर इलाकों में रहने वाले अनजान शायरों को पढ़ना अच्छा लगता है भले ही उनकी शायरी अभी कच्ची है मयार भी बहुत ऊंचा नहीं है लेकिन उनका हौसला बुलंद है। जो लोग स्थापित नहीं हैं उनके तरफ खड़े रहने वालों की हमेशा कमी रहेगी मगर जो लोग जुनूनी हैं उनके लिए इस बात से अधिक फ़र्क नहीं पड़ता कि कितने लोग उनके साथ खड़े हैं। आप दिल से लिखते रहें तो एक दिन चाहने वालों की भीड़ खुद-ब -खुद आपकी तरफ खींची चली आएगी।

 अगरचे काम कोई मेरा बेमिसाल नहीं 
 मगर सुकूँ है यही दिल को कुछ मलाल नहीं 

 वफ़ा की राह पे चल कर किसी को कुछ न मिला 
 मगर मैं ज़िंदा हूँ अब तक ये क्या कमाल नहीं 

 हम अब भी रातों को उठ उठ के उनको छूते हैं 
 हुई है उम्र मगर इश्क में ज़वाल नहीं 
 ज़वाल =गिरावट /कमी 

 दिनेश जी के इस पहले ग़ज़ल संग्रह को 'शब्दांकुर प्रकाशन' मदनगीर , नई दिल्ली ने प्रकाशित किया है। इस किताब को आप प्रकाशक को उनके ईमेल अड्रेस shabdankurprkashan@gmail.com पर मेल करके प्राप्ति का रास्ता पूछ सकते हैं या 09811863500 पर कॉल कर सकते हैं ,सबसे बढ़िया तो ये रहेगा कि आप अपने कीमती समय से एक छोटा सा हिस्सा निकाल कर दिनेश जी को उनके मोबाईल न. 09896755813 पर फोन करके बधाई दें और किताब प्राप्ति का रास्ता पूछें। किसी अनजान शायर की हौसला अफ़ज़ाही करना सबाब का काम होता है क्यूंकि आपके एक फोन से जो ख़ुशी दिनेश जी को मिलेगी वो शायद उन्हें किसी बड़े सम्मान को प्राप्त करके भी न मिले -ये बात मैं अपने अनुभव से कह रहा हूँ और अगर आप भी कुछ लिखते हैं तो पाठक के फोन से मिलने वाली ऊर्जा को समझ सकते हैं।

अपने मिलने का इक दर खुला छोड़ दे 
 चारागर ज़ख्म कोई हरा छोड़ दे 

 तेरी नस्लों को दुश्वारी होगी नहीं 
 दश्ते-सहरा में तू नक़्शे-पा छोड़ दे

 सिर्फ खुशियाँ ही जीवन का हासिल नहीं
 कुछ ग़मों के लिए हाशिया छोड़ दे 

 वक्त आ गया है कि अब किसी नयी किताब की तलाश के लिए निकला जाय इसलिए दिनेश जी की ज़िन्दगी के लगभग हर पहलू को नज़दीक से देखती-भालती पुर कशिश अंदाज़ वाली ग़ज़लों की चर्चा को विराम दिया जाय। चलते चलते आईये पढ़ते हैं उनकी एक छोटी बहर में कही ग़ज़ल के ये शेर :

 मेरे चेहरे पे जब चेहरा नहीं था 
 मैं तब आईने से डरता नहीं था 

 ग़मों से जब नहीं वाबस्तगी थी
 मैं इतनी ज़ोर से हँसता नहीं था 

 नज़ाकत ताज़गी कुछ बेवफाई 
 किसी के हुस्न में क्या क्या नहीं था

Monday, September 24, 2018

किताबों की दुनिया - 196

हम तो रात का मतलब समझे, ख़्वाब, सितारे, चाँद, चराग़  
आगे का अहवाल वो जाने जिसने रात गुज़ारी हो 
 अहवाल =हाल 
 *** 
मुझे कमी नहीं रहती कभी मोहब्बत की
 ये मेरा रिज़्क़ है और आस्मां से आता है 
 रिज़्क़=जीविका
 *** 
वो शोला है तो मुझे ख़ाक भी करे आख़िर 
 अगर दिया है तो कुछ अपनी लौ बढाए भी
 *** 
अपने लहू के शोर से तंग आ चुका हूँ मैं 
 किसने इसे बदन में नज़र-बंद कर दिया 
 *** 
रंग आसान हैं पहचान लिए जाते हैं
 देखने से कहीं ख़ुश्बू का पता चलता है
 *** 
रेत पर थक के गिरा हूँ तो हवा पूछती है 
 आप इस दश्त में क्यों आए थे वहशत के बगैर 
 वहशत=दीवानगी 
 *** 
जिस्म की रानाइयों तक ख्वाइशों की भीड़ है
 ये तमाशा ख़त्म हो जाए तो घर जाएंगे लोग 
 *** 
 ऐसा गुमराह किया था तिरी ख़ामोशी ने 
 सब समझते थे तिरा चाहने वाला मुझको
 *** 
उदास ख़ुश्क लबों पर लरज़ रहा होगा 
 वो एक बोसा जो अब तक मिरी जबीं पे नहीं 
 ***
 वो रुक गया था मिरे बाम से उतरते हुए
 जहां पे देख रहे हो चराग़ जीने में
 *** 
आशिकी के भी कुछ आदाब हुआ करते हैं 
 ज़ख्म खाया है तो क्या हश्र उठाने लग जाएँ 
 हश्र =हंगामा

 मेरी समझ में दुनिया में तीन तरह के लोग होते हैं - ये अलग बात है कि मेरी समझ कोई ज्यादा नहीं है लेकिन जितनी भी है उस हिसाब से कह रहा हूँ- पहले वो लोग जिनके पास क़ाबलियत का समंदर होता है लेकिन वो ज़ाहिर ऐसे करते हैं जैसे उनके पास बस बूँद भर क़ाबलियत है दूसरे वो जिनके पास बूँद भर क़ाबलियत होती है लेकिन वो दुनिया को बताते हैं की उनके पास क़ाबलियत का समंदर है तीसरे वो जिनके पास क़ाबलियत का समंदर तो छोड़ें एक बूँद भी नहीं होती लेकिन ज़ाहिर ऐसे करते हैं जैसे दुनिया में अगर किसी के पास काबलियत है तो सिर्फ उनके पास। दूसरे और तीसरे किस्म के लोग सोशल मिडिया में छाये हुए हैं इसलिए उनका जिक्र किताबों की दुनिया में करके क्यों अपना और आपका वक्त बर्बाद किया जाय।

 लग्ज़िशें कौन सँभाले कि मोहब्बत में यहाँ 
 हमने पहले भी बहुत बोझ उठाया हुआ है 
 लग्ज़िशें =भूल 
 *** 
मिली है जान तो उसपर निसार क्यों न करूँ
 तू ऐ बदन मिरे रस्ते में आने वाला कौन ? 
*** 
इश्क में कहते हैं फरहाद ने काटा था पहाड़ 
 हमने दिन काट दिए ये भी हुनर है साईं 
 *** 
मेरे होने में किसी तौर से शामिल हो जाओ 
 तुम मसीहा नहीं होते हो तो क़ातिल हो जाओ 
 मसीहा =मुर्दे में जान डालने वाला 
 *** 
बदन के दोनों किनारों से जल रहा हूँ मैं 
 कि छू रहा हूँ तुझे और पिघल रहा हूँ मैं 
 *** 
हवा गुलाब को छू कर गुज़रती रहती है 
 सो मैं भी इतना गुनहगार रहना चाहता हूँ
 *** 
मैं झपटने के लिए ढूंढ रहा हूँ मौक़ा 
 और वो शोख़ समझता है कि शर्माता हूँ 
 *** 
लिपट भी जाता था अक्सर वो मेरे सीने से
 और एक फ़ासला सा दर्मियाँ भी रखता था
 *** 
रात को जीत तो पाता नहीं लेकिन ये चराग़ 
 कम से कम रात का नुक्सान बहुत करता है 

 आज जिस शायर की किताब की बात हम कर रहे हैं वो पहली श्रेणी के शायर हैं ,अफसोस इस बात का नहीं है कि इस शायर ने अपनी काबलियत का ढिंढोरा नहीं पीटा अफ़सोस इस बात का है कि हमने उनकी काबलियत को उनके रहते उतना नहीं पहचाना जिसके वो हकदार थे। एक बात तो तय है भले ही किसी शायर को उसके जीते जी इतनी तवज्जो न मिले लेकिन जिस किसी में भी क़ाबलियत होती है उसका काम उसके सामने नहीं तो उसके बाद बोलता है, लेकिन बोलता जरूर है। किसी ने कहा है -किसने ? ये याद नहीं कि आपके लिखे को अगर कोई दौ-चार सौ साल बाद पढता है या पहचानता है तो समझिये आपने वाकई कुछ किया है वर्ना तो प्रसिद्धि पानी पर बने बुलबुले की तरह होती है ,इधर से मिली उधर से गयी। आज जिनको लोग सर माथे पे बिठाते हैं कल उन्हें को गिराने में वक्त नहीं लगाते। ऐसे सैंकड़ों उदाहरण हमारे सामने हैं ,सिर्फ शायरी में ही नहीं हर क्षेत्र में जहाँ हमने कथाकथित महान लोगों को अर्श से फर्श पर औंधे मुंह गिरते देखा है।

 मैं तेरी मन्ज़िल-ए-जां तक पहुँच तो सकता हूँ 
 मगर ये राह बदन की तरफ़ से आती है 

 ये मुश्क है कि मोहब्बत मुझे नहीं मालूम 
 महक सी मेरे हिरन की तरफ़ से आती है 

 किसी के वादा-ए-फ़र्दा के बर्ग-ओ-बार की खैर
 ये आग हिज़्र के बन की तरफ से आती है
 वादा-ए-फ़र्दा=कल मिलने का वादा , बर्गफल -ओ-बार=फल पत्ते फूल 

आप शायरी भी पढ़ते चलिए और साथ में मेरी बकबक भी जैसे खेत में फसल के साथ खरपतवार होती हैं न वैसे ही। अब ये बताइये कि क्यों काबिलियत होते हुए भी किसी को उसके जीते जी उतनी प्रसिद्धि नहीं मिलती ? मेरे ख्याल से उसका कारण शायद ये है कि क़ाबिल लोग ज्यादातर जो बात करते हैं वो उनके समय से आगे की होती है या फिर बात वो होती है जिसे बहुमत समझ नहीं पाता। हम जिसे समझ नहीं पाते उसे या तो नकार देते हैं या सर पर बिठा लेते हैं। नकारना अपेक्षाकृत आसान होता है इसलिए ज्यादातर बुद्धिजीवियों को नकार दिया जाता है फिर सदियों में उसकी कही लिखी बातों का विश्लेषण होता है तब कहीं जा के समझ में आता है कि जिसे हमें नकारा था वो कितना महान था। देखा ये गया है कि अकेले चलने वाले से अक्सर भीड़ में चलने के आदी लोग कतराते हैं उन्हें वो अपनी जमात का नहीं लगता। हम दरअसल धडों में बटें लोग हैं, आप चाहे इस बात को माने न मानें। हमें लगता है कि जिस धड़े में हम हैं वो सर्वश्रेष्ठ है। दूसरे धड़े के लोग हमारी क्या बराबरी करेंगे। धड़े के मठाधीश दूसरे धड़े के क़ाबिल इंसान की क़ाबिलियत को या तो सिरे से नकार देते हैं या उसकी और ध्यान ही नहीं देते।

 बस इक उमीद पे हमने गुज़ार दी इक उम्र 
 बस एक बूँद से कुहसार कट गया आखिर 
 कुहसार=पहाड़

 बचा रहा था मैं शहज़ोर दुश्मनों से उसे 
 मगर वो शख़्स मुझी से लिपट गया आखिर 
 शहज़ोर =ताक़तवर 

 हमारे दाग़ छुपाती रिवायतें कब तक 
 लिबास भी तो पुराना था फट गया आख़िर

 चलिए अब आज की ग़ज़ल की किताब की और रुख करते हैं जिसका शीर्षक है "मन्ज़र-ए-शब-ताब" जिसके शायर हैं जनाब 'इरफ़ान सिद्द्की' साहब। वही इरफ़ान सिद्द्की जो 11 मार्च 1939 को उत्तरप्रदेश के बदायूँ में पैदा हुए , बरेली में पढ़े लिखे और 15 अप्रेल 2004 को लख़नऊ में इस दुनिया-ए-फ़ानी से कूच कर गए। बहुत से लोग बदायूँ में पैदा होते हैं और लखनऊ में जन्नत नशीन होते हैं लेकिन इनमें से शायद ही कोई 'इरफान सिद्द्की 'जैसा होता है। मुझे ये बात कहने में कोई शर्म नहीं कि मेरे लिए ये नाम अब तक अनजाना था। आपने जरूर इनके बारे में पढ़ा सुना होगा लेकिन हम जैसे लोग जो उर्दू से मोहब्बत तो करते हैं लेकिन पढ़ नहीं सकते, इरफ़ान सिद्द्की साहब तक आसानी से नहीं पहुँच सकते। कारण ? ये भी बताना पड़ेगा ? वैसे सीधा सा है -इनकी कोई किताब हिंदी में किसी बड़े प्रकाशक द्वारा प्रकाशित नहीं हुई - किसी पत्रिका या अखबार में कभी छपे हों तो मुझे पता नहीं - मुशायरों में खूब गए हों इसका भी कहीं जिक्र नहीं मिलता - सोशल मिडिया में इनके किसी फैन क्लब की भी सूचना मुझे नहीं है -तो बताइये कैसे पता चलेगा इनके बारे में ?


 ढक गईं फिर संदली शाखें सुनहरी बौर से 
 लड़कियां धानी दोपट्टे सर पे ताने आ गईं

 फिर धनक के रंग बाज़ारों में लहराने लगे
 तितलियाँ मासूम बच्चों को रिझाने आ गईं 

 खुल रहे होंगे छतों पर सांवली शामों के बाल 
 कितनी यादें हमको घर वापस बुलाने आ गईं 

 बिल्ली के भाग्य से छींका तब टूटा जब रेख़्ता बुक्स वालों ने उनकी ग़ज़लों की ये किताब शाया की। आप उनकी शायरी पढ़ते हुए अब तक समझ ही होंगे कि वो किस क़ाबलियत के शायर थे। उनकी शायरी के बारे में मेरे जैसा अनाड़ी तो भला क्या कह पायेगा अलबत्ता इरफ़ान साहब के बारे में जो थोड़ी बहुत जानकारी मैंने जुटाई है वो ही आपसे साझा कर रहा हूँ। वैसे आपकी सूचना के लिए बता हूँ कि ये जो गूगल महाशय हैं ये भी बहुमत के हिसाब से ही चलते हैं ,इनसे किसी इरफ़ान सिद्दीकी साहब जैसे शायर की जानकारी प्राप्त करना आसान काम नहीं। वहां से जो हासिल हुआ वो था की इरफ़ान साहब 1962 में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की केंद्रीय सूचना सर्विसेस से जुड़ गए. नौकरी के सिलसिले में दिल्ली, लखनऊ आदि स्थानों पर रहे. यह नियाज़ बदायूंनी के छोटे भाई थे. उनके पुस्तकों के नाम हैं: ‘कैनवस’, ‘इश्क नामा’, ‘शबे दरमयाँ’, ‘सात समावात’ . इसके अलावा “हवाए दश्ते मारया” और “दरया” भी उनके कुछ रिसाला नुमा किताबों में शामिल हैं. ये किताबें पाकिस्तान से प्रकाशित हुईं 

ज़मीं छुटी तो भटक जाओगे ख़लाओं में 
 तुम उड़ते उड़ते कहीं आस्मां न छू लेना 

 नहीं तो बर्फ़ सा पानी तुम्हें जला देगा 
 गिलास लेते हुए उँगलियाँ न छू लेना 

 उड़े तो फिर न मिलेंगे रिफ़ाक़तों के परिन्द
 शिकायतों से भरी टहनियां न छू लेना
 रिफ़ाक़तों =दोस्ती 

 इरफ़ान साहब की शायरी के बारे में इस किताब की भूमिका में जनाब शारिब रुदौलवी लिखते हैं कि 'इरफ़ान सिद्द्की की शायरी में इश्क की दो कैफ़ियतें मिलती हैं। एक जिसमें गर्मी है, लम्स है ,एहसास की शिद्दत है और कुर्बत (समीपता ) का लुत्फ़ है और दूसरे में एहसास-ए-जमाल (सौंदर्य बोध )है , मोहब्बत है, खुशबू है. इरफ़ान सिद्दीकी के यहाँ जिस्म,लम्स और विसाल का जिक्र है। इस कैफ़ियत (अवस्था )में भी उनके यहाँ बड़ा तवाजुन (संतुलन )है। ये नाज़ुक मरहला था लेकिन उन्होंने उसे बहुत ख़ूबसूरती से तय किया है। उनके यहाँ इश्क़ न तो सिर्फ तसव्वुराती (काल्पनिक) और ख़याली है और न वो तहज़ीबी ज़वाल (पतन) के ज़माने के बाला-खानो (कोठों) में परवरिश पाने वाला इश्क है। एक ज़िंदा शख़्स का ज़िंदा शख़्स से इश्क है। इरफ़ान सिद्दीकी ने उसे जिस तरह अपनी शायरी में बरता है उसने उर्दू की इश्क़िया शायरी के वक़ार ( प्रतिष्ठा ) में इज़ाफा किया है। " शारिब साहब के इस कथन की पुष्टि इस किताब को पढ़ते वक्त होती जाती है।

 उठो ये मंज़र-ए-शब्-ताब देखने के लिए
 कि नींद शर्त नहीं ख़्वाब देखने के लिए 
 मंज़र-ए-शब्-ताब=रात को रोशन करने वाला दृश्य 

 अजब हरीफ़ था मेरे ही साथ डूब गया 
 मिरे सफ़ीने को ग़र्क़ाब देखने के लिए
 हरीफ़ =प्रतिद्वंदी ,ग़र्क़ाब =डूबना 

 जो हो सके तो जरा शहसवार लौट के आएं
 पियादगां को ज़फ़रयाब देखने के लिए 
 शहसवार =अच्छा घुड़सवार , पियादगां =पैदल सिपाही , ज़फ़रयाब =विजयी

 लखनऊ जहाँ शायर पनपते थे वहीँ उनमें आपसी धड़ेबंदी भी खूब चलती थी। इरफान साहब जैसा कि मैंने पहले बताया है इस घटिया किस्म की अदबी सफबन्दी के खिलाफ थे लिहाज़ा इसका खामियाज़ा भी उन्हें भुगतना पड़ा। वो बहुत से ऐसे सम्मानों से जिसे उनके समकालीन शायरों को नवाज़ा गया था , महरूम रह गए। इस बात की टीस उन्हें रही भी। एक बेइंतिहा पढ़े-लिखे ,बेपनाह अच्छे शायर और एक शरीफ आदमी के लिए ये अदबी नाइंसाफियां नाक़ाबिले बर्दाश्त होती हैं कभी कभी तो ये पीड़ा भावुक आदमी की जान भी ले लेती है। अगर उनके साथ ज़माने का सलूक थोड़ा भी दोस्ताना होता तो शायद वो कुछ बरस और जी लेते। ऐसा नहीं है कि ये घटिया रिवायत अब नहीं रही अब भी है और पहले से कहीं ज्यादा खूंखार रूप में है। टीवी शो हों ,मुशायरे हों, अदबी रिसालों में छपने की बात हो या फिर किताब छपवाने की कवायद हो अगर आप किसी धड़े का हिस्सा नहीं है तो फिर फेसबुक या सोशल मिडिया के सहारे दिन काटिये और पढ़ने वालों का इंतज़ार कीजिये।

 उसको मंज़ूर नहीं है मिरी गुमराही भी 
 और मुझे राह पे लाना भी नहीं चाहता है 

 अपने किस काम में लाएगा बताता भी नहीं 
 हमको औरों पे गंवाना भी नहीं चाहता है 

 मेरे लफ़्ज़ों में भी छुपता नहीं पैकर उसका
 दिल मगर नाम बताना भी नहीं चाहता है 

 लखनऊ के शायरों का जिक्र हो और जनाब वाली आसी का नाम ज़हन में न आये ऐसा तो हो ही नहीं सकता। जो लोग किताबों की दुनिया नियमित रूप से पढ़ते आये हैं उन्हें याद होगा कि वाली साहब का जिक्र भारत भूषण पंत साहब की किताब वाली पोस्ट में विस्तार से किया था। वाली आसी साहब की लखनऊ में किताबों की दूकान थी जहाँ सभी शायर शाम के वक्त गपशप करने और शायरी पर संजीदा गुफ्तगू करने इकठ्ठा हुआ करते थे। इरफ़ान साहब वाली साहब के चहेते शायर थे और उनके कितने ही शेर उन्हें ज़बानी याद थे। इरफ़ान साहब की शायरी अपने वतन से ज्यादा पकिस्तान में मशहूर थी बल्कि बहुत से लोग उन्हें पाकिस्तानी शायर ही समझते थे। मुनव्वर राणा साहब ने अपनी किताब 'मीर आके लौट गया ' में इरफ़ान साहब के बारे में एक रोचक किस्सा दर्ज़ किया है। आप इरफ़ान साहब के ये शेर पढ़ें फिर वो किस्सा बताता हूँ :

 अब इसके बाद घने जंगलों की मंज़िल है 
 ये वक्त है कि पलट जाएँ हमसफ़र मेरे 

 ख़बर नहीं है मिरे घर न आने वाले को 
 कि उसके क़द से तो ऊंचे हैं बाम-ओ-दर मेरे 

 हरीफ़े-ऐ-तेग़-ए-सितमगर तो कर दिया है तुझे 
 अब और मुझसे तू क्या चाहता है सर मेरे 
 हरीफ़े-ऐ-तेग़-ए-सितमगर=अत्याचारी की तलवार का प्रतिद्वंदी

 हुआ यूँ कि एक दफह पकिस्तान के मशहूर शायर जनाब 'इफ़्तिख़ार आरिफ़' साहब लखनऊ अपने वतन तशरीफ़ लाये। आरिफ़ साहब के नाम की तूती उस वक्त पूरे उर्दू जगत में बजती थी -उनके मुकाबले का तो छोड़िये उनके आस पास भी किसी शायर का नाम फटकता नहीं था। उन्होंने मुनव्वर साहब से जो अपनी कार से आरिफ़ साहब को होटल छोड़ने जा रहे थे पूछा कि 'मुनव्वर मियां आपकी अदबी सूझ-बूझ और मुतालिए (अध्ययन )के सभी कायल हैं - आप बताइये कि इरफ़ान सिद्दीकी अच्छे शायर हैं या मैं ? मुनव्वर साहब एक पल को चौंके फिर उन्होंने कहा कि 'देखिये इफ़्तिख़ार भाई मेरी इल्मी हैसियत के हिसाब से आपकी ग़ज़लों का दायरा महदूद (सीमित ) है लेकिन इरफ़ान भाई ने ग़ज़ल में नए मौज़ूआत के ढेर लगा दिए हैं " ये सुन कर इफ्तिखार साहब ने कहा 'मुनव्वर इस लिहाज़ से तुम्हारा तजज़िया गैर जानिब दाराना (पक्षपात रहित ) है -पाकिस्तान में भी इरफ़ान भाई मुझसे बड़े शायर माने जाते हैं "

 हट के देखेंगे उसे रौनक-ए-महफ़िल से कभी 
 सब्ज़ मौसम में तो हर पेड़ हरा लगता है 

 ऐसी बेरंग भी शायद न हो कल की दुनिया 
 फूल से बच्चों के चेहरों से पता लगता है 

 देखने वालो मुझे उससे अलग मत जानो 
 यूं तो हर साया ही पैकर से जुदा लगता है 

 इरफ़ान साहब को उर्दू अकादमी उत्तर प्रदेश और ग़ालिब इंस्टीट्यूट ने सम्मानित किया है। उनके अदबी सफर पर मगध बुद्ध विश्विद्यालय से डॉक्टरेट किया गया है। पाकिस्तान के बहावलपुर विश्विद्यालय और पंजाब विश्वविद्यालय के छात्रों उनके किये काम पर थीसिस लिखी। जिन्हें शायरी में कुछ अलग हट कर पढ़ने की चाह है उनके लिए तो ये किताब किसी वरदान से कम नहीं। सच्ची और अच्छी शायरी पढ़ने वालों के लिए इस किताब का उनके हाथ में होना जरूरी है। किताब को आसानी से आप अमेज़न से आन लाइन मंगवा सकते हैं। दिल्ली में कोई परिचित हो तो उसकी मदद से आप इसे रेख़्ता के दफ्तर से ख़रीद कर भी मंगवा सकते हैं। आप क्या करते हैं ये आप पर है लेकिन मेरी तो सिर्फ इतनी सी गुज़ारिश है कि इस किताब को पढ़ें जरूर। चलते चलते उनकी एक लाजवाब ग़ज़ल के ये शेर आपको पढ़वाता चलता हूँ :

 सख्त-जां हम सा कोई तुमने न देखा होगा 
 हमने क़ातिल कई देखे हैं तुम्हारे जैसे 

 दीदनी है मुझे सीने से लगाना उसका 
 अपने शानों से कोई बोझ उतारे जैसे 
 दीदनी =देखने योग्य 

 अब जो चमका है ये खंज़र तो ख्याल आता है 
 तुझको देखा हो कभी नहर किनारे जैसे 

 उसकी आँखें हैं कि इक डूबने वाला इंसां
 दूसरे डूबने वाले को पुकारे जैसे

Monday, September 17, 2018

किताबों की दुनिया - 195

कांटा है वो कि जिसने चमन को लहू दिया 
 ख़ूने -बहार जिसने पिया है , वो फूल है 
 *** 
अपने पहलू में सजा लो तो इसे चैन आये
 दिल मेरा ग़म की धड़कती हुई तस्वीर सही 
 *** 
न जाने कौनसी मंज़िल पे आ पहुंचा है प्यार अपना
 न हमको एतबार अपना, न उनको एतबार अपना 
 *** 
भंवर से बच निकलना तो कोई मुश्किल नहीं लेकिन 
 सफ़ीने ऐन दरिया के किनारे डूब जाते हैं
 *** 
ओ बेरहम मुसाफ़िर हँसकर साहिल की तौहीन न कर 
 हमने अपनी नाव डुबाकर तुझको पार उतारा है
 *** 
अकसर उबल पड़ी है मेरी ओक से शराब 
 यूँ भी दुआ को हाथ उठाता रहा हूँ मैं
 *** 
थक गया मैं करते करते याद तुझको 
 अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ 
 *** 
ना जाने किस अदा से लिया तूने मेरा नाम 
 दुनिया समझ रही है कि सब कुछ तेरा हूँ मैं 
 *** 
ना कोई ख़्वाब हमारे हैं न ताबीरें हैं 
 हम तो पानी पे बनाई हुई तस्वीरें हैं 
 *** 
न हो उनपे कुछ मेरा बस नहीं , कि ये आशिक़ी है हवस नहीं 
 मैं उन्हीं का था मैं उन्हीं का हूँ ,वो मेरे नहीं तो नहीं सही 

लाहौर शहर में सुबह के चार बजे हैं, बरसात हो रही है ,एक गोल चेहरे पर तीखी मूंछों वाला , काले घुंघराले बालों और चमकीली आँखों वाला इंसान आवाज़ लगाता है " ओये मुंडू उठ ओये चार बज गए ,तेल गरम करके लया फटाफट छेती !! मुंडू , उनका सेवक ,जो अभी तक गहरी नींद में था स्प्रिंग लगे गुड्डे की तरह अपने बिस्तर से उछलता है तेल गरम करता है एक कटोरी में डालता है और उस इंसान के पास आकर खड़ा हो जाता है जिसने अब सिर्फ लंगोट धारण कर रखा है और जो जमीन पे पेट के बल लेटा हुआ है। मुंडू को पता है कि क्या करना है - ये तो उसका रोज का काम है एक घंटा उस इंसान की जम के तेल मालिश। मालिश के बाद इन हज़रत का दंड पेलने का सिलसिला शुरू होता है , मुंडू का काम है गिनना जिसमें वो अक्सर गलती करता है लिहाज़ा सौ की जगह ढेड़ सौ दंड पेलना आम बात हो गयी है। पसीने में नहाये ये जनाब अब सीधे आकर अपनी टेबल पर बैठेंगे। आप सोच रहे होंगे कि मैं किसी पहलवान का जिक्र कर रहा हूँ ,आपकी सोच सही है इस तरह का इंसान पहलवान ही हो सकता है, लेकिन नहीं -अब ये हज़रत खिड़की से गिरती बारिश की बूंदों को देखते हैं और गुनगुना उठते हैं : "रात भर बूंदियां रक़्स करती रहीं , भीगी मौसिकियों ने सवेरा किया " आप भी मानेंगे कि ऐसा काव्य रचने वाला इंसान, पहलवान भले हो न हो लेकिन शायर जरूर होगा।

 पूछ रही है दुनिया मुझसे वो हरजाई चाँद कहाँ है 
 दिल कहता है गैर के बस में , मैं कहता हूँ मेरे दिल में 

 डरते-डरते सोच रहा हूँ वो मेरे हैं अब भी शायद 
 वर्ना कौन किया करता है यूँ फेरों पर फेरे दिल में 

 उजड़ी यादों टूटे सपनों शायद कुछ मालूम हो तुमको 
 कौन उठाता है रह-रहकर टीसें शाम-सवेरे दिल में 

 इस तरह तेल मालिश और दंड पेलने के बाद जहाँ अखाड़ा सजना चाहिए ख़म ठोकने और पेंतरे बदलने की मशक्कत होनी चाहिए वहां इसके ठीक विपरीत शेर कहे जा रहे हैं जिनमें झरनों का संगीत नदी की कल-कल, फूलों की महक, भंवरों की गुँजन, बादलों की गड़गड़ाहट, पपीहे की पीहू पीहू और महबूब की लचकती कमर का बखान पिरोया जा रहा है। ये शख्स जो जाति का पठान है और जिसने पेट पालने के लिए कभी गेंद बल्ले बेचे तो कभी रैकेट कभी लुंगियां बेचीं तो कभी कुल्ले कभी चुंगीखाने में कलर्की की तो कभी बस कम्पनियों में टिकट बेचे याने हर तरह का गैर शायराना काम किया और साथ ही की लाजवाब शायरी। शायरी दरअसल आपके अंदर होती है ,आप पहाड़ों की वादियों में, फूलों की घाटियों में या जिस्म के बाज़ारों में बैठें तो ही शायरी कर पाएंगे ऐसा तो कतई जरूरी नहीं और अगर आपके अंदर शायरी है ही नहीं तो साहब आप लाख दंड पेल लें आपके अंदर से एक मिसरा भी फूट जाए तो कहना।

 निकल कर दैरो-क़ाबा से अगर मिलता न मैखाना 
 तो ठुकराए हुए इन्सां खुदा जाने कहाँ जाते 

 तुम्हारी बेरुख़ी ने लाज रख ली बादा-खाने की 
 तुम आँखों से पिला देते तो पैमाने कहाँ जाते 

 चलो अच्छा हुआ काम आ गयी दीवानगी अपनी 
 वगर्ना हम ज़माने भर को समझाने कहाँ जाते 

 हमारे आज के जो शायर साहब हैं न, शायरी उनमें कूट कूट कर भरी हुई है ये तेल मालिश और दंड पेलने की कवायद उस शायरी को अपने अंदर से बाहर कागज़ पर उतारने के लिए की जाती है। ये भी एक तरीका है मूड बनाने का हाँ ये तरीका जरा अलग है इसलिए हमें हजम नहीं होता। हम देखते आये हैं कि शायरी को अपने अंदर से बाहर निकालने के लिए शायर या तो लगातार सिगरेट पीते हैं या तो शराब, या दोनों एक साथ ,कुछ चाय की केतली सामने रखते हैं कुछ रात के सन्नाटे का इंतज़ार करते हैं तो कुछ महबूब के पहलू में लेटने का लेकिन कोई दंड बैठक निकाल कर पसीने पसीने हो कर शायरी करे ऐसा कभी देखा-सुना-पढ़ा ही नहीं। लेकिन जो है सो है। अब क्या पता शायद इसी कसरत की वज़ह से उनके अंदर से बाहर निकलने वाली शायरी की बदौलत उनका पूरी दुनिया में नाम है और उनके लाखों चाहने वाले हैं। जो उन्हें पहचान गए हैं उन्हें सलाम और जो नहीं पहचान पाए हैं उन्हें बताते हैं हमारे आज के शायर का नाम : क़तील शिफ़ाईप्रकाश पंडित द्वारा सम्पादित और राजपाल एन्ड संस् द्वारा प्रकाशित किताब "क़तील शिफ़ाई और उनकी शायरी" हमारे सामने है :


ऐ शामे-अलम कुछ तू ही बता ये ढंग तुझे कुछ आया है  
दिल मेरी खोज में निकला था और तुझको ढूंढ के लाया है

 इक हल्की हल्की धूप मिली उस कोमल रूप के परदे में 
 फागुन की ठिठुरती रातों को जब भादों ने गर्माया है 

 मैं फूल समझ कर चुन लूँगा इन भीगे से अंगारों को 
 आँखों की इबादत का मैंने पहले भी यही फल पाया है 

 ये उस जमाने की बात है, लेकिन कम ज्यादा आज भी लागू होती है, वो ये कि अगर कोई शायर है तो उसकी एक अदद प्रेमिका भी होगी, इसलिए हमारे क़तील साहब की भी थी। और वो थी भी कोई ऐसी वैसी नहीं, सिनेमा की खूबसूरत अदाकारा थी, नाम था चंद्रकांता। उनका प्रेम रॉकेट की गति से परवान चढ़ा और डेढ़ साल में रॉकेट की गति से ही जमीन पर धड़ाम आ गिरा। चंद्रकांता तो कपडे झाड़ कर मुस्कराते हुए तू नहीं और सही और नहीं और सही गुनगुनाते हुए उठ खड़ी हुई लेकिन क़तील साहब वहीँ पड़े रह गए ,दिल पे गहरी चोट खाये हुए। एक तो शायर ऊपर से दिल पे लगी गहरी चोट याने सोने में सुहागा , लोगों ने सोचा अब तो क़तील साहब से विरह की ऐसी ऐसी ग़ज़लें पढ़ने सुनने को मिलेंगी कि अश्कों से तर दामन सूखने का नाम ही नहीं लेगा पर हुआ इसका उल्टा। क़तील ने चंद्रकांता की बेवफाई पर लिखने और कोसने के बजाए उन हालातों पर उन मज़बूरियों पर क़लम चलाई जिसकी वजह से चंद्रकांता उन्हें छोड़ गयी। 

 ये भी कोई बात है आखिर दूर ही दूर रहें मतवाले 
 हरजाई है चाँद का जोबन या पंछी को प्यार नहीं है 

 एक जरा सा दिल है जिसको तोड़ के तुम भी जा सकते हो 
 ये सोने का तौक़ नहीं, ये चांदी की दीवार नहीं है 
तौक़=फंदा 

 मल्लाहों ने साहिल -साहिल मौजों की तौहीन तो कर दी 
लेकिन फिर भी कोई भंवर तक जाने को तैयार नहीं है 

 पंजाब जो अब पकिस्तान के हिस्से में है की तहसील हरिपुर के जिले हज़ारा में 24 दिसंबर 1919 को क़तील साहब का जन्म हुआ। स्कूली और कालेज की पढाई रावलपिंडी में रह कर पूरी की। हर पिता की तरह क़तील के पिता भी यही चाहते थे कि उनका बेटा शायरी जैसे शौक न पाले और एक अच्छी सी नौकरी कर इज़्ज़त की ज़िन्दगी बसर करे और हर नालायक बेटे की तरह क़तील साहब ने पिता की बात नहीं मानी और वो किया जो उनके दिल ने कहा। रावलपिंडी में उनका पत्राचार प्रसिद्ध शायर जनाब 'अहमद नदीम क़ासमी साहब से शुरू हुआ। उनकी रहनुमाई में उन्होंने यथार्थवादी शायरी के गुर सीखे। इस से पहले क़तील साहब रोती बिसूरती लिजलिजी मोहब्बत में लिपटी शायरी किया करते थे और अपने उस्ताद शायर जनाब 'शिफ़ा कानपुरी ' साहब से इस्लाह लिया करते थे। शिफ़ा साहब के शागिर्द की हैसियत से उन्होंने अपना नाम क़तील शिफ़ाई कर लिया था जबकि उनका असली नाम 'औरंगजेब खान' था. 

 बज़्मे-अंजुम से नज़र घूम के लौट आई है 
 फिर वही मैं हूँ वही आलमे-तन्हाई है 

 गुनगुनाती हुई आती हैं फ़लक से बूँदें 
 कोई बदली तेरी पाज़ेब से टकराई है 

 पास रह कर भी ये दूरी मुझे मंज़ूर नहीं 
 इस से बेहतर तो मेरी आलमे -तन्हाई है 

 अभिनेत्री चंद्रकांता का क़तील साहब की ज़िन्दगी से रुख़सत होना खुद क़तील साहब के लिए ठीक हुआ या नहीं ये कहना मुश्किल है लेकिन ये हादसा उर्दू शायरी के लिए नेमत बन कर आया। उसके बाद क़तील ने जो शायरी की है उस से उर्दू साहित्य बहुत समृद्ध हुआ। उर्दू शायरी की डगर को उन्होंने ज्यादा साफ़ सुंदर और प्रकाशमान बनाया। मनीष अपने ब्लॉग "एक शाम मेरे नाम' में लिखते हैं कि "क़तील की शायरी को जितना पढ़ेंगे आप ये महसूस करेंगे कि प्रेम, वियोग बेवफ़ाई की भावना को जिस शिद्दत से उन्होंने अपनी लेखनी का विषय बनाया है वैसा गिने चुने शायरों की शायरी में ही नज़र आता है। जनाब सरदार ज़ाफ़री साहब ने क़तील साहब के बारे में एक जुमला कहा है कि पहाड़ी के ख़ुश्क सीने से उबलता हुआ एक चश्मा ( हरी-भरी वादियों से गुनगुनाता हुआ गुज़र रहा है। और इसका नग़मा सुनकर कलियां आंखें खोल देती हैं। इस चश्मे का नाम क़तील शिफ़ाई है।

 खीरामे-नाज़ --और उनका खीरामे -नाज़ ? क्या कहना 
 ज़माना ठोकरें खाता हुआ महसूस होता है 
 खीरामे-नाज़ =सुन्दर चाल 

 किसी की नुकरई पाज़ेब की झंकार के सदके 
 मुझे सारा जहां गाता हुआ महसूस होता है
नुकरई = चांदी की


 'क़तील' अब दिल की धड़कन बन गई है चाप क़दमों की 
 कोई मेरी तरफ़ आता हुआ महसूस -होता है 

 क़तील साहब के एक दोस्त हुआ करते थे जनाब ए.हमीद उन्होंने क़तील की शख्सियत का ख़ाका कुछ यूँ खिंचा है "माज़ी में पीछे जाता हूं तो क़तील की एक शक्ल उभरती है : घने स्याह घुंघरियाले बाल, मज़बूत क़ुव्वत इरादे की अलामत, चौड़े नथुनों वाली सुतवां रोमन नाक, सुर्ख-ओ-सफ़ेद मुस्कराता हुआ ख़ूबसूरत चेहरा, हज़ारे की मर्दाना वजाहत का भरपूर मज़हर, वालिहाना जज़्बात और तेज़ फ़हम की अकास आंखें, शेरों में पायल की खनक, बातों में बेसा$ख्तगी व बेबाकी, कोई लगी-लिपटी नहीं, पीठ पीछे करने वाली बातों को मुंह पर कह देने वाला....नाराज़गियां मोल लेने वाला.... क़तील शिफ़ाई।''अब इन्हीं क़तील साहब की इस ग़ज़ल के शेर पढ़ें जो इश्क-ओ -मुहब्बत की खूबसूरत वादियों से दूर हक़ीक़त की सख़्त चट्टान की तरह हैं और आज भी उतने ही मौजू हैं जितने आज से पचास साल पहले थे :

 खून से लिथड़े चेहरे पर ये भूखी नंगी रअनाई 
 देख ज़माने देख ये मेरे ख़्वाबों की शहज़ादी है 
 रअनाई =सुंदरता

 पत्ती-पत्ती डाली-डाली कोस रही है मौसम को 
 लेकिन अपने बाग़ का माली इन बातों का आदी है

 शुक्र करो ऐ गुलशन वालो आज क़फ़स की कैद नहीं 
 बाग़ में भूखों मरने की हर पंछी को आज़ादी है 

 मुहब्बतों का शायर कहते हैं क़तील साहब को लेकिन उन्हें समाजी और खासकर महरूम तबके की फ़िक्र कुछ कम न थी।उनके नर्मो-नाज़ुक दिल में सब इंसानों के बराबर होने का सपना पलता था और इस धरती पर रची गई इंसानी ग़ैर-बराबरी बेचैन करती थी। अपने मुल्क के हालात उन्हें बेचैन किया करते थे। अपनी नज़्मों गीतों और ग़ज़लों में उनकी बेचैनी साफ़ तौर पर नज़र आती है। हर संवेदनशील इंसान चाहे वो शायर हो न हो अपने आसपास के बदलते बिगड़ते माहौल को देख कर व्यथित होता ही है ये अलग बात है कि अपनी व्यथा को व्यक्त करने के तरीके सब के एक जैसे नहीं होते। क़तील चूँकि शायर थे लिहाज़ा उन्होंने अपनी मानसिक वेदना का इज़हार अपनी रचनाओं के माध्यम से व्यक्त किया और क्या ही खूब किया।

 क़फ़स में आँधियों का नाम सुनके मुतमइन न हो 
 ये बागबां का हुस्ने- गुफ़्तगू है और कुछ नहीं 

 सरूरे-मय कहाँ , कि दिल की तश्नगी बुझाएं हम 
 इस अंजुमन में साया-ए-सुबू है और कुछ नहीं 

 तुम्हें गुलों की बेबसी में हुस्न की तलाश है 
 ये जुस्तजू बराए जुस्तजू है ,और कुछ नहीं 

 क़तील अपने बारे में लिखते हैं कि ''यूं तो मुझे बारह-तेरह बरस की उम्र से ही मेरी सोच मुझे बेचैन सा रखती थी लेकिन महसूस करके शेर कहने की इब्तिदा 1935 ईस्वी से हुई जब अचानक मेरे शाह खर्च बाप का साया मेरे सर से उठ गया और मेरे शऊर ने मेरे रंगारंग तजुर्बों को अपने अंदर जज़्ब करना शुरू किया। मुझे ज़िंदगी में पहली बार इस हक़ीक़त को समझने की फ़ुरसत मिली कि लोग एक-एक चेहरे पर कई-कई चेहरे सजाए बैठे हैं।'' उनकी एक चेहरे पे कई चेहरे वाली बात को जनाब साहिर लुधियानवी ने 'दाग' फिल्म के गाने के लिए बहुत खूबी से इस्तेमाल किया है। साहिर और क़तील साहब में जबरदस्त याराना था दोनों लाहौर में पास पास रहते थे। साहिर ही तरह क़तील साहब ने भी पाकिस्तानी और हिंदुस्तानी फिल्मों के लिए भी खूब गाने लिखे लेकिन अपनी शायरी के मयार से समझौता नहीं किया।उनके गीत 'घुँघरू टूट गए --" को तो दोनों मुल्कों के न जाने कितने गायकों ने आवाज़ दी है। फ़िल्मी गाने लिखने के दौरान ही उनका इश्क पाकिस्तान की मशहूर गायिका इकबाल बानो से परवान चढ़ा लेकिन शादी की देहलीज़ से ही वापस लौट गया।

 चमन वाले ख़िज़ाँ के नाम से घबरा नहीं सकते
 कुछ ऐसे फूल भी खिलते हैं जो मुरझा नहीं सकते

 समाअत साथ देती है तो सुनते हैं वो अफ़साने
 जो पलकों से झलकते हैं ज़बां पर आ नहीं सकते

 हमें पतवार अपने हाथ में लेने पड़ें शायद
 ये कैसे नाखुदा हैं जो भंवर तक जा नहीं सकते

 आप सोच रहे होंगे कि मैं 'क़तील " साहब की उन ग़ज़लों जिन्हें जगजीत सिंह , मेहदी हसन और गुलाम अली साहब ने गा कर अमर कर दिया है जैसे 'अपने होंठों पर सजाना चाहता हूँ ' , ' ये मोज़ज़ा भी मोहब्बत कभी दिखाए मुझे' , 'अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझे' , 'सदमा तो है मुझे भी कि तुझसे जुदा हूँ मैं ' , 'मिल कर जुदा हुए तो न रोया करेंगे हम' , 'यारों किसी क़ातिल से कभी प्यार न मांगो' , 'ज़िन्दगी में तो सभी प्यार किया करते हैं' ,' शोला था जल बुझा हूँ' , 'किया है प्यार जिसे हमने ज़िन्दगी की तरह ' ,आदि का जिक्र क्यों नहीं कर रहा तो उसका कारण ये है कि वो ग़ज़लें इस किताब में नहीं है क्यूंकि ये किताब तो 1959 में प्रकाशित हुई थी 1959 से 11 जुलाई 2001 तक याने जब तक वो मौजूद रहे तब तक के 42 सालों के दौरान जो ग़ज़लें कहीं वो इस किताब में नहीं हैं वो किसी और किताब में होंगी लेकिन क्यूंकि इसमें नहीं है इसलिए इसमें जो ग़ज़लें हैं मैं सिर्फ उन्हें ही आप तक पहुंचाऊंगा। क़तील साहब के बारे में जानकारी मैंने जरूर इस किताब के अलावा इंटरनेट से प्राप्त सूचनाओं और प्रसिद्ध ब्लॉगर मनीष कुमार और राजकुमार केसवानी साहब के ब्लॉग से इकठ्ठा की है।

 वो फूल से लम्हें भारी हैं अब याद के नाज़ुक शानों पर
 जो प्यार से तुमने सौंपे थे आगाज़ में इक दीवाने को

 इक साथ फ़ना हो जाने से इक जश्न तो बरपा होता है
 यूँ तनहा जलना ठीक नहीं समझाए कोई परवाने को

 मैं रात का भेद तो खोलूंगा जब नींद मुझे न आएगी
 क्यों चाँद-सितारे आते हैं हर रात मुझे समझने को

ये किताब आप https://www.pustak.org/books/bookdetails/4992 की साइट से या फिर राजपाल एन्ड संस् दिल्ली से भी मंगवा सकते हैं।  क़तील शिफ़ाई साहब पर अगर आप लिखने पे आएं तो लिखते ही चले जा सकते हैं ,मैं तो अपनी रौ में लिखता चला जा रहा हूँ लेकिन मुझे ये भी तो ध्यान रखना पड़ेगा कि आपका वक्त बहुत कीमती है और मुझे अब यहीं रुक जाना चाहिए इसलिए आपसे अब रुखसत की इज़ाज़त ले रहा हूँ। हाँ जाने से पहले आपको उनकी एक बहुत मशहूर ग़ज़ल के ये शेर पढ़वाता चलता हूँ , यूँ पढ़वाने की तमन्ना तो और भी बहुत कुछ थी लेकिन खैर -कहते हैं न कि सब कुछ पूरा कभी नहीं मिलना चाहिए थोड़ी सी कसक बाकी रहनी चाहिए तभी ज़िन्दगी में मज़ा बना रहता है :

 परीशां रात सारी है सितारो तुम तो सो जाओ 
 सुकूते-मर्ग तारी है सितारो तुम तो सो जाओ 

 हमें तो आज की शब् पौ फ़टे तक जागना होगा 
 यही किस्मत हमारी है सितारो तुम तो सो जाओ 

 हमें भी नींद आ जायेगी हम भी सो ही जायेंगे 
 अभी कुछ बेकरारी है सितारो तुम तो सो जाओ