Monday, February 19, 2018

किताबों की दुनिया -165

भूलना मैं चाहता तो किस क़दर आसान था 
याद रखने में तुझे, ये सारी दुश्वारी हुई 

तू अगर रूठा रहा मुझसे तो हैरत क्या करूँ 
इस जहाँ में किससे तेरी नाज़ बरदारी हुई 

सोचता हूँ एक पल में हो गया कैसे तमाम 
वो सफ़र जिसके लिए इक उम्र तैय्यारी हुई

"आधुनिकता के जोश में हमारी शायरी, ख़ास तौर पर गज़ल ने समाजी सरोकारों से जो दूरी बना ली थी उसे अपनी ग़ज़लों में इस रिश्ते को दोबारा बहाल करने का सराहनीय प्रयास इन्होने किया है " हमारे आज के शायर और उनकी शायरी के बारे में उस्ताद शायर शहरयार आगे लिखते हैं कि "हकीकत चाहे जो भी हो, शाइर और अदीब आज भी इस खुशफ़हमीमें मुब्तिला हैं कि वो अपनी रचनात्मकता के द्वारा इस दुनिया को बदसूरत होने से बचा सकते हैं और समाज में पाई जाने वाली असमानताओं को दूर कर सकते हैं, इनकी भी शायरी का एक बड़ा हिस्सा इसी खुशफ़हमी का नतीजा मालूम होता है "

ये हमनशीन मेरे खुश हैं कि ग़मज़दा हैं
मातम तो कर रहे हैं बाछें खिली हुई हैं 
हमनशीन =साथी 

देखा है तुमने ऐसा मंज़र कभी कहीं पर 
वीरान घर पड़े हैं सड़कें सजी हुई हैं 

साँसों की क़ैद में हूँ, अक्सर ये सोचता हूँ 
ये ज़िन्दगी है या फिर मुश्कें कसी हुई हैं 

अब क्या है उसके दिल में अंदाज़ा कर रहा हूँ 
आँखें चमक रही हैं पलकें झुकी हुई हैं 

शहरयार साहब जिस शायर की बात कर रहे थे वो हैं 27 मई 1957 को मेरठ में जन्में जनाब "उबैद सिद्दीक़ी", साहब जिनकी डॉल्फिन बुक्स नई दिल्ली द्वारा 2011 में प्रकाशित किताब "रंग हवा में फैल रहा है" का ज़िक्र करेंगे।उबैद साहब के बारे में जो जानकारी उनकी इस किताब और उनके फेसबुक एकाउंट से प्राप्त हुई है उसी को आपके साथ साझा कर रहा हूँ। दरअसल उबैद साहब के बारे में गूगल महोदय ने भी चुप्पी अख़्तियार कर रखी है, कारण बहुत साफ़ सा है , उबैद साहब अपने में मस्त और भीड़ से अलग रहने वाले लोगों में से हैं। शायरी वो छपवाने और प्रसारित करने के लिए नहीं करते ,शायरी उनके लिए इबादत की तरह है जो उनके और उनके आराध्य के बीच घटित होती है।


मौसम के बदलने से बदल जाता है मंज़र 
दुनिया में कोई चीज़ पुरानी नहीं होती 

उसको भी हुनर आ गया आँखों से सुखन का 
हमसे भी कोई बात ज़बानी नहीं होती 

हम भी कोई शै उससे छुपा लेते हैं अक्सर 
उसको भी कोई बात बतानी नहीं होती 

मजे की बात है कि उनके निकटतम रहने वाले लोगों भी ये पता नहीं चला की वो एक बेहतरीन शायर हैं। उन्होंने शायरी कभी शायरी करनी है ये सोच कर नहीं की। उनकी पहली ग़ज़ल सन 1969 में 'बीसवीं सदी' रिसाले में प्रकाशित हुई। उसके बाद वो कभी कभार ग़ज़लें कहते रहे और ये सिलसिला 1997 तक चला। आप यकीन नहीं करेंगे लेकिन ये सच है कि सन 1997 से सन 2009 याने 13 बरस तक उन्होंने एक भी ग़ज़ल नहीं कही। उन्हें लगने लगा था कि वो कभी दुबारा शेर नहीं कह पाएंगे क्यूंकि भरपूर कोशिशों के बावजूद उनकी तबियत शेर कहने की और अग्रसर नहीं होती थी। जो लोग शायरी करते हैं वो जानते हैं कि अच्छी ग़ज़ल दिमाग़ पर जोर देने से नहीं कही जा सकती। यही कारण है कि उबैद साहब का पहला ग़ज़ल संग्रह ,जिसकी हम बात कर रहे हैं ,उनके लेखन के आगाज़ के 25 साल बाद मंज़र-ऐ-आम पर आया है।

आग बुझी तो लोग ख़ुशी से नाचने गाने लगे 
मैंने ठंडी राख कुरेदी और शरर देखा 

इक मैं हूँ कि जिसने देखे जीते जागते लोग 
बाकी सारे सय्याहों ने एक खंडर देखा 
सय्याहों =पर्यटक 

सारी खुशियां कैसे अचानक बेमानी सी लगीं 
दिल के साथ ग़मों को जब से शीरो-शकर देखा 
शीरो-शकर =दूध और चीनी की तरह मिला हुआ

शुरुआती दौर में उबैद साहब की शायरी को संवारने में जनाब "हफ़ीज़ मेरठी" मरहूम जो उसी फैज़े-आम इंटर कॉलेज में क्लर्क थे जहाँ से उन्होंने बारहवीं क्लास तक तालीम हासिल की थी ,बहुत मदद की। हफ़ीज़ साहब मुशायरों के मकबूल शायर होने के बावजूद अदबी क़द्रो-क़ीमत की संजीदा ग़ज़ल कहते थे और शेर कहने के शास्त्र से बखूबी परिचित थे। एक और बुजुर्ग शायर जनाब "अंजुम जमाली" जो मेरठ के वाहिद अदीब और होम्योपैथ डॉक्टर भी थे से भी उबैद साहब ने शायरी की बारीकियां सीखीं। उनके क्लिनिक पर इलाहबाद से प्रकाशित उर्दू की मशहूर साहित्यिक पत्रिका "शब ख़ून" को उबैद साहब ने संजीदगी से पढ़ना शुरू किया।

दुनिया ही नहीं दिल को भी इस शहरे-हवस में 
मनमानी किसी हाल में करने नहीं देना 

महसूस नहीं होगी मसीहा की ज़रूरत 
ये ज़ख्म ही ऐसा है कि भरने नहीं देना

मुश्किल है मगर काम ये करना ही पड़ेगा 
इन्सान को इन्सान से डरने नहीं देना 

उनकी शायरी में उल्लेखनीय मोड़ तब आया जब उन्होंने ग्रेजुएशन के लिए सन 1975 में अलीगढ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दाख़िला लिया। वहां नौजवान शायरों और अदीबों का बहुत बड़ा हलका मौजूद था। उन नौजवानों में फ़रहत एहसास , महताब हैदर नकवी, असद बदायूँनी , जावेद हबीब ,आशुफ़्ता चंगेज़ी आदि विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। फ़रहत एहसास साहब से दोस्ती होने के बाद ही उनको शहरयार साहब तक रसाई हासिल हुई. अलीगढ से ग्रेजुएशन के बाद उबैद साहब ने पी एच डी करने के लिए जामिया मिलिया इस्लामिया के उर्दू विभाग में दाख़िला लिया जिसके जनाब गोपी चंद नारंग विभागाध्यक्ष थे उन्हीं के निर्देशन में उन्हें मीराजी पर रिसर्च करनी थी लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। उबैद साहब ने अध्यापन के बजाय पत्रकारिता को अपना पेशा बनाने का फैसला किया और ऑल इण्डिया रेडिओ में नौकरी कर ली।

ये तो होना ही था इक दिन और ऐसा ही हुआ
ज़ुल्म जब हद से बढ़ा तो सामना करने लगे 

नींद आएगी तो ख़्वाबों के सफ़ीने लाएगी
ख़ौफ़ के मारे हुए हम रतजगा करने लगे 
सफ़ीने=नाव

दिल के मसरफ़ और भी हैं रंज करने के सिवा 
हम उसे किस काम में ये मुब्तला करने लगे 
मसरफ़=काम, व्यस्तता

ये नौकरी उन्हें रेडिओ कश्मीर ले गयी जहाँ श्रीनगर में उन्होंने छै साल गुज़ारे। श्रीनगर प्रवास के इस दौरान उन्होंने अच्छी खासी शायरी की फिर दो साल के लिए उनका ट्रांसफर लन्दन कर दिया गया। कश्मीर से लंदन ट्रांसफर के दौरान उनकी वो डायरियां जिनमें ग़ज़लें दर्ज़ थी गुम हो गयीं। इस तरह उनका बहुत कुछ लिखा मंज़र-ऐ-आम पर आने से रह गया। ऑल रेडिओ में दो साल लन्दन में गुज़ारने के बाद बी. बी. सी. वालों ने उन्हें और दो साल के वहाँ रोक लिया। जब ऑल इण्डिया रेडिओ ने उन्हें वापस इंडिया बुलाना चाहा तो वो इस्तीफ़ा दे कर लन्दन में बी.बी. सी की उर्दू सर्विस में काम करने लगे। इस दौरान उन्हें लन्दन में अक्सर होने वाले उर्दू मुशायरों और साहित्यिक गतिविधियों में हिस्सा लेने का खूब मौका मिला।

तभी तो मुस्कुराते फिर रहे हो 
तुम्हें जीने की आदत हो गयी है 

मुझे चेहरा बदलना पड़ गया है 
यहाँ सूरत ही सीरत हो गयी है 

तेरे सब चाहने वाले ख़फ़ा हैं
तुझे खुद से मोहब्बत हो गयी है 

उबैद साहब 2004 में दिल्ली वापस लौट आये और जामिया मिलिया इस्लामिया के मॉस कम्युनिकेशन रिसर्च सेंटर में प्रोफ़ेसर की हैसियत से पढ़ाने लगे। उनकी ग़ज़लों की पहली किताब "रंग हवा में फ़ैल रहा है " सबसे पहले सन 2010 में उर्दू लिपि में प्रकाशित हुई थी। एक साल बाद उसका हिंदी में जनाब रहमान मुसव्विर द्वारा लिप्यांतर किया संस्करण प्रकाशित हुआ। उबैद साहब मानते हैं कि उन साहित्य प्रेमियों का तबका बहुत बड़ा है जो उर्दू शायरी से मोहब्बत तो करते हैं लेकिन उर्दू लिपि पढ़ लिख नहीं सकते। ऐसे प्रेमियों के लिए ही है ये किताब जो दो हिस्सों में विभक्त है पहले हिस्से में वो ग़ज़लें हैं जो सन 2009 और 2010 याने लगभग एक साल के वक़्फ़े में कही गयीं और दूसरे भाग में सन 1975 से 1997 के बीच कही ग़ज़लें हैं।

अमीरे-शहर सुनता ही नहीं है 
उसे आँखें दिखा कर देखते हैं 

ये शाखें फिर भी क्या ऐसी लगेंगी 
परिंदों को उड़ा कर देखते हैं

बहुत मुमकिन है रोना सीख जाओ 
तुम्हें हंसना सिखा कर देखते हैं 

डॉ. महताब हैदर नक़वी साहब ने इस किताब की भूमिका में लिखा है कि "अपने आप में सिमटी और सिकुड़ी हुई उर्दू की आधुनिक शायरी के विपरीत उबैद की शायरी अपने अलावा बाहर की दुनिया की तरफ़ झांकती हुई भी दिखाई देती है। ये आदमी की तन्हाई के क्षणों में गाया जाने वाला ऐसा नग़्मा है जो हर उस शख्स से बात करना चाहता है जिसके पास कुछ ख़्वाब हैं और दुनिया की मृगतृष्णा में जीवन जी रहा है। सार्थक और ज़िंदा रहने वाली वही सदाबहार शायरी होती है जो इंसानी भलाई और बड़ाई के गीत गाती है तथा इसके लिए हर स्तर पर विपरीत परिस्थितियों में भी अपना पक्ष रखती है. आने वाले समय में उबैद की शायरी उनके संस्कारों एवं परम्परा से ही पहचानी जाएगी "

ये रौशनी के लिए कब जलाए जाते हैं 
यहाँ चराग़ हवा में सजाए जाते हैं 

मैं उनको देख के रोता हूँ जो सरे-महफ़िल 
हरेक बात प' बस खिलखिलाए जाते हैं 

हमारे जैसे बहुत लोग सारी दुनिया में 
न जाने किसलिए इतना सताए जाते हैं 

इंद्रापुरम, ग़ाज़ियाबाद निवासी उबैद साहब की 131 बेजोड़ ग़ज़लों का ये संग्रह आप डॉल्फिन बुक्स ,4855-56 हरबंस स्ट्रीट अंसारी रोड दरियागंज नयी दिल्ली -110002 को पत्र लिख कर ही मंगवा सकते हैं या उबैद साहब से m_obaid_siddiqui@hotmail.com पर मेल कर के पूछ सकते हैं और सबसे बढ़िया तो ये ही रहेगा कि आप उनसे उनके मोबाईल न 9891941452 पर बात कर उन्हें बधाई दें और किताब प्राप्ति का रास्ता पूछें। जनाब ज़ुबैर रज़वी साहब के इस कथन के साथ मैं आपसे विदा लेता हूँ कि " उबैद की हर ग़ज़ल समकालीन ग़ज़ल से कई क़दम आगे का सफर लगती है। बिलकुल अलग परिवेश की ग़ज़लें वर्तमान जीवन पर ऐसी ज्वलंत टिप्पणियां हैं जिनमें शाइर का स्व गहरे निरिक्षण और अनुभव की भांति कभी तहे-आब और कभी सतही-आब पर उछाल लेता नज़र आता है। " चलते चलते उनकी एक ग़ज़ल ये शेर भी पढ़वा देता हूँ :

ये नादानी मंहगी पड़ेगी तुम्हें 
घड़े फोड़ डाले घटा देख कर 

क़दम क्यों ज़मीं पर नहीं पड़ रहे 
वो आया है क्या आईना देख कर 

अजब लोग हैं इनको समझे ख़ुदा 
ख़ता कर रहे हैं सज़ा देख कर

Monday, February 12, 2018

किताबों कीदुनिया -164

छल, कपट, पाखंड का कुछ झूठे आभासों का है 
सारा जीवन चन्द चालों और कुछ पासों का है 

ये मोहब्बत के तकाज़े दोस्ती रिश्तों की डोर 
वहम है सारा फ़क़त, ये खेल विश्वासों का है 

तैरती इक लाश को देखा तो दिल ने ये कहा 
आदमी का कुछ नहीं बस बोझ तो साँसों का है 

कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके बारे में कहा जाता है की फलां तो सर्व गुण संपन्न है या गुणों की खान है।ऊपर वाले का खेल भी अजीब है जिस पर मेहरबान हो जाये उसे छप्पर फाड़ कर देता है और साहब जिस पे नाराज़ हो जाए उसका रहा सहा छप्पर भी फाड़ देता है। हमारे आज के शायर पहली श्रेणी वाले हैं याने गुणों की खान हैं। जिन पर ऊपर वाले का करम रहा। मेरी ये समझ में नहीं आ रहा कि उनकी बात कहाँ से शुरू करूँ ? चलिए शुरू से उनकी बात शुरू करते हैं। 8 जुलाई 1946 को जयपुर के पास चौमूं में जन्मे हमारे शायर साहब ने अपने स्कूली जीवन का आगाज़ कालाडेरा, जो चौमूं से 10 कि.मी. की दूरी पर है, से किया। उसी स्कूल में 12 वीं पास करने के बाद अध्यापन का काम करते रहे। दस वर्ष याने सं 1964 से 1974 तक अध्यापन के साथ साथ अध्ययन भी करते रहे और एम्.ऐ., बी एड की डिग्री हासिल की।

पलकों पे आंसुओं को यूँ मेहमान मत रखो 
काग़ज़ की कश्तियों में ये सामान मत रखो 

दिल है,धड़क रहा है,कोई कम तो नहीं है 
पेशानी को हर वक़्त, परेशान मत रखो 

तुम चाहते हो घर को महकता हुआ अगर 
तो घर में फिर ये कागज़ी गुलदान मत रखो 

उसके बाद याने 1974 से आप उद्घोषक के रूप में आकाशवाणी की सेवा में प्रविष्ट हुए और निरंतर प्रगति करते हुए 2002 में आकाशवाणी के उपनिदेशक बन गए और सं 2006 में केंद्र निदेशक के पद से रिटायर हुए। बात अगर आकाशवाणी के कर्मचारी के रूप में उनकी लगातार प्रगति की होती तो मैं उसे बढ़ा चढ़ा कर प्रस्तुत करने वाला नहीं था लेकिन उन्होंने इस दौरान अपनी सृजन यात्रा को भी अनेक पड़ाव पार करते हुए शिखर तक पहुँचाया। चलिए पहले उनके लेखन की चर्चा करते हैं उन्होंने हिंदी, उर्दू और राजस्थानी भाषा में अधिकारपूर्वक लेखन किया। जिसमें गीत, नवगीत, ग़ज़ल, छंद, दोहे , रुबाइयाँ आदि पद्ध विधा के अलावा गद्य में नाटक, कहानी, व्यंग , बाल साहित्य को भी उन्होंने अपनी कलम से समृद्ध किया है।

ऐ मेरे दोस्त रोक ले अब मत बढ़ा इसे
मुझको तो तेरा हाथ भी खंज़र दिखाई दे

अब ढूंढ रहा हूँ मैं किसी ऐसे शख़्स को
काँधे पे जिसके अपना ही इक सर दिखाई दे

 लाज़िम है अपनी जान को छिप कर बचाइए 
जब भी बचाने वालों का लश्कर दिखाई दे

"अक्षरों के इर्द गिर्द" , "सुकून" , "दर्द के रंग "हमारे आज के शायर जनाब "इकराम राजस्थानी " साहब के लोकप्रिय ग़ज़ल संग्रह हैं , "इस सदी का आखरी पन्ना" , "एक रहा है एक रहेगा अपना हिंदुस्तान" , "अमर है जिनसे राजस्थान" और "खुले पंख" आदि अनेक विचारोत्तेजक काव्य संग्रह हैं। राजस्थानी भाषा में उनके काव्य संग्रह "तारां छाई रात", "पल्लो लटके", शब्दां री सीख", आदि बहुत चाव से पढ़े जाते हैं। हज़रत शेख सादी की "गुलिस्तां" , रविंद्र नाथ टैगोर की " गीतांजलि" और हरवंश राय बच्चन की "मधुशाला" का राजस्थानी में काव्यानुवाद करने वाले वो एकमात्र व्यक्ति हैं।उन्होंने श्रीमदभगवत गीता और उपनिषदों का भी राजस्थानी भाषा में काव्यानुवाद किया है। इसके अलावा वो जिस काम के लिए हमेशा याद किये जायेंगे वो है "क़ुरान शरीफ़" का हिंदी भाषा में भावानुवाद। ऐसा करने वाले वो विश्व के पहले कवि हैं।

मन काले काले उजले उजले भेष हो गए 
जो शेष भी नहीं थे वो विशेष हो गए 

मीनारें चूमती थीं जिनकी आसमान को 
वो ऊंचे ऊंचे महल भी अवशेष हो गए 

वाहन के बराबर भी नहीं जो गणेश के 
वो लोग ये समझते हैं, गणेश हो गए 

इकराम राजस्थानी साहब की चुनिंदा ग़ज़लों, गीतों रुबाइयों दोहों और फुटकर शेरों का अनूठा संग्रह "कलम ज़िंदा रहे " जिसकी आज हम चर्चा कर रहे हैं , वाणी प्रकाशन ने अपनी पेपर बैक श्रृंखला "दास्ताँ कहते कहते " के अंतर्गत प्रकाशित किया है। इकराम साहब के लेखन की चर्चा तो हमने कर दी अब उनके अगले गुण पर प्रकाश डालते हैं और वो है उनका संगीत के प्रति लगाव। संगीत के क्षेत्र में भी उन्होंने अपनी अप्रतिम मेधा शक्ति का परिचय दिया है। वो आकाशवाणी के उच्च श्रेणी मान्यता प्राप्त राजस्थानी लोक संगीत गायकरहे हैं।उनकी लिखी, गायी और संगीत बद्ध की गयी रचनाएँ जो 100 से अधिक सीडी में उपलब्ध हैं ,आज भी उतनी ही लोकप्रिय हैं जितनी पहले थीं।


आप के दिन जब सुहाने आ गए 
लोग कितने दुम हिलाने आ गए 

खोजी कुत्ते चोर निकले ढूंढने 
घूम फिर कर सारे थाने आ गए 

जीत कर लीडर ने चमचों से कहा 
लूट लो अपने ज़माने आ गए 

शायद ही कोई राजस्थानी होगा जिसने उनका लिखा "अंजन की सीटी में मारो मन डोले ...चल्ला चल्ला रे डलावर गाड़ी हौले हौले " गीत नहीं सुना हो। इसकी लोकप्रियता का अंदाज़ा आप इस बात से लगाएं कि इसके मुखड़े और धुन को मशहूर फिल्म "खूबसूरत" के एक गीत में पिरोया गया था। इस से अधिक एक और लोकप्रिय गीत जिसका उपयोग "नौकर" फिल्म में संजीव कुमार पर किशोर कुमार की आवाज में रिकार्ड किया गया था "पल्लो लटके गोरी को पल्लो लटके " भी इकराम साहब की कलम का कमाल था।

हम सब को इंसान बना दे, ऐ अल्लाह 
सबकी इक पहचान बना दे, ऐ अल्लाह 

मंदिर में क़ुरआन हो, गीता मस्जिद में 
ऐसा हिन्दुस्तान बना दे, ऐ अल्लाह 

खुशबू का तो कोई धर्म नहीं होता 
मुझको तू लोबान बना दे, ऐ अल्लाह 

इकराम साहब खुद को अमीर खुसरो,जायसी,रसखान और रहीम की परम्परा का कवि मानते हैं. अभी हाल ही में संपन्न हुए जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में उन्होंने अशोक वाजपेयी , अरुंधति सुब्रमण्यम,इरा टाक, एड्रिआना लिस्बोआ , जेलिना और मोहिनी गुप्ता के साथ मंच साझा करते हुए अपनी बातों से उपस्तिथ श्रोताओं को ताली बजाने पर मजबूर कर दिया। जिस व्यक्ति की कृतियों के प्रशंसकों की लिस्ट में डा.शंकर दयाल शर्मा , श्रीमती प्रतिभा देवी सिंह पाटिल, प्रणव मुखर्जी,श्री श्री रवि शंकर , ममता बनर्जी जैसी विभूतियों का नाम हो उसको सुन कर भला कौन अपने आपको ताली बजाने से रोक पायेगा ?

जो शख्स मुहल्ले में पहलवान था कभी 
उसको, उठा , बिठाते हैं , दो चार पकड़ कर 

दुनिया में इबादत के लिए भेजा था तुझको 
तू आके यहाँ बैठा है, घर बार पकड़ कर 

कुछ लोग तो दरबार जा के झांकते नहीं 
कुछ काट गए ज़िन्दगी ,दरबार पकड़ कर 

इकराम साहब की ग़ज़लें सौ फीसदी खरे सोने जैसी हैं जिसमें ज़रा भी मिलावट नहीं है। वो जैसा देखते सुनते महसूस करते हैं वैसा ही अपने अशआर में पिरो देते हैं। उनकी कृतियों में लफ़्फ़ाज़ी के लिए बिलकुल जगह नहीं है। जिस इंसान को अपने नाम और किसी तरह के ईनाम की परवाह नहीं है वो क्यूँकर लेखन में समझौता करेगा ? दुनिया में अथाह पैसा और ताकत होते भी जहाँ इंसान खुश नहीं हैं वहीँ इकराम राजस्थानी जैसे अल्लाह के बन्दे खुल कर मुस्कुरा रहे हैं ख़ुशी से झूम रहे हैं क्यूंकि वो इक फ़क़ीर हैं. उनके सैंकड़ों मित्र है प्रशंसक हैं भक्त हैं परन्तु धनोपार्जन या लाभ उठाना इकराम साहब के बस की बात नहीं या यूँ समझें उनकी फितरत में ही नहीं।

 इबादत, रोज़ करता है यहाँ तू 
मगर पहुंचा नहीं अब तक वहां तू 

तेरी फ़रियाद सुन लेगा खुदा फिर 
अगर बोले परिंदों की ज़बाँ तू 

खुदा से बात कर लेते थे सीधी 
कहाँ वो लोग थे और है कहाँ तू 

अब चाहे आपको ईनाम की चाह हो न हो अपना नाम कमाने की तमन्ना हो न हो लेकिन अगर आप कुछ अच्छा कर रहे हैं तो ईनाम और नाम दोनों आपको स्वतः मिल जाते हैं। इसीलिए इकराम साहब को लोकमान्य पुरूस्कार ,राधा देवी स्मृति पुरूस्कार, राष्ट्रीय एकता पुरूस्कार ,तुलसी रत्न, रोटरी सेवा पुरूस्कार जैसे अनेक पुरुस्कारों से नवाजा जा चुका है।

बड़े दिलचस्प मंज़र हो गए हैं 
कई कतरे समंदर हो गए हैं 

इन्हें संसद का पूरा हक़ है यारों 
हज़ारों बार अंदर हो गए हैं 

गधों को कृष्ण चन्दर ने चढ़ाया 
गधे सब कृष्ण चन्दर हो गए हैं 
 (कृष्ण चन्दर उर्दू के बड़े अफसाना निगार रहे हैं उनकी "एक गधे की आत्म कथा" और "एक गधे की वापसी" बहुत मकबूल उपन्यास हुए हैं )

 इकराम साहब ने लेखन गायन और संगीत निर्देशन के अलावा नाटक लिखे और उनका मंचन भी किया है। वो कुशल अभिनेता भी हैं। लगभग 30 साल तक लगातार उन्होंने राष्ट्रीय समारोहों का आँखों देखा हाल लाल किले और राष्ट्रपति भवन से सुनाने के अलावा हल्दी घाटी जयंती और ख्वाजा साहब के 86 वे उर्स की कमेंट्री भी की है। तभी तो मैंने उन्हें "गुणों की खान" कहा है। " इकराम" साहब कहते हैं कि "मुझे ग़ज़ल से बहुत प्यार है। शायद वो बचपन से मेरे साथ चल रही है , मेरी सारी मुसीबतों को महसूस करती हुई मेरे साथ ही जवान भी हुई और अब उम्र के साथ ज़िन्दगी में घुमड़ती रहती है"।

तन तो केवल तन होता है 
जो होता है मन होता है 

बरखा की बूंदों से कह दो 
भीतर भी सावन होता है 

जिसके पास नहीं हैं सपने 
वो सबसे निर्धन होता है 

किताब की कोई ग़ज़ल रुबाई दोहा ऐसा नहीं है जिसे आप तक पहुँचाने में मुझे आनंद न आये लेकिन सारी की सारी किताब तो यहाँ नहीं प्रस्तुत की जा सकती। इसके लिए तो आपको "वाणी प्रकाशन" वालों को लिखना होगा या उन्हें 01123273167 पर फोन करना होगा , वैसे ये किताब ऑन लाइन भी उपलब्ध है। आप पढ़ना चाहें तो जरूर मंगवा ले और कुछ नहीं तो इकराम साहब को उनके मोबाईल न 09829078682 पर फोन करके उन्हें इस लाजवाब किताब के लिए बधाई दें। चलते चलते आईये आपको पढ़वाता हूँ इकराम साहब के कुछ चुनिंदा शेर :

चमन के पास से गुज़रो तो खुशबू लगने लगती है 
मैं हिंदी ऐसे लिखता हूँ कि उर्दू लगने लगती है 
*** 
विदा करते हैं जब माँ बाप घर से अपनी बेटी को
किसी कोने में छिप कर उस का बचपन बैठ जाता है 
*** 
काश फिर से वही दादी वही नानी आये 
लौट कर फिर से रजाई में कहानी आये 
*** 
चन्दन बना के खुद को ही पछता रहे हैं हम
सारे के सारे सांप हमीं से लिपट गए 
*** 
बताया नाम उसने राम अपना और यूँ बोला 
मैं घर का पेट भरने के लिए रावण बनाता हूँ 
***
तेरी सूरत अगर एक पल सोच ली 
ऐसा लगता है पूरी ग़ज़ल सोच ली

Monday, February 5, 2018

किताबों की दुनिया -163

ग़ज़ल ऐसी कि ग़ज़लें सिर धुनें बेसाख़्ता उसपे 
कि जब कहना नयी कहना हरी ताज़ी ग़ज़ल कहना 

ग़ज़ल कहनी है बस इस वास्ते कहना नहीं ग़ज़लें
कोई इक बात कहनी हो अगर साथी ग़ज़ल कहना 

जुबां ऐसी कि जैसे बोलते हैं बोलने वाले 
अदा ऐसी कि जैसे वो चले, वैसी ग़ज़ल कहना 

अगर आप ईमानदारी से देखें तो आजकल अधिकतर ग़ज़लें चाहे वो सोशल मिडिया के माध्यम से सामने आएं या प्रिंट मिडिया के, ऐसी कही जा रही हैं जो ऊपर दिए शेरों के ठीक विपरीत हैं। सीधे शब्दों में कहूं तो ग़ज़लें या तो बरसों से बयां किये जा रहे विषयों की जुगाली करती नज़र आती हैं या ग़ज़ल कहनी है ये सोच कर कही जाती हैं या फिर क्लिष्ट भाषा और उलझे विचारों से पाठक को चौंकाती नज़र आती हैं.बहुत कम ऐसी ग़ज़लें नज़र आती हैं जिन्हें सुन या पढ़ कर बेसाख्ता मुंह से वाह निकल जाय। एक बात तो स्पष्ट है कि इस से पहले इतनी तादाद में ग़ज़लें नहीं कही जा रही थीं। सोशल मिडिया था नहीं और प्रिंट मिडिया भी आसानी से सबको उपलब्ध नहीं था। अब आज का ये दौर ग़ज़ल के लिए अच्छा है या बुरा बहस का विषय हो सकता है।

मुल्क तो दिखता नहीं है मुल्क में यारों कहीं 
दिख रही लेकिन है उसकी राजधानी हर तरफ 

सोचता हूँ नस्लेनौ कल क्या पढ़ेगी ढूंढकर 
पानियों पर लिख रही दुनिया कहानी हर तरफ

उग रहे हैं सिर्फ़ कांटे, सिर्फ कांटे शाख में 
आंय ! कैसी हो रही है बागवानी हर तरफ

ग़ज़ल अब महबूब से बातें करने ,उसके रूप का वर्णन करने और उसकी बेवफाई पर आंसू बहाने जैसे विषयों को कब का पीछे छोड़ छाड़ कर इंसान के दुःख सुख और सामाजिक बुराइयों का पर्दाफाश करने की और मुड़ गयी है। ग़ज़ल की सशक्त विधा का प्रयोग अब इंसान और उसके द्वारा बनाये समाज को आइना दिखाने और कमियों पर चोट करने में किया जाने लगा है। दुष्यंत कुमार से पहले भी ग़ज़ल चोट तो करती थी पर शायद इतने धारदार तरीके से नहीं। दुष्यंत के बाद बहुत से शायरों ने इस विधा को हथियार की तरह इस्तेमाल किया ,अदम गौंडवी साहब का नाम इस फेहरिश्त में काफी ऊपर आता है। हमारे आज के शायर भी अदम साहब की परम्परा के ही हैं।

भूख जब वे गाँव की पूरे वतन तक ले गए 
मामला हम भी ये फिर शेरो-सुख़न तक ले गए 

आग भी हैरान थी शायद ये तेवर देख कर 
जब उसे तहज़ीबदां घर की दुल्हन तक ले गए 

हम पिलाते रह गए अपना लहू हर लफ्ज़ को 
और वे बेअदबियां सत्तासदन तक ले गए 

दर असल हमारे आज के शायर जनाब नूर मुहम्मद 'नूर' जिनकी किताब "सफर कठिन है "का जिक्र हम करने जा रहे हैं ,की ग़ज़लों को पढ़ना हिंदुस्तान के समकालीन सफर को पढ़ना है। हिंदुस्तान का समकालीन सफर बहुत कठिन रहा है और इस किताब में संकलित ग़ज़लों का सफर भी। "सफर कठिन है" की ग़ज़लों को पढ़ते हुए हम कई बार सफर में पेश आयी अपनी कठिनाइयों को भी पहचानने का हौसला हासिल करते हैं। इस किताब की ग़ज़लें आम इंसान के दुःख दर्द ,राजनीती और हमारे समाज में घर कर गयी बुराइयों की और इंगित करती हैं और साथ ही हमें इनसे निपटने का हौसला भी देती हैं : 


उधर इस्लाम ख़तरे में, इधर है राम ख़तरे में 
मगर मैं क्या करूँ है मेरी सुबहो-शाम खतरे में 

ये क्या से क्या बना डाला है हमने मुल्क को अपने 
कहीं हैरी, कहीं हामिद, कहीं हरनाम ख़तरे में 

न बोलो सच जियादा 'नूर' वर्ना लोग देखेंगे 
तुम्हारी जान-जोखिम में तुम्हारा नाम खतरे में 

नूर साहब का जन्म 17 अगस्त 1954 में गाँव महासन, जिला –देवरिया (आजकल कुशीनगर) उत्तर प्रदेश में हुआ था.प्रारंभिक शिक्षा कुशीनगर में पूरी करने के बाद वो कलकत्ता आ गए जहाँ उन्होंने कलकत्ता यूनिवर्सिटी से स्नातक की डिग्री हासिल की। इसके बाद दक्षिण-पूर्व रेलवे मुख्यालय के दावा विधि विभाग में नौकरी की और 2014 में सेवा मुक्त हो कर कलकत्ता में रहने के बजाये अपने गाँव वापस लौट गए और अब वहीँ इन दिनों स्वतंत्र लेखन कार्य कर रहे हैं।

हरा भरा है अजब हौसला मगर उनका 
गो अब भी धूप के साये में है सफर उनका 

अभी न दर है न दीवार है न घर है अभी 
अभी ख़्याल है ,पौधा है ,घर का घर उनका 

है लब पे गाँव किसी गीत की तरह अब भी 
तो मौसिक़ी की तरह पाँव में शहर उनका 

नूर मुहम्मद नूर हिंदी, उर्दू , अरबी, बांग्ला के साथ –साथ अंग्रेजी में भी समान अधिकार रखते हैं और लिखते हैं |कविता, ग़ज़ल और कहानी-तीनों विधाओं पर उनकी बराबर की पकड़ है । अपनी मातृ भाषा भोजपुरी में भी वो खूब लिखते हैं। हंस, कथादेश, वर्तमान साहित्य, अक्षर पर्व समेत देश की तमाम पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं लगातार प्रकाशित होती रही हैं, होती रहती हैं। नूर मुहम्मद 'नूर' का एक कविता संग्रह 'ताकि खिलखिलाती रहे पृथ्वी', दो ग़ज़ल संग्रह-'दूर तक सहराओं में' और 'सफ़र कठिन है' प्रकाशित हो चुकी है। एक कहानी संग्रह 'आवाज़ का चेहरा' भी छप चुका है।

जिस तरह सहरा में पानी ढूंढते हैं तिश्नालब 
दोस्तों के बीच रह कर दोस्ताना ढूंढना 

आदमी में आदमियत और खुशबू फूल में
हो सके तो शहर में अब ये खज़ाना ढूंढना 

शेर कहना अब अदब के वास्ते ऐसा लगे
जैसे गूंगों के लिए कोई तराना ढूंढना 

नूर साहब की शख्सियत किसी भी गाँव के आम सीधे सादे इंसान की सी है। लम्बे बाल ,गहरी काली आँखों पर लगा मोटे फ्रेम का चश्मा और होंठों पर मुस्कराहट उनके फक्कड़ अंदाज़ से बहुत मेल खाती है। कुछ कुछ वामपंथी विचारधारा से प्रभावित उनकी शायरी में सामाजिक सरोकार उभर कर सामने आते हैं। वो पिछले चार दशकों से ग़ज़ल कह रहे हैं। "सफर कठिन है " को उनकी ग़ज़लों का प्रतिनिधि संग्रह कहा जा सकता है। प्रतिनिधि इस अर्थ में कि इस संग्रह से नूर की ग़ज़लों का मिज़ाज़ पाठकों के सामने खुलता है।

सुब्ह का चावल नहीं है रात का आटा नहीं
किसने ऐसा वक़्त मेरे गाँव में काटा नहीं 

शोर है कमियों ही कमियों का हरइक लम्हा यहाँ 
मेरे घर में आजकल कोई भी सन्नाटा नहीं 

वक़्तेबद, यारे अदब, हुस्ने ग़ज़ब, ऐ मेरे रब 
किसने मेरे मुंह पे मारा खींच कर चांटा नहीं 

दर्दोग़म है भूख है पीड़ा है चोटें और दुक्ख 
इस नदी में ज्वार तो आया मगर भाटा नहीं 

नूर साहब खूब लिखते हैं ग़ज़ल के अलावा उनकी नज़्मों का रेंज भी बहुत विशाल है। उनकी नज़्में उनके फेसबुक की वाल पर पढ़ी जा सकती हैं। छोटी छोटी नज़्मों की मारक क्षमता बेमिसाल है। किताब के अंतिम पृष्ठ पर उनकी ग़ज़लों के बारे में लिखा है कि " बारिश में जले मकान की जलन नूर की ग़ज़ल में है तो गंभीर पीड़ाओं के साथ साथ जंगल-बस्ती में घूमने का एहसास भी एक और जो संभाल कर रखा था गाँठ में उसे भी रहनुमाई और बन्दानवाज़ी के जरिये लुट जाने की हाय हाय इन ग़ज़लों में है तो शब्द से सुन्दर पहचान नहीं सुन्दर हिंदुस्तान की तमन्ना भी है। "

आपको तो आयतें या सिर्फ मंतर चाहिए 
यानी कि मशहूरियत ज्यादा भयंकर चाहिए 

रोटियां तालीम बच्चों को मिले या मत मिले 
उनका कहना है कि मस्जिद और मंदिर चाहिए 

रूप से व्यवहार से चाहे असुंदर लोग हों 
ज़ोर है इस बात पे कि शहर सुन्दर चाहिए 

ग़ज़ल को हिंदी और उर्दू के खेमों में बांटे वालों को नूर साहब की ग़ज़लें पढ़ कर सीखना चाहिए कि कैसे इन दोनों भाषाओँ के समन्वय से कहन में ख़ूबसूरती पैदा की जा सकती है। इन ग़ज़लों की भाषा अलंकृत भले न हो लेकिन खालिस हिंदुस्तानी है जो सीधे दिल पे दस्तक देती है। इस संग्रह की लगभग सभी सभी ग़ज़लें बेहद सीधी सादी बोलचाल की भाषा में कही गयी हैं। किसी किसी ग़ज़ल के रदीफ़ तो चौंकाने वाले हैं जिनमें ताज़गी है। ऐसे अलग से रदीफ़ वाले कुछ शेर मैं आपको आखिर में पढ़वाऊंगा, अभी तो उनकी एक ग़ज़ल में हिंदी-उर्दू भाषा का समन्वय देखिये :

क्या पूछो तुम हाल हमारा, घट घट के बंजारे हम 
घूम रहे हैं जंगल-बस्ती पीड़ाएँ गंभीर लिए 

ख़ाली-ख़ाली बर्तन लेकर पनघट-पनघट, लोग फिरें 
मन में विपदाओं की हलचल नयन कटोरे नीर लिए 

मरने वाले क़दम-क़दम पर रोज़ रोज़ ही मरते हैं 
जीने वाले जी जाते हैं आहों में तासीर लिए

 "सफर कठिन है "किताब जिसमें नूर साहब की लगभग 156 ग़ज़लें संग्रहित हैं को प्रतिश्रुति प्रकाशन 7 ऐ ,बेंटिक स्ट्रीट कोलकाता ने सं 2014 में प्रकाशित किया है। आप इस पेपर बैक किताब की प्राप्ति के लिए या तो प्रकाशक से 03322622499 पर फोन करें या mail.prkashan@gmail.com पर मेल करें साथ ही साथ नूर साहब को इस लाजवाब ग़ज़ल संग्रह के लिए 09433203786 अथवा 08334888146 पर फोन करें या उन्हें noorluckynoor@gmail.com पर मेल कर बधाई दें। यकीन माने इस संग्रह की ग़ज़लें आपके दिलो-दिमाग पर छा जाएँगी।
आखिर में आपको पढ़वाता हूँ नूर साहब के कुछ फुटकर शेर जो अपनी कहन और रदीफ़ के कारण देर तक याद रहेंगे :

वो रह रहा है बड़े ठाठ से जो बेघर था 
उसे ईनाम मिला बस्तियां जलाने का 
*** 
अब कोई क़ातिल कोई मुजरिम न बख़्शा जाएगा 
आपने क्या खूब फ़रमाया, बधाई ! हाय-हाय 
*** 
तोड़ देती है जो तटबंधों को बांधों को हमेश 
सच अगर पूछो तो मुझको वो नदी अच्छी लगी
 ***
फ़िक्र बिल्ली की तरह 'नूर' झपट्टा मारे 
चैन चिड़िया की तरह फुर्र से उड़ जाता है 
*** 
कभी डरता था घर की चिठ्ठियों से 
कि अब अख़बार से डर लग रहा है 
*** 
अब यही इस दौर के इंसान की पहचान है 
धड़ ही धड़ होते हैं खाली ,सर नहीं होते मियां 
*** 
फूल-पत्ते, चाँद, मौसम, शब, सुराही, औरतें 
अब कहीं अलफ़ाज़ में पत्थर नहीं होते मियां 
***
खूब हँसता हूँ देर तक उस पर 
वो समझता है आदमी मुझको 
*** 
मैं बड़ी देर तक रहा मसरूफ़ 
वो बड़ी देर तक दिखी मुझको 
*** 
औंधा पड़ा हुआ है हरइक मोर्चे पे मुल्क 
पर झंडे उड़ रहे हैं ग़ज़ब आसमान में 
*** 
घुटन कैसी गिला कैसा हुए जो बंद दरवाज़े 
मेरे ख़्वाबों में खुलती है अभी भी खिड़कियां सौ-सौ 
*** 
न्याय सामाजिक, दलित उत्थान, धरम निरपेक्षता 
पक चुके हैं कान सुन-सुनकर मियाँ ,रस्ता पकड़

Monday, January 29, 2018

किताबों की दुनिया -162

तुम समुन्दर हो न समझोगे मिरी मजबूरियां 
एक दरिया क्या करे पानी उतर जाने के बाद 

आएगी चेहरे पे रौनक़ खिल उठेगी ज़िन्दगी 
ग़म के आईने में थोड़ा सज-सँवर जाने के बाद 

मुन्तज़िर आँखों में भर जाती है किरनों की चमक 
सुब्ह बन जाती है हर शब् मेरे घर आने के बाद 

भारत के पूर्वी प्रदेश बिहार के पश्चिम भाग में गंगा नदी के तट पर स्थित एक ऐतिहासिक शहर है। नाम है बक्सर जो पटना से ये ही कोई 75 कि.मी. दूर होगा। इसी बक्सर में ऋषि विश्वामित्र का आश्रम था और यहीं राम- लक्ष्मण ने उनसे शिक्षण-प्रशिक्षण लिया। यहीं पत्थर में परिवर्तित अहिल्या का राम ने उद्धार किया था। इसी जगह का एक शायर है जो पत्थर की तरह के मृतप्राय शब्दों को अपनी विलक्षण कलम से छू कर प्राणवान कर देता है। अपने में मस्त इस अद्भुत शायर को बहुत कम लोग शायद जानते हों। उनसे मेरा परिचय भी इस किताब से हुआ है जिसकी बात हम आज करेंगे।

मिरे नसीब में लिक्खी नहीं है तन्हाई 
जो ढूढ़ना तो हज़ारों में ढूंढ़ना मुझको 

मैं दुश्मनों के बहुत ही क़रीब रहता हूँ 
समझ के सोच के यारों में ढूंढना मुझको 

फ़क़त गुलों की हिफ़ाज़त का काम ही है मिरा
चमन में जाना तो ख़ारों में ढूंढना मुझको 

सही कहा है इस शायर ने ,इन्हें ढूंढना आसान काम नहीं। जिस जगह आज के बहुत से शायर आसानी से मिल जाते हैं वहां ये हज़रत नहीं मिलते। आज के युग का ये शायर न किसी धड़े से जुड़ा है न फेसबुक या ट्वीटर से न कोई इसकी बहुत बड़ी फैन फॉलोइंग नज़र आती है और न किसी अखबार पत्रिका में चर्चा। लेकिन फिर भी बिहार का शायद ही कोई सच्चा साहित्य प्रेमी होगा जिसने इनका नाम न सुना हो और इनके अपने क्षेत्र में तो इनका नाम बहुत ही आदर से लिया जाता है. मेरा इशारा हमारे आज के शायर जनाब "कुमार नयन" से है जिनकी किताब 'दयारे-हयात में" की बात हम करेंगे।


इतने थे जब क़रीब तो फिर क्यों मिरे रफ़ीक़ 
तुमको तलाशने में ज़माना लगा मुझे 

हर सू यहाँ पे दर्द के ही फूल हैं खिले 
रुकने का इसलिए ये ठिकाना लगा मुझे 

मेरी सलामती की दुआ दुश्मनों ने की 
सचमुच ये उनका मुझको हराना लगा मुझे 

बढ़ी हुई दाढ़ी उलझे रूखे बाल कबीर सी सोच और फक्कड़ तबियत के मालिक 'कुमार नयन' आपको बक्सर की सड़कें पैदल नापते कभी भी दिखाई दे सकते हैं। 5 जनवरी 1955 को डुमरांव में कुमार नयन का जन्म हुआ। उनके पिता गोपाल जी केशरी थे। दादा जी सीताराम केशरी जिनको पूरा बिहार स्वतंत्रता सेनानी के नाम से जानता था। नयन जी ने दसवीं तक की पढ़ाई हाई स्कूल डुमरांव से की। 1969 में इंटर पास किया। डीके कालेज से बीए, फिर एलएलबी व अंतत: हिन्दी से एमए किया। इस बीच 1975 में ही वे डुमरांव से बक्सर आ गए। यहां शहर में उनकी ननिहाल थी। यहीं बस गए।

सबकुछ है तेरे पास मेरे पास कुछ नहीं 
अब तेरे-मेरे बीच कोई फ़ासला नहीं 

मैं जी रहा हूँ कम नहीं इतना मिरे लिए 
सर पर मिरे ख़ुदा क़सम कोई ख़ुदा नहीं

मुन्सिफ़ बने हो तुम मिरे तो सोच लो ज़रा 
इन्साफ़ मांगने चला हूँ फ़ैसला नहीं 

आज बक्सर शहर की दलित बस्ती खलासी मुहल्ला में इनका आशियाना है। जीवट इतने हैं कि तब से लेकर आजतक शहर की सड़कों पर पैदल चलते आ रहें हैं। खुद के पास साइकल भी नहीं। नतीजा अब शहर की सड़के भी इनको पहचानने लगी हैं। इस तरह का इंसान खुद्दार किस्म का होता है और ऐसे इंसान की सोच भी सबसे अलग होती है ,ये अपने लिए नहीं समाज के लिए काम करता है। एमए व एलएलबी करने के बाद भी उन्होंने कैरियर के रूप में साहित्यक व सामाजिक क्षेत्र को चुना। 1987 में भोज थियेटर लोक रंगमंच की स्थापना की। इसके माध्यम से उन्होंने भिखारी ठाकुर के नाटकों एवं अन्य लोक संस्कृतियों का मंचन कर अलग ही पहचान बना ली।

दूर तक मंज़िल न कोई मरहला इस राह में 
मील का पत्थर नहीं फिर भी सफ़र अच्छा लगा 

आपने भी फाड़ डाली अपनी सारी अर्ज़ियाँ 
आप भी खुद्दार हैं यह जान कर अच्छा लगा 

हैं वो ही दीवारो-दर आँगन वो ही बिस्तर वो ही 
शख़्स इक आया तो मुद्दत बाद घर अच्छा लगा 

पढाई के बाद 1981 में कोलकत्ता से प्रकाशित होने वाले रविवार के लिए लिखना प्रारंभ किया। इस बीच अंग्रेजी की पत्रिका ब्लिट्ज में लिखना प्रारंभ किया। 1986 में नवभारत टाइम्स से जुड़े, इस क्रम में टाइम्स आफ इंडिया के लिए भी लिखते रहे। यह सफर 1991 में थम गया। लंबे समय अंतराल के बाद वर्ष 2004 में झारखंड के प्रमुख दैनिक समाचारपत्र प्रभात खबर में सीनियर सब एडीटर के तौर पर काम करना प्रारंभ किया। यह सफर भी साल दो साल से अधिक नहीं चला। इसके बाद 08 से 09 के बीच युद्धरत आम आदमी विशेषांक में काम किया।

मिले कभी भी तो करता है बात फूलों की 
वो एक शख्स जो पत्थर के घर में रहता है

निकल न पाऊं कभी उसकी सोच से बाहर 
कोई ख़याल हो उसकी डगर में रहता है 

तुम्हीं कहो न कि मैं क्या करूँ तुम्हारे लिए 
मिरा तो दिल ये अगर और मगर में रहता है 

1991 में पत्रकारिता से साथ छूटा तो मुंबई चले गए। वहां दो भोजपुरी फिल्मों के लिए गीत लिखे। एक के लिए डायलाग व पूरी कहानी लिखी। 93 में हमेशा के लिए माया नगरी को छोड़ दिया। शहर में सामाजिकी जीवन से जुड़े। 94-95 में अंजोर के सेक्रेटरी बने। 1999 में त्यागपत्र दे दिया। जरुरतें परेशान करती रहीं। वकालत शुरु कर दी। हाई कोर्ट के वरीय अधिवक्ता व्यासमुनी सिंह की नजर उनपर पड़ी। वे उन्हें पटना ले गए। 2002 में उनका निधन हो गया। तब नयन जी ने वकालत भी छोड़ दी.
"नयन" जी की एक ग़ज़ल के ये शेर लगता है उन्होंने अपने पर ही कहे हैं :

अजीब शख़्स है वो जो तबाह-हाल रहा 
तमाम उम्र मगर फिर भी बा-कमाल रहा 

मिला न वक़्त कभी ख़ुद से मिलने का ही मुझे 
कि सामने तो मिरे आपका सवाल रहा 

मुझे मुआफ़ करो ऐ मिरे अज़ीज़ ग़मों 
मैं सोचने में कोई शे'र बेख़याल रहा 

हालात ऐसे बने की नयन कलम से जुदा नहीं हो सके। रास्ते कई बदले पर कलम खींच कर अपने पास ले आती रही। यह बात अब उनको भी समझ में आने लगी। जीवन के सफर में जो लिखा था। उसे सहेजने लगे। 1993 में पहला कविता संग्रह पांव कटे बिम्ब प्रकाशित हुआ था। उसने रफ्तार पकड़ी। अब तक कुल पांच पुस्तकें आई हैं। जिनमें आग बरसाते हैं शजर (गजल संग्रह), दयारे हयात (गजल संग्रह), एहसास आदि प्रमुख हैं। उनकी अगली रचना "सोंचती हैं औरतें", प्रकाशित होने वाली है।
वर्ष 2017 फरवरी को पटना में आयोजित पुस्तक मेले में उनकी गजल की पुस्तक "दयारे हयात" सबसे अधिक बिकने वाली पुस्तक रही।

बहुत से लोग मुझसे पूछते हैं 
वतन में अपने ही अब हम नहीं क्या

ख़ुशी से आज भी क्यों जी रहा हूँ 
मुझे ग़म होने का कुछ ग़म नहीं क्या 

लहू क्यों खौलता रहता है हर दम 
सुकूँ का अब कोई मौसम नहीं क्या 

कुमार नयन साहब को ढेरों सम्मान और पुरूस्कार मिले हैं जिनमें बिहार भोजपुरी अकादमी सम्मान , कथा हंस पुरूस्कार, निराला सम्मान ,और ग़ालिब सम्मान उल्लेखनीय हैं।पिछले साल याने 2017 में , पटना में 30 मार्च को राजभाषा की ओर से शिक्षा मंत्री अशोक चौधरी की उपस्थिति में शीर्ष कवि केदारनाथ सिंह ने उन्हें राष्ट्रकवि दिनकर पुरस्कार प्रदान किया. साथ ही कुमार नयन को पुरस्कार की राशि एक लाख रुपए भी प्रदान की गयी। कुमार नयन साहब की शायरी में कई रंग हैं जिन्हें इस पोस्ट में समाया नहीं जा सकता , मैंने सिर्फ उनकी चंद ग़ज़लों के अशआर ही आप तक पहुंचाए हैं ,

मिरे घर में कहानी है अभी तक
मिरे बच्चों की नानी है अभी तक 

घड़ा मिटटी का पत्तों की चटाई
बुजुर्गों की निशानी है अभी तक 

कोई गिरधर यहाँ हो या नहीं हो 
मगर मीरा दीवानी है अभी तक 

वहां उम्मीद कैसे छोड़ दूँ मैं 
जहाँ आँखों में पानी है अभी तक

राधाकृष्ण प्रकाशन 7 /31 अंसारी मार्ग ,दरियागंज नै दिल्ली से प्रकाशित इस किताब में नयन जी की लगभग 111 ग़ज़लें संग्रहित हैं। इस किताब की प्राप्ति के लिए आप राधाकृष्ण प्रकाशन की वेब साईट www.radhakrishnaprkashan.com पर जा कर इस किताब का आर्डर कर सकते या फिर आप कुमार नयन साहब को इस पते पर ई-मेल kumarnayan.bxr@gmail.com करें या फिर उन्हें 9430271604 पर फोन कर के बधाई देते हुए पुस्तक प्राप्ति का रास्ता पूछें।
आखिर में चलते चलते आईये नयन जी की एक और ग़ज़ल के शेर आपको पढ़वाता हूँ :

मिरा दुश्मन लगा मुझसे भी बेहतर 
मैं उसके दिल के जब अंदर गया तो 

मिरे बच्चों से होंगी मेरी बातें 
किसी दिन वक़्त पर मैं घर गया तो

मैं ख़ाली ट्यूब हूँ पहिये का लेकिन
हवा बनकर तू मुझमें भर गया तो 

मन कर रहा है कि एक और ग़ज़ल के शेर आप तक पहुंचा दूँ ,मुझे बहुत अच्छे लगे उम्मीद है आप भी इन्हें पढ़ कर वाह करेंगे , देखिये न छोटी बहर में नयन जी ने क्या हुनर दिखाया है :

वहां पाखण्ड चल नहीं सकता 
जहाँ कोई कबीर ज़िंदा है 

इक पियादा हो जब तलक ज़िंदा 
तो समझना वज़ीर ज़िंदा है 

तेरी दुनिया में मर गयी होगी 
मेरी दुनिया में हीर ज़िंदा है

Monday, January 22, 2018

किताबों की दुनिया -161

माफ़ कर दो जो ख़ता मुझसे हुई है अब तक 
क्या ज़रूरी है उसे हर्फ़े बयानी कह दूँ 

ये ख़ता मुझसे हुई उसको जो चाहा मैंने 
जो ख़ता उसने करी वो मेहरबानी कह दूँ 

ये सबब है मेरे जीने का तो बरसों 'सागर' 
आज उन यादों को कैसे मैं पुरानी कह दूँ 

शायद आपको पता होगा कि आज़ादी से पहले उर्दू सरकारी जुबां हुआ करती थी ,सारे सरकारी फ़रमान उर्दू में आया करते थे ,अदालत की जुबां तो बरसों तक उर्दू रही। सिनेमा के गाने और संवाद ख़ालिस उर्दू में लिखे जाते थे हर मजहब के लोग उर्दू बोलते समझते थे। देश के अधिकतर अख़बार और रिसाले या तो उर्दू में छपते थे या अंग्रेजी में ,लेकिन जब से किसी साज़िश के तहत इस शीरीं ज़बान को एक खास मजहब के साथ जोड़ दिया गया तब से इस ज़बान को ज़बरदस्त नुक़सान हुआ और ये हाशिये पर चली गयी । अब फिर से इसे पटरी पर लाने के लिए सेमिनार आयोजित किये जा रहे हैं जश्न मनाये जा रहे हैं ,मुझे नहीं पता कि इस से उर्दू को फायदा हो रहा है या संयोजकों को।

इक उम्र गुज़ारी थी बस हमने अज़ाबों में 
मैं पढता रहा जीवन को यूँ ही किताबों में 

जीने का सलीका तो अहबाब सीखा देंगे 
इज़हार मुहब्बत का मिलता है गुलाबों में 

चुप चाप करो ख़िदमत तहरीर अदब 'सागर' 
कुछ मोल नहीं दुनिया के झूठे ख़िताबों में 

उर्दू ऐसी ज़बान है जिसे सीखने से ज़िन्दगी में तहज़ीब और सलीक़ा अपने आप आ जाता है। जिस दिन हम इस ज़बान को किसी धर्म विशेष की न मानते हुए अपनाएंगे उस दिन से इसकी वापसी बिना किसी सेमिनार या जश्न मनाने से हो जाएगी। हमारे आज के शायर जनाब " सागर सियालकोटी उर्फ़ हिन्दराज भगत " साहब को उर्दू से उतनी ही मुहब्बत है जितनी शायद कभी मजनूँ को लैला से रही होगी। सागर साहब की शायरी पढ़ते वक्त ये बात साफ़ हो जाती है कि उर्दू ज़बान के इस्तेमाल से किसी भी मज़हब का इंसान बेहतरीन शायरी कर सकता है। आज हम उनकी निहायत ही खूबसूरत किताब "एहतिज़ाज़-ए-ग़ज़ल" की बात करेंगे जिसकी पंच लाइन है "सुराही जाम को झुक कर ही मिलती है : ग़ज़ल कोई भी हो 'सागर' मज़ा देगी। तो आईये मज़े की शुरुआत करते हैं : 


ग़लत को ठीक कहना तो कभी अच्छा नहीं होता 
सही शिकवा शिकायत हो ये निस्बत में ज़रूरी है 

ये तिनके का सहारा डूबने वाले को काफ़ी है 
किसी को हौसला देना मुसीबत में जरूरी है 

मिरा किरदार ही 'सागर' निशानी है बुजुर्गों की 
अदब से पेश आयें हम अदावत में ज़रूरी है 

18 जनवरी 1951 को लुधियाना में जन्मे सागर साहब की उर्दू ज़बान और शायरी से दिलचस्पी उनके पिता जनाब करतार चंद जी की वज़ह से हुई। घर के अदबी माहौल से ये दिलचस्पी जूनून में तब्दील होती चली गयी और उन्होंने अपने कॉलेज के दिनों से शेर कहना शुरू कर दिया। कॉलेज की मेगज़ीन में उनके कलाम गाहे बगाहे छपते रहे।साथ पढ़ने वाले दोस्तों और उस्ताद लोगों ने उनके कलाम को खूब पसंद किया। कालेज के बाद उन्होंने इंडियन ओवरसीज़ बैंक में नौकरी की और वहीँ से मैनेजर के पद से 2011 में रिटायरमेंट लिया। नौकरी के दौरान उन्हें जब भी थोड़ी बहुत फुर्सत मिलती वो लिखने पढ़ने बैठ जाते। ऊपर वाले की मेहरबानी से उन्हें जीवन साथी के रूप में निर्मल जी मिल गयीं जिन्होंने न सिर्फ उनके इस शौक की सराहा बल्कि हर कदम पर हौसला अफजाही भी की।

कभी लैला से पूछा था मुहब्बत चीज़ है कैसी 
कहा उसने ख़ुदा की ये इबादत ही इबादत है 

कहीं दंगे कहीं रिश्वत कहीं जिन्सी मसाइल हैं 
हकूमत में सभी अंधे सियासत ही सियासत है 

तुम्हारे पास जज़्बा है हकूमत को बदलने का 
सही इन्सान को चुन लो करामत ही करामत है 

सागर साहब ने शायरी की तालीम मरहूम जनाब याकूब मसीही सलाम लुधियानवी से हासिल की और सं 2000 से आप जनाब नामी नादरी साहब की सरपरस्ती में शेर कह रहे हैं। नादरी साहब की रहनुमाई में उनके दो ग़ज़ल संग्रह "एहसास" सं 2004 में और "आवाज़ें" सं 2013 में शाया हो कर मकबूलियत हासिल कर चुके हैं। " एहतिज़ाज़-ए-ग़ज़ल" याने ग़ज़ल की ख़ूबसूरती ,उनका तीसरा ग़ज़ल संग्रह है जो 2017 के शुरुआत में शाया हुआ है।सागर साहब ने अपने तीनों ग़ज़ल संग्रह "साहिर लुध्यानवी" साहब के इस शेर से मुत्तासिर हो कर लिखे हैं " दुनियां ने तजुर्बात-ओ-हवादिस की शक़्ल में : जो कुछ मुझे दिया वही लौटा रहा हूँ मैं "

परिंदे को हवा पत्ता शजर भी जानता है 
जो राही थक के बैठा है सफ़र भी जानता है 

बशर साहिल पे जो भी घर बनाता है यकीनन 
वो तूफानों से लड़ने का हुनर भी जानता है

मुहब्बत में कहाँ अन्जाम की परवाह किसी को
मरीज़े इश्क़ तेशे का असर भी जानता है 

सागर साहब के शेर सच्चे हैं क्यूंकि वो ज़िन्दगी की तल्ख़ सच्चाइयों से गुज़र कर कहे गए हैं। उन्होंने ज़िन्दगी में जो देखा सुना और भोगा है वो ही अशआर में पिरो दिया है इसलिए उनके शेर पढ़ने वाले को आपबीती-जगबीती का अहसास भी करवाते हैं।हो सकता है आपको उनके शेर खुरदरे सपाट और तल्ख़ लगें क्यूंकि सच्चाई बिना मुलम्मे के होती है। नींव के पत्थरों की तरह जिनमें नक्काशी नहीं होती पर ईमारत को मजबूती से थामने की शक्ति होती है। हर तरफ रियाकारी ,क़तल-ओ-ग़ारत ,बढ़ती बेरोज़गारी और इन्सानियत की कमी के बीच मुलायम घुमावदार और मीठी बातें करना एक ईंमानदार शायर के लिए मुमकिन नहीं.

खिलौना सब का दिल बहला नहीं सकता मगर फिर भी 
वो बूढ़ा है खिलौने के लिए फिर भी मचलता है 

जिसे मालूम है सब कुछ वही ख़ामोश है लेकिन 
जिसे कुछ भी नहीं आता वही ज्यादा उछलता है

किसी के इश्क़ में 'सागर' क़दम ये सोच कर रखना 
ये वो जंगल यहाँ से कोई वापस कब निकलता है 

मैं 'सागर' साहब की इस बात से पूरी तरह इत्तेफ़ाक़ रखता हूँ कि "बड़े से बड़ा शायर भी फ़िक्री तौर पर कुछ भी नया नहीं कह सकता क्यूंकि खुदा की इस क़ायनात में तमाम ख्याल पहले से मौजूद हैं " लेकिन फिर भी 'सागर' साहब ने अपनी तरह से कुछ नया कहने की कोशिश जरूर की है। बेहतरीन तरन्नुम के मालिक 'सागर' साहब मुशायरों में शिरकत नहीं करते ,मेरे ये पूछने पर कि "क्यों ?" उन्होंने बेबाक अंदाज़ में जवाब दिया "क्यूंकि नीरज जी कोई हमें बुलाता नहीं और हम बिन बुलाये कहीं जाते नहीं " उन्हें कोई इसलिए नहीं बुलाता कि वो किसी धड़े से नहीं जुड़े हुए हैं और उन्हें अपनी ख़ुद्दारी बहुत प्यारी है।
आज के इस दौर में जहाँ शायरी के नाम पर कुछ लोग बाजार सजा कर बैठे हैं, कुछ लोग मठाधीश बने बैठे हैं और कुछ लोग एक गुट बना लेते हैं वहीँ सागर साहब जैसे लोग भी हैं जो एकला चालो रे की तर्ज़ पर शायरी सिर्फ शायरी की खातिर कर रहे हैं। अदब की ख़ामोशी से ख़िदमत करने वाले सागर साहब जैसे इंसान बड़ी मुश्किल से मिलते हैं , मेरे दिल में उन लोगों के लिए बहुत आदर है जिनकी सोच कबीर दास जी की उस सोच से मेल खाती जिसे उन्होंने अपने एक दोहे में यूँ व्यक्त किया है :" .कबीरा खड़ा बाज़ार में, सबकी मांगे खैर ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर"
मज़ाहिब कब सिखाते हैं किसी से बैर तकरारी 
अगर फ़िरक़ा परस्ती है तो फिर लड़ना जरूरी है 

अदब का काम लोगों को तो बस बेदार करना है 
जो कर पायें न तहरीरें तो फिर जलना जरूरी है 

अदीबों में सियासत बढ़ गई एजाज़ पाने की 
यही हालत रही 'सागर' तो फिर बचना जरूरी है 

सागर साहब की इस किताब को ' साहित्य कलश पब्लिकेशन' पटियाला ने प्रकाशित किया है, इसकी प्राप्ति के लिए आप उन्हें 9872888174 पर संपर्क कर सकते हैं या फिर sahitykalash@gmail.com पर मेल कर सकते हैं। जैसा मैं हमेशा कहता आया हूँ बड़ा अच्छा हो अगर आप सागर साहब को इस किताब के लिए मुबारकबाद देते हुए उन्हें 9876865957 पर कॉल करें। यकीन मानिये उनकी आवाज़ में उनकी ग़ज़ल सुनना एक ऐसा अनुभव है जिस से आप बार बार गुज़रना चाहेंगे। अगली किताब की तलाश में निकलने से पहले पेश हैं सागर साहब की एक छोटी बहर की ग़ज़ल के ये शेर :

आपका ख़त संभाल कर रख्खा 
और शिकवा निकाल कर रख्खा 

कब कहा था के वो पराया है 
सांप उसने जो पाल कर रख्खा 

फाश पर्दा कहीं ना हो 'सागर' 
जाल रिश्तों पे डाल कर रख्खा

Monday, January 15, 2018

किताबों की दुनिया -160

(ये मेरे ब्लॉग की चारसौ वीं (400th) पोस्ट है)

****

अपना हर अंदाज़ आँखों को तरोताज़ा लगा
कितने दिन के बाद मुझको आईना अच्छा लगा

सारा आराईश का सामां मेज़ पर सोता रहा
और चेहरा जगमगाता जागता, हँसता लगा
आराईश :सजावट

मलगजे कपड़ों पे उस दिन किस ग़ज़ब की आब थी
सारे दिन का काम उस दिन किस क़दर हल्का लगा

मैं तो अपने आपको उस दिन बहुत अच्छी लगी
वो जो थक कर देर से आया उसे कैसा लगा

आदाब !! मैं ही इन अशआर की शायरा हूँ और आज मैं अपनी बात आपसे खुद करने वाली हूँ, चूँकि मुझे हिंदी लिखनी नहीं आती इसलिए टाइपिंग के लिए नीरज की मदद ले रही हूँ। नीरज ने बहुत से मशहूर और अनजान शायरों का तआर्रुफ़ आपसे करवाया है अब इस सिलसिले को आगे बढ़ाने के इरादे से जब उन्होंने मेरी किताब  उठाई तो मैंने कहा आप ज़हमत मत कीजिये और मुझे खुद अपनी बात ख़ुद कहने दीजिये क्यूंकि आप अतिरेक से काम लेंगे और ये बात मुझे गवारा नहीं होगी। मुझे नहीं पता कि जो मैं कह रही हूँ नीरज वही सब लिख रहे हैं क्योंकि मुझे हिंदी पढ़नी भी नहीं आती लेकिन मुझे नीरज की ईमानदारी पर पूरा भरोसा है,आगे अल्लाह जाने।

हर ख़ार इनायत था हर संग सिला था
उस राह में हर ज़ख़्म हमें राहनुमा था
राहनुमा : पथ प्रदर्शक

उन आँखों से क्यों सुबह का सूरज है गुरेज़ाँ
जिन आँखों ने रातों में सितारों को चुना था
गुरेज़ाँ =बचना 

क्यों घिर के अब आये हैं ये बादल ये घटायें 
हमने तो तुझे देर हुई याद किया था 

आप सोचते होंगे कि मैं हूँ कौन ,बताती हूँ, बताने के लिए ही तो आपसे गुफ़्तगू कर रही हूँ लेकिन पहले मैं खुद तो ये तय करूँ कि मैं हिंदुस्तानी हूँ या पाकिस्तानी क्यूंकि मैं पैदा तो 14 मई 1937 में दख्खन हैदराबाद में हुई जो हिंदुस्तान में है और जब पैदाइश के 10 साल बाद देश का बंटवारा हुआ तो मेरा परिवार कराँची चला गया जो पाकिस्तान में है। तो यूँ समझें कि मैं पैदाइशी हिंदुस्तानी हूँ लेकिन निवासी पाकिस्तान की हूँ। मुझ पर भले ही पाकिस्तानी नागरिक होने का ठप्पा लगा है लेकिन मैं हक़ीक़त में इस खूबसूरत दुनिया की निवासी हूँ। इस दुनिया के हर इक कोने में रहने वाले लोग मेरे अपने हैं ,उनके दुःख दर्द तकलीफ़ें परेशानियां खुशियाँ सब मेरी हैं। मैं सोचती हूँ शायर का कोई वतन नहीं होता ,पूरी दुनिया उसकी होती है। मैंने दुनिया में होने वाली हर अच्छी बुरी घटनाओं पर अपनी कलम चलाई है.

जुदाईयां तो ये माना बड़ी क़यादत हैं
रफ़ाक़तों में भी दुःख किस क़दर हैं क्या कहिये
रफ़ाक़त: दोस्ती

हिकायते-ग़मे-दुनिया तवील थी कह दी
हिकायते-ग़मे-दिल मुख़्तसर है क्या कहिये
हिकायते-ग़मे- दुनिया :सांसारिक दुखों की कहानी, तवील : लम्बी , हिकायते-ग़मे-दिल : दिल के दुखों की कहानी

मजाले-दीद नहीं हसरते-नज़ारा ही सही
ये सिलसिला भी बहुत मोतबर है क्या कहिये
मजाले-दीद : देखने का साहस , हसरते-नज़ारा : देखने की इच्छा , मोतबर : विश्वसनीय

मेरा नाम "ज़ोहरा निगाह" है , शायद आपमें से बहुतों ने मेरा नाम नहीं सुना होगा मैं वैसे भी अब बहुत पुरानी हो चुकी हूँ आज के दौर में जहाँ लोग कल की बात भूल जाते हैं वहां मुझ जैसी नाचीज़ को याद रखना मुमकिन भी नहीं है। मेरे पिता सिविल सर्वेंट थे और उनका साहित्य, खास तौर से काव्य से गहरा लगाव था। हमारा परिवार प्रगतिशील विचारधारा वाला बुद्धि जीवियों का परिवार है। मेरी बड़ी बहन सुरैय्या बाजी बहुत प्रसिद्ध लेखिका थीं उनके लिखे नाटक बहुत चर्चित हुए ,मेरा बड़ा भाई अनवर मसूद पाकिस्तानी टीवी का एक जाना पहचाना नाम है ,उसे शायद आप लोगों ने जरूर देखा सुना होगा। मेरा छोटा भाई अहमद मसूद सरकारी महकमे में बहुत ऊँचे ओहदे पर रहा। मेरी शादी माजिद अली से हुई जो सिविल सर्वेंट थे और जिनकी रूचि सूफी काव्य में है। ये तो हुई मेरे परिवार की बात, अब बात करती हूँ पहले अपनी शायरी की और साथ साथ अपनी पहली किताब " शाम का पहला तारा " की जिस पर नीरज लिखने वाले थे लेकिन मेरे कहने पर जो अब सिर्फ टाइपिंग का काम कर रहे हैं :


ये क्या सितम है कोई रंगो-बू न पहचाने 
बहार में भी रहे बंद तेरे मैख़ाने 

तिरि निगाह की जुम्बिश में अब भी शामिल हैं 
मिरि हयात के कुछ मुख़्तसर से अफ़साने 

जो सुन सको तो ये दास्ताँ तुम्हारी है 
हज़ार बार जताया मगर नहीं माने 

शायरी मैंने 10-11साल की उम्र से ही शुरू कर दी थी। मेरी माँ ने, जिन्होंने मेरे वालिद के 1949 में दुनिया ऐ फ़ानी से रुखसत होने के बाद हम चारों भाई बहनों की बड़ी हिम्मत से परवरिश की और किसी बात की कमी नहीं महसूस होने दी थी , मेरी बहुत हौसला अफ़ज़ाही की। सबसे पहले मैंने अपने स्कूल की प्रिंसिपल के लन्दन तबादले पर नज़्म कही थी जिसे सुन कर मेरी एक टीचर ने मेरा नाम शहर में होने वाले ख़्वातीनो के मुशायरे में भेज दिया। लगभग 12-13 बरस की उम्र में मैंने अपना पहला मुशायरा पढ़ा। उस वक्त लड़कियों के ग़ज़ल लिखने को अच्छी बात नहीं माना जाता था क्यूंकि तब ग़ज़लें अधिकतर तवायफ़ें कहा करती थीं। मुझसे पहले मुझसे 13 साल बड़ी "अदा ज़ाफ़री" ही ग़ज़लें कहा करती थीं। खैर !! एक बार हुआ यूँ कि 1953 - 54 में जब मैं महज़ 16 -17 बरस की थी , हिंदुस्तान में होने वाले वाले डी सी एम् के मुशायरे में शिरकत करने के लिए मुझे दिल्ली से बुलावा आया। मैं डरते डरते गयी। मुशायरा के.एन.काटजू साहब की सदारत में हुआ जिसमें जिगर मुरादाबादी , फ़िराक़ गोरखपुरी, सरदार ज़ाफ़री , मज़रूह सुल्तानपुरी और कैफ़ी आज़मी जैसे कद्दावर शायरों ने शिरकत की थी. काटजू साहब को मेरी शायरी बहुत पसंद आयी और उन्होंने इसका जिक्र अगले दिन पंडित जवाहर लाल जी से किया। पंडित नेहरू ने मुझे सुनने की इच्छा ज़ाहिर की। अगले दिन रात दस बजे सब कामों से फ़ारिग हो कर पंडित नेहरू काटजू साहब के यहाँ तशरीफ़ लाये और मुझे एक घंटे तक बैठ कर सुना। किसी शायरा के लिए इस से बढ़ कर ख़ुशी की बात और क्या हो सकती है? आज के दौर में ये बात एक सपना लगती है .बताइये आज किस वज़ीर-ऐ-आज़म के पास इस काम के लिए इतनी फ़ुरसत है ?

नहीं नहीं हमें अब तेरी जुस्तजू भी नहीं 
तुझे भी भूल गए हम तिरि ख़ुशी के लिए 

कहाँ के इश्को-मुहब्बत किधर के हिज्रो विसाल 
अभी तो लोग तरसते हैं ज़िन्दगी के लिए 

जहाने-नौ का तसव्वुर, हयाते नौ का ख्याल 
बड़े फ़रेब दिए तुमने बंदगी के लिए 

मैं खुशकिस्मत हूँ कि मुझे जिगर साहब और फैज़ अहमद फैज़ साहब जैसे शायरों की कुर्बत हासिल हुई। जिगर साहब जब कभी भी पाकिस्तान आ कर मुझसे मिलते तो 10 रु बतौर ईनाम अता किया करते। वो तरन्नुम के बादशाह थे और कहा करते थे कि तरन्नुम कभी लफ़्ज़ों पर हावी नहीं होना चाहिए। फैज़ साहब कहते थे कि लफ्ज़ का इस्तेमाल शायरी की सबसे अहम् बात होती है। लफ्ज़ तो वो ही होते हैं जिसे हम एक दूसरे से बात करने में बरतते हैं शायर उन्ही लफ़्ज़ों को आगे पीछे कर अपनी शायरी में इस तरह मोती सा पिरो देता है कि वो जगमगाने लगते हैं और उनके अलग ही मआनी निकल आते हैं। जिसने ये हुनर सीख लिया वही कामयाब शायर होता है।

खूब है साहिबे महफ़िल की अदा
कोई बोला तो बुरा मान गए 

उस जगह अक्ल ने धोके खाये 
जिस जगह दिल तेरे फ़रमान गए 

तेरी एक एक अदा पहचानी 
अपनी एक-एक ख़ता मान गए 

कोई धड़कन है न आंसू न उमंग 
वक़्त के साथ ये तूफ़ान गए 

अक्सर लोग मुझसे पूछते हैं कि आप सं 1950 से लिख रही हैं और अभी तक आपके कुल जमा 3 मजमुए पहला "शाम का पहला तारा " दूसरा "वर्क" और तीसरा "फ़िराक़" ही शाया हुए हैं, ऐसा क्यों ? तो मैं कहती हूँ कि ये ही बहुत हैं। शायरी क्या है ?कुछ तो नेचर की तरफ़ से आपको गिफ़्ट है कि आप अल्फ़ाज़ की तुकबंदी कर लेते हैं ,उसमें वज़्न पैदा कर लेते हैं और उसके बाद आप उसको जोड़ लेते हैं। आप समझते हैं कि आपने कुछ लिखा है जिसमें तरन्नुम है एक मीटर है अगर ये काम आपको आता है तो फिर ये काम आपके लिए बहुत आसान है आप जब चाहें जितना चाहें लिख सकते हैं लेकिन सवाल ये है कि सबसे बड़ा नक्काद मैं समझती हूँ कि शायर खुद होता है इसलिए कि वो अपने शेर को खुद जांचता है परखता है कि ये शेर उसने अच्छा कहा है उसके दिल को लगा है या उसने कोई भर्ती के लफ्ज़ उसमें डाल दिए हैं इस तरह से उसकी कतर ब्योंत जो होती है न वो बहुत ज्यादा करनी पड़ती है और जो ऐसा करता है वोही बड़ा शायर बन पाता है। जिगर साहब, फ़िराक़ साहब, फ़ैज़ साहब को यही सब करते मैंने देखा है. ये सब अपने अशआर के साथ मेहनत करते थे। ज्यादा लिखना जरूरी नहीं होता ज्यादा पढ़ना जरूरी होता है मैं भी पढ़ती हूँ खूब पढ़ती हूँ और चाहती हूँ कि लिखने से पहले आप दूसरों को पढ़ने की आदत डालें।

वक़्त की फ़ज़ाओं पर कौन हो सका हाकिम 
कितने चाँद चमके थे कितने चाँद गहनाये 

इशरते-मोहब्बत के ज़ख़्म रह गए बाक़ी 
तल्ख़ि-ऐ-ज़माना को कोई कैसे समझाये 
इशरते-मोहब्बत =प्रेम का सुख 

मंज़िलो ! कहाँ हो तुम आओ अब क़दम चूमो 
आज हम ज़माने को साथ अपने ले आये 

आप ज़िन्दगी में कोई पेशा इख़्तियार कर लें चित्रकार बनें, संगीतकार बनें, डाक्टर, इंजिनियर, वक़ील या सरकारी मुलाज़िम बनें अगर आप थोड़ा बहुत अपने क्लासिक के साथ दिलचस्पी रखते हैं तो वो आपको तहज़ीब के संवारने में मदद देती है। फैज़ साहब कहते थे कि अच्छे अदब की एक निशानी ये भी है कि उसमें अपने पिछले ज़माने की इको जिसे सदाए बाज़गश्त कहते हैं आनी चाहिए। मैं फुर्सत के लम्हों में पुराना क्लासिकल साहित्य पढ़ती हूँ ,और ऐसा करना मुझे अच्छा लगता है।

बैठे बैठे कैसा दिल घबरा जाता है 
जाने वालों का जाना याद आ जाता है 

दफ्तर मन्सब दोनों ज़हन को खा लेते हैं 
घर वालों की किस्मत में तन रह जाता है
मन्सब =ओहदा 

अब इस घर की आबादी मेहमानों पर है 
कोई आ जाए तो वक्त गुजर जाता है 

हज़ारों बातें हैं जो आपसे करने को दिल कर रहा है लेकिन नीरज की लगातार टाइप करती उँगलियाँ थक कर मुझे चुप रहने का इशारा कर रही हैं। आपको ये बता दूँ कि ये किताब जिसमें मेरी लगभग 40 ग़ज़लें और उतनी ही नज़्में हैं को राधाकृष्ण प्रकाशन दिल्ली ने सन 2010 में शाया किया था, इसे आप अमेजन से आन लाइन मंगवा सकते हैं । मेरे पास तो इसकी कोई प्रति भी नहीं है।
मुझे अनेक देशों में शायरी पढ़ने का मौका मिला है लेकिन मेरा मन हमेशा हिंदुस्तान आ कर अपनी शायरी सुनाने को करता है।यूँ तो मुझे पाकिस्तान के प्रेजिडेंट के हाथों "प्राइड ऑफ परफॉरमेंस " अवार्ड मिल चुका लेकिन मेरा सबसे बड़ा अवार्ड मेरी शायरी के चाहने वाले प्रसंशकों की बेपनाह मोहब्बत है। अब मैं चलती हूँ और नीरज से गुज़ारिश करती हूँ कि मेरी एक ग़ज़ल के चंद शेर आप तक पहुंचा कर आराम करें। इंशाअल्लाह फिर मिलेंगे -ख़ुदा हाफिज !!

ये उदासी ये फैलते साए 
हम तुझे याद करके पछताए 

मिल गया सुकूँ निगाहों को 
की तमन्ना तो अश्क भर आये 

हम जो पहुंचे तो रहगुज़र ही न थी 
तुम जो आये तो मंज़िलें लाये 

 ( दोस्तों ज़ोहरा निग़ाह साहिबा तो चली गयीं लेकिन मेरी इल्तिज़ा है कि अगर वक्त मिले तो उनकी 3 नज़्में एक जिसमें कोख़ ही में मार दी गयी लड़की की पुकार है " मैं बच गयी माँ ", दूसरी में बांग्ला देश में फौजियों द्वारा किये गए रेप का जिक्र है " भेजो नबी जी बरकतें " और तीसरी जिसमें युद्ध के बाद बर्बाद हुए अफगानिस्तान के बच्चे का जिक्र है " कागज़ के जहाज " यू ट्यूब पर सुनें और देखें कि कैसे बेहद साधारण लफ्ज़ ऐसी इमेजरी पेश करते हैं कि आँखें भर आती हैं। ज़ोहरा जी ने तो इस किताब में छपी ग़ज़लों में से कुछ के शेर आप तक पहुंचाए , मैं आपको उनके कुछ फुटकर शेर पढ़वा कर विदा लेता हूँ और निकलता हूँ अगली किताब की तलाश में :

 भूले अगर तुझे तो कहाँ जाएँ क्या करें 
हर रहगुजर में तेरे गुजरने का हुस्न है 
*** 
उसने आहिस्ता से ज़ोहरा कह दिया, दिल खिल उठा 
आज से इस नाम की खुशबू में बस जायेंगे हम 
*** 
कड़े सफर में मुझको छोड़ देने वाला हमसफ़र 
बिछड़ते वक़्त अपने साथ सारी धूप ले गया
*** 
कब तक जां को ख़ाक करोगे कितने अश्क़ बहाओगे 
इतने महँगे दामों आख़िर कितना क़र्ज़ चुकाओगे
*** 
तुमने बात कह डाली कोई भी न पहचाना
हमने बात सोची थी बन गए हैं अफ़साने
*** 
यही मत समझना तुम्हीं ज़िन्दगी हो 
 बहुत दिन अकेले भी हमने गुज़ारे 
*** 
कौन जाने तिरा अंदाज़े-नज़र क्या हो जाए 
दिल धड़कता है तो दुनिया को ख़बर होती है )

Monday, January 8, 2018

किताबों की दुनिया -159

कल रात गुदगुदा गई यादों की उँगलियाँ
दिल पे मेरे वो भरती रही नर्म चुटकियाँ

झोंका हवा का आयेगा कर जायेगा उदास
इस डर से खोलते नहीं यादों की खिड़कियाँ

मैं सोचता हूँ तुझको ही सोचा करूँ मगर
इक शै पे कैसे ठहरें ख्यालों की तितलियाँ

जिगर साहब ने फ़रमाया था के शेर इतना आसान कहो कि सुनने वाला कहे के ये तो मैं भी कह सकता हूँ लेकिन जब कहने वाला कहने बैठे तो कह न पाये। ये बात हमारे आज के शायर डा. प्रेम भंडारी जी , जिनकी ग़ज़लों की किताब "खुशबू-रंग,सदा के संग" की हम बात करेंगे, पर पूरी तरह सच साबित होती है। प्रेम जी कोई एलोपैथी या होम्योपैथी के डाक्टर नहीं हैं, उन्होंने ये पदवी संगीत में पी.एच.डी करके प्राप्त की है.


 तुम समंदर ही सही मैं भी तो इक दरिया हूँ 
मेरी बाहों में किसी रोज़ सिमट कर देखो 

तुम अगर मेरी तरह मुझको परखना चाहो 
मेरे साये की तरह मुझसे लिपट कर देखो 

कौन है कैसा यहाँ जान सकोगे तुम भी 
जिस जगह तुम हो वहां से कभी हट कर देखो 

उदयपुर, राजस्थान में 23 सितम्बर 1949 को श्री दलपत सिंह भंडारी के पुत्र के रूप में श्री प्रेम भंडारी जी का जन्म हुआ। बचपन से ही उनका रुझान संगीत की और था। उनके इस शौक को हवा दी उनकी माता श्रीमती दरियाव बाई कंवर जी ने। उन्होंने ही प्रेम जी को सब्र के सबक के साथ सबका शुक्रिया अदा करना और किसी से शिकायत नहीं करना भी सिखाया। प्रेम जी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा कंवरपाड़ा हायर सेकेंडरी स्कूल से पूरी की। संगीत से अगाध प्रेम होने की वजह से उन्होंने 1976 में संगीत से एम.ए किया और ग़ज़ल गायकी विषय पर 1991 में पी.एच.डी। "हिंदुस्तानी संगीत में ग़ज़ल गायकी " विषय पर प्रकाशित किया गया उनका शोध ग्रंथ देश विदेश के सभी संगीत एवं ग़ज़ल के उस्तादों द्वारा खूब सराहा गया। आज भी इसे इस विषय के सन्दर्भ ग्रंथ के रूप में ख्याति प्राप्त है।

ठीक से जाना, जल्दी आना, याद भी करना, भूल न जाना 
रुख़्सत करते वक़्त वो भीगी आँख से क्या-क्या कहती है 

आओ इक दूजे से होकर दूर ज़रा हम भी देखें 
रूहों को नज़दीक, सुना है जिस्म की दूरी करती है 

सोच-विचार तज़र्बा तो हर चीज़ में नुक्स निकलेगा 
बच्चे बन कर देखो हर शै कितनी अच्छी लगती है 

लगभग 15-16 की उम्र से ही प्रेम जी ने अपनी ग़ज़ल गायकी को सार्वजानिक मंचो से पेश करना शुरू कर दिया था। दूसरों की ग़ज़लों को गाते गाते वो अपने ख्यालों को भी सुर में ढालने लगे, इस कोशिश को लोगों ने बहुत सराहा। लोगों से मिले प्रोत्साहन के बाद से प्रेम जी ने शायरी को गंभीरता से लेना शुरू किया। सबसे पहले उन्होंने जनाब खुर्शीद नवाब साहब से उर्दू सीखनी शुरू की। खुर्शीद साहब ने शुरू के शेरों को सुनकर उनकी हौसला अफ़ज़ाई भी की। जैसे जैसे प्रेम जी का लेखन आगे बढ़ा उनको उस्ताद शायरों की रहनुमाई भी हासिल होने लगी जिनमें जनाब कैफ़ भोपाली और जनाब जमील कुरैशी का नाम प्रमुख है।

इश्क ने आँख से अश्कों की रवानी लेली 
जो समंदर थे कभी दश्त के मंज़र निकले 

था निगाहों का वो धोका के ख़ता मेरी थी 
फूल समझे थे जिन्हें बरता तो पत्थर निकले 

ख़ौफ़ ये था कि कहीं ज़िन्दगी पहचान न ले 
आख़री वक़्त में जो मुंह को छुपा कर निकले 

ग़ज़ल गायकी में डॉक्टरेट करने के दौरान ही प्रेमजी की ग़ज़लों का पहला मजमुआ सन 1990 में "झील किनारे तनहा चाँद " मन्ज़रे आम पर आ गया। ग़ज़ल के इस मजमूए ने धूम मचा दी और उन्हें बेहतरीन गायक के साथ साथ लाजवाब शायर भी कहा जाने लगा। इस मजमूए को डा.जमील जलिबी, बलराज कोमल, शहाब सरमदी , डा. गोपी चंद नारंग ,वाली आसी, कैसर-उल-जाफ़री ,डा.मुख़्तार शमीम और नौशाद अली जैसे अदीबों ने जी भर के सराहा। इस सराहना से प्रेम जी के ग़ज़ल लेखन का सिलसिला जोर पकड़ गया नतीजतन सन 2003 में उनकी ग़ज़लों का दूसरा मजमुआ मन्ज़रे आम पर आ गया , आज हम उसी मजमुए की ही तो बात कर रहे हैं।

इक उम्र अपने आप में, मैं देवता रहा 
मेरा ग़रूर टूटा तो इंसान हो गया

ऐसा समा गया है वो मेरे वजूद में 
यूँ लग रहा है उसकी मैं पहचान हो गया 

जिस्मों की आग के परे इक आग और है 
तुझसे मिला तो सोच के हैरान हो गया

प्रेम साहब ने ग़ज़ल गायकी और लेखन के साथ साथ सुखाड़िया विश्वविद्यालय में बरसों अध्यापन के बाद वहां के संगीत विभाग के अध्यक्ष के पद पर कार्य किया है 2009 में सेवा निवृत होने के बावजूद उनमें सीखने और सिखाने का ज़ज़्बा ज्यूँ का त्यूं है। उनके बहुत से शिष्यों ने गायकी के क्षेत्र में बहुत मकबूलियत हासिल की है। संगीत में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें मेवाड़ फिल्म अकेडमी द्वारा "किंग ऑफ़ ग़ज़ल " के ख़िताब से सन 1984 में नवाज़ गया था इसके अलावा 1994 में राजस्थान उर्दू अकेडमी द्वारा , 2001 में मीरा संगीत सुधाकर सम्मान ,2002 में 'संगीत राज " सम्मान, 2002 में ही तैमूर सोसाइटी द्वारा ग़ालिब अवार्ड और 2004 में कलकत्ता में 'सुर नंदन अवार्ड " से सम्मानित किया जा चुका का है।

सच का ज़हर लबों से उगलना पड़ा मुझे
फिर यूँ हुआ सलीब पर चढ़ना पड़ा मुझे 

शंकर बना के लोग मुझे पूजते रहे 
मजबूरियों में ज़हर निगलना पड़ा मुझे 

मैं वो चराग़ हूँ के अँधेरे ज़हान में 
शब् की कहूँ क्या दिनमें भी जलना पड़ा मुझे

यूँ तो ग़ज़ल गायकी के लिए भारत और पाकिस्तान में एक से बढ़ कर एक नामवर गायक हुए हैं जिनमें मेहदी हसन ,गुलाम अली ,जगजीत सिंह आदि बहुत प्रसिद्ध हैं लेकिन प्रेम जी इन सब से अलग हैं क्यूंकि वो सिर्फ ग़ज़ल गायक ही नहीं हैं बल्कि एक मकबूल शायर भी हैं उन्होंने दूसरों की शायरी के साथ साथ अपनी शायरी को भी सुरों में ढाला है। वो सार्वजिनक मंचो पर कभी एक गायक तो कभी एक शायर की हैसियत से शिरकत करते हैं। भारत के अलावा विदेशों में भी उनकी शायरी और गायन के प्रशंसकों की कमी नहीं है।

दिल से दिल की बात हुई तो होंठों से क्या कहना है 
काग़ज़ पर होठों को रख दें फिर खत में क्या लिखना है 

पतझड़ के आते ही सारे साथी उनसे रूठ गए 
अगली रुत तक अब पेड़ों को तनहा तनहा रहना है 

कभी कभी बरतन टकराएं घर में अच्छा लगता है 
मुझको इससे ज्यादा तुझसे और नहीं कुछ कहना है 

एक ज़माना था जब कितने ज़ेवर पहने रहती थी 
मोती जैसा इक आंसू ही अब आँखों का गहना है 

मृदु भाषी ,मिलनसार आत्म प्रशंसा से दूर और हमेशा दूसरों की सहायताकरने को तत्पर प्रेम जी की शायरी पढ़ते हुए अब आपको भी जिगर साहब की उस बात से इत्तेफ़ाक़ हो गया होगा जिसका जिक्र मैंने शुरू में किया था। उनकी किताब का हर शेर निहायत सादगी से कहा गया है इसीलिए सीधा दिल पे असर करता है और ये ही उनकी मकबूलियत का कारण भी है। प्रेम जी के संगीत निर्देशन में उनकी ग़ज़ल को जगजीत सिंह साहब ने गाया है और ये बात किसी भी लिहाज़ से छोटी नहीं है। उनकी शायरी की जुबान ख़ालिस हिंदुस्तानी जुबान है इसलिए हिंदी और उर्दू जानने वालों को समान रूप से पसंद आती है। ग़ज़ल और ग़ज़ल गायन प्रेम जी की ज़िन्दगी का अहम् हिस्सा है।

काँटों की तासीर लिए क्यों 
फूलों जैसे लोग मिले थे

 प्यास बुझाना खेल नहीं था 
यूँ तो दरिया पाँव तले थे

शाम हुई तो सूरज सोचे 
सारा दिन बेकार जले थे 

इस किताब की सभी 115 ग़ज़लें हिंदी और उर्दू दोनों लिपियों में प्रकाशित की गयी हैं। ऐसा नहीं है कि एक पृष्ठ पर हिंदी में ग़ज़ल छपी हो और उसके सामने वाले पृष्ठ पर उर्दू में बल्कि सभी हिंदी की ग़ज़लें एक साथ और उर्दू की भी एक साथ छपी हैं जैसे किसी ने उर्दू और हिंदी में छपी अलग अलग किताबों को एक जिल्द में बांध दिया हो। इस किताब को पश्चिमी क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र उदयपुर एवं तामीर सोसाइटी उदयपुर द्वारा प्रकाशित किया गया हैहालाँकि उर्दू में पढ़ने वाले इसका इ-बुक संस्करण रेख़्ता की साइट पर ऑन लाइन पढ़ सकते हैं। ग़ज़लें और फुटकर शेर भी रेख़्ता की साइट पर उपलब्ध हैं.

 साँस मेरी जब अंदर से बाहर की जानिब आती है 
 और तो क्या कुछ उम्र का हिस्सा साथ में लेकर जाती है

जैसा भी हो अपना घर तो अपना घर ही होता है 
औरों के बिस्तर पे यूँ भी नींद कहाँ आ पाती है 

बचपन झरना ,नदी जवानी, सागर जैसी उम्र पकी 
एक समय के बाद ये सच है गहराई आ जाती है 

इस किताब की प्राप्ति जो रास्ता मुझे मालूम है वो एक ही है कि आप प्रेम भंडारी जी को उनकी खूबसूरत ग़ज़लों के लिए बधाई देते हुए उनके मोबाईल न 9414158358 पर बात करें और किताब प्राप्ति का रास्ता पूछें। मुझे तो ये किताब भाई विकास गुप्ता जी के माध्यम से मिली जो इंटरनेट पर उर्दू की सबसे बड़ी साइट "रेख़्ता" के आफिस में काम करते हैं और उर्दू शायरी से बेहद मोहब्बत करते हैं।
आपसे विदा लेने से पहले पढ़िए प्रेम जी की एक छोटी बहर की ग़ज़ल के ये शेर :

क्या हासिल है शम्मा जला कर 
परवाने को राख बना कर 

मैं तो सब कुछ भूल चूका हूँ 
तू भूले तो बात बराबर 

दीवारों की तन्हाई को
दूर करूँ तस्वीर लगा कर