Monday, May 21, 2018

किताबों की दुनिया - 178

इच्छाओं पर प्रश्नचिन्ह हैं अरमानों पर पहरे हैं 
संबंधों से हमें मिले जो घाव बहुत ही गहरे हैं 

सहमत जो न हुआ राज्य से दंड मृत्यु का उसे मिला 
राजमहल की नींव के पत्थर नरमुंडों पर ठहरे हैं 

नई क्रांति की आज घोषणा कर दी है कुछ गूंगों ने 
सुनकर जो दौड़े आये वे सब के सब ही बहरे हैं 

अब 'क्या अर्ज़ करूँ..." अर्ज़ करने से होगा भी क्या ? आप तो मान ही बैठे हैं कि आज किसी हिंदी ग़ज़लों वाली किताब की चर्चा होने वाली है क्यूंकि हमने ग़ज़ल को भाषाओँ में बाँट दिया है। हिंदी ग़ज़ल उर्दू ग़ज़ल, गुजराती ग़ज़ल, हरियाणवी ग़ज़ल, पंजाबी ग़ज़ल, ब्रज ग़ज़ल आदि आदि जबकि ग़ज़ल ग़ज़ल होती है। हर ग़ज़ल में बहर काफिया रदीफ़ और भाव का होना जरुरी होता है। सम्प्रेषण की भाषा अलग हो सकती है बाकि कुछ नहीं। सम्प्रेषण की भाषा कोई भी हो अगर कमज़ोर है तो उसमें कही ग़ज़ल भी कमज़ोर ही होगी। भाषाएँ अलग हो सकती हैं लेकिन उनसे व्यक्त भाव तो एक ही होते हैं। क्यूंकि बोलने वाला या लिखने वाला इंसान है जो इस दुनिया का हिस्सा है और इस दुनिया के लोगों के ,वो चाहे किसी भी जगह के हों दुःख-सुख परेशानियां कमोबेश एक जैसी होती हैं। खैर !! तो आपको ये बता दूँ कि हमारी आज के शायर सिर्फ हिंदी ग़ज़ल वाले नहीं हैं बल्कि वो भाषा विशेषज्ञ हैं और हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू और सिरायकी -जो पाकिस्तान के मुल्तान इलाके में बोली जाती है -में समान अधिकार से लिखते हैं।

जो खुल के हँस नहीं सकते जो खुल कर रो नहीं सकते 
ये दुनिया क्या कभी उनकी भी मजबूरी समझती है 

किनारे बैठ कर तुम तब्सिरा करते रहो लेकिन 
है पानी सर्द या फिर गर्म बस मछली समझती है 

ख़िरद हर चीज़ से इंकार करने पर है आमादा 
अक़ीदत गोल पत्थर को भी ठाकुर जी समझती है 
ख़िरद=बुद्धिमता, अक्ल ,अक़ीदत =श्रद्धा 

हमारे आज के शायर खूबसूरत शख्शियत के स्वामी मृदुभाषी 28 दिसम्बर 1952 को देहरादून में जन्में जनाब ओम प्रकाश खरबंदा हैं ,जो पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तरप्रदेश,उत्तराखंड, बिहार, हिमाचलप्रदेश में होने वाले राष्ट्रीय और अंतर राष्ट्रिय हिंदी और उर्दू के कार्यक्रमों का कभी आयोजन भी करते हैं तो कभी उनमें शायर या नाज़िम याने संचालक की हैसियत से "अम्बर खरबंदा" के नाम से शिरकत करते हैं.आज हम "अंबर खरबंदा" साहब की ग़ज़लों, कत'आत, नज़्मों ,गीतों और दोहों से सजी किताब "क्या अर्ज़ करूँ " की बात करेंगे जिसे "असीम प्रकाशन , 602 मालीवाड़ा, ग़ाज़ियाबाद ने एक बेहद खूबसूरत आवरण के साथ सन 2014 में प्रकाशित किया था। इस किताब में खरबंदा साहब की 50 ग़ज़लें 45 कत'आत 9 नज़्में और गीत तथा 20 दोहे संकलित किये गए हैं।ये किताब हमें खरबंदा साहब की बहुमुखी प्रतिभा से रूबरू करवाती है। इसे पढ़ कर लगता है कि ऊपर वाला किसी किसी को वाकई जब कुछ देने पे आता है तो छप्पर फाड़ कर देता है।



ये सच है मैं वहां तनहा बहुत था 
मगर परदेश में पैसा बहुत था

वो कहता था बिछुड़ कर जी सकोगे 
वो शायद अबके संजीदा बहुत था

बिछड़ते वक्त चुप था वो भी, मैं भी
हमारे हक़ में ये अच्छा बहुत था 

ये जो कम लफ़्ज़ों में गहरी बात करने का हुनर है ये ऐसे ही नहीं आता। गागर में सागर भरना हर किसी के बस का रोग नहीं। मुझे लगता है इस काम को अंजाम देने में अंबर जी का इलेक्ट्रॉनिक्स ज्ञान बहुत काम आया होगा। आपको को तो पता ही है कि इलेक्ट्रॉनिक्स ने किस तरह विज्ञान जगत में क्रांति का सूत्रपात किया है। एक छोटी सी माइक्रोचिप में हज़ारों लाखों सूचनाएँ इकठ्ठा की जा सकती हैं। उदाहरण के लिए आज मोबाईल से हम जो दुनिया भर की जानकारियां लेते हैं फ़िल्में देखते हैं गाने सुनते हैं एक दूसरे को देखते सुनते हैं इस सब के पीछे इलेक्ट्रॉनिक्स है और हमारे 'अंबर खरबंदा' जी इलेक्ट्रॉनिक्स के इंजीनियर हैं। उन्होंने न केवल इलेक्ट्रॉनिक्स पढ़ी है बल्कि बरसों बरस शिक्षण संस्थाओं में पढाई भी है।

कैसे कैसे क्या से क्या होते गए 
इब्तिदा थे इन्तिहा होते गए 
इब्तिदा =प्रारम्भ, इन्तिहा =अंत

ग़म मिले इसका भी बेहद ग़म रहा 
और फिर ग़म ही दवा होते गए 

हम नहीं समझे के क्या है ज़िन्दगी 
आप जीने की अदा होते गए

'अंबर' जी के जीन में शायरी है। इनका परिवार 'मियाँवाली' जो अब पाकिस्तान में है से, 1947 में देश को मिली खूनी आज़ादी के कारण ,पलायन कर देहरादून में आ कर बस गया। अंबर जी के पिता स्वर्गीय श्री 'जीवनदास खरबंदा' उर्दू से बेहद मुहब्बत रखते थे। उनके पास बेशुमार मयारी शायरी का खज़ाना था और उन्हें न जाने कितने ही शेर ज़बानी याद थे। मियांवाली के जिस स्कूल में वो पढ़ते थे वहां के हैडमास्टर उर्दू शायरी के कद्दावर शायर और स्कॉलर जनाब 'त्रिलोक चंद 'महरूम' साहब थे और सहपाठी जनाब 'जगन्नाथ' , जी हाँ वही जो बाद में 'जगन्नाथ आज़ाद' के नाम से उर्दू अदब में मशहूर हुए। अंबर साहब को घर और स्कूल में ऐसा माहौल मिला कि उनकी उर्दू से मोहब्बत दीवानगी की हद तक जा पहुंची।

मेरे लिए ऐ दोस्त ! बस इतना ही बहुत था 
जैसा तुझे सोचा था तू वैसा निकल आता 

मैं जोड़ तो देता तेरी तस्वीर के टुकड़े 
मुश्किल था के वो पहला-सा चेहरा निकल आता 

ऐसा हूँ मैं इस वास्ते चुभता हूँ नज़र में 
सोचो तो , अगर मैं कहीं वैसा निकल आता 

थोड़ा होश सँभालते ही खरबंदा जी देहरादून में होने वाले मुशायरों में रात रात भर बैठे रहते। उस वक्त रेकार्डिंग की आज जैसी सुविधा तो थी नहीं सो अपनी डायरी में मयारी शेरों को लिखते और गुनगुनाते रहते। मुशायरों में उनकी लगातार रहने वाली मौजूदगी से बहुत से शायर उन्हें पहचानने लगे थे। ऐसे ही किसी एक मुशायरे के बाद उनकी शायरों से हो रही उनकी गुफ्तगू के दौरान उन्हें देहरादून के मोतबर शायर जनाब 'कँवल ज़ियाई साहब का पता चला और वो जा पहुंचे उनकी शागिर्दी में। कँवल साहब ने अंबर साहब को अपने क़दमों में जगह दी और फिर बाक़ायदा उनके शेरी हुनर को तराशने लगे।कँवल साहब के यहाँ शायरों का आना जाना लगा ही रहता था एक दिन उनकी मुलाकात देहरादून के ही एक और उस्ताद शायर जनाब नाज़ कश्मीरी से हुई जिनकी मौजूदगी में उनका तख़ल्लुस 'अंबर' रखा गया।

गवाहों को तो बिक जाने की मजबूरी रही होगी 
हमें भी फैसला मंज़ूर हो ऐसा नहीं होता 

मुहब्बत जुर्म है तो फिर सज़ा भी एक जैसी हो 
कोई रुसवा कोई मशहूर हो ऐसा नहीं होता 

कोई मिसरा अगर दिल में उतर जाए ग़नीमत है 
तग़ज़्जुल से ग़ज़ल भरपूर हो ऐसा नहीं होता

"तग़ज़्जुल से ग़ज़ल भरपूर हो ऐसा नहीं होता" बहुत ही सही बात की है अंबर जी ने. उर्दू शायरी के बड़े से बड़े उस्ताद शायर की किसी भी ग़ज़ल को उठा कर देखिये आपको शायद ही उनकी कोई ऐसी ग़ज़ल मिलेगी जिसके सारे शेर ग़ज़ब के हों। सच तो ये है कि कभी कभी एक अच्छा या सच्चा मिसरा कहने में उम्र निकल जाती है शेर तो बहुत दूर की बात है। आप कितना लिखते हैं इस से कोई फर्क नहीं पड़ता आप क्या लिखते हैं ये बात मायने रखती है। अम्बर साहब ने अपने तवील शेरी सफर में बहुत ज्यादा नहीं लिखा लेकिन जो लिखा वो पुख्ता लिखा। शायरी में उन्हें जो मुकाम हासिल हुआ है वो उन्हें किताबें पढ़ने और अपने उस्ताद की रहनुमाई के साथ साथ मित्तर नकोदरी ,डा.श्यामनन्द सरस्वती 'रोशन' नाज़ कश्मीरी ,विज्ञान व्रत, शाहिद हसन 'शाहिद', सरदार पंछी,ओम प्रकाश 'नदीम', इकबाल आज़र, नरेश शांडिल्य, महेंद्र प्रताप 'चाँद' जैसे बहुत से कामयाब शायरों की सोहबत से हासिल हुआ।

कितना नफ़ा है, क्या है नुक्सान सोच लेगा 
फिर दोस्ती करेगा , आखिर वो आदमी है 

सब धर्म सारे मज़हब जब उसने रट लिए हैं 
मिल-जुल के क्यों रहेगा आखिर वो आदमी है 

भूले से भी न रखना आईना उसके आगे 
खुद से बहुत डरेगा आखिर वो आदमी है 

धर्म और मज़हब के कारण एक इंसान की दूसरे इंसान के बीच जो दूरी बढ़ी है, नफ़रत बढ़ी है उस पर आपको सैंकड़ों शेर मिल जाएंगे लेकिन अंबरी साहब ने उसी बात को बिलकुल अलग ढंग से अपने शेर में पिरोया है- 'मिल-जुल के क्यों रहेगा आखिर वो आदमी है '. शायरी दरअसल हज़ारों सालों से चली आ रही इंसानी फितरत को अलग अपने नज़रिये से शेर में पिरोने का नाम है। जो इस काम को सही ढंग से अंजाम दे देता है वो ही कामयाब शायर कहलाता है। आप कोई नयी बात नहीं कह सकते लेकिन नए ढंग से जरूर कह सकते हैं। अंबर साहब की इस किताब को पढ़ते हुए आप को कई जगह किसी बात को नए ढंग से कहने का हुनर नज़र आता है और यही इस किताब की कामयाबी भी है।

देखिये कैसे चमकती है नगीने की तरह 
सौ ग़मों के बीच छोटी सी ख़ुशी रख लीजिये 

रहबरों की रहबरी को आज़माने के लिए 
अपने क़दमों में जरा सी गुमरही रख लीजिये 

आप 'अंबर' जी न बन जाएँ फ़रिश्तें यूँ कहीं 
अपने किरदार-ओ-अमल में कुछ कमी रख लीजिये 

पहले सामिईन के बीच बैठ कर शायरों को सुनना और फिर शायरों के बीच बैठ कर सामिईन को सुनाना एक ऐसा अनुभव है जिसे लफ़्ज़ों में बयाँ नहीं किया जा सकता। इस सफ़र को तय करने में बहुत मेहनत लगती है। इस दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाना आसान काम नहीं है तभी तो अधिकतर लोग भीड़ का हिस्सा बनकर ही ज़िन्दगी काट देते हैं। जो मज़ा परचम उठा कर आगे आगे चलने में है वो पीछे पीछे चलते हुए नारे लगाने में नहीं। अंबर साहब की अब अपनी पहचान है और इसी के चलते उन्हें 2005 में अंतर्राष्ट्रीय प्रवासी सम्मलेन में 'अक्षरम सम्मान' , 2008 में गुंजन साहित्य सम्मान, 2009 में नागरिक परिषद् सम्मान, 2010 में एस.पी.गौहर सम्मान, 2011 में लोक लिखारी सम्मान, 2012 में हंसराज हंस सम्मान और 2013 में प्राइड ऑफ उत्तराखंड सम्मान से सम्मानित किया गया है। सम्मान प्राप्ति की ये लिस्ट अभी अधूरी है क्यूंकि उन्हें मिले सम्मानों की लिस्ट के लिए एक पोस्ट अलग से लिखनी पड़ेगी।

मौसम की तब्दीली कहिये या पतझड़ का बहाना था 
पेड़ को तो बस पीले पत्तों से छुटकारा पाना था 

रेशा-रेशा हो कर अब बिखरी है मेरे आँगन में
रिश्तों की वो चादर जिसका वो ताना मैं बाना था 

बादल,बरखा, जाम, सुराही, उनकी यादें, तन्हाई 
तुझको तो ऐ मेरी तौबा ! शाम ढले मर जाना था

रेडिओ -टीवी पर प्रसारित होने वाले शायरी से सम्बंधित लगभग सभी कार्यक्रमों में शिरकत करने वाले और देश के प्रसिद्ध रिसालों -अख़बारों में नियमित रूप से छपने वाले 'अंबर खरबंदा' साहब की किताब "क्या अर्ज़ करूँ ' को प्राप्त करने के लिए आपको 'असीम प्रकाशन ग़ाज़ियाबाद के आफिस नंबर 0120-4560628 पर फोन करना पड़ेगा या फिर अंबर साहब को उनकी लाजवाब शायरी के लिए बधाई देते हुए उनके मोबाईल न. 9411512333 पर फोन करना पड़ेगा। अंबर साहब, जो दून क़लम संगम के जनरल सेकेट्री भी हैं, को आप ई -मेल से ambarkharbanda@gmail.com से भी सम्पर्क कर सकते हैं। मैंने रास्ता बता दिया है ,चलने का काम तो आपको ही करना पड़ेगा। लीजिये आखिर में उनके दो कतआत पेश हैं :

यही इक जुर्म है ऐ मेरे हमदम 
के मैं खुशबू को खुशबू बोलता हूँ 
तेरी आँखों को देखा था किसी दिन 
उसी दिन से मैं उर्दू बोलता हूँ 
*** 
सर्दी बहुत है दोस्तो ! हालत ख़राब है 
बाज़ार चल के ढूंढ लें इसका कोई जवाब 
माँ के लिए खरीद लें सस्ती-सी एक शाल 
ले आएं अपने वास्ते मँहगी कोई शराब

Monday, May 14, 2018

किताबों की दुनिया - 177

मौन के ये आवरण मुझको बचा ले जायेंगे 
वरना बातों के कई मतलब निकले जायेंगे 

अब अंधेरों की हुकूमत हो चली है हर तरफ 
अब अंधेरों की अदालत में उजाले जायेंगे 

प्यार का दोनों पे आखिर जुर्म साबित हो गया 
ये फ़रिश्ते आज जन्नत से निकाले जायेंगे 

नशा कोई भी हो बुरा नहीं होता -आप सोचेंगे हैं ? ये क्या कह रहे हैं नीरज जी ?अरे सठियाये हुए तो ये थे ही लगता है अब पगलाय भी गए हैं क्यूंकि पगलाना सठियाने के बाद की सीढ़ी है ,वैसे कुछ कुछ लोग सठियाने से पहले भी पगला जाते हैं। नशा चाहे शराब का हो, भांग का, दौलत का हो या सत्ता का बुरा नहीं होता -अगर -जी हाँ इस अगर के बाद ही मेरी बात पूरी होगी - अगर-वो एक निश्चित सीमा में किया जाय। सीमा पार की नहीं कि इन सभी नशों में दोष दिखाई देने शुरू हो जायेंगे। लेकिन एक नशा है जिसकी सीमा का कोई निर्धारण नहीं किया जा सकता और वो है किताब का नशा। जिसे इसका नशा चढ़ गया उसके लिए बाकि के नशे धूल बराबर हैं। किसी लाइब्रेरी की खुली रेक्स पर सजी पुरानी किताबों के पास से गुज़रें उसमें से उठती गंध को गहरी सांस के साथ अपने भीतर खींचे-अहा-ये गंध आपको मदहोश कर देगी। मुझे तो करती है - सब को करे ये जरूरी तो नहीं। किताबों से उठने वाली ये खुशबू ही मुझे जयपुर की पुरानी लाइब्रेरियों और हर साल होने वाले दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले तक खींच के ले जाती है। इस गंध में डूबा हुआ मैं तलाशता हूँ शायरी, खास तौर पर ग़ज़ल की कोई किताब जिस पर लिखा जा सके।

अभी दीवारो-दर से दिल के, वीरानी नहीं झलकी
ग़मों के वास्ते इस घर में आसाइश अधूरी है
आसाइश = सुविधा

अभी से थक गए हो क्यूँ , अभी हारा नहीं हूँ मैं
सितम में भी इज़ाफा हो अभी सोज़िश अधूरी है
सोज़िश=जलन

मेरे लब सी दिए उसने क़लम है फिर भी हाथों में 
ये हाकिम से कहो जाकर तेरी बंदिश अधूरी है 

दिल्ली में सं 2018 की जनवरी को प्रगति मैदान में चल रही अभूतपूर्व प्रगति के कारण वहां आयोजित पुस्तक मेले तक पहुंचना एक टेढ़ी खीर थी। पुस्तक प्रेमी परेशान जरूर हुए लेकिन निराश नहीं। बड़ी तादाद में पहुंचे। देश में पुस्तकों के प्रति लोगों की दीवानगी देख कर बहुत अच्छा लगा। खास तौर पर युवाओं की। मेरे साथ मेरे प्रिय विकास गुप्ता थे। 'विकास' रेख़्ता के एडिटोरियल बोर्ड में कार्यरत हैं उनका उर्दू साहित्य के प्रति समर्पण और ज्ञान अभूतपूर्व है। किताब ढूंढने में वो भी मेरी मदद करते हुए इधर से उधर घूम रहे थे तभी उनकी भेंट एक चुंबकीय व्यक्तित्व के धीर गंभीर व्यक्ति से हुई। दोनों एक दूसरे को देख मुस्कुराये हाथ मिलाया और बातें करने लगे। विकास ने मेरी और देखा और कहा ' नीरज जी आप इन्हें नहीं जानते ? ये आलोक यादव है -बेहतरीन शायर और यादव जी ये नीरज जी है " हमने हाथ मिलाया और बातें करने लगे।बातों ही बातों में जब मैंने उनसे पूछा कि क्या आपकी कोई किताब मंज़र-ऐ-आम पर आयी है तो मुस्कुराते हुए वो मुझे स्नेह से हाथ पकड़ कर  उस स्टाल पर ले गए जहाँ उनकी किताब "उसी के नाम "रैक पर करीने से सजी हुई दिखाई दे रही थी। उन्होंने किताब उठाई उस पर कुछ लिखा अपने हस्ताक्षर किये और मुझे दी .मैंने उनके लाख मना करने के बावजूद तुरंत काउंटर पर जा कर उसका भुगतान किया। जहाँ तक संभव हो मुझे किताब खरीद कर पढ़ने में ही मज़ा आता है। जहाँ मेरा बस नहीं चलता वहां भेंट में मिली किताबें भी स्वीकार कर लेता हूँ। आज हम इसी किताब और इसके अनूठे शायर की चर्चा करेंगे।



 अब न रावण की कृपा का भार ढोना चाहता हूँ 
आ भी जाओ राम मैं मारीच होना चाहता हूँ 

 है हक़ीक़त से तुम्हारी आशनाई खूब लेकिन 
 मैं तुम्हारी आँख में कुछ ख़्वाब बोना चाहता हूँ 

 है क़लम तलवार से भी तेज़तर 'आलोक' तो फिर 
 मैं किसी मजबूर की शमशीर होना चाहता हूँ 

 राम रावण और मारीच के माध्यम से बहुत कुछ कहता उनकी एक ग़ज़ल के मतले का ये शेर विलक्षण है। ऐसे शेर कहाँ रोज रोज पढ़ने को मिलते हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी अलोक यादव का जन्म 30 जुलाई 1967 को उनके ननिहाल कायमगंज जनपद फर्रुखाबाद में हुआ। उनके पिता फर्रुखाबाद के मुख्यालय फतेहगढ़ में रहते थे जहाँ उन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा ग्रहण की और लख़नऊ विश्वविद्यालय से बी एस सी करने के बाद इलाहबाद विश्वविद्यालय से एम् बी ऐ किया। 1989 में कानपुर की लोहिया स्टार्लिंगर में अनमने से मन से नौकरी आरम्भ की क्यूंकि बचपन से ही उन्होंने सिविल सेवा में जाने की ठान रखी थी। लिहाज़ा इस नौकरी को उन्होंने साल भर में ही छोड़ दिया और अर्जुन की तरह अपना लक्ष्य सिविल सेवा रूपी मछली की आँख पर गड़ाए हुए इसको पाने के लिए संघर्ष का एक लम्बा दौर जिया। बच्चन जी की प्रसिद्ध रचना की इन पंक्तियाँ " लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती , हिम्मत करने वालों की कभी हार नहीं होती " को 9 सालों (1989 -1998 ) की अथक मेहनत से साकार करते हुए वो आखिर 1999 में संघ लोक सेवा आयोग से सहायक भविष्य निधि आयुक्त के पद पर चयनित हुए। (Regional Commissioner at Employees Provident Fund Organisation of India)

 तेरे रूप की उपमा मैं उसको दे तो देता 
 होता जो थोड़ा भी तेरे मुखड़े जैसा चाँद 

 चंचल चितवन मंद हास की किरणें बिखराता 
 मेरे घर, मेरे आँगन में मेरा अपना चाँद 

 सांझ ढली पंछी लौटे चल तू भी घर 'आलोक' 
बैठ झरोखे कब से देखे तेरा रस्ता चाँद 

संवेदनशील और अंतर्मुखी 'आलोक' को अपने भावों के सम्प्रेषण के लिए ग़ज़ल या गीत का सहारा लेना सुगम लगा। वो किशोर वय से ही कवितायेँ लिखने लगे थे जिनमें ग़ज़लों का अंश बीज रहा करता था। उन्हें ग़ज़ल कहने की विधिवत शिक्षा फतेहगढ़ के श्री कृष्ण स्वरुप श्रीवास्तव जी से मिली जो किसी सरकारी विभाग में कार्यरत थे। अभी उन्होंने रदीफ़ काफिया और बहर का ज्ञान लिया ही था कि कृष्ण जी का ट्रांसफर किसी दूसरे शहर में हो गया। अब जिस तरह अंग्रेजी के 'ऐ' से लेकर 'जेड' तक के वर्णाक्षर पढ़-लिख लेने से अंग्रेजी नहीं आती वैसे ही रदीफ़, काफिया और बहर के ज्ञान से ग़ज़ल कहनी नहीं आ सकती। ये तीन तो महज़ शरीर हैं जिसमें जब तक भाव की आत्मा न डाली जाय तब तक प्राण नहीं आते। तो हुआ यूँ कि नयी नौकरी और पारिवारिक जिम्मेदारियों ने उनकी संवेदनशील और रचनात्मक वृति को बैक फुट पे धकेल दिया। बैकफुट क्रिकेट की भाषा में उस स्थिति को कहते हैं जहाँ खिलाड़ी शॉट मारने की जगह अपना विकेट बचाने को खेलता है।

हवा के दम पे है जब ज़िन्दगी का दारोमदार 
तो क्यूँ ग़ुरूर तुझे ऐ हुबाब रहता है 
हुबाब =बुलबुला 

मेरे लिए हैं मुसीबत ये आईनाख़ाने
यहाँ ज़मीर मेरा बेनक़ाब रहता है 

हसीन ख़्वाब हों कितने ही पर कोई 'आलोक' 
तमाम उम्र कहाँ महवे-ख़्वाब रहता है 
महव=तल्लीन 

 जब परिस्थितियां थोड़ी अनुकूल हुईं तो आलोक जी की बरसों से दबी रचनात्मकता बाहर आने को छटपटाने लगी। तभी उनकी मुलाकात हुई मोतबर और मकबूल शायर जनाब 'अकील नोमानी' साहब से। अकील साहब ने न केवल उन्हें ग़ज़ल कहने का सलीका सिखाया बल्कि अपनी इस्लाह से उनकी ग़ज़ल में प्राण फूंके और वो बोलने लगी।आलोक जी की ग़ज़ल को निखारने में बरेली के जनाब सरदार जिया साहब ने भी बहुत मदद की।इन दो साहबान के सहयोग से आलोक की ग़ज़लों ने वो मुकाम हासिल किया जो किसी भी शायर का सपना होता है। 'उसी के नाम' में आलोक जी की महज़ तीन सालों याने 2012 से 2015 के बीच कही गयी ग़ज़लों का ही संग्रह किया गया है। बकौल आलोक " इस किताब में पाठक को एक शायर के शैशव से युवावस्था तक की यात्रा का आनंद मिलेगा , साथ ही वे रचनाकार के रूप में मेरी विकास यात्रा का भी अवलोकन कर सकेंगे "

नयी नस्लों के हाथों में भी ताबिन्दा रहेगा 
मैं मिल जाऊंगा मिटटी में क़लम ज़िंदा रहेगा 
ताबिन्दा=स्थाई 

ग़ज़ल कोई लिखे कैसे लबो-रुख़्सार पे अब
समय से अपने कब तक कोई शर्मिंदा रहेगा 

बना कर पाँव की बेड़ी को घुंघरू ज़िंदगानी 
करेगी रक्स जब तक दर्द साज़िन्दा रहेगा 

आज आलोक एक बेहतरीन ग़ज़लकार के रूप में स्थापित हो चुके हैं। उनकी ग़ज़लें इंटरनेट की सभी श्रेष्ठ ग़ज़ल या काव्य से सम्बंधित साइट्स जिसमें रेख़्ता भी है, पर उपलब्ध हैं। इन दिनों वो मयारी मुशायरों में कद्दावर शायर जनाब वसीम बरेलवी , ताहिर फ़राज़ , मंसूर उस्मानी और कुंअर बैचैन आदि के साथ शिरकत कर वाहवाहियां बटोरते नज़र आ जाते हैं। देश की लगभग सभी प्रतिष्ठित हिंदी-उर्दू की पत्र पत्रिकाओं में उनकी ग़ज़लें छपती रहती हैं। आकाशवाणी और दूरदर्शन के विभिन्न केंद्रों से उनकी ग़ज़लों का प्रसारण होता रहता है। इतना सब कुछ होने के बावजूद भी आलोक जमीन से जुड़े इंसान हैं ,अहम् उन्हें छू भी नहीं गया है। हर छोटे को प्यार और बड़े को सम्मान देना उनकी फितरत में है तभी उनकी लोकप्रियता बढ़ती ही जा रही है। अच्छा इंसान होना अच्छे शायर से ज्यादा जरूरी है और आलोक तो एक अच्छे इंसान भी हैं और बहुत अच्छे शायर भी । उनकी 'बेटी' पर कही एक मुसलसल ग़ज़ल बहुत लोकप्रिय हुई है जो उनके अच्छे इंसान और अच्छे ग़ज़लकार होने का पुख्ता सबूत है :

घर में बेटी जो जनम ले तो ग़ज़ल होती है 
दाई बाहों में जो रख दे तो ग़ज़ल होती है 

उसकी किलकारियों से घर जो चहकता है मेरा 
सोते सोते जो वो हँस दे तो ग़ज़ल होती है 

छोड़कर मुझको वो एक रोज़ चली जाएगी 
सोचकर मन जो ये सिहरे तो ग़ज़ल होती है 

यूँ तो अधिकतर सम्मान, वज़ीफ़े, उपाधियों और अवार्ड्स की कोई अहमियत नहीं होती लेकिन कुछ सम्मान या अवार्ड्स की वाकई कीमत होती है क्यूंकि वो जिन शख्सियतों को दिया जाता है उनमें खास बात होती है। आलोक को मिले सम्मान उन सम्मानों से अलग हैं जो थोक के भाव लोगों को खुश करने के लिए हर साल बाँटे जाते हैं। उन्हें वर्ष 2014 में 'इंटरनेशनल इंटेलेचुअल पीस अकेडमी ' द्वारा डा इक़बाल उर्दू अवार्ड एवं डा. आसिफ़ बरेलवी अवार्ड से नवाज़ा गया था. इसके बाद वर्ष 2015 में उन्हें प्रतिष्ठित 'दुष्यंत कुमार सम्मान 'मिला एवं वर्ष 2016 में विक्रमशिला हिंदी विद्यापीठ,भागलपुर द्वारा 'विद्या वाचस्पति' की मानद उपाधि प्रदान की गयी।

 ऐसे सिस्टम की अहमियत क्या है 
इसमें इन्सां की हैसियत क्या है

नौकरी जब मिले सिफ़ारिश पर 
कौन पूछे सलाहियत क्या है 
सलाहियत = योग्यता 

फूल से जिस्म बोझ बस्तों का 
क्या है तालीम तरबियत क्या है 

 उनके उस्ताद मोतरम जनाब अकील नोमानी साहब द्वारा उनके बारे में कहे इन अलफ़ाज़ को पढ़ने के बाद मेरे पास कहने को कुछ नहीं रह जाता कि "आलोक के पास काबिलीयत भी है और सलाहियत भी ,हस्सास दिल भी है और दुनिया को उसके तमाम रंगों के साथ देखने वाली नज़र भी। उनकी शायरी में ख़ुलूसो-मुहब्बत के ज़ज़्बों,समाजी क़द्रों, आला उसूलों और इंसानी रिश्तों का एहतराम भी है और ज़ुल्म,ज़ब्र ,नाइंसाफी और इस्तहाल के ख़िलाफ़ मोहज़्ज़ब एहतिजाज भी. उनके अशआर एक तरफ उर्दू से वालिहाना लगाव का एलान करते नज़र आते हैं तो दूसरी तरफ हिंदी से उनके मज़बूत रिश्ते और गहरी रग़बत के गम्माज़ भी है।"

   अपने ही जादू में जकड़े रखता है 
 जाने जंतर-मंतर मौसम बारिश का 

 बिछड़ गया जाते बसंत सा पल भर में 
 आखों को वो दे के मौसम बारिश का 

 उससे पूछो जिसकी मज़दूरी छूटी 
 काँटों का है बिस्तर मौसम बारिश का 

 आलोक जी ने ग़ज़लें थोक के भाव में नहीं कही हैं लेकिन जो कहीं है पुख्ता कहीं हैं तभी तो तीन साल के दौरान कही महज़ 74 ग़ज़लें ही इस किताब में शुमार की गयी हैं। इस किताब की प्राप्ति के लिए आप "लोक भारती प्रकाशन " दरबारी बिल्डिंग महात्मा गाँधी मार्ग इलाहाबाद को लिख सकते हैं या उन्हें info@lokbhartiprakashan.com पर मेल करें।ये किताब हार्ड बाउन्ड और पेपर बैक में भी उपलब्ध है जिसे आप www. pustak.org या फिर amazon.in से ऑन लाइन मंगवा सकते हैं। इस खूबसूरत किताब के लिए आलोक जी को उनके मोबाईल न. 9412736688 पर फोन करके बधाई दें या alokyadav1 @rediffmail.com पर मेल से बधाई सन्देश भेजें। आप अपना ये काम करें तब तक आलोक जी के चंद शेर आप तक पहुंचा कर मैं निकलता हूँ किसी और नयी किताब की तलाश में:

 अब भी सोफे में है गर्मी बाक़ी
 वो अभी उठ के गया हो जैसे
 ***
वाइज़ सफ़र तो मेरा भी था रूह की तरफ़
पर क्या करूँ कि राह में ये जिस्म आ पड़ा
 ***
न वो इस तरह बदलते न निगाह फेर लेते
 जो न बेबसी का मेरी उन्हें ऐतबार होता
 ***
तुम हुए हमसफ़र तो ये जाना
 रास्ते मुख़्तसर भी होते हैं
 ***
गोपियों ने सुनी राधिका ने पढ़ी
 बांसुरी से लिखी श्याम की चिठ्ठियां
 ***
कर लेंगे खुद तलाश कि मंज़िल है किस तरफ 
 उकता गए हैं यार तेरी रहबरी से हम 
 *** 
ख्वाइशों के बदन ढक न पायी कभी 
 कब मिली है मुझे नाप की ज़िन्दगी ?

Monday, May 7, 2018

किताबों की दुनिया -176

 हमें जब काटनी पड़ती हैं सारी रात आँखों में 
अँधेरे आसमाँ में इक सितारा ढूंढ लेते हैं 

बरामद होती है वो चीज आखिर कार कमरे में 
जब उसके वास्ते संसार सारा ढूंढ लेते हैं 

ख़सारे में हमें वो फ़ायदा बतलाने आये हैं 
किसी भी फ़ायदे में जो ख़सारा ढूंढ लेते हैं 
ख़सारा=नुक्सान 

ये कोई सन 2005-2006 की बात होगी जब मैंने पहली बार अपने एक मित्र से ब्लॉग का नाम सुना था। मेरी समझ में ही नहीं आया कि वो क्या कह रहा है। धीरे धीरे बात समझ में आने लगी तो देखा मेरी तरह बहुत से लोग ब्लॉग खोले बैठे हैं जो समझ नहीं पा रहे कि इस विधा का उपयोग किया कैसे जाय। कुछ लोग कवितायेँ लिख रहे थे कुछ लघुकथाएं कुछ व्यंग तो कुछ राजनीती से जुड़े लेख। इस भीड़ में हमारे जैसे कुछ लोग शायरी ,खास तौर पर ग़ज़ल सीखने में लगे हुए थे। ग़ज़ल सीखने वालों का एक बड़ा सा कुनबा बन गया था। इससे जुड़े लोग ग़ज़ल के उरूज़ से वाबस्ता होते और किसी एक तरही मिसरे पर ग़ज़ल कहते और टिप्पणियाँ करते। पुराने लोग नयों की हौसला अफ़ज़ाही करते। वो दिन बहुत अच्छे थे। उसी दौर के लोग अब फेसबुक पर छाये हुए हैं और वाहवाहियां बटोर रहे हैं। अब ब्लॉग की अपेक्षा फेसबुक पर बहुत त्वरित गति से टिप्पणियां आ जाती हैं और लोकप्रियता मिल जाती है। आज के शायर हमारे उसी ब्लॉग कुनबे के सदस्य थे जो अब ग़ज़ल की बारीकियां सीख कर एक पुख्ता ग़ज़लकार की श्रेणी में आ चुके हैं।

दीवार आहनी थी, सभी नाउमीद थे
धूप आई और उसमें भी रौज़न बना लिया 
आहनी :लोहे की ,रौज़न: झिर्री 

इक नींद में ज़रा सी इसे क्या पनाह दी 
इस ख़्वाब ने तो मुझमें नशेमन बना लिया 
नशेमन : घर 

अफ़्सुर्दगी पहन के निकलते हैं घर से लोग 
लोगों ने क्या उदासी को फैशन बना लिया 
अफ़्सुर्दगी=उदासी

एक बिलकुल ही अलहदा लबो लहज़े के 7 जनवरी 1977 में मुज़फ्फ़रपुर बिहार में जन्में इस युवा शायर का नाम है "सौरभ शेखर " जिनकी हाल ही में बोधि प्रकाशन जयपुर से प्रकाशित हुई ग़ज़लों की किताब "एक रौज़न" की हम बात कर रहे हैं। सौरभ ने अंग्रेजी साहित्य में एम् ऐ किया है और वर्तमान में राज्यसभा सचिवालय में अपर निदेशक के पद पर कार्य करते हुए ग़ज़लें कह रहे हैं। ग़ज़लों की तरफ उनका झुकाव दुष्यंत कुमार साहब की प्रसिद्ध किताब "साये में धूप" पढ़ने के बाद हुआ। कॉलेज के वो रुमानियत से भरपूर दिन और ग़ज़ल का साथ याने सोने में सुहागा। बीस बरस की जोशो-खरोश से भरी उम्र में उनकी ग़ज़लें पत्र पत्रिकाओं में छपने लगीं और लोगों के दिलों को गुदगुदाने लगीं। अब जवानी कब किसी नियम कानून को मानती है सो जनाब के जो दिल में आता उसे ग़ज़ल की शक्ल में पिरो कर वो यार दोस्तों को सुनाते ,ब्लॉग पर डालते और वाहवाहियां बटोरते।


मैं न कहता था कि थोड़ी सी हवस बाक़ी रखो 
देख लो अब किस तरह आसूदगी चुभने लगी 
आसूदगी : तृप्ति 

तीरगी का दश्त नापा रौशनी के वास्ते 
रौशनी फैली तो मुझको रौशनी चुभने लगी 
दश्त :जंगल 

सख़्त इक लम्हे की रौ में आ के तौबा कर लिया
हल्क़ में मेरे मगर अब तिश्नगी चुभने लगी 

इस से पहले कि तारीफ़ और वाह वाही के बेशुमार जुमले सौरभ का दिमाग सातवें आसमान पर पहुंचाते और वो भटकते, एक दिन किसी 'नीरज गोस्वामी' नाम के शख़्स ने उनके ब्लॉग पर उन्हें ग़ज़ल कहने से पहले उसके व्याकरण को अच्छे से सीखने की सलाह दे डाली। अक्सर युवा किसी बुजुर्ग की सलाह को भी हर फ़िक्र की तरह धुएं में उड़ा देने में विश्वास रखते हैं लेकिन सौरभ ने नीरज जी की बात को पता नहीं क्यों गंभीरता से लिया ( इस बात से नीरज जी अभी तक हैरान हैं क्यूंकि इससे पहले उनकी किसी बात को कभी किसी और ने गंभीरता से नहीं लिया था ) और संजीदगी से उरूज़ सीखने लगे। इसके नतीज़े जल्द ही सामने आने लगे। उनकी ग़ज़लों में निखार आने लगा और सोच में पुख़्तगी झलकने लगी. उनकी, ग़ज़ल से मुहब्बत अब दीवानगी की हद तक जा पहुंची।

ख़ता ज़रा भी नहीं रास्तों के काँटों की 
गुनाहगार मिरे पाँव का ही छाला है 

ये सर्द रात, ये ख़लवत,अलाव माजी का 
बदन पे गुज़रे दिनों का मिरे दुशाला है 
ख़लवत =एकांत

ज़माने भर की जुटा लेगा बदगुमानी वो 
उसे सचाई से क्या और मिलने वाला है 

उस्ताद ग़ज़लकार जनाब 'ज्ञानप्रकाश विवेक' इस किताब की भूमिका में लिखते हैं कि " सौरभ शेखर की ग़ज़लों में एक नई ज़मीन दिखाई देती है। एक ऐसा भावबोध जो जटिल होते संबंधों, मुश्किल होते जीवन और कुटिल होते तंत्र को बड़ी सूक्ष्मता से व्यक्त करने में सफल होता है। यहाँ नए समय का संज्ञान है और बदलते समय की गूँज। यथार्थ बेशक कर्कश हुआ है लेकिन इन ग़ज़लों में खुरदरे और कर्कश यथार्थ को बड़ी निपुणता से व्यक्त किया गया है। यहाँ वेदना भी अपने गाढ़े रूप में मौजूद है। लहजा बेतकल्लुफ अभिव्यक्ति में व्यंजना का पुट लेकिन शेर में थरथराती बैचनी। ये जो शेरगोई का अंदाज़ है यही सौरभ शेखर का मुहावरा है। वो नए प्रयोग करते हैं और सफल होते हैं

जिस से भी मिल रहा हूँ उसी को करार है 
चैनो-सुकूँ के शह्र में उजलत का क्या हुआ 
उजलत=जल्दबाज़ी  

सौ सदमे खा के ख़ैर मुहब्बत तो बच गई
तलवार भांजती हुई नफ़रत का क्या हुआ 

वो आदमी तो हो गया मशहूर इश्क में 
रुसवाइयों की आग में औरत का क्या हुआ 

हम तो हक़ीर थे हमें मिटटी निगल गई 
पर यार बादशाह सलामत का क्या हुआ 

सौरभ ने सन 2009 में औपचारिक तौर पर ग़ज़ल कहना शुरू किया अपने ब्लॉग से, धीरे धीर उनकी ग़ज़लें सन 2012 से लफ्ज़ के पोर्टल पर होने वाले तरही मुशायरों में भी दिखाई देने लगीं। उस पोर्टल पर ग़ज़ल का पोस्ट होना उसके मयार का सर्टिफिकेट हुआ करता था। सौरभ की ग़ज़लें वहां उर्दू के कामयाब शायरों की नज़रों में आयीं और वाहवाही बटोरने लगीं। बेहतरीन शायर और ग़ज़ल के पारखी जनाब मयंक अवस्थी साहब ने उनकी ग़ज़लों के बारे में कहा कि "नावल्टी सौरभ की ग़ज़लों की पहचान है। सामाजिक चैतन्य,शिल्पगत ख़ूबसूरती और ज़बान की कहन सौरभ की ग़ज़लों की विशेषता है। सौरभ ने कम समय में ही ग़ज़ल के दुश्वार मरहले सर कर लिए हैं। ये सौरभ की उपलब्धि है। दुष्यंत कुमार ने अपनी पुस्तक ” साये में धूप” में लिखा है कि हिन्दी और उर्दू जब आम आदमी के पास जाती हैं तो वो अपना सिंहासन छोड़ कर हिदुस्तानी बन जाती हैं ,सौरभ की ग़ज़लों की भाषा खालिस हिंदुस्तानी है।"

सच झूठ की कहानी मुकम्मल न जानिये
कुछ आखरी ग़लत है न कुछ आखरी सही

रहबर ने बार-बार ही भटका दिया मुझे
साबित हुई हमेशा मिरी गुमरही सही

इक आपके अलावा ग़लत है हरेक शख्स
अच्छा ये आप समझे हैं, अच्छा यही सही

उर्दू ग़ज़ल को हिंदी पाठकों तक ले जाने में लफ्ज़ पत्रिका और उसके संपादक बेहतरीन शायर जनाब 'तुफैल चतुर्वेदी " साहब का योगदान अविस्मरणीय रहा है. तुफैल साहब के शागिर्दों की संख्या बहुत बड़ी है और उन में कुछ एक नौजवान शायर तो आज उर्दू अदब में अपनी कलम का लोहा मनवा रहे हैं। तुफैल साहब ने ही सन 2016 में सौरभ की ग़ज़लों को लगातार चार साल पढ़ते रहने के बाद उन्हें लिखा कि " सौरभ आपका लहजा सबसे अलग सबसे जुदा जा रहा है। आपके बिम्ब अनोखे और आपके अपने हैं। आपका लहजा ग़ज़ल का भी है और उससे अलग भी है।आप के लिये बानी की पंक्ति कुछ तब्दील करके सादिक़ आती है-बोलता इक लफ़्ज़ मंज़र में मगर सबसे हटा सा. ये आपकी ज़बरदस्त कामयाबी है कि जहां मैं ग़ज़ल के 36 बरस पांव दबाने के बाद आ पाया हूं, वहां आप कुछ बरस के सफ़र में ही पहुँच गये। अब वक़्त आ गया है कि आपको किताब ले आनी चाहिये। " मैं समझता हूँ कि एक उस्ताद शायर द्वारा सरे आम ये कहना कि जिस मुकाम पर वो 36 सालों की मेहनत के बाद पहुंचे हैं वहां एक युवा शायर चंद सालों में ही पहुँच गया है ,बहुत बड़ी बात है। ये उस्ताद शायर का बड़प्पन तो है ही एक युवा शायर के लिए सबसे बड़ा ईनाम भी है।

पाक़ लोगों की सुहबतें तौबा 
कुफ़्र ही कुफ़्र सूझता है मुझे 

मुझको आँखें बचा के रखनी हैं
कितना कुछ और देखना है मुझे 

घर में फुर्सत का आज इक लम्हा 
इत्तिफ़ाक़न गिरा मिला है मुझे 

युवा सौरभ की इस पहली किताब को पढ़ते वक्त अंदाज़ा हो जाता है कि इनका भविष्य बहुत उज्जवल है. इस किताब में सौरभ की 88 ग़ज़लें संगृहीत हैं जो बार-बार पढ़ने लायक हैं. अधिकतर छोटी बहर की ग़ज़लों की मारक क्षमता का तो कहना ही क्या। ग़ज़ल में भाषा का सौंदर्य आपको बांध लेता है। उन्होंने हिंदी-उर्दू के अलावा अंग्रेजी के रोजमर्रा इस्तेमाल होने वाले शब्दों को बहुत ख़ूबसूरती से अपनी ग़ज़लों में पिरोया है। यूँ अंग्रेजी शब्द आजकल की ग़ज़लों में खूब प्रचलन में हैं लेकिन सौरभ ने जिस तरह उन्हें बरता है उसे पढ़ कर लगता है कि जैसे इस लफ्ज़ के सिवाय अगर और किसी भाषा का लफ्ज़ आता तो वो मिसरे का सौंदर्य धूमिल कर देता।

बीच भंवर वालों की क्या हालत होगी 
ख़ौफ़ज़दा जब छिछले पानी में हूँ मैं 

ज़द में हूँ मैं दिल की सी.सी.टी.वी.की 
चौबीसों घंटे निगरानी में हूँ मैं  

महसूस हुआ कल इक नॉविल पढ़ कर 
ये मेरा क़िरदार, कहानी में हूँ मैं 

तुफैल साहब के अलावा एक और शख़्स का नाम लिए बिना बात पूरी नहीं होगी जिसने सौरभ को शायर सौरभ बनने में पूरी मदद की, वो हैं मशहूर शायर जनाब 'सर्वत जमाल' साहब। सर्वत मेरे मित्र हैं इसलिए नहीं कह रहा बल्कि वो हकीकत में जितने बेहतरीन शायर हैं उस से कहीं ज्यादा अच्छे इंसान हैं. उन्होंने सौरभ की हर उस कदम पर मदद की जहाँ जहाँ उसे अपने सफर का रास्ता उबड़-खाबड़ और दुश्वार लगा। चढाई पर चढ़ने वाले इंसान की लाठी बनना सर्वत जमाल की फितरत में है। उस्ताद लोग सिर्फ रस्ते में आयी रुकावटों को दूर करने में आपकी मदद करते हैं लेकिन अपनी मंज़िल का रास्ता खुद को ही तलाशना पड़ता है। सौरभ ने जो रास्ता तलाशा वो उसका अपना है जिस पर पहले किसी के चलने के निशान नहीं मिलते ,तभी तो उन्हें जो मंज़र दिखाई देते हैं वो बहुत अलग और दिलकश हैं।

उदासी के रुतों के फूल हैं हम 
ग़मों में देखना जलवा हमारा 

बहुत बारीक़ हैं उनके इशारे 
बढ़ाना तो ज़रा चश्मा हमारा 

खराबी कोई तो हम में है जिस से 
कहीं भी जी नहीं लगता हमारा 

इस किताब की सभी ग़ज़लें बेहद खूबसूरत हैं। मेरे देखे शायरी के प्रेमियों के पास ये किताब जरूर होनी चाहिए। आपसे गुज़ारिश है कि इन बेहतरीन ग़ज़लों के लिए सौरभ शेखर, जो फिलहाल इंद्रापुरम गाज़ियाबाद के निवासी हैं , को उनके मोबाईल न 9873866653 पर फोन करके बधाई दें और किताब प्राप्ति के लिए 'बोधि प्रकाशन जयपुर के जनाब 'माया मृग ' जी से 9829018087 पर संपर्क करें। सौरभ की ग़ज़लें आप 'रेख़्ता' की साइट पर भी पढ़ सकते हैं। ये किताब अमेज़न पर भी उपलब्ध है.सौरभ पर जितना लिखा जा सकता है उसका मात्र 20 -25 प्रतिशत ही आप तक पहुंचा पाया हूँ। पोस्ट की सीमा को नज़र-अंदाज़ भी तो नहीं किया जा सकता इसलिए उनके कुछ फुटकर शेर आपको पढ़वाता चलता हूँ:

लक़ीरें फ़क़त खेंचता जा वरक़ पर 
कोई शक्ल तैयार हो कर रहेगी
*** 
कुछ इच्छा भी तो हो मिलने-जुलने की 
वर्ना ऐसा थोड़ी है कि फुर्सत नईं 
*** 
वैसे पैसा ही सब कुछ है दुनिया में 
लेकिन पैसे पर भी थूका जा सकता है
*** 
वो बार-बार पूछ रहा था वही सवाल 
मजबूर हो के झूठ मुझे बोलना पड़ा
*** 
बच्चे ने सजाई है कोई और ही दुनिया 
खींचा है जहां बाघ वहीँ रक्खा हिरन भी
*** 
फ़िक्र मुझे अपने बच्चों के सर की होती थी 
जर्जर घर था सच्चाई का आखिर छोड़ दिया
*** 
मैं हकलाता नहीं हूँ बोलने में 
मैं नर्वस था तिरी मौजूदगी से 
*** 
यही एक मौका मिरे पास है 
गिराना है ग़म को इसी वार में
*** 
गौर से देखिये पाज़ेब की खुशफ़हमी में
आप जंज़ीर की झंकार संभाले हुए हैं

Monday, April 30, 2018

किताबों की दुनिया - 175

शायरी की दीवानगी से मुझे वो ईनाम मिला है जो किसी भी इनाम से बहुत बड़ा है। ये वो ईनाम है जो मिलने के बाद किसी खूबसूरत अलमारी में बंद हो कर दम नहीं तोड़ता ना ही किसी दीवार पर खूबसूरत फ्रेम में टंगा टंगा अपनी अहमियत खो देता है। ये ईनाम हमेशा ज़िंदा रहता है और मेरे साथ धड़कता है। ये ईनाम है कुछ बहुत ही प्यारे लोगों की सोहबत जो मुझे सिर्फ अपनी इसी दीवानगी की वजह से हासिल हुई है। ये प्यारे लोग मेरी हौसला अफजाही भी करते हैं तो मौका पड़ने पर टांग भी खींचते हैं। इनके साथ कायम हुए राबते से मिलने वाले आनंद को लफ़्ज़ों में बयाँ नहीं किया जा सकता। ऐसे प्यारे इंसानों में से एक हैं लुधियाना निवासी, बेहतरीन शायर जनाब 'सागर सियालकोटी' साहब जिनकी किताब " अहतिजाज़-ए-ग़ज़ल" पर की गयी चर्चा को आप पढ़ चुके हैं। सागर साहब गाहे बगाहे फोन करते हैं, कभी कभी मूड में बेहतरीन तरन्नुम के साथ अपनी ग़ज़लें भी सुनाते हैं। ऐसी ही किसी बात चीत के दौरान उन्होंने मुझे चंद शेर सुनाये :

किसी किसी को थमाता है चाबियाँ घर की 
ख़ुदा हरेक को अपना पता नहीं देता
***
हवेलियाँ भी हैं कारें भी कार-खाने भी 
बस आदमी की कमी देखता हूँ शहरों में 
*** 
फलदार था तो गाँव उसे पूजता रहा 
सूखा तो क़त्ल हो गया वो बे-जबाँ दरख़्त
*** 
तुमने क्यों बारूद बिछा दी धरती पर 
मैं तो दुआ का शहर बसाने वाला था 
 *** 
तू कलमा पढ़ के परिंदों को ज़िबह करता है 
खुदा मुआफ करे सब इबादतें तेरी 

इन शेरों को सुन कर मैं उछल पड़ा और सागर साहब से पूछा ये शेर किसके हैं ? तो सागर साहब कहने लगे आपने "परवीन कुमार अश्क" का नाम नहीं सुना ? उनके हैं। मैं झूठ बोल कर अपनी इज़्ज़त बचा सकता था लेकिन इससे मेरा ही नुक्सान ज्यादा होता लिहाज़ा जो सच था मैंने वही कहा कि "नहीं -मैंने तो जी नहीं सुना"। मेरे जवाब से वो थोड़े निराश जरूर हुए, होना भी चाहिए था क्यूंकि 'अश्क' साहब जिस पाए के शायर हैं उस लिहाज़ से उनका नाम मुझे पता होना चाहिए था। इसमें दोष 'अश्क' साहब का नहीं मेरी नासमझी का है। वो बोले मेरे पास उनकी किताब 'ग़ज़ल तेरे शहर में " है, आप पढ़ना चाहेंगे ? अँधा क्या मांगे ? दो आँखें ? मैंने फ़ौरन हाँ कर दी और साहब कमाल की बात ये है कि बात ख़त्म होने के एक घंटे के अंदर सागर साहब का फिर फोन आया और उन्होंने बताया कि "नीरज जी किताब कोरियर कर दी है " अब आप ही बताइये दुनिया का कौनसा ईनाम इस मोहब्बत और अपनेपन से बड़ा है ? तीसरे दिन किताब आ भी गयी जिसे पढ़ने के बाद आज उसे आपके सामने रख रहा हूँ।


दवा, दुआ की कमी तो नहीं मगर यह दर्द 
जो आँख उठा के भी देखे न दूसरों की तरफ 

सवाल करते हैं सहरा-ए-बेगुनाह कब से 
हर इक नदी है रवाँ क्यों समुंदरों की तरफ

मज़ार छोड़ के तनहा, मुरादें मांग के 'अश्क' 
तमाम शहर पलट जाएगा घरों की तरफ 

जनाब 'परवीन कुमार अश्क' साहब का जन्म लुधियाना में 1 नवम्बर 1951 को हुआ। उनके वालिद जनाब कुलवंत राय कँवल होशियारपुरी साहब उस्ताद शायर थे। घर में उर्दू-अंग्रेजी की हज़ारों किताबें थीं। डॉक्टर का बेटा डॉक्टर, इंजीनियर का बेटा इंजीनियर, वकील का बेटा वकील होते हुए तो बहुत देखा है सुना है लेकिन शायर का बेटा भी अपने वालिद की तरह कद्दावर शायर बने ऐसा बहुत कम होता है। पर ऐसा हुआ और खूब हुआ। वो बचपन से शायर बन गए ऐसा नहीं हुआ लेकिन शायरी के जींस उनमें बचपन से ही आ गए थे। पिता के ये कहने पर कि पहले कोई अच्छी सी तालीम हासिल करो फिर शायरी करना, उन्होंने इंजिनीरिंग की पढाई की और सरकारी नौकरी में लग गए. 1971 में जब वो मात्र 20-21 बरस के थे तभी उनके पिता का आकस्मिक निधन हो गया, जो अश्क साहब के लिए बहुत बड़ा झटका था। सदमे से उबरने के बाद उनकी नज़र घर की लाइब्रेरी पर गयी जिसमें किताबों का ज़खीरा था। वो सोच में पड़ गए कि अब इन 20-25 हज़ार किताबों का क्या होगा ? अधिकांश किताबें उर्दू में थीं।

कि एक ख़ुश्बू हूँ क्या जाने कब मैं दर आऊँ 
तुम अपने घर का दरीचा ज़रा खुला रखना 

ख़ुशी का एक भी सिक्का न अपनी जेब में रख
खज़ाना दर्द का हर आँख से छुपा रखना 

बहुत करीब के रिश्ते ही ज़ख़्म देते हैं 
दिलों के दरम्याँ थोड़ा सा फ़ासला रखना 

अब परवीन साहब के सामने दो ही रास्ते थे पहला या तो इन किताबों को बेच दिया जाय और दूसरा ये कि इन्हें पढ़ा जाय। बेचना उनके ज़मीर को गवारा नहीं हुआ और पढ़ने के लिए उर्दू जानना जरूरी था। उन्होंने उर्दू सीखने का फैसला लिया। उर्दू पढ़ना सीखने के लिए वो बाजार से किताबें ले आये और पढ़ने में जुट गए। बुजुर्गों से अपनी समस्याओं का निदान पाया। मेहनत का फल मीठा ही होता है सो हुआ, धीरे धीरे उन्हें उर्दू लिखना पढ़ना आ गया। फिर शुरू हुआ किताबें पढ़ने का सिलसिला जो बरसों बरस चला। परवीन साहब ने खूब पढ़ा और सीखा। जब उन्हें लगा कि अब वो अपने ख्यालात को लफ़्ज़ों का ज़ामा पहना सकते हैं तो उन्होंने लिखना शुरू किया। हज़ारों किताबों की पढाई काम आई और वो पुख्ता शेर कहने लगे। परवीन साहब ने शुरू से ही ये तय कर लिया था कि वो किसी शैली की नक़ल नहीं करेंगे और अपने ज़ज़्बात को नए अनूठे ढंग से ही कहने की कोशिश करेंगे। इस सोच से उन्हें बहुत फ़ायदा पहुंचा और उनके अशआर जल्द ही लोकप्रिय होने लगे। सन 1973 में शिमला के गेयटी थियेटर में उन्होंने अपना पहला मुशायरा पढ़ा और उसे लूट लिया।

बर्फ मुझे जब आग दिखाने लगती है 
सूरज मेरे सर पर साया करता है 

लहू समंदर में उसने दिल फेंक दिया 
अब वो सबसे हाथ मिलाया करता है 

पेड़ के पत्ते आंसू आंसू गिरते हैं 
जब कोई शाख-ए-दर्द हिलाया करता है 

परवीन साहब कहते हैं कि 'ग़ज़ल सबसे मुश्किल ग़ज़ल सबसे शफ़्फ़ाक़ सिन्फ़े-सुखन है और ये हर ऐरे-गैरे के बस का रोग नहीं है, आप अपनी ग़ज़लें इस्लाह के लिए किसी उस्ताद को दिखा जरूर सकते हैं लेकिन उसका मफ़हूम और शिल्प आपका अपना ही होना चाहिए।उस्ताद आपका काफिया रदीफ़ बहर तो ठीक कर देगा लेकिन अगर उसने आपकी सोच और कहन को भी ठीक किया तो फिर वो शेर आपका नहीं रह जायेगा वो उस्ताद का हो जायेगा भले ही नाम आपका रहे। किसी भी फितरती फ़नकार को आप फ़नकारी नहीं सीखा सकते क्यूंकि फ़नकार तो उसके भीतर छुपा हुआ होता है । मैं किसी उस्ताद के पास नहीं गया ,उरूज मैंने खुद सीखा और मेरे पास जो किताबों का ज़खीरा था उसने मेरी कहन को पुख्ता किया " 

बहुत रोया मैं दीवारों से मिल कर 
मकाँ ख़ाली हुआ जब साथ वाला 

उठाले अपने चलते फिरते पत्थर 
कोई इंसान दे ज़ज़्बात वाला 

ला मेरे चाँद सूरज मुझको दे दे 
तमाशा खत्म कर दिन रात वाला 

उनका पहला शेरी मजमुआ 'दर-बदर" जिसे भाषा विभाग -पंजाब ने छपवाया था ,जब सन 1980 में मंज़र-ए-आम पर आया तब तक वो देश के जाने माने जदीद या मॉडर्न शायरों की लिस्ट में तस्लीम किये जा चुके थे। उनके शेर खास-ओ-आम की जुबाँ पर आ चुके थे,जो किसी भी शायर की मकबूलियत की सबसे पुख्ता निशानी मानी जाती है। आप भले हज़ारों अवार्ड ले लें, रिसालों, किताबें में छपें लेकिन अगर आपके अशआर आम लोगों की जबान पर नहीं हैं या आपके अशआर आपसी बातचीत में कोट नहीं किये जाते तो समझ लीजिये कि आप अभी मकबूलियत से दूर हैं।"दर-बदर" को हर खास-ओ-आम ने हाथों हाथ लिया। इस किताब की उस्ताद शायर जनाब महमूद हाश्मी साहब, कुमार पाशी साहब ,मशहूर नक़्क़ाद जनाब शम्सुर्रहमान फारुखी साहब और बलराज कोमल साहब जैसे बहुत से उर्दू अदब से जुड़े लोगों ने भरपूर तारीफ़ की.

हवा की आँख से भी जो छुपाकर हमको रखता था 
उसी को अब हमारी जग हंसाई अच्छी लगती है 

मैं अश्कों में बहा देता हूँ अपने दर्द की मिट्टी 
कि बारिश में दरख्तों की धुलाई अच्छी लगती है 

ज़माने की तरह अब बेवफ़ा मैं भी न हो जाऊँ 
कि अपने आप से अब आशनाई अच्छी लगती है 

अश्क साहब कभी किसी गिरोह किसी टोले या अदबी सियासत से नहीं जुड़े न ही किसी सियासी पार्टी से उनका राब्ता रहा। टोले और गिरोह उन लोगों के होते हैं जो बैसाखियों का सहारा लेकर आगे बढ़ते हैं। परवीन साहब ने ग़ज़ल की देवी को पूजा है। उनके शेरों में हमारी रोजमर्रा की ज़िन्दगी की परेशानियां खुशियां तकलीफें झलकती हैं।हमारा समाज उसमें सांस लेता नज़र आता है। बशीर बद्र ने उनके लिए कहा है कि " परवीन कुमार अश्क ने ग़ज़ल में अनोखे अहसास को बड़ी मुहब्बत से अपना लिया है। वो किसी बाहरी मंज़र , निशाँ या सामने की चीज को ऐसी अंदरूनी प्यारी और ज़ाती तख़्लीक़ीयत (सृजनता ) से ग़ज़ल बनाते हैं कि उनके बहुत से शेर पढ़ने से ज्यादा दिल में छुपा कर रखने का तोहफा बन जाते हैं। " 

सुना है साथ रहता है वो मेरे 
मगर मैंने उसे देखा नहीं है

मुरव्वत की तिजोरी बंद रखना 
ये सिक्का शहर में चलता नहीं है 
मुरव्वत=वफ़ादारी 

ये हो सकता है वो आ जाये मुड़कर 
मगर ऐसा कभी होता नहीं है

"चांदनी के खुतूत" उनका दूसरा ग़ज़ल संग्रह था जो सन 1992 में प्रकाशित हुआ। इसी साल ही उनकी उर्दू ज़बान में कही चुनिंदा ग़ज़लों को "ग़ज़ल तेरे शहर में " के नाम से उर्दू न जानने वाले पाठकों के लिए देवनागरी में प्रकाशित किया गया। इस किताब में उनकी 52 ग़ज़लें हैं जो पाठक को बाँध लेती हैं। उनके ख़्याल पाठक को उद्वेलित करते हैं। हालाँकि किताब की छपाई आजकल प्रकाशित होने वाली ग़ज़ल की किताबों से बिलकुल अलग है लेकिन फिर भी इस के जादू से बाहर निकलना बहुत मुश्किल है। परवीन साहब को देश विभाजन की त्रासदी ने भीतर से तोड़ कर रख दिया था। उनके बहुत से शेरों में विभाजन का दर्द बहुत शिद्दत से उबरकर नज़र आता है। उन्होंने पंजाबी में भी ग़ज़लें और कवितायेँ लिखी जो पाकिस्तान में भी उतनी ही लोकप्रिय हुईं जितनी कि हिंदुस्तान में।

उसने भी आँखों में आंसू रोक लिए 
मैं भी अपने ज़ख्म छुपाने वाला था 

पार के मंज़र ने मौके पर आँखें दीं 
मैं अँधा दीवार उठाने वाला था 

बच्चे 'अश्क' को पागल कह कर भाग गए 
वो परियों की कथा सुनाने वाला था 

सन 2005 में उनका तीसरा शेरी मजमुआ दुआ ज़मीन मंज़र-ए-आम पर आया जिसने जनाब 'परवीन कुमार अश्क' साहब को देश का बेहतरीन सूफ़ी शायर सिद्ध कर दिया। उनकी ग़ज़लों और शख्सियत पर मिथिला यूनिवर्सिटी दरभंगा बिहार की छात्रा ने 2014 में पी एच डी की डिग्री हासिल की। परवीन कुमार अश्क अपनी पीढ़ी के पहले उर्दू शायर है जिनकी शायरी पर उनके अपने प्रांत पंजाब के बाहर की उर्दू यूनिवर्सिटी पीएचडी करवा रही है. उन्हें ढेरों अवार्ड से नवाज़ा गया जिनमें पंजाब सरकार के मुख्य मंत्री द्वारा दिया गया "शहनशाहे ग़ज़ल अवार्ड और पंजाब लोकसभा के स्पीकर साहब द्वारा दिया गया 'ग़ज़ल हीरो' अवार्ड ,बिहार उर्दू अकेडमी अवार्ड ,उत्तरप्रदेश अकादमी अवार्ड ,दिल्ली से 'ग़ज़ल भास्कर' अवार्ड आदि प्रमुख हैं. अश्क साहब ने लगभग 200 टीवी प्रोग्रामस और 150 से भी अधिक कुल हिन्दो पाक मुशायरों में भी शिरकत की।अश्क साहब की अनोखी गजलों पर निदा फ़ाज़ली , बशीर बद्र , गोपीचंद नारंग, साकी फ़ारूक़ी , वज़ीर आगा , अमजद इस्लाम, शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी जैसी विश्व प्रसिद्ध उर्दू शख्शियत ने बहुत खूबसूरती के साथ लिखा है। अश्क साहब के लगभग तीन सौ शेयर पूरी दुनिया में मशहूर है।

सफ़र में मुझसे वो लड़ता रहा था 
बिछड़ते वक्त फिर क्यों रो पड़ा था 

न पकड़ी काफ़िले की जिसने ऊँगली
वो बच्चा सबसे आगे चल रहा था 

समुन्दर चीखता उस वक्त पहुंचा 
मकाँ पूरी तरह जब जल चुका था 

उनकी ग़ज़लों और गीतों को मशहूर गायक दिलेर मेहंदी, जसविंदर नरूला, शंकर साहनी, रूपकुमार राठौर, सोनाली राठोर, अल्ताफ राजा, अनुराधा पौडवाल, जावेद अली, अरविंद्र सिंह, घनश्याम वासवानी जैसे गायक आवाज दे चुके हैं । उनके सूफियाना कलाम को कराची में पाकिस्तान के मशहूर कव्वाल फरीद गुलाम और गायक खलील हैदर ने भी महफिलों में खूब गाया है उनके कई गीतों के वीडियो यू ट्यूब पर भी लोगों की पसंद बने हुए हैं। उन्होंने कुछ फिल्मों के लिए भी गीत लिखे। परवीन साहब जुलाई 2017 में इस दुनिया-ए-फ़ानी से अचानक रुख़सत हो गए और अपने पीछे शायरी का एक ऐसा नायाब खज़ाना छोड़ गए जिस से आने वाली नस्लें बरसों बरस मालामाल होती रहेंगी।

ज़मीं को या खुदा वो जलजला दे 
निशाँ तक सरहदों के जो मिटा दे 

बुजुर्गों का बस इक कमरा बचा कर
तू जब चाहे पुराना घर गिरा दे 

मैं सूरज तोड़ लाऊंगा नहीं तो 
मुझे ऐ रौशनी अपना पता दे 

मैं आपको इस किताब की प्राप्ति का रास्ता नहीं बता सकता क्यूंकि 1992 में समीक्षा प्रकाशन पठानकोट से छपी इस किताब की कोई प्रति कहीं मिलेगी भी या नहीं कह नहीं सकता। हाँ आप चाहे तो उनके छोटे भाई जनाब 'अनिल पठानकोटी' जो खुद भी बेहतरीन शायर हैं और जिनकी ग़ज़लों की किताब" आवाज़ के साये" का कभी हम यहाँ जिक्र करेंगे,से उनके मोबाईल न 9465280779 पूछ सकते हैं। आप उनकी ग़ज़लों को रेख़्ता की साइट पर जरूर पढ़ सकते हैं। अगली किताब की तलाश में निकलने से पहले हाज़िर हैं उनकी एक ग़ज़ल के ये शेर :

सूरज उसको निगल गया
मेरे पास इक जुगनू था 

एक सहारा बस तू है 
एक सहारा बस तू था 

मेरे पास धड़कता दिल 
उसकी जेब में चाकू था

Monday, April 23, 2018

किताबों की दुनिया-174

माली चाहे कितना भी चौकन्ना हो 
फूल और तितली में रिश्ता हो जाता है 

गुलशन गुलशन हो जाने की ख़्वाहिश में 
धीरे-धीरे सब सहरा हो जाता है 

अब लगता है ठीक कहा है ग़ालिब ने 
बढ़ते बढ़ते दर्द दवा हो जाता है 

घर के बाहिरी कोने में एक कमरा है जिसे मैंने अपना ऑफिस बनाया हुआ है , मिलने जुलने वाले वहीँ आते हैं, बैठते हैं, गप्पें मारते हैं, चाय पीते हैं और चले जाते हैं। एक दिन एक सज्जन आये तब मैं किसी किताब पर लिख रहा था, वो बैठे बैठे मुझे देखते रहे फिर अचानक बोले "नीरज जी आपको मिलता क्या है ? " मैंने चौंकते हुए पूछा "किस से क्या मिलता है ?" वो बोले "ये ही किताब के बारे में लिखने से " , मैंने कहा "आनंद" .अब चौंकने की बारी उनकी थी बोले "आनंद ? कैसे ? इसे पढता भी है कोई ". मैंने कहा भाई आनंद मुझे लिखने से मिलता है किसी के पढ़ने या न पढ़ने से नहीं। इसे यूँ समझें जैसे कोई शार्क के साथ तैरने में आनंद लेता है कोई ऊंची जगह से बंगी जम्पिंग करने में तो कोई पैराशूट पहन कर कूदने में , शार्क के साथ तैरने वाले या बंगी जम्पिंग करने वाले या पैराशूट के साथ कूदने वाले लोग दर्शकों के मोहताज़ नहीं होते। वो ये काम सिर्फ अपने आनंद के लिए करते हैं, बस वैसे मैं भी करता हूँ. मुझे लगता है , जरूरी नहीं कि जो मुझे लगे वो सही ही हो ,कि ये बात सभी क्रिएटिव काम करने वालों पर लागू होती है जिनमें शायर भी शामिल हैं. शायर, शायरी अपने आनंद के लिए करते हैं।जो शायर, शायरी आनंद पाने के लिए करता है उसे मकबूलियत अपने आप मिल जाती है। अच्छे शायर कभी पाठक को ध्यान में रख कर ग़ज़ल नहीं कहते ऐसा काम सिर्फ मज़मेबाज़ करते हैं।“

गुज़रता ही नहीं वो एक लम्हा 
इधर मैं हूँ कि बीता जा रहा हूँ 

मुहब्बत अब मुहब्बत हो चली है 
यही तो सोच कर घबरा रहा हूँ 

ये नादानी नहीं तो और क्या है 'दानिश' 
समझना था जिसे, समझा रहा हूँ 

ग़ज़ल के जानकार तो मक्ते में शायर का नाम पढ़ कर ये पहचान ही गए होंगे कि हमारे आज के शायर हैं 'दानिश' साहब। जी हाँ बिलकुल सही पहचाना ,आज हम शायर 'मदन मोहन मिश्र 'दानिश' साहब की ग़ज़लों की किताब ' आस्मां फ़ुर्सत में है " का जिक्र करेंगे जिसे 2018 में मंजुल पब्लिशिंग हॉउस भोपाल ने प्रकाशित किया था। 'दानिश' साहब के लिए शायरी आनंद प्राप्त करने का जरिया है। अगर किसी दिन कोई मनचाहा शेर शायर के ज़ेहन में आ जाये तो समझिये कि उस का दिन बन जाता है और कहीं पूरी ग़ज़ल ही कागज़ पर उतर जाए तो फिर जो ख़ुशी मिलती है उसकी तुलना उस माँ की ख़ुशी से की जा सकती है जिसने प्रसव पीड़ा के बाद अपने बच्चे का पहली बार मुंह देखा हो। मुझे यकीन है कि 'दानिश' भाई भी इस तरह की ख़ुशी से जरूर रूबरू हुए होंगे।


मेरे चुप रहने पे हंगामा है क्यूँ
ख़ामशी भी मुद्दआ होती है क्या 

दिल में गर अफ़सोस ही न हो तो फिर 
जुर्म की कोई सज़ा होती है क्या 

इंतिहा साँसों की होती हो तो हो 
ज़िन्दगी की इंतिहा होती है क्या 

खूबसूरत शख़्सियत के मालिक "दानिश" का जन्म 8 सितम्बर 1961 को उत्तर प्रदेश के ज़िला बलिया के रामगढ़ गाँव में हुआ था। ये इत्तेफ़ाक़ ही है कि इसी गाँव में हिंदी के मूर्धन्य विद्वान आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का भी जन्म हुआ था।उनका गाँव छोटा था लेकिन उसके एकमात्र प्राइमरी स्कूल, की लाइब्रेरी बहुत बड़ी थी। हिंदी के लगभग सभी श्रेष्ठ साहित्यकारों की पुस्तकें वहां बहुतयात में थीं। दानिश जी को पढ़ने की रूचि वहीँ से पड़ी। छंद और काव्य के रस का चस्का उन्हें अपने पूज्यनीय दादा जी की सोहबत से लगा जो हर शाम घर के आँगन में गाँव के बच्चों से रामायण की चौपाइयां गवाया करते थे। चूँकि आस पड़ौस में बहुत से मुस्लिम परिवार भी थे लिहाज़ा उर्दू शेरो शायरी के दौर भी चलते, इसके चलते मदन जी का शायरी से परिचय भी बचपन में ही हो गया।

मैं अपनी गूँज को महसूस करना चाहता हूँ 
उतर के मुझमें ,मुझे जोर से पुकारे कोई 

अब आरज़ू है वो हर शय में जगमगाने लगे 
बस एक चेहरे में कब तक उसे निहारे कोई 

है दुःख तो कह लो किसी पेड़ से परिंदे से 
अब आदमी का भरोसा नहीं है प्यारे कोई 

वो ज़िन्दगी ही क्या जो सीधी सपाट राह पर चले। 'दानिश' साहब की ज़िन्दगी भी पेचो ख़म से भरपूर रास्तों पर चली। हालात ऐसे हुए कि उन्हें दसवीं के बाद अपनी पढाई दूरस्त पाठ्यकर्मो याने कॉरेस्पोंडेंस के माध्यम से जारी रखनी पड़ी। ज़िन्दगी की मुश्किलों को उन्होंने सहजता से लिया और उस पर पार पाते चले गए। झुझारू प्रवति के मदन जी ने ज़िन्दगी की तल्खियों पर आंसू नहीं बहाये बल्कि उसे ख़ूबसूरती से अपनी शायरी में ढालने का हुनर सीख लिया। अपनी शुरूआती परवरिश के बारे में वो लिखते हैं कि " उस दौर में ज़िन्दगी इस क़दर सहमी हुई और खामोश नहीं थी। वो सबकी हमजोली हुआ करती थी.....रोज़ रोज़ की तमाम मुश्किलों और चुनौतियों के बावजूद भी हँसती-खिलखिलाती, अल्हड़ और अलमस्त। बाग़-बगीचे खेत-खलियान दरिया-झरने हम सब के थे। रिश्ते-नाते इंसानों के थे जातियों और मज़हबों के नहीं। बहुत थोड़े में भी खुश रहने की न जाने कितनी वजहें थीं।" ये ही कारण है कि हमें उनकी शायरी में ज़िन्दगी के सभी रंग दिखाई देते हैं।

मुहब्बतों में नए क़र्ज़ चढ़ते रहते हैं 
मगर ये किसने कहा है कभी हिसाब करो 

तुम्हें ये दुनिया कभी फूल तो नहीं देगी 
मिलें हैं कांटें तो काँटों को ही गुलाब करो 

कई सदायें ठिकाना तलाश करती हुईं 
फ़िज़ा में गूँज रही हैं उन्हें किताब करो

'दानिश' साहब की शायरी पर उर्दू के कद्दावर शायर जनाब निदा फ़ाज़ली साहब ने लिखा था कि " दानिश आज के शायर हैं। आज की ज़िन्दगी से उनका ग़ज़ल का रिश्ता है। जो जिया है उसे ग़ज़ल में दर्शाया है। उन्होंने अपने लिए जिस भाषा का इंतख़ाब किया है वो सड़क पर चलती भी है ,वक़्त के साथ बदलती भी है , चाँद के साथ ढलती भी है-सूरज के साथ निकलती भी है। ये वो भाषा है जो घर की बोली में खनकती है,गली-चौराहों में महकती है, परिंदों की उड़ानों में चहकती है ,दरख़्तों की शाखों में लहकती है और अपने एकांत में अपने ग़म के साथ सिसकती भी है। " उनके इस ग़ज़ल संग्रह को पढ़ते वक्त आप अपने आप को निदा साहब से शत- प्रतिशत सहमत पाएंगे।

मसअला तो इश्क का है ,ज़िंदगानी का नहीं
यूँ समझिये प्यास का शिकवा है ,पानी का नहीं

क्या सितम है वक़्त का, इस दौर का हर आदमी
है तो इक किरदार पर अपनी कहानी का नहीं

अनसुना करने से पहले सोच लो तुम एक बार
ख़ामशी का शोर है ये बेजुबानी का नहीं

वक़्त को क्या हो गया है, क्यों सुनाता है हमें
जंगली फूलों का किस्सा, रातरानी का नहीं

दानिश साहब की ज़िन्दगी में सुकून की घड़ियाँ तब दाखिल हुईं जब उन्हें सन 1992 में उन्हें ऑल इण्डिया रेडियो में स्थाई नौकरी मिल गयी। ऑल इंडिया रेडियों की नौकरी में आने के बाद वो शायरी में पूरी तरह डूब गए।‌ नतीज़तन सन 2005 में उनकी ग़ज़लों की पहली किताब "अगर" मेधा बुक्स द्वारा प्रकाशित हो कर मंज़र-ऐ-आम पर आयी और बहुत चर्चित हुई। 'अगर' के बाद एक लम्बा वक्फ़ा बीत गया और अब 13 सालों बाद उनकी शायरी की दूसरी किताब 'आसमां फुर्सत में है ' आयी है । इस किताब में दानिश साहब की 83 ग़ज़लें और 9 नज़्में संगृहित हैं। किताब पेपरबैक में और बहुत ख़ूबसूरती से प्रकाशित की गयी है। अधिकतर ग़ज़लें बहुत आसान ज़बान में कही गयी हैं जिनके शेर पढ़ते पढ़ते याद होते जाते हैं। आसान ज़बान में ज़िन्दगी के तजुर्बों को बयां करना एक बेहद मुश्किल हुनर है जो बहुत मेहनत से हासिल होता है।

कोई ये लाख कहे मेरे बनाने से मिला 
हर नया रंग ज़माने को पुराने से मिला 

उसकी तक़दीर अंधेरों ने लिखी थी शायद 
वो उजाला जो चिरागों को बुझाने से मिला 

फ़िक्र हर बार ख़मोशी से मिली है मुझको 
और ज़माना ये मुझे शोर मचाने से मिला 

और लोगों से मुलाकात कहाँ मुमकिन थी 
वो तो ख़ुद से भी मिला है तो बहाने से मिला 

सरल भाषा के छोटे छोटे मिसरों में ज़िन्दगी के रंग भरने का हुनर हर किसी को नहीं आता,हर कोई 'देखन में छोटे लगें घाव करें गंभीर" वाली कला को नहीं साध पाता उसके लिए बहुत प्रयत्न करने पड़ते हैं। दानिश साहब ने इस असाधारण कला पर सफलता से हाथ आज़माये हैं। ।छोटी बहर के उस्ताद शायर मरहूम जनाब मुहम्मद अल्वी साहब ने उनके बारे में लिखा था कि "दानिश की शायरी पर दिल से वाह निकलती है , उनकी शायरी और मेरी शायरी के लफ़्ज़ों के स्टाइल में कोई फ़र्क नज़र नहीं आता। उनकी शायरी सोचने समझने और कुछ हासिल करने की तहरीक देती है। मैं उनकी शायरी से बहुत मुतास्सिर हूँ ". अल्वी साहब के दानिश साहब की शायरी को लेकर कहे ये लफ्ज़ किसी भी शायर को मिले बड़े से बड़े अवार्ड से ज्यादा महत्व रखते हैं।

वो भी मेरे ही जैसा है 
हँसते-हँसते रो पड़ता है

लिख लो हथेली पर चाहो तो 
इतना सा तो नाम पता है 

जिस को बाँट नहीं सकते हम 
उस ग़म को पीना पड़ता है 

तुम तो चाहे जब आ जाते 
वक्त बता कर सितम किया है

'वक्त बता कर सितम किया है " जैसा मिसरा बताता है कि दानिश किस पाए के शायर हैं। आप इस मिसरे पर घंटों सर धुन सकते हैं ,ऐसा कमाल इस किताब में जगह जगह बिखरा पड़ा है। आप अगर शायरी के प्रेमी हैं तो इस किताब की ग़ज़लों से गुज़रते हुए आप को बार बार ठिठकना पड़ेगा। कभी कोई मिसरा तो कभी कोई शेर आपकी बांह पकड़ के अपने पास बिठा लेगा और आप चाह कर भी नहीं उठ पाएंगे। मदन मोहन 'दानिश' साहब ने शायरी नहीं की, जादू किया है। जादू भी ऐसा जो सर चढ़ कर बोलता है। जनाब सचिन चौधरी इस किताब में लिखते हैं कि "दानिश की शायरी ज़िन्दगी के मुख़्तलिफ़ रंगों से सजा हुआ एक ऐसा कोलाज़ है जिसमें हर आदमी को अपना रंग नज़र आता है। यही वजह है कि दानिश की शायरी की खुशबू मुल्क की सरहदों से होती हुई दुनिया के तमाम मुल्कों में फ़ैल चुकी है।अमेरिका, पकिस्तान, दुबई, शारजाह, दोहा, क़तर कर आबूधाबी जैसे कई मुल्कों, कई शहरों के अदबी मुशायरों में दानिश की शिरकत इसकी मिसाल है "

 रंगे दुनिया कितना गहरा हो गया 
आदमी का रंग फीका हो गया 

रात क्या होती है हमसे पूछिए 
आप तो सोए , सवेरा हो गया 

डूबने की ज़िद पे कश्ती आ गयी 
बस यहीं मज़बूर दरिया हो गया 

दानिश साहब को मध्यप्रदेश उर्दू अकेडमी , जयपुर के भगवत शरण चतुर्वेदी स्मृति और राष्ट्रीय अनामिका साहित्य परिषद् जैसे प्रतिष्ठित अवार्ड्स से नवाज़ा जा चुका है। उनकी ग़ज़लें अंतरजाल की लगभग सभी महत्वपूर्ण साहित्यिक साइट पर मौजूद हैं। देश के पत्र- पत्रिकाओं में भी वो निरंतर छपते रहते हैं। आप इस किताब को अमेज़न से तो ऑन लाइन मंगवा ही सकते हैं यदि ऐसा न करना चाहें तो मंजुल पब्लिशिंग हॉउस को 'सेकंड फ्लोर, उषा प्रीत काम्प्लेक्स ,42 मालवीय नगर भोपाल-462003 "के पते पर लिख सकते हैं। मंजुल की साइट www. manjulindia.com से भी इसे मंगवाया जा सकता है। मेरा तो आपसे ये ही अनुरोध है कि आप 'मदन मोहन दानिश साहब को, जो ग्वालियर में "ऑल इण्डिया रेडियो" के प्रोग्राम एग्जीक्यूटिव के पद पर कार्यरत हैं, उनके मोबाईल न. 09425114435 पर संपर्क कर उन्हें इन खूबसूरत अशआरों के लिए भरपूर बधाई दें।

मंदिर-मस्जिद गिरिजाघर और गुरुद्वारा 
लफ्ज़ कई हैं , एक मआनी हम दोनों

ज्ञानी-ध्यानी, चतुर-सियानी दुनिया में 
जीते हैं अपनी नादानी हम दोनों 

तू सावन की शोख घटा, मैं प्यासा बन 
चल करते हैं कुछ मनमानी हम दोनों 

अब जिस शायर के लिए उस्ताद शायर जनाब " शीन काफ़ निज़ाम" ये लिखते हों कि " मदन मोहन दानिश का शुमार हमारे उन शायरों में होता है , जो आपबीती को जगबीती बनाना जानते हैं। यही सबब है कि उनकी शायरी पढ़ने वालों को अच्छी लगती है और सुनने वालों को भी पसंद आती है।" उसके बारे में और क्या लिखा जा सकता है ? अगली किताब की तलाश पर निकलने से पहले आईये पढ़ते हैं दानिश साहब की उस ग़ज़ल के कुछ शेर जिसने उन्हें बुलंदियों पर पहुंचा दिया और हर कहीं लोग उनसे ये ग़ज़ल बार बार सुनने की फरमाइश करते नहीं थकते :

ये कहाँ की रीत है ,जागे कोई सोए कोई 
रात सबकी है तो सबको नींद आनी चाहिए 

क्यों जरूरी है किसी के पीछे-पीछे हम चलें 
जब सफर अपना है तो अपनी रवानी चाहिए 

कौन पहचानेगा दानिश अब तुझे किरदार से 
बेमुरव्वत वक़्त को ताज़ा निशानी चाहिए

Monday, April 16, 2018

किताबों की दुनिया -173

सोये सपनों को जगाने की ज़रूरत क्या है 
बे सबब अश्क बहाने की ज़रूरत क्या है 

तेरा एहसास ही काफ़ी है मेरे जीने को 
तेरे आने कि न आने की ज़रुरत क्या है 

यह फ़िजा तेरी ज़मीं तेरी हवा भी तेरी 
सरहदें इस पे बनाने की ज़रूरत क्या है 

आज अपनी पोस्ट की शुरुआत हम जनाब 'अज़हर जावेद' साहब की बात से करते हैं जो उन्होंने उस किताब के फ्लैप पे लिखी है जिसका जिक्र आज होने जा रहा है। वो लिखते हैं कि " जदीदियत की लहर और मुशायरों की भरमार ने ग़ज़ल का बांकपन बिगाड़ने में बहुत बड़ा किरदार अदा किया है। मगर कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्होंने तग़ज़्ज़ुल को संभाला ही नहीं उजाला भी है,उनमें जाखू 'साहिल' का नाम भी बहुत नुमाया और बेहद अहम हैं। " जाखू 'साहिल' ? अरे ? ये कौन है ?ये नाम तो मैंने कभी पढ़ा सुना नहीं। फिर अपने आप को समझाया कि शायरी का समंदर बहुत विशाल है 'नीरज' बाबू ,अभी तो आप इसकी सतह पर ही तैर रहे हैं ,अभी आपने डुबकी लगाई कहाँ हैं? सच्ची बात है ,सिर्फ सतह पर तैरने भर से समंदर की गहराई का अंदाज़ा थोड़े होता है।

जन्नत मिरे ख्याल की है, मेरी मुन्तज़िर 
 लेकिन मैं हूँ कि जिसको ख़राबे ही रास हैं 

होती हैं मुद्दतों में कभी मेरी उनसे बात 
कहने को घर हमारे बहुत पास पास हैं 

बस है वही ख़ुलूस का परचम लिए हुए 
रहने को जिन के घर न बदन पर लिबास हैं 

अब जब उनके बारे में पता करना शुरू किया तो अपनी कमअक्ली पर शर्म सी आयी क्यूंकि रमेंद्र जाखू 'साहिल' तो बड़े नामी गरामी शायर और कवि निकले। अपने आप को फिर ये कह कर सांत्वना दी कि कोई बात नहीं - 'नहीं' से देर भली या देर आये दुरुस्त आये। तो लीजिये पेश है उनके बारे में पता की गयी जानकारी के साथ साथ उनकी ग़ज़लों की किताब "एक जज़ीरा धूप का" का थोड़ा सा जिक्र। शुरुआत पंजाब के खूबसूरत शहर जालंधर के पास के क़स्बे "नकोदर" से करते हैं ,नकोदर नाम पर्शियन शब्द 'नेकी का दर" से पड़ा है ,जहाँ 17 अप्रेल 1953 को श्री ऊधोराम और श्रीमती करम देवी के यहाँ जिस बालक का जन्म हुआ उसका नाम रखा गया "रमेंद्र". तब ये किसे पता था कि 'रमेंद्र" नकोदर का नाम आगे जाकर खूब रौशन करने वाला है।"रमेंद्र" ने वहीँ नकोदर के स्कूलों में उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण की और फिर आगे पढ़ने के लिए 49 कि.मी. दूर बसे जालंधर चले गए।


 आपने ऐसा मसीहा भी कभी देखा है क्या 
 ज़ख़्म दे कर जो यह पूछे दर्द-सा होता है क्या 

कोई भी उम्मीद उसके घर से बर आती नहीं 
अब खुदा के घर सिफ़ारिश का चलन चलता है क्या 

जाने कैसे लोग थे जो मर मिटे इक बात पर 
अब किसे मालूम दस्तूर-ऐ-वफ़ा होता है क्या 

कॉलेज के दिनों में जब वो मात्र 17 साल के थे उन्हें कवितायेँ और नज़्में कहने और संगीत का शौक चढ़ा। उन्हें लगता था जैसे कवितायेँ और नज़्में उनसे कान में हलके से आ कर कह रही हैं कि हमें कागज़ पर उतारो। कॉलेज में लगातार तीन सालों तक उन्हें कविता प्रतियोगिता में प्रथम स्थान मिलता रहा। काव्य की रसधार जो उनमें उस समय से बही वो अभी तक अबाध गति से बहे जा रही है। भारतीय प्रशासनिक अधिकारी की परीक्षा में वो उत्तीर्ण हुए और मसूरी ट्रेनिंग पर चले गए जहाँ उनकी मुलाकात शकुंतला जी हुई जो अंग्रेजी की लेक्चररशिप की नौकरी छोड़ कर के प्रशासनिक अधिकारी की परीक्षा पास कर मसूरी में ट्रेनिंग पर आयी हुई थीं। शंकुन्तला जी उनसे एक साल सीनियर थीं। मुलाकातें दोस्ती में बदलीं, दोस्ती प्यार में और प्यार शादी में। शकुंतला जी की प्रेरणा से शादी के लगभग 10 साल बाद उन्होंने ग़ज़लें कहनी शुरू कीं।

जाने कितनी सरहदों में बट गई है ज़िन्दगी 
बस ज़रा-सी बात पर खुद से लड़ाई हो गई 

भूल जाना हादसों को भीड़ का दस्तूर है 
एक पल में बात सब आई गई सी हो गई

क्या मिलेगा तुझको 'साहिल' रोने धोने से यहाँ 
थी समन्दर ही की कश्ती जो उसी में खो गई 

साहिल साहब के बारे में मशहूर ग़ज़लकार जनाब 'बशीर बद्र' साहब ने इस किताब में लिखा है कि "जाखू ज़िम्मेदार ज़हीन और खूबसूरत शख्सियत के मालिक हैं। ज़िम्मेदार और भरपूर ज़िन्दगी जीना प्रेक्टिकल ग़ज़ल है। ग़ज़ल जी लेने के बाद ग़ज़ल लिख लेना बहुत दुश्वार नहीं होता। आप ज़रा सी देर साहिल की ग़ज़लों के साथ रहिये फिर उनकी ग़ज़लों के कितने ही मिसरे ज़िन्दगी के सुख-दुःख की बहुत खूबसूरत इमेज बनकर आपके साथ रहेंगे। साहिल ग़ज़ल और नज़्म के सच्चे शायर हैं। आज की ग़ज़ल का एक खूबसूरत नाम जाखू साहिल है" इस किताब को पढ़ते वक्त बशीर बद्र साहब की उक्त पंक्तियाँ अक्षरशः सच्ची लगती हैं। पहले जाखू साहब हिंदी में ग़ज़लें लिखते थे लेकिन धीरे धीरे उन्हें लगा कि बिना उर्दू सीखे अच्छी ग़ज़ल नहीं कही जा सकती इसलिए उन्होंने बाकायदा उर्दू पढ़ने लिखने की तालीम हासिल की और फिर उर्दू में ग़ज़लें कहने लगे। उन्होंने सिद्ध किया कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती सिर्फ आपने सीखने ज़ज़्बा होना चाहिए बस।

शिकवा ही क्या जो उम्र भर राहत मिली नहीं 
जैसी भी है ये ज़िन्दगी हरगिज़ बुरी नहीं 

तनक़ीद आपकी तो बहुत खूब है जनाब 
लेकिन किताब आपने शायद पढ़ी नहीं 

जब दोस्त कह दिया है तो फिर खामियां न देख
टुकड़ों में जो क़ुबूल हो , वो दोस्ती नहीं 

मैं इतना खो गया था खुदाओं की भीड़ में 
असली खुदा पे मेरी नज़र ही पड़ी नहीं 

ये तो आपको भी पता होगा कि शायरी महज़ उर्दू ज़बान सीखने भर से नहीं आ जाती उसके लिए आपको ये पता होना चाहिए कि आपके एहसास किस लफ्ज़ की सवारी करके दिल पर दस्तक देने में कामयाब होंगे। कुछ लोगों में ये हुनर जन्मजात होता है वो लोग उस्ताद कहलाते हैं जिनके पास ये हुनर नहीं होता वो उस्ताद की शरण में जाते हैं।आज सोशल मिडिया के इस दौर में आपको उस्ताद आसानी से मिल जायेंगे लेकिन जब मोबाईल और इंटरनेट का ज़माना नहीं था तब उस्ताद को ढूंढ निकालना टेढ़ी खीर हुआ करता था ,खास तौर पे सही उस्ताद का मिलना तो किस्मत की बात होती थी। रमेंद्र जाखू जी किस्मत के धनी थे तभी उन्हें जनाब "गोपाल कृष्ण" 'शफ़क' जैसे गुणी उस्ताद मिले जिन्होंने उनका शायरी की तकनीक के साथ-साथ ग़ज़ल की ख़ूबसूरती से परिचय करवाया।शायर की असली परख उसके द्वारा छोटी बहर में कही ग़ज़लों से होती है क्यूंकि ये गागर में सागर भरने जैसा दुष्कर काम होता है। छोटी बहर में कही जाखू जी की ग़ज़लें पढ़ कर पता चलता है कि उन्होंने अपने उस्ताद जी की रहनुमाई में कितना कुछ सीखा है :

ख़फ़ा ही सी रहती है क्यों मुझसे अक्सर 
बता ज़िन्दगी क्या मैं इतना बुरा हूँ 

मुझे गैर से कोई शिकवा नहीं है 
मैं अपनी अना का सताया हुआ हूँ 

हवस का जुनूं है मुहब्बत पे भारी 
हैं जिस्मों के मेले जिधर भी गया हूँ 

जाखू साहब की शायरी में एक रवानी है,सादगी है सरलता है जो ग़ज़ल गायकों को अपनी और खींचती है। उनकी शायरी आम आदमी की ज़िन्दगी के एहसासात और मुश्किलात को छू कर गुज़रती है और ज़िन्दगी के बहुत पास पास है। उनकी ग़ज़लें पढ़ कर जब आम पाठक ही गुनगुनाने लगता है तो गायकों की क्या बात करनी। ये ही कारण है कि उनकी ग़ज़लें "ग़ुलाम अली" , जगजीत सिंह ", "पीनाज़ मसानी" , "राजकुमार रिज़वी" "रूप कुमार राठौड़" और "परवीन मेहदी" जैसे श्रेष्ठ ग़ज़ल गायकों ने गायी हैं। साहिल साहब खुद जब मुशायरों में अपनी ग़ज़लें तरन्नुम से पढ़ते हैं तो श्रोता झूम-झूम जाते हैं। देश ही नहीं लाहौर, दुबई,अबुधाबी,मस्कट और कतर जैसे दूसरे मुल्कों में जहाँ उर्दू बोली या समझी जाती है साहिल साहब के चाहने वालों की कमी नहीं।

 मज़हब हज़ारों बन गये आदम की ज़ात के 
रस्में बदल के रह गईं, फितरत मगर नहीं 

इस दौरे खुद परस्ती में बदली है वो हवा 
अपनों से खौफ है मुझे गैरों का डर नहीं 

'साहिल' मुहब्बतों की रविश हो गई तमाम 
अब राह-ए-आशिक़ी में वफ़ा का शजर नहीं 

भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधीन हरियाणा सरकार में वित्तायुक्त एवं प्रधान सचिव के पद से सेवामुक्त होने पर रमेंद्र जाखू साहब ने हरियाणा सरकार के अनुरोध पर उन्होंने हरियाणा उर्दू अकेडमी के सचिव पद पर तीन वर्षों तक सफलता पूर्वक कार्य किया। उन्हें ,उनकी साहित्य सेवाओं के लिए अनेको पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त हुए जिनमें सन 2003 में मिला "बलराज साहनी अवार्ड और 2012 में मिला 'सरस्वती सम्मान" प्रमुख है। एक जज़ीरा धूप का" जाखू साहब की ग़ज़लों की दूसरी और यूँ तीसरी किताब है। इस से पूर्व सन 1987 में उनकी कविताओं का संग्रह "शब्द सैलाब" और सन 2001 में प्रकाशित पहला ग़ज़ल संग्रह " मेरे हिस्से की ग़ज़ल " साहित्यिक जगत में धूम मचा चुका है. उसी साल याने 2001 में ही उनकी चुनिंदा 12 ग़ज़लों का ऑडियो संग्रह बहुत लोकप्रिय हुआ था। इस किताब की प्राप्ति के लिए आप आधार प्रकाशन पंचकूला हरियाणा को aadhar_prakashan@yahoo. com पर मेल कर सकते हैं या नेट पर ढूंढ सकते हैं , जाखू साहब का नंबर मुझे पता नहीं इसलिए आप तक पहुँचाने में असमर्थ हूँ ,अगर किसी पाठक को पता हो तो मुझे बताये ताकि मैं इस पोस्ट में उसे दूसरों के लिए जोड़ सकूँ। चलते-चलते मैं आपको उनकी एक ग़ज़ल के शेर पढ़वाता चलता हूँ :

 कोई साजिश कहीं हुई होगी 
आग यूँ ही नहीं लगी होगी 

ज़र्द पत्तों से भर गया आँगन 
कोई उम्मीद मर गयी होगी 

कश्मकश कब तलक छुपी रहती 
 बात हद से गुज़र गयी होगी