Monday, August 13, 2018

किताबों की दुनिया - 190

 सच बात मान लीजिये चेहरे पे धूल है
 इलज़ाम आइनों पे लगाना फ़ुज़ूल है

 उस पार अब तो कोई तेरा मुन्तज़िर नहीं
 कच्चे घड़े पे तैर के जाना फ़ुज़ूल है

 जब भी मिला है ज़ख्म का तोहफा दिया मुझे
 दुश्मन जरूर है वो मगर बा-उसूल है

 उर्दू गुलिस्तां में एक से बढ़ एक बुलबुले हुई हैं जिनकी शायरी को लोगों ने पसंद तो किया लेकिन याद नहीं रखा। कारण ये रहा कि उन्होंने अपनी शायरी में कमो-बेस वो ही सब कुछ कहा जो की मर्द शायर कह रहे थे। फ़र्क इतना था कि शायर मेहबूबा को लेकर आंसू बहा रहे थे और शायरायें महबूब को लेकर। मुशायरों के मंच पर शायरा को एक सजी धजी गुड़िया के रूप में पेश किया जाता रहा है जो तरन्नुम और अपने हुस्न से सामयीन के दिलों पर कब्ज़ा करने की कोशिश करती थीं। आज भी हालात कुछ कुछ वैसे ही हैं लेकिन आधी आबादी की नुमाइंदगी कर रहीं शायराओं में से कुछ ने अपनी शायरी में उन अहसासात और ज़ज़्बात को पिरोना शुरू किया जो शायर की सोच के बाहर थे। इस सिलसिले में लिए जाने वाले नामों में पाकिस्तान की शायरा परवीन शाक़िर का नाम सबसे ऊपर है उन्होंने शायरी में जो मुकाम हासिल किया है उसकी कोई मिसाल नहीं। आज हमारे यहाँ भी गिनती की कुछ शायरा हैं जिनका कलाम उर्दू शायरी के किसी भी मोतबर शायर के कलाम से कम नहीं आँका जा सकता।

कौन चक्कर लगाए दुनिया के
 कम नहीं होते सात फेरे भी

 मेरी साँसों को जोड़ने वाले
 है तुझे हक़ मुझे बिखेरे भी

 इतनी ज़हरीली साज़िशें होंगी
 डस लिए जायेंगे सपेरे भी

 मेरी आँखों में जागने वाले
 टूट सकते हैं ख़्वाब तेरे भी

 हमारी आज की शायरा भी उसी फेहरिश्त में हैं जिनके कलाम ने सामिईन के दिल में जगह बनाई हुई है लोग उन्हें देखने सुनने को हमेशा मुशायरों में मौजूद रहते हैं। बात सन 1977 के एक मुशायरे की है जब मंच से एक नाम पुकारा जाता है और मंच पर बैठी एक पंद्रह साल की कमसिन सी लड़की माइक के सामने आ खड़ी होती है। उसके चलने और माइक के सामने खड़े होने में उसका अपने आप पर बला का भरोसा नज़र आता है। उसकी उम्र को देखते हुए लोग उसे बहुत ज्यादा तवज्जो नहीं देते लेकिन इस बात की परवाह न करते हुए वो अपना गला साफ़ कर तरुन्नम में अपना कलाम पढ़ती है. लोग हैरान हो जाते हैं और उनकी सारी तवज्जो अब उस लड़की के कलाम पर हो जाती है। तालियां हैं कि थमने का नाम नहीं लेती। उस मुशायरे में जिस लड़की ने उर्दू अदब में अपनी शिरकत करने का ऐलान सरे आम कर दिया था उसका नाम है "अंजुम रहबर " जिनकी किताब "मलमल कच्चे रंगों की " मेरे सामने है।


 कहीं रास्ते में उसने मेरा हाथ छू लिया था
 तो कलाइयों के कंगन कई रोज़ खन-खनाये

 तुझे क्या खबर कि मैंने शबे हिज़्र कैसे काटी
 कभी नाविलें पढ़ी हैं कभी गीत गुनगुनाये

 मेरी इक तमन्ना 'अंजुम' कभी हो सकी न पूरी
 कि मैं उससे रूठ जाऊँ मुझे आके वो मनाये

 "अंजुम रहबर" मध्य प्रदेश के गुना जिले में 17 सितम्बर 1962 को पैदा हुईं। पढ़ने में होशियार अंजुम ने उर्दू में एम्. ऐ की डिग्री हासिल की। अंजुम जैसे शायरी के लिए ही पैदा हुई हैं। 1977 से आज तक याने लगभग 40 वर्षों से लगातार उनकी मंच पर मौजूदगी किसी भी मुशायरे की कामयाबी मानी जाती है। कारण जानना बहुत आसान है उन्हें सुन कर ही आपको उनकी सफलता का राज़ पता चल जायेगा। दरअसल अंजुम रहबर के गीतों और ग़ज़लों की भाषा सरल और स्पष्ट है जिसे हिन्दी का आम पाठक श्रोता भी आसानी से समझ सकता है।

मेरी आँखों तुम्हें रोने का सलीका भी नहीं
 रोज दरियाओं में सैलाब नहीं आते हैं

 कुछ तो दुनिया ने यहाँ मौत बिछा रक्खी है
 कुछ हमें जीने के आदाब नहीं आते हैं

 ये भी इक किस्म का संगीन मरज़ है 'अंजुम'
 नींद आती है मगर ख़्वाब नहीं आते हैं

 उनकी सभी रचनायें जीवन और जगत के विभिन्न रस-रंगों, सुख-दुख, दर्द और आनन्द की लहरों में अविरल गतिमान रहती हैं तथा हर आम और हर खास इंसान को उसकी हकीकत से रुबरु कराती हैं। यह जज़्बाती पाकीज़गी के साथ मुहब्बत का अहसास कराती हुई चलती है। इस किताब के बारे में बशीर बद्र लिखते हैं कि " ग़ज़लों की ये किताब शायरी की शानदार कद्रों का बेहतरीन नमूना है, जिसमें बोली जाने वाली सादा और तहदार ज़बान में उनका फन गज़ल की खूबसूरत ज़िन्दा रिवायतों और सच्ची जिद्दतों के मिले-जुले रंगों से वुजूद में आया है। हमारे अहद की शायरात की शायरी की तारीख़ इस किताब के ज़िक्र के बग़ैर नामुक्कमल रहेगी "

 तूफ़ान पर लिखे थे मेरे दोस्तों के नाम 
 कश्ती को साहिलों की तरफ मोड़ना पड़ा 

 मेरी पसंद और थी सबकी पसंद और 
 इतनी ज़रा सी बात पे घर छोड़ना पड़ा 

 'अंजुम' मैं क़ैद जिस्म की दीवार में रही 
 अपने बदन से अपना ही सर फोड़ना पड़ा 

 अंजुम की बढ़ती लोकप्रियता से प्रभावित हो कर उस काल में बहुत सी शायराओं ने उनके जैसी बनने की कोशिश की। आप यूँ समझें कि लता मंगेशकर के काल में न जाने कितनी गायिकाओं ने उनके जैसे गाने की कोशिश की है लेकिन लता लता ही रही। लता के पास सुर तो थे ही सबसे बड़ी बात उनके गाने में जो अदायगी थी जो भावनाएं पिरोयी गयीं थीं वो सुनने वाले को अपनी लगती थीं तभी तो वो लता बनी रहीं। आप सुर में उनकी भले नक़ल कर लें लेकिन गायन में वैसे भाव कैसे लाएंगे , ठीक इसी तरह अगर कोई अंजुम जैसी तरन्नुम से या उस से भी बेहतर तरन्नुम से अपनी रचनाएँ सुनाएँ उसको क्षणिक सफलता तो भले ही मिल जाए लेकिन लगातार सफलता नहीं मिल सकती। अंजुम साहिबा के पास बेहतरीन तरन्नुम तो है ही साथ में वो अलफ़ाज़ और अहसासात हैं जो उनके फ़न में चार चाँद लगा देते हैं।

 तन्हाइयों के दोश पे यादों की डोलियाँ 
 जंगल में जैसे निकली हों हिरणों की टोलियां 
 दोश =कंधे 

 कुर्बान मैं तुम्हारे लबों की मिठास पर 
 अंगूर जैसी लगती हैं कड़वी निबोलियाँ 

 यूँ गुदगुदा रहे हैं मेरे दिल को तेरे हाथ 
 आंगन में जैसे कोई बनाये रंगोलियां 

 सन 1988 में उनकी शादी लाज़वाब शायर जनाब राहत इंदौरी साहब से हुई. उनसे उन्हें एक बेटा "समीर राहत" भी हुआ लेकिन ये शादी अधिक टिकी नहीं और 1993 में दोनों अलग हो गये। अंजुम साहब की ज़िन्दगी अब अपने बेटे और शायरी को समर्पित हो गयी। देश-विदेश से उन्हें शिरकत के लिए पैगाम आने लगे और वो शोहरत की बुलंदियों पर जा बैठीं। देश के प्रसिद्ध कवि स्वर्गीय गोपाल दास 'नीरज' ने उनके बारे में लिखा है कि " अंजुम रहबर की रचनाओं में जहां वैयक्तिक अनुभूतियों की मिठास, कड़वाहट और रोज़मर्रा की ज़िन्दगी का रसपूर्ण मिश्रण है, वहीं आज के सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक विकृतियों और विद्रुपताओं की भी मार्मिक अभिव्यक्ति है। निश्चित ही जो भी पाठक इन रचनाओं में झांकेगा उसे अवश्य ही अपना और अपने समाज का कोई न कोई रुप अवश्य दिखाई देगा।’

 बस्ती के सारे लोग ही आतिश परस्त थे 
 घर जल रहा था और समन्दर करीब था 

 दफ़्ना दिया गया मुझे चांदी की कब्र में 
 मैं जिसको चाहती थी वो लड़का ग़रीब था 

 अंजुम मैं जीत कर भी यही सोचती रही 
 जो हार कर गया है बहुत खुश नसीब था 

 अंजुम रहबर साहिबा ने मुशायरों के अलावा टेलीविजन के अनेक चेनल्स जैसे ABP न्यूज ,सब टी.वी ,सोनी पल , ई टी.वी नेटवर्क ,डी डी उर्दू आदि में अपनी रचनाओं का पाठ किया है. उन्हें 1986 में इंदिरा गाँधी अवार्ड ,राम-रिख मनहर अवार्ड साहित्य भर्ती अवार्ड ,हिंदी साहित्य सम्मेलन अवार्ड ,अखिल भारतीय कविवर विद्यापीठ अवार्ड ,दैनिक भास्कर अवार्ड , चित्रांश फ़िराक़ गोरखपुरी अवार्ड और गुना का गौरव अवार्ड से सम्मानित किया गया है। सब से बड़ा अवार्ड तो मंच से उन्हें सुनते हुए बजने वाली वो तालियाँ हैं जो उनके चाहने वाले बजाते नहीं थकते।

 तेरी पलक पे इक आंसू की तरह ठहरी हूँ 
 मैं कहीं ख़ाक न हो जाऊं बचाले मुझको 

 तेरे चेहरे पे नज़र आती है सूरत मेरी 
 अब तुझे देखते हैं देखने वाले मुझको 

 है मोहब्बत की लड़ाई भी मोहब्बत 'अंजुम'
  जब भी जी चाहे वो आ जाये मना ले मुझको 

 अंजुम साहिबा की शायरी मोहब्बत में डूबी हुई शायरी है उन्हें पढ़ते सुनते हुए वही आनंद आता है जो शहद चखते हुए आता है क्यूंकि उसमें पता नहीं चलता की गुलाब चंपा चमेली गुलमोहर रातकी रानी मोगरे का रस कितना और कहाँ घुला हुआ है। मधुमख्खी की तरह वो अलग अलग ज़ज़्बातों के फूलों का रस अपनी शायरी में बहुत हुनर से घोल देती हैं। मशहूर शायर जनाब मुनव्वर राणा साहब लिखते हैं कि " अंजुम रहबर उम्र के उस हिस्से से निकल आई हैं जहां संजीदगी पर हँसी आती है, बल्कि अब उनकी हँसी में भी एक संजीदगी होती है और संजीदगी को जब ग़ज़ल की शाहराह मिल जाती है तो गज़ल इक बाविकार औरत की सहेली बन जाती है। जज़्बात की पाकीज़ा तरजुमानी, लहजे का ठहराव और अश्कों की रौशनाई से ग़ज़ल के हाथ पीले करने के हुनर ने उन्हें सल्तनत-ए-शायरी की ग़ज़लज़ादी बना दिया है। वो जिस सलीके, एहतराम और यकीन के साथ दिलों पर हुकूमत करती हैं, अगर सियासतदां चाहें तो उनसे हुकूमत करने का हुनर सीख सकते हैं .

दिन रात बरसता हो जो बादल नहीं देखा 
 आँखों की तरह कोई भी पागल नहीं देखा 

 तुमने मेरी आँखों के क़सीदे तो लिखे हैं 
 लेकिन मेरा बहता हुआ काजल नहीं देखा 

 उसने भी कभी नींद से रिश्ता नहीं रखा 
 मैंने भी कोई ख़्वाब मुकम्मल नहीं देखा 

 "मलमल कच्चे रंगों की " का प्रकाशन सबसे पहले सं 1998 में रहबर साहिबा ने खुद ही करवाया था बाद में इसे मंजुल प्रकाशन भोपाल से प्रकाशित किया गया। आप इस किताब को जिसमें अंजुम साहिबा की लगभग 63 ग़ज़लें कुर कुछ गीत भी संकलित किये गए हैं, अमेज़न से तो ऑन लाइन मंगवा ही सकते हैं यदि ऐसा न करना चाहें तो मंजुल पब्लिशिंग हॉउस को 'सेकंड फ्लोर, उषा प्रीत काम्प्लेक्स ,42 मालवीय नगर भोपाल-462003 "के पते पर लिख सकते हैं। मंजुल की साइट www. manjulindia.com से भी इसे मंगवाया जा सकता है। अंजुम साहिबा को इस किताब के लिए आप उनके फेसबुक पेज पर जा कर बधाई दे सकते हैं। मेरे पास उनका मोबाईल नंबर नहीं है वरना जरूर देता। नयी किताब की तलाश पे निकलने से पहले मैं पढ़वाता हूँ आपको उनकी कुछ ग़ज़लों से चुने हुए ये शेर :

 पाजेब तोड़ देने में साज़िश उन्हीं की थी
 जो लोग कह रहे हैं कि झनकार भी गई
 ***
अंजुम तुम्हारा शहर जिधर है उसी तरफ
 इक रेल जा रही थी कि तुम याद आ गए
 ***
वो चाह कर भी किसी का शिकार कर न सका 
 वो एक तीर था लेकिन मेरी कमान में था
 ***
रौशनी आँखें जलाकर कीजिये
 चाँद को कब तक निचोड़ा जाएगा
 ***
छुपती कभी नहीं है मोहब्बत छुपाये से
 चूड़ी हो हाथ में तो खनकती जरूर है
 ***
वादा अगर करें तो भरोसा न कीजिये
 खुलकर नहीं बरसते वो बादल हैं लड़कियाँ
 ***
जो बिखरा था कभी सारे जहाँ में
 वो ग़म अब एक औरत बन गया है
 ***
हर क़दम देखभाल कर रखिये
 हादसे बेज़बान होते हैं
*** 
आँखों में मामता है तो घुँघरू हैं पाँव में 
 रक्कासा है कहीं, कहीं मरियम है ज़िन्दगी  

आपके कीमती वक्त को देखते हुए वैसे तो क़ायदे से तो इन फुटकर शेरों के साथ ही बात ख़तम हो जानी चाहिए थी लेकिन साहब कम्बख्त दिल कब क़ायदे मानता है ? तो क़ायदे को बाक़ायदा तोड़ते हुए मैं आपको अंजुम साहिबा की एक छोटी बहर की ग़ज़ल के ये शेर पढ़वा कर आपसे रुख़सत होता हूँ :

 तेरा फेरा तेरा चक्कर लगेगा 
 न जाने कब मेरा घर, घर लगेगा 

 वो पल भर के लिए आयेगा लेकिन
 संवरने में मुझे दिनभर लगेगा 

 जो है बिक जाने को तैयार 'अंजुम' 
वो कुछ दिन बाद सौदागर लगेगा।

Monday, August 6, 2018

किताबों की दुनिया - 189

रह के दुनिया में है यूँ तर्के-हवस की कोशिश
जिस तरह अपने ही साये से गुरेज़ाँ होना 
 तर्के-हवस=इच्छाओं का त्याग, गुरेज़ाँ =भागना

 ज़िन्दगी क्या है ?अनासिर में ज़हूरे-तरतीब 
 मौत क्या है ? इन्हीं अजज़ा का परीशां होना 
 अनासिर=पंच तत्व , ज़हूरे तरतीब = संगठित होना , अजज़ा =टुकड़ों ,परीशाँ =विघटन 

 दफ़्तरे-हुस्न पे मोहरे-यदे-क़ुदरत समझो 
 फूल का ख़ाक के तूदे से नुमायां होना 
 मोहरे-यदे-क़ुदरत= प्रकृति के हाथ की छाप , तूदे=ढेर 

 दिल असीरी में भी आज़ाद है आज़ादों का 
 वलवलों के लिए मुमकिन नहीं ज़िन्दा होना 
 असीरी=क़ैद , ज़िन्दा=क़ैद

 ज़िन्दगी क्या है ?- जैसा शेर उर्दू के कालजयी शेरों में शुमार होता है इस हिसाब से तो इसके शायर का नाम भी कालजयी होना चाहिए था -लेकिन हुआ नहीं। मीर-ओ-ग़ालिब के चलते ऐसे बहुत से शायरों को जिनका कलाम मयारी और क़ाबिले रश्क था अनजाने में या जानबूझ कर किसी सोची समझी साजिश के तहत भुला दिया गया। शायद इसलिए कि उनकी मादरी ज़बान उर्दू फ़ारसी या अरबी नहीं थी -वजह जो भी रही हो लेकिन इसका खामियाज़ा उर्दू शायरी के अनगिनत चाहने वालों को भुगतना पड़ा - वो ऐसे अनेक शायरों के बेजोड़ कलाम तक नहीं पहुँच पाए जिन्हें उन तक पहुंचना चाहिए था। इतना ही नहीं इनका कलाम सिर्फ उर्दू ज़बान जानने वालों तक ही सीमित रहा। आज के हिंदी पढ़ने लिखने वाले युवाओं ने तो शायद ये नाम सुना भी न हो।

 ज़बाँ को बंद करें या मुझे असीर करें 
मिरे ख़याल को बेड़ी पिन्हा नहीं सकते 
असीर =कैद ,पिन्हा=पहना 

 ये कैसी बज़्म है और कैसे उस के साक़ी हैं 
शराब हाथ में है और पिला नहीं सकते 

 ये बेकसी भी अजब बेकसी है दुनिया में 
कोई सताए हमें, हम सता नहीं सकते 

 आज हम जिस शायर और उसकी उस शायरी की किताब की बात कर रहे हैं जिसे राजपाल एन्ड साँस ने 'लोकप्रिय शायर " श्रृंखला के अंतर्गत प्रकाशित किया था। शायर का नाम है "पंडित ब्रजनारायण चकबस्त " जो एक कश्मीरी ब्राह्मण खानदान के घर 19 जनवरी 1882 को उत्तर प्रदेश के फैज़ाबाद में पैदा हुए -जी हाँ आज से करीब 136 साल पहले। उर्दू फ़ारसी ज़बान घर पर सीखी और अंग्रेजी पढ़ने के लिए स्कूल में दाखिल हुए। प्रारंभिक शिक्षा उन्होंने फैज़ाबाद में ही ली। उनके पिता उस वक्त डिप्टी कलेक्टर थे जो किसी भी भारतीय के लिए सिविल सेवा में उच्चतम पोस्ट हुआ करती थी। उनके पिता उदित नारायण शायरी भी किया करते थे। पिता की असामयिक मृत्यु के बाद उनका परिवार लखनऊ आ बसा। उन्होंने 1905 में कैनिंग कालेज लखनऊ से बी.ऐ किया और वहीँ से वकालत की परीक्षा पास करके 1908 से बाकायदा वकालत करने लगे. चकबस्त बेहद मेहनती ,समझदार और लगन के पक्के थे लिहाज़ा उनकी वकालत चल निकली और उनका नाम लखनऊ के मशहूर वकीलों में शामिल हो गया। पेशे से वकील लेकिन दिल से शायर ब्रजनारायण ने मात्र 9 साल की उम्र में पहली ग़ज़ल कही। इसे कहते हैं पूत के पाँव पालने में दिखाई देना।


 जहाँ में आँख जो खोली फ़ना को भूल गये 
 कुछ इब्तदा ही में हम इन्तहा को भूल गये 
 फ़ना=मौत , इब्तदा = शुरुआत , इन्तहा=अंत 

 निफ़ाक़ गब्रो-मुसलमां का यूँ मिटा आखिर 
 ये बुत को भूल गए वो खुदा को भूल गये 
 निफ़ाक़ = दुश्मनी , गब्रो-मुसलमां= हिन्दू मुसलमान

 ज़मीं लरज़ती है बहते हैं ख़ून के दरिया
 ख़ुदी के जोश में बन्दे खुदा को भूल गये

 चकबस्त साहब ने कभी किसी को उस्ताद नहीं बनाया क्यूंकि होता ये है कि लाख कोशिशों के बावजूद आपकी शायरी में आपके उस्ताद का अक्स नज़र आ ही जाता है। बिना उस्ताद के शायरी करना उर्दू कविता की परम्परा के अनुसार सही नहीं है लेकिन साहब कोई चकबस्त जैसा इन्सान ही ऐसा हौसला कर सकता है। एक तो हिन्दू ऊपर से बिना किसी उस्ताद के सहारे के मयारी अशआर कहना कोई आसान काम नहीं था। उस ज़माने में बिना किसी उस्ताद के सहारे अपनी पहचान बनाना मुश्किल काम रहा होगा। उस्ताद की जगह उन्होंने सीखने के लिए पुराने शायरों जैसे मीर, आतिश, ग़ालिब, अनीस आदि को खूब पढ़ा। जो लोग बिना दूसरों को पढ़े ये सोचते हैं कि वो बेहतरीन शायर बन सकते हैं वो जरूर किसी ग़लतफहमी में हैं.

 कमाले-बुजदिली है पस्त होना अपनी आँखों में 
 अगर थोड़ी सी हिम्मत हो तो फिर क्या हो नहीं सकता 

 उभरने ही नहीं देती यहाँ बेमायगी दिल की 
 नहीं तो कौन कतरा है जो दरिया हो नहीं सकता 
 बेमायगी=निर्धनता 

 चकबस्त साहब ने ग़ज़लें बहुत कम कही हैं यही कुल जमा 50 के करीब लेकिन जो जितनी कही हैं वो बेजोड़ हैं। उन्होंने नज़्में खूब लिखी और बाद में तो उनके लेखन में देश प्रेम सर्वोपरि हो गया। उन्होंने अपनी पूरी काव्य प्रतिभा को देश के लिए लुटा दिया अगर उनकी रचनाओं से राष्ट्रीयता के तत्व को निकाल दें तो बाकि कुछ खास नहीं बचता। देशप्रेम प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उनकी सभी रचनाओं में दिखाई देता है। वो सच्चे देशभक्त तो थे लेकिन उनका विश्वास राजनीतिक क्रांति में नहीं था। बहरहाल उनके विचार चाहे जो कुछ हों उनके देश प्रेम की सच्चाई और गहराई में कोई संदेह नहीं किया जा सकता।

 रहेगी आबो-हवा में ख्याल की बिजली 
 ये मुश्ते-ख़ाक है फानी रहे रहे न रहे 

 जो दिल में ज़ख्म लगे हैं वो खुद पुकारेंगे 
 ज़बाँ की सैफ-बयानी रहे रहे न रहे 
 सैफ-बयानी= तेजी 

 जो मांगना हो अभी मांग लो वतन के लिए 
 ये आरज़ू की जवानी रहे रहे न रहे 

 चकबस्त साहब ने अपनी ग़ज़लों को अद्भुत रंगों में ढाला है. 'आतिश' की चुस्त बंदिश के साथ उन्होंने 'ग़ालिब' की दार्शनिकता का पुट देकर अपनी ग़ज़लों के लिए में नयी राह बनायीं। ग़ज़ल में उनसे पहले के शायरों द्वारा कहे जाने वाले वैयक्तिक प्रेम के विषय से अलग ही विषयों का प्रयोग किया। उनकी ग़ज़लों में नरमी ,करुणा , व्यापकता और गागर में सागर भरने की अनूठी क्षमता पूरी तरह से कायम है। इसीलिए उन्हें पढ़ने से दिमाग पर किसी तरह का बोझ नहीं पड़ता और आंनद की अनुभूति भी हो जाती है।

 ये हयात आलमे-ख़्वाब है , न गुनाह है न सवाब है
 वही कुफ्रो-दीं में ख़राब है जिसे इल्मे-राजे-जहां नहीं 
 कुफ्रो-दीं =इस्लाम के अलावा , इल्मे-राजे-जहां=संसार के रहस्य 

 वो है सब जगह जो करो नज़र , वो कहीं नहीं जो है बे-बसर
 मुझे आजतक न हुई खबर वो कहाँ है और कहाँ नहीं 
 बे-बसर=न देखने वाला 

 वो ज़मीं पे जिनका था दबदबा कि बुलंद अर्श पे नाम था 
 उन्हें यूँ फ़लक ने मिटा दिया कि मज़ार तक का निशां नहीं 

 20 वीं सदी में उस वक्त जब भाषा को मजहब में बांटा जा रहा था चकबस्त साहब ने रामायण को अपने अनूठे ढंग से उर्दू में काव्य की सूरत में लिखा। उनकी लिखी रामायण के तीन हिस्से उर्दू साहित्य में बहुत ऊंचा स्थान रखते हैं। पाठक इसे इंटरनेट की वेब पत्रिका 'कविता कोष' में पढ़ सकते हैं। चकबस्त बहुत संवेदन शील शायर थे उन्होंने समाज और इंसान के बिगड़ते-संवरते विषयों पर उर्दू के अनेक पत्र पत्रिकाओं में कई लेख लिखे जो बहुत सराहे गए।उनकी विभिन्न काव्य विधाओं का संकलन लगभग 15 वर्ष पूर्व "सुबह वतन " शीर्षक से उनकी पोती उमा चकबस्त ने प्रकाशित करवाया। चकबस्त साहब लखनऊ के कश्मीरी मोहल्ले में , जहाँ वो रहते थे , हर साल नियम से ऑल इण्डिया मुशायरे का आयोजन करवाया करते थे ,जिसमें शिरकत करना हर बड़े शायर का सपना हुआ करता था। अपने बारे में कहे उनके इन अशआरों को पढ़ कर चकबस्त साहब की सोच का अंदाज़ा हो जाता है :

 जिस जा हो ख़ुशी, है वो मेरी मंज़िले-राहत
 जिस घर में हो मातम वो अज़ाख़ाना है मेरा
 जा =तरफ , अज़ाख़ाना =रोने की जगह

 जिस गोशाए-दुनिया में परस्तिश हो वफ़ा की 
 काबा है वही और वही बुतखाना है मेरा 
 परस्तिश=पूजा 

 मैं दोस्त भी अपना हूँ उदू भी हूँ मैं अपना 
 अपना है कोई और न बेगाना है मेरा 
 उदू =दुश्मन 

 ‘खाक-ए-हिन्द’, ‘गुलजार-ए-नसीम’, ‘रामायण का एक सीन’ (मुसद्दस), ‘नाल-ए-दर्द’, नाल-ए-यास’ और कमला (नाटक) ‘चकबस्त’ की प्रमुख रचनाएं हैं। 1983 में जन्मशती के अवसर पर उनका समग्र साहित्य ‘कुल्लियाते चकबस्त’ नाम से कालिदास गुप्ता ‘रजा’ के संपादन में प्रकाशित हुआ। लेकिन अब फैजाबाद स्थित उनकी जन्मस्थली में उनकी स्मृतियों और साहित्य के संरक्षण का सिर्फ एक ही उपक्रम है – वह लाइब्रेरी जिस पर मीर बबरअली अनीस के साथ पंडित बृजनारायण ‘चकबस्त’ का नाम भी चस्पां है और जिसे अवध की सांप्रदायिक एकता की अनूठी मिसाल माना जाता है।

 है शौक़ की मंज़िल यही दुनिया के सफर में 
 क्या ख़ाक जवानी है जो सौदा नहीं सर में 
 सौदा =उन्माद

 दुनिया मेरे नाले से खिंच आती है क़फ़स तक 
 मेला सा लगा रहता है सय्याद के घर में 

 रहती हैं उमंगें कहीं ज़ंज़ीर की पाबंद 
 हम कैद हैं ज़िंदा में बियाबां है नज़र में 
 ज़िंदा =कैदखाना 

 पंडित बृजनारायण ‘चकबस्त’। अल्लामा इकबाल के बेहद गहरे दोस्त। दोनों की दोस्ती कितनी गहरी थी इसका अंदाजा इस बात से होता है कि इकबाल मुंबई में मलाबार हिल्स पर रहने वाली अपनी प्रेमिका अतिया फैजी (राजा धनराजगीर के सेक्रटरी अंकल फैजी की बहन) से मिलने जाते तो भी चकबस्त को साथ ले जाते।धनराजमहल में शाम की महफिलें जमतीं तो ‘चकबस्त’ झूम-झूम कर कलाम सुनाते। बाद में उन्हें उर्दू के आधुनिक कविता स्कूल के संस्थापकों में से एक माना जाने लगा और उन्होंने आलोचना, संपादन व शोध के क्षेत्रों में भी भरपूर शोहरत पाई।

 उसे यह फ़िक्र है हरदम नया तर्ज़े-ज़फ़ा क्या है
 हमें ये शौक है देखें सितम की इंतिहा क्या है 
 तर्ज़े जफ़ा =अत्याचार /जुल्म 

 गुनहगारों में शामिल हैं गुनाहों से नहीं वाकिफ़
 सजा को जानते हैं हम ,खुदा जाने खता क्या है 

 नया बिस्मिल हूँ मैं , वाकिफ नहीं रस्मे-शहादत से 
 बता दे तू ही , ऐ ज़ालिम ! तड़पने की अदा क्या है 
बिस्मिल =घायल , रस्मे-शहादत = शहीद होने की रस्म 

 लखनऊ में ही वे प्रसिद्ध उर्दू निबंधकार अब्दुल हलीम ‘शरर’ से एक बहुचर्चित साहित्यिक विवाद में उलझे। दरअसल, उन्होंने 1905 में ‘गुलजार-ए-नसीम’ नाम से शायर दयाशंकर कौल ‘नसीम’ (1811-1843) की रचनाओं का संग्रह प्रकाशित किया तो शरर ने यह कहकर उनकी तीखी आलोचना की कि उन्होंने झूठ-मूठ ही नसीम की प्रशंसा के पुल बांधे हैं और उनको ‘गुल-ए-बकावली’ का रचयिता बता दिया है। शरर के अनुसार ‘गुल-ए-बकावली’ वास्तव में आतिश लखनवी की रचना थी। बाद में यह मामला अदालत तक गया, जिसमें चकबस्त ने अपना सफल बचाव किया .

दिल ही की बदौलत रंज भी है दिल ही की बदौलत राहत भी
 यह दुनिया जिसको कहते हैं दोज़ख भी है और जन्नत भी

 अरमान भरे दिल खाक हुए और मौत के तालिब जीते हैं
 अंधेर पे इस दुनिया के हमें आती है हंसी और रिक़्क़त भी
 तालिब =इच्छुक , रिक़्क़त =रोना

 या ख़ौफ़े-खुदा या ख़ौफ़े-सकर हैं दो ही बयां तेरे वाइज़
 अल्लाह के बन्दे ! दिल में तेरे है सोज़ो-गुदाज़े-मुहब्बत भी
 ख़ौफ़े-खुदा =ईश्वर का डर ,ख़ौफ़े-सकर =नर्क का डर , वाइज़ =धर्मोपदेशक, सोज़ो-गुदाज़े-मुहब्बत =प्रेम की नरमी

 उन्होंने 12 फ़रवरी 1926 के तीसरे पहर रायबरेली में एक मुक़दमे की पैरवी की और शाम 6 बजे की ट्रेन से लखनऊ आने के लिए उसमें बैठे ही थे कि अचानक उनपर दिमागी फालिज का तेज दौरा पड़ा और उनकी ज़बान बंद हो गयी। साथियों ने उन्हें प्लेटफॉर्म पर उतारा यथासंभव उपचार की व्यवस्था की गयी लेकिन सफलता नहीं मिली। डाक्टर द्वारा स्टेशन पर ही दो घंटों की भरसक कोशिशों के बावजूद मात्र 44 की उम्र में उर्दू शायरी का ये चमकता हुआ सितारा अंग्रेजी की एक कहावत कि "जिन्हें भगवान् प्यार करता है वे नौजवानी में मर जाते हैं " को चरितार्थ करते हुए अचानक बुझ गया। उम्र दराज़ लोग मेरी बात को अन्यथा न लें मैंने तो एक कहावत का जिक्र किया है। लखनऊ में नहीं बल्कि पूरे उर्दू जगत में इस खबर से शोक छा गया .

अगर दर्द-ए-मोहब्बत से न इंसाँ आश्ना होता
 न कुछ मरने का ग़म होता न जीने का मज़ा होता 

 बहार-ए-गुल में दीवानों का सहरा में परा होता 
जिधर उठती नज़र कोसों तलक जंगल हरा होता

 मय-ए-गुल-रंग लुटती यूँ दर-ए-मय-ख़ाना वा होता
 न पीने की कमी होती न साक़ी से गिला होता 

हज़ारों जान देते हैं बुतों की बेवफ़ाई पर 
अगर उन में से कोई बा-वफ़ा होता तो क्या होता 

 रुलाया अहल-ए-महफ़िल को निगाह-ए-यास ने मेरी 
क़यामत थी जो इक क़तरा इन आँखों से जुदा होता 

 चकबस्त साहब की कोई किताब देवनागरी में उपलब्ध है या नहीं मैं नहीं बता सकता क्यूंकि जिस किताब की चर्चा मैं कर रहा हूँ वो अब राजपाल एन्ड संस पर उपलब्ध नहीं है। उनकी ग़ज़लें आप रेख़्ता या कविता कोष की वेब साइट पर पढ़ सकते हैं या फिर गूगल से पूछें शायद वो कोई मदद कर पाए मुझे तो उसने अंगूठा दिखा दिया है। आईये पढ़ते हैं चकबस्त के कुछ चुनिंदा शेर और निकलते हैं किसी नयी किताब की तलाश में :

 उलझ पड़ूँ किसी के दामन से वह खार नहीं,
 वह फूल हूँ जो किसी के गले का हार नहीं।
 ***
 कौम का गम लेकर दिल का यह आलम हुआ,
 याद भी आती नहीं, अपनी परीशानी मुझे।
 ***
 जिन्दगी और जिन्दगी की यादगार,
पर्दा और पर्दे के पीछे कुछ परछाइयाँ।
***
बादे-फना फिजूल है, नामों-निशां की फिक्र,
जब हम नहीं रहे तो रहेगा मजार क्या। .
बादे-फना - मृत्यु के बाद
***
मुहब्बत है मुझे बुलबुल के गमअंगेज नालों से,
चमन में रह के मैं फूलों का शैदा हो नहीं सकता।
 गमअंगेज - गम बढ़ाने वाला, नाला - फरियाद, शैदा - आशिक
 ***
 हमारे और ज़ाहिदों के मज़हब में फ़र्क अगर है तो इस क़दर है  
कहेंगे हम जिसको पासे-इंसां वो उसको खौफ़े-ख़ुदा कहेंगे 
  ***
आशना हों कान क्या इंसान की फ़रियाद से
 शेख़ को फ़ुरसत नहीं मिलती खुदा की याद से

Monday, July 30, 2018

किताबों की दुनिया -188

कफ़स भी हैं हमारे और ज़ंजीरें भी अपनी हैं 
 युगों से क़ैद हम अपनी ही दीवारों में बैठे हैं 
 ***
 मुश्किलें ही मुश्किलें हैं रात-दिन इसको 
 काट कर इस जिस्म से सर को कहीं रख दे
 *** 
जानती थी कि तेरे बाद उजड़ जाऊँगी 
 मैंने फिर भी तिरा हर रंग छुड़ा कर देखा 
 *** 
इल्ज़ाम सिर्फ तेज़ हवा पर ही क्यों रहे
 सूरज की रौशनी भी दिये का अज़ाब है
 *** 
सूरत नहीं दिखी तिरि करवे के चाँद में 
 जाने मुझे क्यों चाँद में बस चाँद ही दिखा 
 *** 
फिर कोई अब्र आ न जाए इधर 
बाम पर जख़्म कुछ सुखाये हैं 
 *** 
फिर बदन उसको दे दिया वापिस
 रूह जब से निखार ली हमने 
 *** 
फिर लगा तेरी छुअन में अजनबीपन सा
 तुझमें कोई और भी रहने लगा है क्या 

 आप ईश्वर या कोई भी अदृश्य शक्ति जो हमें चला रही है को मानें न मानें ये आप पर है। इस बात पर कोई बहस नहीं लेकिन आप एक बात तो जरूर मानेंगे कि इस शक्ति ने अपने द्वारा सृजित इंसानों में हुनर की एक नदी को प्रवाहित किया है। ये नदी सतत बहती रहती है। कुछ लोग इसे सतह पर ले आते हैं और ये सबको दिखाई देने लगती है लेकिन कुछ ऐसा नहीं कर पाते। ख़ास तौर पर आधी दुनिया की नुमाईंदगी करने वाली महिलाओं के लिए अपने में छिपे हुनर की नदी को सतह पर लाना इतना आसान नहीं होता। समाज और घर की जिम्मेदारियां एक बाँध की तरह इस नदी के प्रवाह को रोक लेते हैं। कुछ में हुनर की ये नदी समय के साथ सूख जाती है और कुछ में इसके लगातार प्रवाहित होते रहने से बाँध का जलस्तर बढ़ने लगता है ,साथ ही बढ़ता है बाँध पर दबाव। कुछ बाँध इस दबाव से टूट जाते हैं , कुछ रिसने लगते हैं और कुछ के ऊपर से नदी बहने लगती है।

 उम्र भर का साथ है कुछ फासले रख दरमियाँ 
 दूरीयां कर देंगी यूँ दिन-रात की नज़दीकियां 

 मर्द की बातों में आकर, चाहतों के नाम पर 
 औरतोँ ने फूंक डाले औरतों के आशियाँ 

 आँख में चुभने लगी है अपने घर की चांदनी 
 जुगनुओं की चाह में हो ? क्या हो बदकिस्मत मियाँ !! 

 ये जो शेर आपने ऊपर पढ़े हैं, यकीन मानिये कोई औरत ही लिख सकती है. पुरुष की सोच यहाँ तक पहुँच ही नहीं सकती। हमारी आज की शायरा हैं "निर्मल आर्या ' जिनकी ग़ज़लों की अद्भुत किताब "कौन हो तुम " की बात हम करेंगे। निर्मल जी ने विपरीत परिस्थितियों में भी अपने हुनर की सरिता को सूखने नहीं दिया। निर्मल जी को ये तो इल्म था कि कुछ है जो उनके मन के अंदर ही अंदर घुमड़ता है लेकिन उसे व्यक्त करने की विधा का उन्हें जरा सा भी भान नहीं था। बाँध की मज़बूत दीवारों से उनके हुनर की नदी टकराती और लौट जाती। आखिर वो दिन आया जब बाँध में हलकी सी दरार पड़ गयी। पानी का रिसाव पहले बूँद बूँद हुआ फिर एक पतली सी धार बनी और फिर हुनर झरने के पानी सा झर झर झरने लगा। हर विपरीत परिस्थिति इस दरार को चौड़ा करने लगी। लबालब भरे बाँध में आयी इस दरार को भरना अब नामुमकिन था।


 यूँ हसरतों ने आजमाए मुझपे जम के हाथ 
 फिर पूछिए न मुझसे भी क्या क्या खता हुई

 बेचैनियाँ बहुत थीं बरसने से पेश्तर 
 बरसी जो खुल के जिस्म से हलकी घटा हुई 

 शब् भी विसाल की थी मुहब्बत भी थी जवां
 मुझसे मगर न फिर भी कोई इल्तिजा हुई

 उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के छोटे से गाँव दोघाट में जन्मीं निर्मल एक चुलबुली मस्त मौला लड़की थी। उम्र के उस हसीन दौर में जब गुलाबी सपनों की आमद शुरू होती है याने 16 वें साल में जब वो बाहरवीं कक्षा में पढ़ ही रही थीं, निर्मल जी शादी के बंधन में बंध गयीं। अपना घर छूट गया, स्कूल छूट गया और वो संगी साथी छूट गए जिनके साथ वक्त पंख लगा के उड़ा करता था। शादी हुई तो धीरे धीरे घर परिवार सामाजिक जिम्मेदारियों का बोझ भी बढ़ने लगा। पति और परिवार के स्नेह ने उन्हें हिम्मत दी और वो जी जान से अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने लगीं। बाँध जरूर बंध गया था लेकिन अंदर चलने वाली नदी सूखी नहीं थी लिहाज़ा वक्त के साथ बांध का जलस्तर तो बढ़ा ही और उसके साथ ही बहने का रास्ता न मिल पाने के कारण मन में बेचैनी भी बढ़ने लगी।

 ये रात होते ही चमकेंगे चांदनी बनकर 
 जो साये धूप के दिनभर शजर में रहते हैं 

 हमें सुकून कि ज्यादा किसी से रब्त नहीं 
 उन्हें गुरूर कि वो हर नज़र में रहते हैं 

 कभी भी दिल से कहीं गलतियां नहीं होतीं 
 खराबियों के जो कीड़े हैं सर में रहते हैं 

 बेचैनियां अभिव्यक्ति का माध्यम ढूंढने के लिए छटपटाने लगीं। कभी वो कहानियों का सहारा लेतीं तो कभी कविताओं का। और तो और खुद को व्यक्त करने के लिए उन्होंने फैशन डिजाइनिंग से लेकर घर भी डिजाइन किये।खूब वाह वाही बटोरी। नाम भी मिला प्रशंशकों की तादाद में बेशुमार इज़ाफ़ा भी हुआ लेकिन मन की बेचैनी का मुकम्मल इलाज़ वो नहीं ढूंढ पायीं। 8 मई 2014 की गर्म दुपहरी थी जब उन्होंने अनमनी सी अवस्था में एक कहानी लिखने की सोची ,थोड़ा बहुत लिखा फिर फाड़ के फेंक दिया। अचानक एक कविता की कुछ पंक्तियाँ उनके दिमाग में बिजली सी कौंधी उन्होंने उसे फ़ौरन कागज़ पर उतारा और घर वालों को सुनाया ,घर वालों ने सुन कर तालियां बजाईं। हिम्मत बंधी तो उसे फेसबुक पे डाल दिया। जैसा कि फेसबुक पर अक्सर होता है, प्रशंशा करने वालों का ताँता लग गया। फिर तो ये सिलसिला चल निकला। एक दिन उनकी किसी पोस्ट पर किन्हीं सुभाष मालिक जी का कमेंट आया जिसमें कहा गया था कि निर्मल जी आप बहुत खूब लिखती हैं लेकिन अगर इसे बहर में लिखें तो आनंद आ जाय।

 वो मुझको भूल गया इक तो ये गिला ,उस पर 
मुझे पुकारा गया नाम भी नया ले कर 

 पहन ले या तो चरागों की रौशनी या फिर 
 वजूद अपना तपा धूप की क़बा लेकर 

 मुझे तो रात की अलसाई सुब्ह प्यारी है 
 ये कौन रोज़ चला आता है सबा लेकर 

 बहर ? चौंक कर निर्मल जी ने सोचा। ये किस चिड़िया का नाम है ? सुभाष जी से संपर्क साधा गया तो उन्होंने फेसबुक पर चलने वाले ग्रुप " कविता लोक " का पता दिया जहाँ ग़ज़ल लेखन सिखाया जाता था । कविता लोक ने निर्मल जी का वो काम किया जो "खुल जा सिम सिम " ने अलीबाबा का किया था। ख़ज़ाने की गुफ़ा का दरवाज़ा खुल गया। फिर तो सिर्फ़ बहर ही क्यों ग़ज़ल की बारीकियां भी निर्मल जी समझने लगीं रफ़्ता रफ़्ता ग़ज़ल कहने भी लगीं। एक नये सफर की शुरुआत हो चुकी थी। जैसे जैसे वो आगे बढ़ती गयीं वैसे वैसे उनका मार्ग दर्शन करने लोग आगे आने लगे सुभाष जी से शुरू हुआ ये सिलसिला विजय शंकर मिश्रा जी -जो उनके सबसे बड़े आलोचक रहे और जिन्होंने उनकी हर इक ग़ज़ल में गलती निकाल कर उसे दोष मुक्त किया - से होता हुआ सईद जिया साहब तक और फिर आखिर में उर्दू अदब के जीते-जागते स्तम्भ और अदबी मर्कज़ पानीपत के आर्गेनाइज़र जनाब डा. कुमार पानीपती जी पर समाप्त हुआ।

 खिड़की पर ही हमने रख दी हैं आँखें 
 क्या जाने कब चाँद इधर से गुज़रेगा 

 ऐसे छू ,बस रूह मुअत्तर हो जाए 
 मिटटी का ये जिस्म कहाँ तक महकेगा

 आखिर कब तक थामे रक्खेगी 'निर्मल' 
दिल तो दिल है ,ज़िंदा है तो मचलेगा 

 डा. कुमार ने निर्मल जी हुई एक मुलाकात को बहुत दिलचस्प ढंग से में बयां किया है संक्षेप में बताऊँ तो वो लिखते हैं कि " एक दिन निर्मल अपने पति के साथ सुबह सुबह कुमार साहब के घर जा पहुंची और उन्हें कागजों का एक पुलंदा थमाते हुए बोलीं कि सर मेरी ये कुछ ग़ज़लें हैं आप इन्हें देख लीजिये मुझे दस पंद्रह दिनों में एक पब्लिशर को इन्हें देना है। कुमार साहब इतनी ग़ज़लें देख कर बोले कि इन्हें दस पंद्रह दिनों में देख कर देना संभव नहीं है। निर्मल निराश क़दमों से लौटने लगी तो उनका दिल पसीज गया। उन्होंने कहा कि चलो इन्हें रख दो मैं कोशिश करूँगा। निर्मल ख़ुशी ख़ुशी लौट गयी। डाक्टर साहब ने तीन दिनों में लगातार बैठ कर करीब पचास ग़ज़लें देख डालीं और निर्मल को कहा कि ये पचास ग़ज़लें तो अभी जाओ बाकि की बाद में दूंगा। निर्मल आयी उसके पाँव ख़ुशी के मारे ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे। कुमार साहब के पाँव छुए उनका आशीर्वाद लिया और चली गयी। डाक्टर साहब ने निर्मल को वो सब कुछ दिया जो एक पिता अपनी बेटी को और उस्ताद अपने शागिर्द को दे सकता है।

 दिल के पहले पन्ने पर तुम ही तुम हो 
 क्या तुम मेरे सारे पन्ने भर दोगे 

 ऐसा लगता है मैं छूट गयी हूँ कहीं 
 तुमको मिल जाऊं तो वापिस कर दोगे 

 मैं घर की इज़्ज़त हूँ ज़ीनत हूँ ज़र हूँ 
 क्या तुम मुझको इल्मो-अदब का घर दोगे 

 निर्मल जी बहुत कम बोलती हैं ,और अपने बारे में तो बिल्कुल भी नहीं। ऊपर से कठोर लेकिन भीतर से बेहद नाज़ुक़ मिज़ाज़ की निर्मल जी ने ये रूप जान बूझ कर धरा है वो कहती हैं कि आज के ज़माने को देखते हुए ये बहुत जरूरी है। ये कठोरता एक रक्षा कवच है जो समाज में पाए जाने वाले मौका परस्तों को उनसे दूर रखता है। खुद्दार और जुझारू प्रवति की निर्मल ने 43 वर्ष की उम्र में एक्टिवा चलाना सीखा और फिर कार। उनसे वो महिलाएं प्रेरणा ले सकती हैं जो बढ़ती उम्र की आड़ ले कर अपनी कमज़ोरियाँ छुपाती हैं और अपने ख़्वाबों की पोटली बना कर घर के बाहर रखे सरकारी कूड़े दान में फेंक देती हैं।अगर आप में अपने सपनो को साकार करने की शिद्दत से चाह है तो फिर दुनिया की कोई ताकत आपकी राह नहीं रोक सकती। स्वभाव से हँसमुख और मस्त रहने वाली निर्मल जी ने जीवन में आयी अनेक कड़वाहटों का दौर सफलता पूर्वक झेला है और विजयी बन के निकली हैं।

 तू जरूरी है मुझे ज़ीस्त बनाने के लिए
 ज़ीस्त लग जाएगी तुझको ये बताने के लिए 

 सुनते हैं हिज़्र बिना इश्क मुकम्मल ही नहीं 
 दूर हो जाओ ज़रा इश्क निभाने के लिए 

 मसअला बात के जरिये भी सुलझ जाता, पर 
 खार ही काम आया खार हटाने के लिए 

 निर्मल जी किसी मुशायरे में नहीं जातीं, किसी पत्रिका या अखबार में अपनी ग़ज़लें नहीं भेजती क्यूंकि वो अंतर्मुखी हैं उनका आत्म प्रचार में विश्वास नहीं। उनके शुभचिंतक ही उनकी रचनाएँ इधर उधर भेजते रहते हैं। आज की दुनिया में नाम कमाने के लिए आपको खुद को बेचने का हुनर आना चाहिए, अपने फायदे के लिए दूसरों का इस्तेमाल करना भी आना चाहिए। संस्कार और अध्यात्म में गहरी रूचि के चलते वो चाह कर भी ऐसा नहीं कर पातीं जो है जैसा है उसमें ही बहुत खुश रहने में उनका गहरा विश्वास है। निर्मल जी की ज़िन्दगी में जो भी घटनाएं हुई हैं वो अचानक ही हुई हैं ,शायरी भी अचानक ही उनके जीवन में उतरी। शायरी को एक बोझिल और समय की बर्बादी समझने वाली निर्मल ने आज शायरी के माध्यम से अपनी पहचान बनाई है।

 जरा सी धूप के आसार कर दो 
 तुम्हारी याद पे काई जमी है 

 अकेला है वो मुझसे दूर रह कर 
 मुझे इस बात की बेहद ख़ुशी है 

 मिरी इक राय है मानों अगर तुम 
 जिसे देखा नहीं वो ही सही है 

 ऐनी बुक के पराग अग्रवाल की मैं इसलिए तारीफ करता हूँ कि उन्हें नए अनजान शायरों की किताबें छापने से गुरेज़ नहीं होता। बेहद दिलकश आवरण में लिपटी ये किताब जिसमें निर्मल जी की 100 से अधिक ग़ज़लें संगृहीत हैं ,दूर से ही पाठकों को अपनी और आकर्षित करती है। इस किताब को पाने के लिए आप पराग जी से 9971698930 पर संपर्क करें।ये किताब अमेजन पर भी ऑन लाइन उपलब्ध है। इस किताब को निर्मल जी ने अपने पिता स्वर्गीय चौधरी रामचन्दर सिंह जी को, जो प्रसिद्ध स्वतंत्रता सैनानी और समाजसेवी भी थे ,समर्पित किया है। आप इसे ध्यान से पढ़ें और निर्मल जी को इन लाजवाब ग़ज़लों के लिए 9416931642 पर फोन कर बधाई भी दें। और अब आखिर में पढ़िए निर्मल जी उस ग़ज़ल के चंद शेर जिसे उनसे हमेशा फरमाइश करके बार बार सुना जाता है और जिसने डा. कुमार जैसे ग़ज़ल पारखी को भी हैरान हो कर दाद देने पर मज़बूर कर दिया था :

 बूँद का रक्स आग पर देखो 
 जान जाओगे इश्क क्या शय है 

 कह रहे हैं ख़ुदा के क़ातिल भी 
 ज़र्रे-ज़र्रे में अब भी है ! है ! है ! 

 हाथ में किसके है कोई लम्हा 
 वक़्त हर शय का आज भी तय है

Monday, July 23, 2018

किताबों की दुनिया -187

बाज़ारों में फ़िरते फ़िरते दिन भर बीत गया
 काश हमारा भी घर होता, घर जाते हम भी
 ***
तुम इक मर्तबा क्या दिखाई दिए
 मिरा काम ही देखना हो गया
 ***
सड़क पे सोए हुए आदमी को सोने दो
 वो ख्वाब में तो पहुँच जायेगा बसेरे तक
 ***
 बसर की इस तरह दुनिया में गोया
 गुज़ारी जेल में चक्की चला के
 ***
मैंने ये सोच के रोका नहीं जाने से उसे
 बाद में भी यही होगा तो अभी में क्या है
 ***
और आलूदा मत करो दामन
 आंसुओं रूह में उतर जाओ
 आलूदा =प्रदूषित
 ***
 किया करते थे बातें ज़िन्दगी भर साथ देने की
 मगर ये हौसला हम में जुदा होने से पहले था
 ***
सिर्फ उस के होंठ कागज़ पर बना देता हूँ मैं
 ख़ुद बना लेती हैं होंठो पर हंसी अपनी जगह
 ***
गुज़ारे हैं हज़ारों साल हमने
 इसी दो चार दिन की ज़िन्दगी में
 ***
था वादा शाम का मगर आये वो देर रात
 मैं भी किवाड़ खोलने फ़ौरन नहीं गया
 ***
लोग सदमों से मर नहीं जाते
 सामने की मिसाल है मेरी
***
अच्छा खासा बैठे बैठे गुम हो जाता हूँ 
 अब मैं अक्सर मैं नहीं रहता तुम हो जाता हूँ

 मेरी तो ये बात समझ में आती नहीं , आप ही बताइये कि शराब और शायर के बीच क्या नाता है ?हमने ग़ालिब से लेकर फ़िराक़ ,जिगर ,मज़ाज़ जॉन एलिया आदि बहुत से ऐसे शायरों के बारे में पढ़ा है कि वो शराब के घनघोर प्रेमी थे ,उसी में डूबे रहते थे वगैरह !! शायर और शराब के रिश्ते को बहुत बढ़ा चढ़ा कर लिखा गया है जबकि शराब पीने का चलन आदि काल से चलता आ रहा है। हर तबके और वर्ग के लोग इस की गिरफ्त में रहे, रहते हैं और रहते रहेंगे। दरअसल जिसका नाम होता है वो ही बदनाम भी जल्दी होता है वर्ना आम आदमी अगर शराब में गर्क हुआ पड़ा है तो कौन उसकी परवाह करता है ? शराब दअसल इंसान को उस आभासी दुनिया में ले जाती है जिसकी वो कल्पना करता है -चाहे थोड़ी देर को ही सही। इसके नशे में गिरफ्त इंसान को अपने आप पास फूल खिलते नज़र आते हैं जिन पर रंगीन तितलियाँ रक़्स करती है, खुशबू भरी ठंडी हवाएं चलती हैं दूर बर्फ से ढके पहाड़ नज़र आते हैं ,झरने गीत गाते दिखाई देते हैं परिंदों का समूहगान सुनाई देता है हर इंसान खूबसूरत और खुश दिखाई देता है -इस दुनिया को देख कर शराबी सोचता है कि अगर फिरदौस-ऐ -ज़मीनस्तों , हमीनस्तों हमीनस्त चाहे हकीकत में वो किसी नाली में ही क्यों न गिरा हो।

 कार-ऐ-दुनिया में उलझने से हमें क्या मिलता 
 हम तिरी याद में बेकार बहुत अच्छे हैं 
 कार-ऐ-दुनिया =दुनिया के काम

 सिर्फ नाकारा हैं आवारा नहीं हैं हर्गिज़ 
 तेरी ज़ुल्फ़ों के गिरफ़्तार बहुत अच्छे हैं 

 हद से गुज़रेगा अँधेरा तो सवेरा होगा 
 हाल अब्तर सही आसार बहुत अच्छे हैं 
 अब्तर =ख़राब 

 इस से पहले कि मेरे अज़ीज़ और बेहतरीन शायर जनाब के पी अनमोल साहब हँसते हुए कहें कि नीरज भाई आप भूमिका में क्यों बोर कर रहे हो तो मैं माज़रत के साथ अर्ज़ कर दूँ कि हमारे आज के शायर का शराब के साथ गहरा तअल्लुक है। दोनों शायद एक दूसरे के बिना नहीं रह सकते। बार बार छोड़ देने के बावजूद इस अंगूर की बेटी का हुस्न उन्हें अपने पास खींच लेता है।इसके चलते मैंने सोचा कि चलो शराब से ही बात शुरू की जाय। हमारे आज के शायर हैं जनाब अनवर हुसैन जो शायरी की दुनिया में अनवर शुऊर के नाम से जाने जाते हैं। अनवर साहब भारत के मध्यप्रदेश राज्य के फर्रुखाबाद जिले के एक छोटे से गाँव सियोनी में अशफ़ाक़ हुसैन साहब के यहाँ 11 अप्रेल 1943 को पैदा हुए। प्रारंभिक शिक्षा वहीँ से ली।देश के विभाजन के बाद उनका परिवार कराची चला गया। वो जब पांचवी जमात में पढ़ते थे तभी उनकी माँ का देहांत हो गया ,पिता के अत्याचारों से तंग आ कर वो स्कूल और घर से भाग गए। पढाई से तौबा करली। आप ये न समझे कि वो पढ़े लिखे नहीं हैं , ये जरूर है की स्कूल से तालीम उन्होंने भले ही हासिल न की हो लेकिन दुनिया से मिली ठोकरों और घुमक्कड़ी से उन्होंने बहुत सीखा और फिर उसके बाद अपने दिलचस्पी के विषयों पर खूब पढ़ा। आज हम उनकी किताब "अब मैं अक्सर मैं नहीं रहता " की बात करेंगे।


 पहले सूली पे चढ़ाते हैं मसीहाओं को 
 बाद में सोग मनाते हैं मनाने वाले 

 मेरी बातों के मआ'नी भी समझते ऐ काश
 मेरी आवाज़ से आवाज़ मिलाने वाले 

 नाम देते हैं मुझे आज खराबाती का 
 इस खराबे की तरफ खींच के लाने वाले 
 खराबाती-शराबी, खराबे - वीराना 

 अनवर मानते हैं कि तालीम हासिल करना बहुत जरुरी चीज है और इस बात का अफ़सोस उन्हें आज तक भी है लेकिन अब जो हो गया सो गया। ज़िन्दगी में भटकते भटकते आखिर उन्होंने उर्दू के सबसे ज्यादा छपने वाले पर्चे "सबरंग डाइजेस्ट " में मुलाज़मत की। उसी दौरान उनकी दोस्ती जॉन एलिया से हो गयी। जॉन साहब अपनी एक किताब का पेश लफ्ज़ या दीबाचा या प्रस्तावना लिखवाने सबरंग डाइजेस्ट के दफ्तर आते जहाँ वो बोलते और अनवर साहब उसे लिखते। उर्दू नस्र का एक बेहतरीन नमूना यूँ लिखा गया था। जॉन से उनकी दोस्ती और कुछ उनकी अपनी तबियत ने अनवर को शायर बना दिया। उनकी शायरी में किसी और शायर की शायरी का अक्स नहीं झलकता। उनका अपना स्टाइल है जो सुनने पढ़ने वालों को बहुत आकर्षित करता है।"सबरंग" ने उन्हें उड़ने के लिए आसमान दिया।

 कहीं दिखाई दिए एक दूसरे को हम 
 तो मुंह बिगाड़ लिए रंजिशें ही ऐसी थीं 

 बहुत इरादा किया कोई काम करने का 
 मगर अमल न हुआ उलझने ही ऐसी थीं

 बुतों के सामने मेरी ज़बान क्या खुलती 
 खुदा मुआफ़ करे ख्वाहिशें ही ऐसी थीं 

 लिखने का शौक उन्हें बचपन से ही था। महज़ 11 साल की उम्र में उन्होंने कवितायेँ लिखनी शुरू की जो कराची से लेकर दिल्ली तक की बच्चों की पत्रिकाओं और अख़बारों में प्रकाशित होने लगीं। "सबरंग" में सब एडिटर बनने से पहले उन्होंने 1964 में अपनी मुलाजमत की शुरुआत अंजुमन तरक्की-ऐ-उर्दू से की। 1970 में उन्होंने जो सबरंग का दामन पकड़ा तो फिर 30 साल बाद सन 2000 में छोड़ा। इन तीस सालों में उनकी पहचान पाकिस्तान के बेहद लोकप्रिय शायरों में की जाने लगीं। अनवर आजकल रोजाना की घटनाओं पर पाकिस्तान के नंबर 1 अखबार 'जंग' में नियमित रूप से कतआ लिखते हैं जिसे लाखों लोग रोज नियम से पढ़ते हैं। कतआत ने उनकी लोकप्रियता में चार चाँद लगा दिए लेकिन वो खुद को मूल रूप से एक ग़ज़ल कार ही समझते हैं।

 तमाम दिन की गुलामी के बाद दफ़्तर से
 किसी बहिश्त में जाता हूँ घर नहीं जाता 

 सता रही है मुझे ज़िन्दगी बहुत लेकिन 
 कोई किसी के सताने से मर नहीं जाता 

 ज़ियादा वक्त टहलते हुए गुज़रता है 
 कफ़स में भी मेरा शौक-ऐ-सफर नहीं जाता 

 अनवर साहब की ज़िन्दगी बहुत उतार चढ़ाव वाली रही। बड़ी मुश्किल से गुज़ारा होता था। एक तिमंज़िला इमारत पे बनी छोटी सी कोठरी में उनका ठिकाना रहा जिसमें बमुश्किल घुस के वो देर रात आने के बाद सोया करते थे। बलानोशी के चलते उन्होंने एक काबुली से पैसा उधार लिया और चुका नहीं पाए लिहाज़ा सूद-दर-सूद के हिसाब से अस्ल रकम में कई गुना इज़ाफ़ा हो गया। सूद-खोर ने जब धमकाना शुरू किया तो उन्होंने 'सबरंग' के एडिटर जनाब मुश्फ़िक ख्वाज़ा साहब से मदद की गुहार की। ख्वाजा साहब जो अनवर साहब की पीने की आदत से वाकिफ थे ने उन्हें इस शर्त पर क़र्ज़ अदाई के लिए पैसा देना मंज़ूर किया कि वो शराब छोड़ देंगे। अनवर मान गए , उनकी हरकतों से लगने लगा कि उन्होंने शराब से तौबा कर ली है लेकिन चंद दिन ही गुज़रे कि जॉन एलिया घबराये हुए सबरंग के दफ्तर आये और ख्वाजा साहब से कहा कि अनवर को बुरी तरह नशे की हालत में पोलिस पकड़ के ले गयी है और छोड़ने के 50 रु मांग रही है। ख्वाजा साहब ने सर पकड़ लिया - और करते भी क्या। अनवर ने शायद अपने बारे में जो ग़ज़ल कही उसके ये शेर देखें :

 मुझसे सरज़द होते रहते हैं गुनाह 
 आदमी हूँ क्यों कहूं अच्छा हूँ मैं 

 बीट कर जाती है चिड़िया टाट पर 
 अज़मत-ए- आदम का आईना हूँ मैं 
 अज़मत-ए- आदम =इंसान की महानता 

 मुझ से पूछो हुर्मत-ए-काबा कोई
 मस्जिदों में चोरियां करता हूँ मैं 

 मैं छुपाता हूँ बरहना ख्वाहिशें 
 वो समझती है कि शर्मीला हूँ मैं 
 बरहना = नग्न 

 ख्वाजा साहब लिखते हैं कि "शुऊर साहब की शायरी को किसी दीबाचे याने तआरुफ़ की ज़रूरत नहीं है। अबतक उर्दू ग़ज़ल के जितने सांचे और जितने रंग मिलते हैं शुऊर की ग़ज़ल उन सब से अलग है। इसकी एक अपनी फ़िज़ा है एक अपना मिज़ाज़ है यहाँ तक कि ज़खीरा-इ-अलफ़ाज़ (शब्द भण्डार )भी आम ग़ज़लों में इस्तेमाल होने वाले अल्फ़ाज़ से अलग है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं की शुऊर की ग़ज़ल हमारी शेरी रिवायती से अलग है। अपनी शेरी रिवायत से जितनी वाक़फ़ियत शुऊर को है उतनी कम शायरों को होगी लेकिन शुऊर ने बने बनाये सांचो पर निर्भर न रहते हुए और अपनी शेरी रिवायतों से तालमेल बिठाते हुए एक अलग राह निकाली है और एक अलग लहज़े को पहचान दी है जिससे नयी ग़ज़ल के फैलाव की सम्भावना का अंदाज़ा होता है। "

 तबाह सोच-समझ कर नहीं हुआ जाता 
 जो दिल लगाते हैं फर्ज़ाने थोड़ी होते हैं 
 फर्ज़ाने =समझदार 

 जो आते हैं मिलने तेरे हवाले से 
 नए तो होते हैं अनजाने थोड़ी होते हैं 

 हमेशा हाथ में रखते हैं फूल उनके लिए 
 किसी को भेज के मंगवाने थोड़ी होते हैं 

 आज शादीशुदा और अपने अपने घरों में खुश 3 बेटियों और एक बेटे के पिता शुऊर साहब कराची के पॉश इलाके में बने गुलशन-ऐ-इक़बाल बिल्डिंग में बने अपने अपार्टमेंट में आराम और सुकून से रहते हैं जहाँ से कराची का सर्कुलर रेलवे स्टेशन और अलादीन अम्यूजमेंट पार्क साफ़ दिखाई देता है। वो अपने अपार्टमेंट की बालकनी में बैठ कर लगातार कुछ न कुछ पढ़ते रहते हैं। उनका मानना है कि लेखक को साहित्य की हर विधा पर पढ़ते रहना चाहिए। उपन्यास हो, कहानियां हों, ग़ज़लें हों, नज़्में हों, यात्रा वृत्तान्त हो , दर्शन हो या जीवनियां हों। वो मुस्कुराते हुए वो कहते हैं कि आजकल कहानीकार सिर्फ कहानियां पढता है उपन्यासकार सिर्फ उपन्यास ग़ज़लकार सिर्फ ग़ज़लें इतना ही नहीं हालात इतने ख़राब हैं कि अब तो शायर सिर्फ अपनी ही शायरी पढता है और फिक्शन लेखक सिर्फ अपना लिखा फिक्शन। वो कहते हैं कि मुझे जो भी थोड़ी बहुत पहचान मिली है वो सिर्फ शायरी की बदौलत मिली है।

 दिल जुर्म-ऐ-मोहब्बत से कभी रह न सका बाज़ 
 हालाँकि बहुत बार सज़ा पाए हुए था 

 हम चाहते थे कोई सुने बात हमारी
 ये शौक हमें घर से निकलवाए हुए था 

 होने न दिया खुद पे मुसल्लत उसे मैंने 
 जिस शख़्स को जी जान से अपनाए हुए था
 मुसल्लत =छा जाना

 "अब मैं अक्सर मैं नहीं रहता " शायद हिंदी में अनवर साहब की शायरी की एक मात्र किताब है जिसे रेख़्ता बुक्स ने प्रकाशित किया है। पाकिस्तान सरकार की और से अल्लामा इक़बाल सम्मान से सम्मानित अनवर शुऊर साहब के चार मजमुए "अनदोख्ता" 1995 में ,मश्क-ऐ-सुखन " 1999 में मी-रक्सम 2008 में और "दिल क्या रंग करूँ " 2009 में प्रकाशित हो चुके हैं। इस किताब को पाने के लिए आप रेख़्ता बुक्स से सम्पर्क करें या फिर अमेजन से ऑन लाइन मंगवा लें। इस किताब में अनवर साहब की 119 ग़ज़लें संग्रहित हैं जो अपने कहन और दिलकश अंदाज़ से आपका मन मोह लेंगी। आप किताब मंगवाने की कवायद करें और मैं नयी किताब की तलाश में निकलने से पहले उनकी एक छोटी बहर की ग़ज़ल के ये शेर पढ़वाता चलता हूँ :

 हमने जिस रोज़ पी नहीं होती
 ज़िन्दगी ज़िन्दगी नहीं होती

 रात को ख़्वाब देखने के लिए
 आँख में नींद ही नहीं होती

 सुब्ह जिस वक्त शहर आती है
 कोई खिड़की खुली नहीं होती

 बे पिए कोई क्या ग़ज़ल छेड़े 
 कोफ़्त में शाइरी नहीं होती

Monday, July 16, 2018

किताबों की दुनिया - 186

मासूम चिरागों को हवाओं ने बुझाया 
क्यों भड़के हुए शोलों प ताज़ीर नहीं की 
 ताज़ीर = सजा सुनाना 
 *** 
वही शाम है वही रात है मगर अपना अपना नसीब है 
 कहीं काटनी ये मुहाल है कहीं आरज़ू कि सहर न हो 
 *** 
इसको नादानी कहें या सादगी दिल की कहें 
 इक ज़रा चश्मे करम हो खुशगुमाँ हो जाएगा 
 *** 
मेरी बातों की सदाक़त मेरे लहजे का सबात 
 तुमको लगता है बगावत है , चलो यूँ ही सही 
 सदाकत=सच्चाई, सबात : स्थाई भाव 
 *** 
हर्ज क्या है सुनने में मशविरे भी सुन लीजिये 
 फैसला जो दिल का हो बस वही मुनासिब है
 *** 
कुछ हक़ीक़त में ग़म के मारे हैं
 बे सबब भी उदास हैं कुछ लोग
 *** 
बज़्मे तसव्वुरात में माज़ी का रक़्स था 
 यादों के घुँघरू छनन-छनन बोलने लगे
 बज़्मे तसव्वुरात =कल्पना लोक , माज़ी = गुज़रा हुआ समय 

आप यकीनन किसी न किसी गुलशन में सैर के वास्ते जरूर गए होंगे , वहां फूलों को खिलते मुस्कुराते देख के खुश भी हुए होंगे। गुलशन में आपने कितनी तरह के फूल देखें होंगे -वो ही केतकी गुलाब जूही चंपा चमेली कमल हजारा या फिर मौसमी फूल ? आपको ये तो पता ही होगा कि कुछ फूल ऐसे होते हैं जो जंगल में खिलते हैं बनफूल -बन का फूल। इन्हें न किसी माली के देखरेख की जरुरत होती है है न किसी खाद की न किसी गमले की और न ही किसी देखने वाले की। ये बंजर जमीन पर भी खिल उठते हैं क्यूंकि इनके बीज में उगने की जबरदस्त इच्छा शक्ति होती है। इन्हें तो ज़मीन का छोटा सा टुकड़ा हवा की नमी और सूरज की रौशनी चाहिए होती है बस। इन पर भी तितलियाँ रक़्स करती हैं कायनात फक्र करती है हवाएं दुलारती है शबनम भिगोती है। इन फूलों को देख भले कोई तालियां न बजाये अपने घर के गुलदानों में न सजाये ये फूल हर हाल में हाल में झूमते खिलखिलाते अपने आस-पास की फ़ज़ा को अपने रंगों और खुशबू से आबाद किये रखते हैं -कमाल के होते हैं ऐसे फूल।

 जितने फरज़ाने थे सब दस्तो गिरीबां ही रहे 
 दार तक रौशन हुआ है सिर्फ दीवाने का नाम 
 फरज़ाने =समझदार 

 ज़िन्दगी पैहम सफर है ज़ुस्तुजू दर ज़ुस्तज़ू 
 मौत क्या है ज़िंदगानी के ठहर जाने का नाम 

 आसमाँ की मांग में है जो शफ़क़ की ये लकीर 
 झील के पानी में सूरज के उतर जाने का नाम 

 ऐसा ही एक कमाल का फूल है हमारी आज की शायरा "तबस्सुम आज़मी" जो ऐसी ज़मीन पर खिलीं जो शायरी के लिए बिलकुल मुफ़ीद नहीं थी. आज हम उनकी किताब "धनक" की बात करेंगे। आजमगढ़, जहाँ शायरी के एक से बढ़ कर एक उस्ताद पैदा हुए , एक अदद शायरा के लिए तरसता रहा। आज़मगढ़ की मिटटी में ऐसा कुछ जरूर है जिसमें खेलने रचने वाला शख़्स शायरी करने लगता है। शिबली नोमानी याने 1857 से चला ये सिलसिला आजतक बदस्तूर जारी है. लेकिन वहां की मिटटी न जाने क्यों हमेशा शायरों की परवरिश करती रही। तबस्सुम वहां की पहली शायरा होने का फ़क्र हासिल रखती हैं। आज से कोई आधी सदी पहले जब कि लड़कियों की पढाई को लेकर वहां का मुस्लिम समाज एक मत से खिलाफ था तब पास के एक छोटे से गाँव में रहने वाले पिता ने अपनी बेटी को तालीम दिलवाने की सोची। ये एक क्रांतिकारी क़दम था।



 कभी ऐसा भी होता है ये दिल खुद हार जाता है 
 कभी हारी हुई बाज़ी भी सच मानी नहीं जाती 

 कभी कितना बड़ा हो वाक़ेआ हैरत नहीं होती 
 कभी हो बात छोटी फिर भी हैरानी नहीं जाती 

 कभी इक पल में हो जाता है दिल ये बाग़-बाग़ अपना 
 कभी मुद्दत तलक इस दिल की वीरानी नहीं जाती 

 तबस्सुम का जन्म अपने ननिहाल कलकत्ता में हुआ जहाँ उन्होंने वहां के एक कॉन्वेंट स्कूल में तीसरी जमात तक पढाई की। कुछ हालात ऐसे बने कि उनको अपने गाँव जो आजमगढ़ के बेहद करीब है , आना पड़ा। पढ़ने की शौकीन तबस्सुम को यहाँ पढाई का माहौल ही नहीं मिला। गाँव में स्कूल न होने पर तबस्सुम की पढाई का जिम्मा उनके वालिद जनाब अब्दुल हमीद साहब ने उठाया। काश हर बेटी को तबस्सुम जैसे माँ- मिलें जिन्होंने समाज के ख़िलाफ़ जा कर अपनी बेटी को पढ़ाने का फैसला किया और उसके पीछे ठोस चट्टान की तरह खड़े रहे। उन्होंने महज 5 साल की उम्र में कुरानशरीफ नाज़िर ख़त्म कर लिया साथ ही साथ अहम् सूरा-ए कुरान हिफ्ज़ भी। परिवार से उन्हें पाकीजा सोच की तालीम मिली । प्रारभिक पढाई के बाद उन्होंने अपना मुताला (अध्ययन )जारी रखा और जामिया उर्दू अलीगढ से अदीब कामिल किया। लिखने में ये बात जितनी आसान लगती है हकीकत में है नहीं। जहाँ साहित्य के नाम पर बंज़र और सोच के स्तर पर रूढ़ि वादी समाज में किसी लड़की के लिए अफसाने लिखना-पढ़ना और शायरी में दिलचस्पी रखना गुनाह माने जाते हैं वहीं उसी समाज का हिस्सा बने रह कर उन्होंने अपने परिवार खास तौर पर माँ-बाप के सहयोग से अफ़साने भी लिखे और शायरी भी की। इसके लिए बला की हिम्मत और जूनून चाहिए।

 किसको मालूम पसे पर्दा जो सिसकी है निहाँ 
 चूड़ियों का तो कलाई में खनकना तय था 

 आँखों आँखों में वो जज़्बात हुए हैं ज़ाहिर
 जिनके इज़हार में होटों का झिझकना तय था 

 गुल का अंजामे तबस्सुम था निगाहों में मगर
 फिर भी कलियों के मुकद्दर में चटकना तय था 

 ज़िन्दगी हमें खूबसूरत इसलिए लगती है क्यूंकि ये पता नहीं होता कि ये किस वक्त क्या रंग दिखाएगी।जब कभी आप इसकी रफ़्तार देख सोचते हैं कि ये कभी थमेगी नहीं तभी अचानक थम जाती है और कभी लगने लगता है कि सामने दीवार है तभी अचानक रास्ते नज़र आ जाते हैं। अब तबस्सुम ने कभी सोचा नहीं था कि वो शायरी करेगी। शायरी का बीज उसके जेहन में कब आके गिरा उसे कुछ पता नहीं, अचानक वो कब का गिरा बीज फूटा और उस में से पौधा निकल आया। वो तो खुद कहती हैं कि "मुझे ये तो पता नहीं कि मुझ में शायरी के जरासीम कैसे आये क्यूंकि मेरे घर या खानदान में मुझसे पहले कोई शायर या शायरा नहीं था। जब मुझमें शेर समझने की सलाहियत नहीं थी तब भी हर अच्छा शेर मुझे अपनी और खींचता था ,फिर पता ही नहीं चला कब और कैसे मैं खुद शेर कहने लगी " हालाँकि पहली ग़ज़ल मात्र 13 साल की उम्र में कही लेकिन रुझान उनका कहानियों पर रहा जो देश के मैयारी रिसालों में छपीं।

 बे ग़रज़ हो के अगर डोर ये बाँधी जाए 
 कोई बंधन ही नहीं प्यार के बंधन की तरह 

 दिल में झाँका तो वही मोम का पुतला निकला 
 जो बज़ाहिर नजर आता रहा आहन की तरह 
 आहन=लोहा 

 इक नई सुब्ह की उम्मीद को रक्खा क़ायम 
 ज़िन्दगी रोज़ सँवरती रही दुल्हन की तरह 

 पिता की आकस्मिक मृत्यु के बाद उनके लेखन का सिलसिला अचानक से थम गया। बरसों उन्होंने कुछ लिखा पढ़ा नहीं आखिर उनके बेटे ने उन्हें संभाला, हिम्मत दी और दुबारा लेखन की और प्रेरित किया। इसलिए ये कहना गलत न होगा कि तबस्सुम का शे'री सफर बहुत पुराना नहीं है। ग़ज़ल कहने की विधिवत शुरुआत उन्होंने 2013 से की। जैसा कि आपसब को पता ही है सोशल मिडिया की वजह से आज ग़ज़ल को जो लोकप्रियता मिली है वो बेमिसाल है -इसकी वजह से हालाँकि ग़ज़ल को नुक्सान भी हुआ है क्यूंकि बहुत से लोग बिना इसकी रूह तक पहुंचे सस्ती वाहवाही के चक्कर में इसका बेडा गर्क करने पर तुले हुए हैं। सिर्फ बहर में तुकबंदी याने काफिया पैमाई करना ग़ज़ल नहीं है ये इसके बहुत आगे की विधा है। हम अगर ग़ज़ल को सस्ता मनोरंजन समझने वाले लोगों को नज़रअंदाज़ कर दें तो आज भी बहुत से युवा और बुजुर्ग ग़ज़ल की चाकरी में पूरे मन से लगे हुए हैं और ग़ज़ल को लोकप्रिय बनाने में सहयोग दे रहे हैं।इसी इंटरनेट के चलते तबस्सुम की मुलाकात फेसबुक पर ग़ज़ल के पारखी डा. प्रमोद लाल यक्ता साहब से हुई। इस मुलाकात ने ही तुकबंदी करने वाली "ताहिरा तबस्सुम" को बेहतरीन शायरा "तबस्सुम आज़मी" बनाया।

 इक मोड़ प किरदारों का यूँ रब्त है टूटा 
 लिख पाया मुसन्निफ़ नहीं अंजाम अभी तक 
 मुसन्निफ़ =लेखक 

 वो जुर्म जो सरज़द न हुआ था कभी मुझ पर 
क़ायम है मिरे सर प वो इल्ज़ाम अभी तक 
 सरज़द = सिद्ध 

 और अपनी वफ़ादारी का क्या दूँ मैं सबूत अब
 लिक्खा है सरे दार मिरा नाम अभी तक 
 सरे दार =सूली पर 

 माली का काम सिर्फ इतना होता है कि वो उस बीज की हिफाज़त करे जो उसे मिला है ,उसे जरुरत के मुताबिक पानी खाद दे धूप बारिश से दो चार करवाए उसका ख्याल रखे -बस। अब अगर बीज कमज़ोर है तो उस से खूबसूरत फूल-फल की उम्मीद करना गलत है ,उसमें माली भी कुछ नहीं कर पायेगा। तबस्सुम के भीतर का जो बीज था वो कमज़ोर नहीं था उसमें बेहद खूबसूरत शायरी छुपी हुई थी जिसे उनके उस्ताद ने माली की तरह पालपोस कर एक फूलों से भरे पेड़ बन जाने में मदद की। बीज को हुनर मंद माली का मिलना भी किस्मत की बात होती है। प्रमोद जी जैसा उस्ताद सभी को मयस्सर नहीं होता। तबस्सुम जी फेसबुक पर प्रमोद जी के ग़ज़ल ग्रुप "रू -ब -रु" में लिखती थीं , अब भी लिखती हैं ,जहाँ प्रमोद जी उसे पढ़ कर तबस्सुम जी को मशवरे दिया करते। फोन पर बातचीत के दौरान भी भी वो तबस्सुम जी को शायरी के गुर सिखाते।फेसबुक के माध्यम से बना ये रिश्ता उस्ताद शागिर्द से ज्यादा पिता-पुत्री का रहा जो प्रमोद जी के दुनिया-ऐ-फ़ानी से रुखसत होते वक़्त तक रहा।
 दुनिया प हमको कोई भरोसा नहीं रहा 
 देखेंगे ज़िन्दगी को अब अपनी नज़र से हम 

 अब तो किसी भी शय में कशिश वो नहीं रही 
 गुज़रे तो बारहा हैं तिरी रहगुज़र से हम 

 चारागरों में जब वो मुरव्वत नहीं रही 
 किस वास्ते उमीद रखें चारागर से हम 
 चारागरों =चिकित्सकों 

 तबस्स्सुम जी के बारे में मशहूर शायरा और मेरी छोटी बहन "इस्मत ज़ैदी शिफ़ा " लिखती हैं कि "वो न ये कि एक उम्दा शायरा हैं बल्कि ओरिजिनल शायरा हैं। उनके कलाम में मौसिकी भी है ,सन्नाई(शिल्प कौशल ) भी , मुसव्विरि (चित्रकारी ) भी है पुरकारी भी ,तसव्वुरात की वुसअत (ख्यालों का फैलाव ) और खयालात की पाकीज़गी भी जो पाठक के दिलो-दिमाग को सुकून अता करती है। उनकी ज़बान मुझे बहुत ज्यादा आकर्षित करती है क्यों आज के शायर और शायरा इतनी अलंकृत ज़बान का इस्तेमाल बहुत कम करते हैं। तबस्सुम को पढ़ कर उनकी काबलियत का अंदाज़ा बहुत आसानी से लगाया जा सकता है उनकी ग़ज़लें आबशार की सी ठंडक का एहसास कराती हैं "

हमारा दिल भी दिल ही है ये क्या कभी दुखा नहीं 
 ये और बात है हमें किसी से कुछ गिला नहीं 

 हरेक बार चेहरे पर नई नई परत मिली 
 मिला तो बारहा है वो मगर कभी खुला नहीं 

 ये धूप छाँव ज़ीस्त की ये कुर्बतें जुदाईयाँ 
 ये गर्दिशें हैं वक्त की किसी की कुछ खता नहीं 

 मशहूर शायर प्रोफ़ेसर सुबोध लाल साक़ी ने लिखा है कि "तबस्सुम की 'धनक में मुझे सात दिलकश रंग नज़र आते हैं - सादगी ,सच्चाई ,सहजता , पाकीज़गी ,पुख़्तगी और हिन्दुस्तानियत। ये रंगों का एक जादुई संगम है लेकिन यहाँ आ कर प्यास बुझती नहीं और भड़क जाती है " सुबोध जी ने ही तबस्सुम जी की इस किताब का नाम 'धनक' रखा था। धनक में तबस्सुम जी की 73 ग़ज़लें संगृहीत हैं जो उन्होंने जनवरी 2015 से लेकर नवम्बर 2016 के बीच कही हैं। इस छोटे से वक़्फ़े में इतनी मयारी ग़ज़लें कहना आसान काम नहीं है। हमें उम्मीद करनी चाहिए कि आने वाले वक्त में हमें उनकी और भी बहुत सी किताबें पढ़ने को मिलेंगी।

 ज़िन्दगी लगती है ज़िन्दान को घर होने तक 
 दम न घुट जाएगा दीवार में दर होने तक 

 रक्से परवाना के शैदाई को क्या इस से गरज़ 
 शम'अ किस दर्द से गुज़री है सहर होने तक 

 बेहिसी ओढ़ के सोते हैं हमारे रहबर 
 आँख खुलती ही नहीं रक्से शरर होने तक 

 आज आलम ये है कि तबस्सुम जी की ग़ज़लें देश की प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में छप रही हैं और उनका नाम उर्दू के कद्रदानों में बड़े आदर से लिया जाने लगा है फिर वो कद्रदान चाहे अपने देश के हों या विदेश के। पड़ौसी देश पाकिस्तान के नामवर शायर अदबी हलकों में एक मुमताज़ हैसियत रखने वाले जनाब अज़ीज़ुद्दीन खिज़री जो जोश मलीहाबादी साहब के नवासे हैं इस किताब की भूमिका में लिखते हैं कि "तबस्सुम की ग़ज़लों में मकसदियत ज़ज़्बात के इज़हार में सलीक़ा। शाइस्तगी और सुथरापन ग़ज़ल की रवायत को मज़रूह किये बगैर नुमायाँ नज़र आता है। तबस्सुम बचपन से ही हस्सास तबियत की मालिक है। भरी भरकम अलफ़ाज़ के बगैर सीधे सादे लफ़्ज़ों में अपनी बात कारी के दिल में उतार देती हैं।

उनके दामन की सबा ले के जो खुशबू आई 
 मुद्दतों बाद निगाहों में चमक उभरी है 

 दर्द के तार से बाँधा गया एक इक घुँघरू 
 सोज़ छलका है तो पायल में छनक उभरी है 

 अश्कबारी में जो फूटी है तबस्सुम की किरन 
 तब कहीं जा के ये रंगीन धनक उभरी है 

 'धनक' को सैंड पाइपर्स पब्लिशर्स 327/89 मीर अनीस लें चौक लख़नऊ ने सं 2017 में प्रकाशित किया है। इस किताब की प्राप्ति के लिए आप डा मोहम्मद आज़मी को 9984784445 पर संपर्क कर सकते हैं। वैसे धनक अमेजन से भी ऑन लाइन मंगवाई जा सकती है। इस किताब में तबस्सुम जी की ग़ज़लों के अलावा उनके द्वारा की गयी 8 तख़मीस सॉनेट,कत'आत, रुबाइयाँ त्रिवेणियाँ और दोहे भी संकलित हैं जिसे पढ़ कर उनकी बहुमुखी प्रतिभा का अंदाज़ा हो जाता है। आप तबस्सुम जी से उनके इ-मेल tabassumazmi 68 @ gmail.com पर संपर्क कर उन्हें इन बेहतरीन ग़ज़लों के लिए बधाई दे सकते हैं। उनका फेसबुक एकाउंट भी है जहाँ जा कर आप उन्हें मैसेज कर सकते हैं।चलते चलते पेशे खिदमत हैं उनकी एक ग़ज़ल के ये शेर : 

कुरबतों में बारहा ऐसा लगा 
 दरमियाँ इक फासला मौजूद है 

 दूसरों की आँख में ख़ामी न ढूंढ 
 देख ! उसमें आईना मौजूद है 

 कब भला हर मसअला हल हो सका
 सिलसिला दर सिलसिला मौजूद है 

 मुद्दई खामोश है बोले भी क्या 
 पहले से जब फैसला मौजूद है