Monday, May 28, 2012

गुलमुहर के पेड़ नीचे

देश में गर्मी अपने पूरे रंग में है लेकिन यहाँ खोपोली में बादलों ने हलके से आहट देनी शुरू कर दी है. गर्मियों का अपना आनंद होता है इसी विषय पर पंकज जी के ब्लॉग पर पिछले साल एक तरही मुशायरा हुआ जिसमें दिया गया मिसरा " और सन्नाटे में डूबी गर्मियों की वो दुपहरी" पर पेश की गयी खाकसार की ग़ज़ल अब मेरे ब्लॉग पर पढ़िए और गर्मियों को दुआएं दीजिये.



आम, लीची सी रसीली, गर्मियों की वो दुपहरी
और शहतूतों से मीठी, गर्मियों की वो दुपहरी

फालसे, आलू बुखारों की तरह खट्टी-ओ-मीठी
यार की बातों सी प्यारी, गर्मियों की वो दुपहरी

थे पिता बरगद सरीखे और शीतल सी हवा माँ
तो लगा करती थी ठंडी, गर्मियों की वो दुपहरी

भूलना मुमकिन नहीं है, गुलमुहर के पेड़ नीचे
साथ हमने जो गुजारी, गर्मियों की वो दुपहरी

कूकती कोयल के स्वर से गूँजती अमराइयों में
प्यार के थे गीत गाती, गर्मियों की वो दुपहरी

बिन तेरे उफ़! किस कदर थी जानलेवा यार लम्बी
और सन्नाटे में डूबी, गर्मियों की वो दुपहरी

सर्दियों में भी पसीना याद कर आता है 'नीरज'
तन जलाती चिलचिलाती, गर्मियों की वो दुपहरी

43 comments:

इस्मत ज़ैदी said...

थे पिता बरगद सरीखे और शीतल सी हवा माँ
तो लगा करती थी ठंडी, गर्मियों की वो दुपहरी

bahut badhiya ghazal,,khas taur par ye sher!!

सदा said...

थे पिता बरगद सरीखे और शीतल सी हवा माँ
तो लगा करती थी ठंडी, गर्मियों की वो दुपहरी

ये पंक्तियां मन को छूती हुई जैसे कोई तपती दुपहरी में ठंडी हवा का झौंका ... उत्‍कृष्‍ट प्रस्‍तुति के लिए आभार ।

Chirag Joshi said...

थे पिता बरगद सरीखे और शीतल सी हवा माँ
तो लगा करती थी ठंडी, गर्मियों की वो दुपहरी


bahut khoob sir
maja aa gaya
thanks
http://drivingwithpen.blogspot.in/

दीपिका रानी said...

बढ़िया..

Alok Mohan said...

उत्‍कृष्‍ट प्रस्‍तुति

expression said...

गर्मी की सड़ी दोपहरी पर लिखी उत्कृष्ट रचना....
:-)

भूलना मुमकिन नहीं है, गुलमोहर के पेड़ नीचे
साथ हमने जो गुजारी, गर्मियों की वो दुपहरी

बहुत सुंदर......................

अनु

dheerendra said...

थे पिता बरगद सरीखे और शीतल सी हवा माँ
तो लगा करती थी ठंडी, गर्मियों की वो दुपहरी

सुंदर प्रस्तुति,,,,,

RECENT POST ,,,,, काव्यान्जलि ,,,,, ऐ हवा महक ले आ,,,,,

दिगम्बर नासवा said...

थे पिता बरगद सरीखे और शीतल सी हवा माँ
तो लगा करती थी ठंडी, गर्मियों की वो दुपहरी ..

वाह नीरज जी .. इस लाजवाब गज़ल का आनंद बार बार पढ़ने के बाद और भी बढ़ता जाता है ... ये शेर तो बहुत ही खास ... दिल में सीधे उतर जाता है ..

वन्दना said...

वाह वाह शानदार गज़ल हर शेर खूबसूरत

Rajesh Kumari said...

आपकी इस उत्कृष्ठ प्रविष्टि की चर्चा कल मंगल वार 29/5/12 को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी |

shikha varshney said...

जाने कहाँ गए वो दिन....शानदार गज़ल.

प्रवीण पाण्डेय said...

पिछले साल भी पढ़ी थी, इस बार पढ़कर थोड़ा और सुकूँ मिला..

PRAN SHARMA said...

KAVITA KEE SUNDARTAA USKAA CHITRAMAYEE HONA HAI . HAR SHER MEIN
SAJEEV CHITRAN HAI . SEEDHE - SAADE
SHABDON MEIN RACHEE - BASEE GAZAL
KE LIYE AAPKO BADHAAEE .

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बहुत बढ़िया सर!

सादर

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

उम्दा, बेहतरीन अभिव्यक्ति...बहुत बहुत बधाई...

तिलक राज कपूर said...

गर्मियों की धूप में आपके जैसी मुस्‍कराती, गुनगुनाती, खिलखिलाती ये ग़ज़ल एयर कंडीशनर का अहसासस दे रही है।

dr.mahendrag said...

बिन तेरे उफ़! किस कदर थी जानलेवा यार लम्बी
और सन्नाटे में डूबी, गर्मियों की वो दुपहरी

गर्मी में रोमांस पर यादों की ठिठुरती सुन्दर रचना
भाई वाह

Anupama Tripathi said...

बहुत सुंदर बिम्ब प्रयोग और सुंदर भाव से भरी ....गर्मियों की वो दुपहरी ....

नीरज गोस्वामी said...

Comment received on mail:-

Neeraj ji
Namaskar
Garmio ki dopahar ke sari khusbuye samte apki gajal mili aachi lagi...purani dopahrio ki yaad aa gyi.
Neeraj ji apne blog par hum hindi main kis tarha likh sakte hai.kya aap btayenge plz .mujhe jyada knowedge nahi ha blogging ki.
Regards
Parul singh

काजल कुमार Kajal Kumar said...

☺ सुंदर

डॉ. नूतन डिमरी गैरोला- नीति said...

बहुत प्यारी लगी हर पंक्तिय... ऊपर में गर्मी का लुत्फ़ और नीचे के दो उफ़ गर्मी... उम्दा रचना

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर और सार्थक प्रस्तुति।

नीरज गोस्वामी said...

Comment received on mail:-

neeraj ji
namasey,
gud poem to welcome this summer,
congrats,
-om sapra, delhi-9

kshama said...

Aapko padhna ek alaghee anubhav hota hai!

udaya veer singh said...

पंक्तियां मन को छूती हुई ... उत्‍कृष्‍ट प्रस्‍तुति आभार ।

Shiv said...

बहुत बढ़िया.

भूलना मुमकिन नहीं है, गुलमुहर के पेड़ नीचे
साथ हमने जो गुजारी, गर्मियों की वो दुपहरी

कूकती कोयल के स्वर से गूँजती अमराइयों में
प्यार के थे गीत गाती, गर्मियों की वो दुपहरी

खोपोली इतना अच्छा लग रहा है अभी, इसलिए खोपोली यात्रा की तैयारी शुरू:-)

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

कल 31/05/2012 को आपकी यह पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!

Ankit Joshi said...

नमस्कार नीरज जी,
यादों का एक झोंका अपने साथ बहा कर उन बीती सुनहरी गर्मियों की दुपहरी की तरफ खींच के ले जा रहा है.
"फालसे, आलू बुखारों की तरह खट्टी......." वाह
"थे पिता बरगद सरीखे और शीतल सी हवा माँ........", बहुत खूबसूरत बिम्ब बाँधा है.
"कूकती कोयल के स्वर से गूँजती अमराइयों में......", लाजवाब

पिछली तरही के इस खूबसूरत दस्तावेज़ ने आज फिर से कमाल कर दिया.

niranjan jain said...

ati uttam

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

थे पिता बरगद सरीखे और शीतल सी हवा माँ
तो लगा करती थी ठंडी, गर्मियों की वो दुपहरी... वाह!

आदरणीय नीरज सर पूरी गजल बहुत खुबसूरत है....
सादर बधाई स्वीकारें.

दर्शन कौर धनोय said...

"बिन तेरे उफ़! किस कदर थी जानलेवा यार लम्बी
और सन्नाटे में डूबी, गर्मियों की वो दुपहरी

सर्दियों में भी पसीना याद कर आता है 'नीरज'
तन जलाती चिलचिलाती, गर्मियों की वो दुपहरी"....

याद आता हैं वो बचपन सुहाना ..!
वो आमो की अमराई वो गुलमोहर का जमाना ...!
क्या बात हैं ?आपकी कविता में वो गर्मी की झुलसान कम हवा का झौका ज्यादा हैं नीरज साहेब !

ऋता शेखर मधु said...

थे पिता बरगद सरीखे और शीतल सी हवा माँ
तो लगा करती थी ठंडी, गर्मियों की वो दुपहरी

ठंढा ठंढा कूल कूल सा एहसास...
वर्ना गर्मी और गजलः(

Reena Maurya said...

बहुत ही सुन्दर और बेहतरीन रचना...

Anita said...

बहुत खूबसूरत, गर्मियों को तरो-ताज़ा बनाती रचना ! Thanks for sharing !!!
तरबूज़ और खरबूजे की यारी,
उनकी ऊँटों की सवारी..!
पेड पे चढ़, दादी से छुपकर..
कच्ची अमियों की वो चोरी,
भूल नहीं सकता कभी दिल.....
गर्मियों की वो दुपहरी..... :))

Brijendra Singh... (बिरजू, برجو) said...

"थे पिता बरगद सरीखे और शीतल सी हवा माँ
तो लगा करती थी ठंडी, गर्मियों की वो दुपहरी"

बहुत खूब लिखा है सर..
आभार!!

इमरान अंसारी said...

वाह बेहद खुबसूरत।

Anjani Kumar said...

वैसे तो हर पन्क्ति उत्कृ्ष्ठ है ...फिर भी
"थे पिता बरगद सरीखे और शीतल सी हवा माँ
तो लगा करती थी ठंडी, गर्मियों की वो दुपहरी"
खास तौर पर मन को छू जाने वाली है
दिलकश प्रस्तुति सर

निर्मला कपिला said...

थे पिता बरगद सरीखे और शीतल सी हवा माँ
तो लगा करती थी ठंडी, गर्मियों की वो दुपहरी
बहुत अच्छी गज़ल है। लेकिन ये शेर तो कमाल का है।हर शेर इतने खूबसूरत तरीके से बुना है कि दिल वाह वाह कर उठता है। शुभकामनायें।

Saras said...

थे पिता बरगद सरीखे और शीतल सी हवा माँ
तो लगा करती थी ठंडी, गर्मियों की वो दुपहरी

वास्तव में पूरी ग़ज़ल की जान है यह शेर ...बहुत सुन्दर नीरज जी ..
बहुत ही सुन्दर अहसासों से सराबोर रचना ...बधाई !!!

pramod gupta said...

abhi aap ki company ke bagal goojar raha achha lagata ye sochakar ke jiska mai blog padhata hoon wo yahi kaam karate hai

आशा जोगळेकर said...

आपकी गज़ल ने खोले खुशबुओं के वो पिटारे
हो गई मन मोहनी सी गर्मियों की ये दुपहरी ।

Vijay Kumar Sappatti said...

थे पिता बरगद सरीखे और शीतल सी हवा माँ
तो लगा करती थी ठंडी, गर्मियों की वो दुपहरी


आपकी गजले पता नहीं कहाँ कहाँ ले जाती है .. बड़ा अरमान रहेंगा मैं आपकी तरह नहीं लिख सकता ..

नीरज गोस्वामी said...

Msg received on mail:--

आदरणीय नीरज जी,

बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल कही है वाह...वाह..
"थे पिता बरगद सरीखे और शीतल सी हवा माँ
तो लगा करती थी ठंडी, गर्मियों की वो दुपहरी"
जवाब नहीं.....वाह वाह
"भूलना मुमकिन नहीं है, गुलमुहर के पेड़ नीचे
साथ हमने जो गुजारी, गर्मियों की वो दुपहरी"
क्या कहने...

खूबसूरत अशआर पढ़वाने के लिए आपका सादर आभार.

दिली मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं.

सादर,
सतीश शुक्ला 'रक़ीब'
जुहू, मुंबई-49.