Monday, March 19, 2012

किताबों की दुनिया - 67


चमकी कहीं जो बर्क तो एहसास बन गयी
छाई कहीं घटा तो अदा बन गयी ग़ज़ल

आंधी चली तो कहर के साँचें में ढल गयी
बादे सबा चली तो नशा बन गयी ग़ज़ल

उठ्ठा जो दर्दे इश्क़ तो अश्कों में ढल गयी
बेचैनियाँ बढीं तो दुआ बन गयी ग़ज़ल

अर्ज़े दकन में जान तो देहली में दिल बनी
और शेहरे लखनऊ में हिना बन गयी ग़ज़ल

मुंबई निवासी मेरे शायर मित्र जनाब सतीश शुक्ला 'रकीब' जिनकी शायरी आप मेरे ब्लॉग पर पढ़ और पसंद कर चुके हैं जब मेरे यहाँ खोपोली में एक रात रहने आये तो अपने साथ शायरी की एक किताब भी उठाते लाये. मुझे ये बात स्वीकारने में कोई हिचक नहीं है कि इस किताब के शायर और उनकी शायरी के बारे में मुझे कुछ भी पता नहीं था. बाद में मुझे अपनी अज्ञानता पर अलबत्ता शर्म जरूर आई.

अश्क बहने दे यूँ ही
लज्ज़ते ग़म कम न कर

अजनबियत भी बरत
फासला भी कम न कर

पी के कुछ राहत मिले
ज़हर को मरहम न कर

बहते हुए अश्कों से ग़म की लज्जत उठाने वाले इस अज़ीम शायर का नाम है "गणेश बिहारी 'तर्ज़' जिनकी किताब "हिना बन गयी ग़ज़ल" का जिक्र आज हम अपनी इस किताबों की दुनिया श्रृंखला में करेंगे. ये किताब 'तर्ज़' साहब का सपना थी, जिसके हिंदी संस्करण का अनावरण वो अपने सामने करवाने से पहले ही 17 जुलाई 2009 को इस दुनिया-ऐ-फ़ानी से कूच कर गए.


ज़िन्दगी का ये सफ़र भी यूँ ही पूरा हो गया
इक ज़रा नज़रें उठायीं थीं कि पर्दा हो गया

दर्द जब उमड़ा तो इक आंसू का कतरा हो गया
और जब ठहरा तो बढ़ कर एक दरिया हो गया

अपनों को अपना ही समझा ग़ैर समझा ग़ैर को
गौर से देखा तो देखा मुझको धोका हो गया

अव्वल अव्वल तो समाधी में अँधेरा ही रहा
आखिर आखिर हर तरफ जैसे उजाला हो गया.

ऐसे और इस तरह के अनेकों शेर पढ़ कर मालूम हुआ कि 'तर्ज़' साहब कितने कद्दावर शायर थे. "दर्द जब उमड़ा..".जैसा शेर एक बार पढने के बाद ज़ेहन से उतरने का नाम ही नहीं ले रहा. ज़िन्दगी को बहुत करीब से देखने और समझने वाला शख्स ही ऐसे शेर कह सकता है.
18 मई 1928 को लखनऊ में पैदा हुए 'तर्ज़' साहब की शायरी में हमें वहां की नफासत और नजाकत दोनों दिखाई पड़ती है.

इक ज़माना था कि जब था कच्चे धागों का भरम
कौन अब समझेगा कदरें रेशमी ज़ंजीर की

त्याग, चाहत, प्यार, नफरत, कह रहे हैं आज भी
हम सभी हैं सूरतें बदली हुई ज़ंजीर की

किस को अपना दुःख सुनाएँ किस से अब मांगें मदद
बात करता है तो वो भी इक नयी ज़ंजीर की

शोर शराबे और आत्म प्रशंशा से कोसों दूर रहने वाले इस ग़ैर मामूली शायर को मकबूलियत की वो बलंदी नहीं मिली जिसके वो हकदार थे. उनके बारे में मशहूर शायर जनाब 'अली सरदार जाफरी' साहब ने कहा है " सारे हिन्दुस्तान में बिखरे हुए कुछ ऐसे शायर भी मिलेंगे जिनके नाम या तो अपने इलाकों से बाहर नहीं गए हैं या बिलकुल गुमनामी के आलम में हैं. मेरे अज़ीज़ दोस्त 'तर्ज़' ऐसे शायर हैं जो ज्यादातर अपने हल्कए अहबाब में रहना पसंद करते हैं. इनके इस मिजाज़ ने उर्दू के आम पढने वालों को उनकी ग़ज़लों के हुस्न से महरूम रखा है." ज़ाफरी साहब की बात पर यकीं करने के लिए आप तर्ज़ साहब का नाम गूगल कर के देखें आप को गूगल महाशय जो अपनी जानकारी पर इतराते फिरते हैं बगलें झांकते नज़र आयेंगे.

है बात वक्त वक्त की चलने की शर्त है
साया कभी तो कद के बराबर भी आएगा

ऐसी तो कोई बात तसव्वुर में भी न थी
कोई ख्याल आपसे हट कर भी आएगा

मैं अपनी धुन में आग लगाता चला गया
सोचा न था कि ज़द में मेरा घर भी आएगा

'तर्ज़' साहब बेहद खूबसूरत आवाज़ के मालिक थे और जब वो तरन्नुम से अपना कलाम पढ़ते थे तो सुनने वाला बेहतरीन शायरी के साथ साथ उनकी आवाज़ के हुस्न का भी दीवाना हो जाता था. उनकी ग़ज़लों में हुस्न और इश्क की कशमकश, इश्क की बेबसी, हुस्न का अंदाज़े बयाँ, इंतज़ार का दर्द, हिज्र की कसक ही नहीं है ज़िन्दगी की तल्खियाँ और सच्चाइयाँ भी हैं, गिरते मूल्यों का दर्द भी है :

सपने मिलन के मिल के तो काफूर हो गए
इतना हुए क़रीब कि हम दूर हो गए

जिन कायदों को तोड़ के मुजरिम बने थे हम
वो क़ायदे ही मुल्क का दस्तूर हो गए

कोनों में काँपते थे अँधेरे जो आज तक
सूरज को ज़र्द देखा तो मगरूर हो गए

'तर्ज़' इनको अपने सीने में कब तक छुपाओगे
ये ज़ख्म अब कहाँ कहाँ रहे नासूर हो गए

अच्छी शायरी के शौकीनों को अपना दिल छोटा करने की जरूरत नहीं है क्यूँ के "हिना बन गयी ग़ज़ल" जैसी अनमोल शायरी की किताब, जिसमें तर्ज़ साहब की उम्दा ग़ज़लें ,नज्में, कतआत संगृहीत हैं सिर्फ "दिवंगत आत्मा की शांति के लिए दो मीठे बोल" बोल कर प्राप्त की जा सकती है. इस किताब में शायरी के साथ साथ तर्ज़ साहब के कुछ अविस्मर्णीय चित्र भी प्रकाशित किये गए हैं जिसमें आप उनको अपने परिवार और शायर मित्रों के साथ हँसते मुस्कुराते देख सकते हैं. मुझे इस किताब से ही मालूम पड़ा के मशहूर शायर कृष्ण बिहारी 'नूर' साहब रिश्ते में तर्ज़ साहब के दूर के भाई हैं. इस बेजोड़ किताब की प्राप्ति के लिए आप अपना मोबाइल या फोन उठाइये 09452461950 पर फोन कीजिये और इस किताब की फरमाइश कर डालिए. अगर ये तरीका कारगार साबित न हो रहा हो तो हमेशा मदद के लिए तैयार हमारे मित्र सतीश शुक्ला 'रकीब' साहब जो ‘तर्ज़’ साहब के बहुत क़रीब रहे हैं और उन्हें अपना गुरु मानते हैं को उनके मोबाइल 09892165892 पर संपर्क करें. मुझे पक्का विशवास है वो आपको ये किताब भिजवाने में कोई कसर न उठा रखेंगे. एक बात जान लें इस किताब की बहुत कम प्रतियाँ छपवाई गयीं हैं इसलिए इसकी प्राप्ति के लिए की गयी कोशिश में देरी आपको हाथ मलने पर मजबूर कर सकती है.

आईये चलते चलते तर्ज़ साहब की एक छोटी बहर की ग़ज़ल के चंद खूबसूरत शेर आपको पढवाता हूँ...मुलाहिज़ा फरमाइए...

ज़िन्दगी क्या है और मौत क्या
शब् हुई और सहर हो गयी

उनकी आँखों में अश्क आ गए
दास्ताँ मुख़्तसर हो गयी

चार तिनके ही रख पाए थे
बिजलियों को खबर हो गयी

उनकी महफ़िल से उठ कर चले
रौशनी हमसफ़र हो गयी

48 comments:

दीपिका रानी said...

दर्द जब उमड़ा तो इक आंसू का कतरा हो गया
और जब ठहरा तो बढ़ कर एक दरिया हो गया... बेहतरीन शेर है यह। शुक्रिया ऐसे नायाब शायर से परिचय कराने के लिए।

अनुपमा पाठक said...

वाह! इस परिचय के लिए आभार!
आपका रचना संसार किताबों की दुनिया से नक्षत्रों को ढूंढ़ कर लाता है!
सादर!

Anupama Tripathi said...

अव्वल अव्वल तो समाधी में अँधेरा ही रहा
आखिर आखिर हर तरफ जैसे उजाला हो गया.

janab Tarj ki behtareen shayari padhwane ka abhar Niraj ji ...

सदा said...

दर्द जब उमड़ा तो इक आंसू का कतरा हो गया
और जब ठहरा तो बढ़ कर एक दरिया हो गया

अपनों को अपना ही समझा ग़ैर समझा ग़ैर को
गौर से देखा तो देखा मुझको धोका हो गया
वाह ...बहुत खूब ।

रविकर said...

इसे कहते हैं रूचि | यही है दीवानापन ।

सलाम ।

कोशिश को सलाम ।।

Dr (Miss) Sharad Singh said...

"हिना बन गयी ग़ज़ल" से परिचित कराने के लिए हार्दिक आभार!

mridula pradhan said...

wah.....kya kahoon,bar-bar padh rahi hoon....

expression said...

वाह!!!!
सुन्दर पुस्तक के सुन्दर परिचय के लिए आपका बहुत आभार......
सादर.

वन्दना said...

जिन कायदों को तोड़ के मुजरिम बने थे हम
वो क़ायदे ही मुल्क का दस्तूर हो गए

कोनों में काँपते थे अँधेरे जो आज तक
सूरज को ज़र्द देखा तो मगरूर हो गए

'तर्ज़' इनको अपने सीने में कब तक छुपाओगे
ये ज़ख्म अब कहाँ कहाँ रहे नासूर हो गए
जब शायरी खुद जुबाँ बन जाये फिर कहने को क्या रह जाये …………तर्ज़ साहब से मिलवाने और उनकी शायरी पढवाने के लिये हार्दिक आभार्।

दिगम्बर नासवा said...

दर्द जब उमड़ा तो इक आंसू का कतरा हो गया
और जब ठहरा तो बढ़ कर एक दरिया हो गया ...

गज़ब इस शेर पे तो पूरी शायरी कुर्बान की जा सकती है ... क्या गज़ब के शेर हैं सभी ... ये अफ़सोस की बात है की ऐसे शायर को बुलंदी नहीं मिलती ... मेरेमुंह से हर शेर पे बस वाह वाह ही निकल रही है ... बहुत ही लाजवाब और अज़ीम शायर की किताब से मिलवाया है जो उनको सदियों तक जिन्दा रखेगी ...
और आपकी समीक्षा के अंदाज़ के क्या कहने ... दीवाना बना देते हैं आप किताबो का ...

प्रवीण पाण्डेय said...

आप उम्दा शायरों को गुमनामी से बाहर कम से कम ब्लॉग जगत तक तो लेकर आ रहे हैं।

Kailash Sharma said...

जिन कायदों को तोड़ के मुजरिम बने थे हम
वो क़ायदे ही मुल्क का दस्तूर हो गए

....एक बेहतरीन शायर से मुलाकात कराने के लिये आभार ....

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') said...

बेशकीमत मुलाक़ात के लिए सादर आभार नीरज सर....

निरामिष said...

बेहतरीन नगीनों की मंजुषा!!

उठ्ठा जो दर्दे इश्क़ तो अश्कों में ढल गयी
बेचैनियाँ बढीं तो दुआ बन गयी ग़ज़ल

दुआओं के लिए आभार!! शुभकामनाएं

dr.mahendrag said...

जिन कायदों को तोड़ के मुजरिम बने थे हम
वो क़ायदे ही मुल्क का दस्तूर हो गए
SUNDAR BAHUT HI SUNDAR
es pustak se parichya karane ke liye aabhar

यादें....ashok saluja . said...

नीरज जी, हमेशा की तरह उम्दा शायराना गुफ़्तगू|
शुक्रिया|

जिन्दगी क्या है ,ज़माने को बताऊ क्या
इक मुसाफ़िर था, चलते-चलते नींद आ गई ||
--अज्ञात

Atul Shrivastava said...

आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर की गई है।
चर्चा में शामिल होकर इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और इस मंच को समृद्ध बनाएं....
आपकी एक टिप्‍पणी मंच में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान करेगी......

***Punam*** said...

उठ्ठा जो दर्दे इश्क़ तो अश्कों में ढल गयी
बेचैनियाँ बढीं तो दुआ बन गयी ग़ज़ल!!

जवाब नहीं इस लाजवाब का..

udaya veer singh said...

मित्र गोस्वामी जी , आपके जज्बे को सलाम , आपने अपने प्रयास जो आप सुखानुभूति निहितार्थ करते है ,जो दूसरों को कितनी रोशनी दे रहा है ,प्रशंसनीय है ....बहुत सुन्दर शुभकामनायें /

इस्मत ज़ैदी said...

जिन कायदों को तोड़ के मुजरिम बने थे हम
वो क़ायदे ही मुल्क का दस्तूर हो गए

क्या बात है !!
इतनी खूबसूरत शायरी के ख़ालिक़ की रूह को ख़ुदा ्सुकून बख़्शे और उन को जन्नत में वो जगह अता करे जो दुनिया में न मिल सकी

amrendra "amar" said...

Itne mahan Shayer se parichay karane ke liye bahut bahut shurkiya......baar baar padhne ka man ho rha hai

Mukesh Tyagi said...

माननीय महोदय
नमस्कार
लाजवाब पोस्ट!! इस जानकारी के लिए आपका तहे-दिल से शुक्रिया!!
माननीय तर्ज़ जी की आत्मा को ईश्वर शांति दे!! उनका यह तोहफा उनकी याद दिलों में हमेशा बनाए रखेगा!
सादर/साभार
सारिका मुकेश

रश्मि प्रभा... said...

उठ्ठा जो दर्दे इश्क़ तो अश्कों में ढल गयी
बेचैनियाँ बढीं तो दुआ बन गयी ग़ज़ल... phir ek tohfa , waah

Amrita Tanmay said...

कारवां तो गुजर ही जाता है पर निशानी रह जाती है किताब के रूप में जिससे आपने सुन्दर परिचय करवाया..आभार..

ओमप्रकाश यती said...

कोनों में कांपते थे अँधेरे जो अब तलक
सूरज को ज़र्द देखा तो मगरूर हो गए.
एक से बढ़कर अशआर....भाई नीरज जी बहुत-बहुत आभार.तर्ज़ साहब को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि.

***Punam*** said...

शुक्रिया....
एक बेहतरीन और संजीदा शायर से तारुफ़ कराने के लिए...!
जितने भी शेर आपने यहाँ हम सबके लिए फूलों से बिखेर दिए हैं...
उनकी महक अभी भी ताज़ी है...
एक शायर की उम्मीद कभी ख़त्म नहीं होती..

"है बात वक्त वक्त की चलने की शर्त है
साया कभी तो कद के बराबर भी आएगा"

देवेन्द्र पाण्डेय said...

वाह! बेहतरीन शायरी।

Kunwar Kusumesh said...

गणेश बिहारी तर्ज़ जी को सामने से सुनने का मौक़ा मुझे मिला.वाक़ई वो बहुत प्यारे शेर कहते थे.इस समय वो यादगार लम्हा याद आ गया जब उन्हें सुना था.

अरुण चन्द्र रॉय said...

बढ़िया ग़ज़ल..... बढ़िया किताब से परिचय....

इमरान अंसारी said...

मैं अपनी धुन में आग लगाता चला गया
सोचा न था कि ज़द में मेरा घर भी आएगा

चार तिनके ही रख पाए थे
बिजलियों को खबर हो गयी

बहुत उम्दा है शेर तर्ज साहब के.....सलाम हैं उनको.....आभार है आपका।

Dr. Surendra Saini said...

laajawaab jitnaa padhaa doobtaa chalaa gyaa Satish ji p se shikaayat rahegee mujhe iske baare men pahle bataayaa hotaa to main in gulon kee khushboo se ab tak mehroom n rahtaa. khair aapko saadhuwaad detaa hoon ki aapko ese beshqeemtee ustaad mile

Shiv said...

इक ज़माना था कि जब था कच्चे धागों का भरम
कौन अब समझेगा कदरें रेशमी ज़ंजीर की

है बात वक्त वक्त की चलने की शर्त है
साया कभी तो कद के बराबर भी आएगा

एक से बढ़कर एक बढ़िया शेर. 'तर्ज' साहब की किताब के बारे में पढ़ना बढ़िया अनुभव रहा. आपकी इस श्रृंखला का बढ़ते जाना इसकी पॉपुलरटी की कहानी कहता है.

तिलक राज कपूर said...

हर बार एक नया अहसास होता है अपने कद का, जब आपके ब्‍लॉग पर किसी शायर की प्रस्‍तुति पढ़ता हूँ। एक बात तो तय है कि आप यूँ ही किसी किताब का जि़क्र नहीं करते। आज भी यही है और खुदा चाहेगा कि आगे भी ऐसा ही हो।

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

नीरज जी नमस्कार ! बहुत दिनों बाद फिर आपके ब्लाग पर पुस्तक चर्चा देखकर और "गणेश बिहारी 'तर्ज़' की रचनाओं से रूबरू होकर बहुत अच्छा लगा। आप को इस कार्य के लिये बहुत बहुत बधाई .........
आप द्वारा प्रस्तुत काव्यपाठ भी सुना.... अच्छा लगा.......

Bhushan said...

हमेशा की तरह इस बार भी आपने एक संपूर्ण शायर का परिचय कराया है जिसकी शायरी के पास देने के लिए सब कुछ है. आभार आपका.

Udan Tashtari said...

एक बेहतरीन शायर से मुलाकात कराने के लिये आभार ....

Naveen Mani Tripathi said...

wha goswami ji bahut achhe shayar se maulakat karayee apne ...sadar badhai .

अख़तर क़िदवाई said...

पुस्तक के परिचय के लिए आपका बहुत आभार......

avanti singh said...

prichay bahut hi rochak tarike se likha aap ne ,bdhaai

गिरधारी खंकरियाल said...

अज्ञात को करते हो ज्ञात, शायर के हों घात प्रतिघात

ब्लॉग पर सभी को लब्ध हो ज्ञान, तान शायरी के वितान

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

आद. नीरज जी आपने अश्क और दरिया वाले शेर के बारे में बिल्कुल सही लिखा है...वैसे देखा जाए, तो
अपनों को अपना ही समझा ग़ैर समझा ग़ैर को
गौर से देखा तो देखा मुझको धोका हो गया...
इस शेर ने तो काफ़ी देर तक कुछ और सोचने ही नहीं दिया...
कमाल की शायरी है जनाब...गणेश बिहारी 'तर्ज़’ साहब की...
बिल्कुल आपकी प्रस्तुति जैसी.

mahendra verma said...

गणेश बिहारी जी से परिचय कराने के लिए धन्यवाद।
उनकी रचनाएं उच्च कोटि की हैं।

डॉ. जेन्नी शबनम said...

विस्तार से शायर का परिचय, उनकी शायरी और पुस्तक पर चर्चा पढकर अच्छा लगा. आपके ब्लॉग के द्वारा रचनाकारों का परिचय यूँ ही मिलता रहे. धन्यवाद !

Arvind Mishra said...

इन अजीम शायरों से तआरुफ़ के लिए शुक्रिया!
एक से बढ़कर एक अहसास हैं शेर हैं और अंदाजे बयान को तो कहना ही क्या !

नीरज गोस्वामी said...

नीरज जी,
सादर नमस्ते. आपके ब्लॉग द्वारा श्री बिहारी 'तर्ज़' जी की शायरी से परिचय हुआ. आपका अंदाज़े बयां खूबसूरत कलाम को चार चाँद लगा देता है. इस महत्वपूर्ण जानकारी को इस खूबसूरती के साथ हम तक पहूँचाने का बहुत बहुत शुक्रिया.

भाई जी, श्री सतीश शुक्ला 'रकीब' जी का तहे-दिल से शुक्रिया जिन्होंने आपके ब्लॉग से परिचय कराया.

शुभकामनाओं के साथ
- उषा

आशा जोगळेकर said...

गणेश बिहारी तर्ज जी से मिलवाने का बेहद शुक्रिया । एक से एक बढिया शेर चुने हैं आपने ।

अर्ज़े दकन में जान तो देहली में दिल बनी
और शेहरे लखनऊ में हिना बन गयी ग़ज़ल ।

दर्द जब उमड़ा तो इक आंसू का कतरा हो गया
और जब ठहरा तो बढ़ कर एक दरिया हो गया ।

मैं अपनी धुन में आग लगाता चला गया
सोचा न था कि ज़द में मेरा घर भी आएगा ।

सपने मिलन के मिल के तो काफूर हो गए
इतना हुए क़रीब कि हम दूर हो गए ।

SATISH said...

मरहूम गणेश बिहारी श्रीवास्तव 'तर्ज़ लखनवी' साहिब की किताब "हिना बन गयी ग़ज़ल" के चंद शेर जो मुझे बहुत पसंद हैं नीरज साहिब की पैनी नज़र से भला कैसे बच सकते थे....

अपनों को अपना ही समझा ग़ैर समझा ग़ैर को
गौर से देखा तो देखा मुझको धोका हो गया

जिन कायदों को तोड़ के मुजरिम बने थे हम
वो क़ायदे ही मुल्क का दस्तूर हो गए

'तर्ज़' इनको अपने सीने में कब तक छुपाओगे
ये ज़ख्म अब कहाँ रहे नासूर हो गए
(सीने में अपने 'तर्ज़' छुपाओगे कब तलक)
...पहला मिसरा किताब में बदलना रह गया है

यह दीगर बात है कि याद न हो, लेकिन तर्ज़ साहिब ने ऐसा कुछ नहीं कहा..जो मैंने पढ़ा न हो....कुछ कलाम जो नहीं छप पाए थे...डायरी में ही रह गए वह भी...

कुछ और बहुत खूबसूरत शे'र...

उनकी आँखों में अश्क आ गए
दास्ताँ मुख़्तसर हो गयी

चार तिनके ही रख पाए थे
बिजलियों को खबर हो गयी

आदरणीय नीरज साहिब का तहे दिल से शुक्रगुजार हूँ कि उन्होंने अपने ब्लॉग में इस खूबसूरत अंदाज़ में पेश किया जिसका जवाब नहीं.....साथ ही आप सभी का भी..कि सभी ने अपने अपने तरीके से श्रद्धा सुमन अर्पित किए.

"तू ही जब बेजार है मुझसे तो फिर,
जा तुझे मैंने भी छोड़ा ज़िंदगी........तर्ज़"

सतीश शुक्ला 'रक़ीब'

Yudhisthar raj said...

वाह मजा आए गया तर्ज़ साहब के बारे में जानकर

वाह क्या खूब गाया है मेहदी हसन साहब ने 'हिना बन गई ग़ज़ल'

वाह