Monday, May 9, 2011

साथ बच्चों के जब खिलखिलाने लगे


जब वो मेरी ग़ज़ल गुनगुनाने लगे
तो रकीबों के दिल कसमसाने लगे

आप जिस बात पर तमतमाने लगे
हम उसी बात पर मुस्कुराने लगे

ग़म न जाने कहाँ पर हवा हो गए
साथ बच्चों के जब खिलखिलाने लगे

जिन चरागों को समझा था मज़बूत हैं
जब हवायें चलीं टिमटिमाने लगे

है मुनासिब यही, मयकशी छोड़ दे
पाँव पी कर अगर, डगमगाने लगे

फिर हमें देख कर मुस्कुराए हैं वो
फिरसे बुझते दिये जगमगाने लगे

जुल्म करके बड़े सूरमा जो बने
वक्त बदला तो वो गिड़गिडाने लगे

आज के दौर में, प्यार के नाम पर
देह का द्वार सब, खटखटाने लगे

ख्वाहिशों के परिंदे थे सहमे हुए
देख 'नीरज' तुम्हें चहचहाने लगे





( ये ग़ज़ल सिर्फ मेरी नहीं है इसे कहने में पचास प्रतिशत की भागीदारी मेरे अनुज तिलक राज कपूर साहब की है )

58 comments:

anupama's sukrity ! said...

ख्वाइशों के परिंदे थे सहमे हुए
देख 'नीरज' तुम्हें चहचहाने लगे

ज़िन्दगी का निचोड़ ...अलग अलग अनुभूति ...बहुत सुंदर शब्दों में उकेरी है ...!!
बहुत खूबसूरत शायरी ..!!
हर शेर उम्दा ..!!

इस्मत ज़ैदी said...

ग़म न जाने कहाँ पर हवा हो गए
साथ बच्चों के जब खिलखिलाने लगे

जिन चरागों को समझा था मज़बूत हैं
जब हवायें चलीं टिमटिमाने लगे


जुल्म करके बड़े सूरमा जो बने
वक्त बदला तो वो गिड़गिडाने लगे

बहुत ख़ूब !
हर शेर अपनी अहमियत मनवाता हुआ !
बड़ी सरल और सहज भाषा में
बहुत ही प्रभावी तरीक़े से आप अपनी बात कह जाते हैं
मुबारकबाद क़ुबूल करें

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

आज के दौर में, प्यार के नाम पर
देह का द्वार सब, खटखटाने लगे

कटु बात को भी सहजता से कह दिया है ..


ख्वाइशों के परिंदे थे सहमे हुए
देख 'नीरज' तुम्हें चहचहाने लगे

सुन्दर अभिव्यक्ति ...खूबसूरत गज़ल

रश्मि प्रभा... said...

आज के दौर में, प्यार के नाम पर
देह का द्वार सब, खटखटाने लगे ... aur parampraaon ko raakh ker diya

Sunil Kumar said...

ग़म न जाने कहाँ पर हवा हो गए
साथ बच्चों के जब खिलखिलाने लगे

घर से मस्जिद है अगर दूर चलो यूँ करलें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाये
खुबसूरत ग़जल मुबारक हो.........

singhsdm said...

ग़ज़ल प्यारी बन पड़ी है......जीवन के चंद एहसासों को समेट कर छोटी बहर में बड़ी बड़ी बातें कह डाली आपने......! ये शेर बहुत की सटीक हैं....!
आप जिस बात पर तमतमाने लगे
हम उसी बात पर मुस्कुराने लगे
बहुत सुन्दर वाह वाह.......
जिन चरागों को समझा था मज़बूत हैं
जब हवायें चलीं टिमटिमाने लगे
अच्छा लिखा है हुज़ूर....!
आज के दौर में, प्यार के नाम पर
देह का द्वार सब, खटखटाने लगे

ख्वाइशों के परिंदे थे सहमे हुए
देख 'नीरज' तुम्हें चहचहाने लगे
जिंदाबाद......!!!!

दर्शन कौर धनोए said...

बहुत सुंदर जान पढ़ती है --बच्चो की तरह मासूम ...

vishal said...

ग़म न जाने कहाँ पर हवा हो गए
साथ बच्चों के जब खिलखिलाने लगे

ख्वाइशों के परिंदे थे सहमे हुए
देख 'नीरज' तुम्हें चहचहाने लगे
बहुत खूब साब! अनुज और अग्रज दोनों को बधाई।

दिगम्बर नासवा said...

जिन चरागों को समझा था मज़बूत हैं
जब हवायें चलीं टिमटिमाने लगे ..

बहुत खूब नीरज जी ... हम तो आपकी और तिलक जी की जुगलबंदी देख रहे हैं ... और पढ़ रहे हैं कमाल के मोती ... जीवन के बहुत से रंगो से सजी है ये ग़ज़ल ...

pran sharma said...

Gam n jaane kahan par hwaa ho gaye
saath bachchon ke jab muskrane lage

Khoob badhiya sher hai ! sher
vo padhte hee fauran yaad rah jaaye
Sab ke manon ko sparsh karne waalee
aapkee gazal par aapko badhaaee
deta hoon .

वन्दना said...

ग़म न जाने कहाँ पर हवा हो गए
साथ बच्चों के जब खिलखिलाने लगे
आज के दौर में, प्यार के नाम पर
देह का द्वार सब, खटखटाने लगे

ख्वाहिशों के परिंदे थे सहमे हुए
देख 'नीरज' तुम्हें चहचहाने लगे


हमेशा की तरह शानदार गज़ल्…………हर शेर बेहतरीन्।

संध्या शर्मा said...

ग़म न जाने कहाँ पर हवा हो गए
साथ बच्चों के जब खिलखिलाने लगे
ख्वाहिशों के परिंदे थे सहमे हुए
देख 'नीरज' तुम्हें चहचहाने लगे

सुन्दर अभिव्यक्ति ...खूबसूरत गज़ल...

saurabh she. said...

Neeraj jee namaskar,
Sahaj shaili me gahri bat kahna apki kalam ka hallmark ban gaya hai.Ghazal bahut pasand aai.Khas kar yeh sher:
आज के दौर में, प्यार के नाम पर
देह का द्वार सब, खटखटाने लगे

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

शायर बहुत अनूठा जीव होता है! चिराग को मजबूत समझता है! हम हैं की मिट्टी के दिए की भंगुरता को ले परेशान रहते हैं!

Shiv said...

बहुत सुन्दर ग़ज़ल.

सदा said...

ग़म न जाने कहाँ पर हवा हो गए
साथ बच्चों के जब खिलखिलाने लगे
वाह बहुत खूब कहा है .... ।

daanish said...

फिर हमें देख कर मुस्कुराए हैं वो
फिर बुझे दीप सब जगमगाने लगे
ख्वाहिशों के परिंदे थे सहमे हुए
देख 'नीरज' तुम्हें चहचहाने लगे

बहुत ही शानदार और यादगार ग़ज़ल कही है जनाब
बड़ी उलझन आन पड़ती है क किस शेर का हवाला दिया जाए
हर शेर अपने आप को खुद ही पढवाता हुआ ...
वाह !

डॉ टी एस दराल said...

सारी ग़ज़ल ही शानदार है । निर्मल , कोमल अहसास लिए हुए ।

नीरज जाट जी said...

जुल्म करके बड़े सूरमा जो बने
वक्त बदला तो वो गिड़गिडाने लगे
वाह वाह
मस्त

सतीश सक्सेना said...

ख्वाहिशों के परिंदे थे सहमे हुए
देख 'नीरज' तुम्हें चहचहाने लगे

बधाई भाई जी !

प्रवीण पाण्डेय said...

काश हमें भी देख पंछी चहचहाते।

Kajal Kumar said...

है मुनासिब यही, मयकशी छोड़ दे
पाँव पी कर अगर, डगमगाने लगे ...

इसे पढ़कर याद हो आया कि किसी शायर (शायद मज़ाज) को हाकिम ने कहा कि अगर तुम पीना छोड़ दो मैं तुम्हें मालामाल कर दूंगा. शायर का सवाल था -'तो मियां फिर मैं माल का करूंगा क्या'

Abhishek Ojha said...

हमारी पसंद:
"आप जिस बात पर तमतमाने लगे
हम उसी बात पर मुस्कुराने लगे"

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

bahut khoob

योगेन्द्र मौदगिल said...

khoobsurat gazal.....neeraj ji..sadhuwad

तिलक राज कपूर said...

एक खूबसूरत ग़ज़ल के लिये दिली बधाई।
आपसे बहुत कुछ सीखना हे अभी। मेरा नाम एक खूबसूरत ग़ज़ल से जोड़कर आपने जो सम्‍मान दिया उसके लिये दिल से आभारी हूँ। वो दिन दूर नहीं जब आपकी पुस्‍तक की समीक्षा आपके ब्‍लॉग पर होगी।
अब छप भी जाईये।

इमरान अंसारी said...

नीरज जी......शानदार.....बेहतरीन.....समझ नहीं आता किस शेर की तारीफ ज्यादा करूँ .....सब एक से बढकर एक हैं........आपकी खूबी है की आप भारी - भरकम लफ़्ज़ों का इस्तेमाल किये बिना छोटे बहर की इतनी शानदार ग़ज़लें प्रस्तुत करते हैं.........हैट्स ऑफ इस पोस्ट के लिए |

नीरज गोस्वामी said...

Awesome, sir. Both you and Anuj Tilak Raj.
Regards,

Purvesh Gada
+91-98195 47048
http://about.me/purveshg

Babli said...

बहुत सुन्दर और भावपूर्ण पोस्ट! दिल को छू गयी! उम्दा प्रस्तुती!

Udan Tashtari said...

ग़म न जाने कहाँ पर हवा हो गए
साथ बच्चों के जब खिलखिलाने लगे


-वाह नीरज भाई..यही शेर आजकल नित अहसास रहा हूँ. :)

Mrs. Asha Joglekar said...

फिर हमें देख कर मुस्कुराए हैं वो
फिरसे बुझते दिये जगमगाने लगे

ग़म न जाने कहाँ पर हवा हो गए
साथ बच्चों के जब खिलखिलाने लगे

वाह क्या बात है । गज़ल मे से एक या दो शेर चुनना मुश्किल तो है पर ये दोनों सहज सरल प्रसन्न करने वाले लगे ।

sandeep sharma said...

आप जिस बात पर तमतमाने लगे
हम उसी बात पर मुस्कुराने लगे

ग़म न जाने कहाँ पर हवा हो गए
साथ बच्चों के जब खिलखिलाने लगे

nice post
:)

देवेन्द्र पाण्डेय said...

अच्छी गज़ल।

कविता रावत said...

ग़म न जाने कहाँ पर हवा हो गए
साथ बच्चों के जब खिलखिलाने लगे
....सच बच्चों को देख मर मर कर भी हिम्मत आ ही जाती है .....
बहुत बढ़िया गजल प्रस्तुति के लिए आभार

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

आप जिस बात पर तमतमाने लगे
हम उसी बात पर मुस्कुराने लगे
शानदार शेर नीरज जी,
सब आप जैसे हो जाए, तो दुनिया जन्नत बन जाए :)
फिर हमें देख कर मुस्कुराए हैं वो
फिर से बुझते दिये जगमगाने लगे
उम्मीदें जगाता प्यारा शेर.

राजेश उत्‍साही said...

बस आप कहते रहें हम सुनते रहें।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

बड़े भाई!
आज तो सलीम जावेद वाली गज़ल हो गयी.. तभी कहूँ नशा इतना क्यूं है!!

निर्मला कपिला said...

ग़म न जाने कहाँ पर हवा हो गए
साथ बच्चों के जब खिलखिलाने लगे
बच्चे बडों के खिलौने हैं ये बात साबित कर दी इस शेर के माध्यम से।
जिन चरागों को समझा था मज़बूत हैं
जब हवायें चलीं टिमटिमाने लगे
बहुत खूबसूरत गज़ल है। बधाई आपको।

संतोष कुमार said...

है मुनासिब यही, मयकशी छोड़ दे
पाँव पी कर अगर, डगमगाने लगे


बहुत ही बेहतरीन ग़ज़ल
शुभकामनाएं !

डॉ .अनुराग said...

क्या कहूँ...इन दिनों बहुत कुछ पढ़ रहा हूँ.....बस पढ़ रहा हूँ.....जितना आपको पढता हूँ....उतनी तलब बढती जाती है ...उम्मीद है इस बार जयपुर में जुलाई में मुलाकात होगी...
नदीम कासमी साहब का एक शेर मुझे बेहद पसंद है .....

तमाम उम्र वफ़ा के गुनाहगार रहे
ये ओर बात है के हम आदमी तो अच्छे थे

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

Bachchon ki muskan ki tarh sundar..

............
तीन भूत और चार चुड़ैलें।!
14 सप्ताह का हो गया ब्लॉग समीक्षा कॉलम।

'साहिल' said...

ग़म न जाने कहाँ पर हवा हो गए
साथ बच्चों के जब खिलखिलाने लगे

ये शेर सौ प्रतिशत सही है.............
पूरी ग़ज़ल खूबसूरत है!

सुनील गज्जाणी said...

neeraj jee
pranam !
umdaa gazal ke liye shukariyaa . har sher achcha hai . aur kuch sher to bauht pyaree pyare hai .
sadhuwad .
saadar

Navin C. Chaturvedi said...

नीरज भाई आप तो वाकई मुस्कुराहट के होल्सेल डिस्ट्रिबूटर हैं| आप की ग़ज़ल में भी हँसगुल्लों का बाक़ायदा भरा पूरा इंतेज़ाम होता है|

फिर हमें देख कर..................भाई राज़ की बात इस तरह सरेआम!!!!!!!!!!!!!!!
देह का द्वार..............हाए हाए हाए, यार क्या बात कही हैं| काश................मैं भी आप की तरह कह पाता|

आदमी का अक्स ग़ज़ल में उतर ही आता है| हँसमुख बंदे का भी और संजीदा व्यक्ति का भी| तिलक भाई साब का साथ तो भाई वैसे भी चार चाँद लगा देता है, और आप की ईमानदारी की भी दाद देनी पड़ेगी|

mridula pradhan said...

bahut achchi lagi.

मीनाक्षी said...

ग़म न जाने कहाँ पर हवा हो गए
साथ बच्चों के जब खिलखिलाने लगे ---
बच्चों के साथ खिलखिलाने के लिए हम भी आ पहुँचे...

Manish Kumar said...

sahaj, saral shabdon mein umda baat keh jate hai aap...

मान जाऊंगा..... ज़िद न करो said...

एक खूबसूरत गज़ल के लिए बधाई.....

Kunwar Kusumesh said...

पश्चिमी सभ्यता के कारण समाज में आये एक ज़बरदस्त परिवर्तन को चित्रित करता हुआ आपका निम्न शेर खूबसूरत बन पड़ा है.

आज के दौर में, प्यार के नाम पर
देह का द्वार सब, खटखटाने लगे.

पूरी ग़ज़ल बेहतरीन.

रंजन (Ranjan) said...

ग़म न जाने कहाँ पर हवा हो गए
साथ बच्चों के जब खिलखिलाने लगे...


wonderful!!!

नीरज गोस्वामी said...

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sahaj, saral shabdon mein umda baat keh jate hai aap...

Manish Kumar

नीरज गोस्वामी said...

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ग़म न जाने कहाँ पर हवा हो गए
साथ बच्चों के जब खिलखिलाने लगे ---
बच्चों के साथ खिलखिलाने के लिए हम भी आ पहुँचे...


Meenu

नीरज गोस्वामी said...

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bahut achchi lagi.

Mridula Pradhaan

नीरज गोस्वामी said...

Comment which failed to appear due to blogger breakdown:-


नीरज भाई आप तो वाकई मुस्कुराहट के होल्सेल डिस्ट्रिबूटर हैं| आप की ग़ज़ल में भी हँसगुल्लों का बाक़ायदा भरा पूरा इंतेज़ाम होता है|

फिर हमें देख कर..................भाई राज़ की बात इस तरह सरेआम!!!!!!!!!!!!!!!
देह का द्वार..............हाए हाए हाए, यार क्या बात कही हैं| काश................मैं भी आप की तरह कह पाता|

आदमी का अक्स ग़ज़ल में उतर ही आता है| हँसमुख बंदे का भी और संजीदा व्यक्ति का भी| तिलक भाई साब का साथ तो भाई वैसे भी चार चाँद लगा देता है, और आप की ईमानदारी की भी दाद देनी पड़ेगी|

Navin C Chaturvedi

नीरज गोस्वामी said...

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neeraj jee
pranam !
umdaa gazal ke liye shukariyaa . har sher achcha hai . aur kuch sher to bauht pyaree pyare hai .
sadhuwad .
saadar


Sunil Gajjani

अंकित "सफ़र" said...

"आज के दौर में, प्यार के नाम पर...................", आज के समाज को आइना दिखाता आप का ये शेर, बहुत उम्दा है.

"ख्वाहिशों के परिंदे थे सहमे हुए ...................", वाह वा, सर जी. क्या खूब कहा है. एक नया अंदाज़.

mepretentious said...

'है मुनासिब यही, मयकशी छोड़ दे
पाँव पी कर अगर, डगमगाने लगे '
बहुत सुंदर!
इससे ज्यादा कहना भी अभी नहीं सीखा है.
यहाँ आते रहेंगे और सीखते रहेंगे.

इस ग़ज़ल से रु-बा-रु कराने के लिए आभार
-मुग्धा

Amrita Tanmay said...

खूबसूरत गज़ल ..अनंत शुभकामनायें