Monday, November 15, 2010

तुम हुए जिस घड़ी हमसफ़र

फोटो: गूगल साभार

(दोस्तों पेश है एक और छोटी बहर की गज़ल)

दूरियां मत बढ़ा इस कदर
दूँ सदाएं तो हों बेअसर

सोच मत, ठान ले, कर गुज़र
जिंदगी है बडी मुख़्तसर

याद तेरी हमें आ गयी
मुस्कुराए, हुई ऑंख तर

बिन डरे सच कहें किस तरह
सीखिये आइनों से हुनर

गर सभी के रहें सुर अलग
टूटने से बचेगा न घर

राह, मंजिल हुई उस घड़ी
तुम हुए जिस घड़ी हमसफ़र

घर जला कर मेरा झूमते
दोस्तों की तरह ये शरर

हैं सभी पास “नीरज” कहाँ
वो जिसे ढूंढती है नज़र


मुख़्तसर: छोटी, शरर: चिंगारियां ,

56 comments:

Vijay Kumar Sappatti said...

दूरियां मत बढ़ा इस कदर
दूँ सदाएं तो हों बेअसर

neeraj ji

is sher ko kayi baaer padh liya hai , aaj subah subah aap na jaane mujhe kahan lekar chale gaye ....

kya kahun...

aaj is akele sher par main apni kavitao ko kurbaan karta hoon,

mera naman aapki lekhni ko ..

aapka

vijay

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" said...

आपकी हर ग़ज़ल एकदम A1 होती है ! मज़ा आ गया पढकर ... लाजवाब !

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' said...

सोच मत, ठान ले, कर गुज़र
जिंदगी है बडी मुख़्तसर

कमाल है नीरज जी,,,,
छोटी बहर में बड़ी तालीम देने का फ़न तो कोई आपसे सीखे

याद तेरी हमें आ गयी
मुस्कुराए, हुई ऑंख तर

मुस्कुराए...और आंख तर???
क्या तकरार है वाह

गर सभी के रहें सुर अलग
टूटने से बचेगा न घर
एक सूत्र में बांधने का मूलमंत्र दिया है आपने.

हर शेर बेहतरीन है.

रूपम said...

वहुत खूब ,
अच्छा लिखते है आप
कविता कहने का अंदाज़ पसंद आया !

इमरान अंसारी said...

नीरज जी,

वाह..वाह....बहुत खुबसूरत छोटी बहार की ग़ज़ल की अपनी खूबसूरती होती है जिसे आपने बखूबी पेश किया है...सुभानाल्लाह.....ये शेर बहुत पसंद आये.....

दूरियां मत बढ़ा इस कदर
दूँ सदाएं तो हों बेअसर

सोच मत, ठान ले, कर गुज़र
जिंदगी है बडी मुख़्तसर

बिन डरे सच कहें किस तरह
सीखिये आइनों से हुनर

गर सभी के रहें सुर अलग
टूटने से बचेगा न घर

Anand Rathore said...

bahut khoob...

raat bhar jagta main raha
apni aankho mein leke sahar ..

mahendra verma said...

दूरियां मत बढ़ा इस कदर,
दूँ सदाएं तो हों बेअसर।

सोच मत ठान ले कर गुज़र,
जिंदगी है बडी मुख़्तसर।

नीरज जी,
बहुत ही सुंदर ग़ज़ल है
सभी शे‘र एक से बढ़कर एक हैं

योगेन्द्र मौदगिल said...

wahwa........shandaar bhai ji...wah

नीरज बसलियाल said...

दूरियां मत बढ़ा इस कदर,
दूँ सदाएं तो हों बेअसर।

सोच मत ठान ले कर गुज़र,
जिंदगी है बडी मुख़्तसर।

बिन डरे सच कहें किस तरह
सीखिये आइनों से हुनर|

दो तीन शेर काफी असरदार लगे

vishal said...

याद तेरी हमें आ गयी
मुस्कुराए, हुई आँख तर

गर सभी के रहें सुर अलग
टूटने से बचेगा न घर

हैं सभी पास “नीरज” कहाँ
वो जिसे ढूंढती है नज़र

Excellent again Sir!! Maza aa gaya. Monday means neeraj jee ki gajal or tabsira.. (book review).

राणा प्रताप सिंह (Rana Pratap Singh) said...

बेहतरीन ग़ज़ल..... हर शेर बेमिसाल है|

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
विचार-परिवार

PRAN said...

Aapne to gagar mein sagar bhar diya
hai. khoob ! Bahut khoob !!

तिलक राज कपूर said...

सारी दुनिया शोर मचा रही है कि जंगलों में शेरों की संख्‍या कम हो रही है, यहॉं आकर कारण देख ले, शेर इस तरह सधने लगे तो जंगलों में कहॉं बचेंगे।
मत्‍ले और मक्‍ते के बीच बँधा हर शेर खूबसूरत लग रहा है। बहुत खूबसूरत ग़ज़ल।

वन्दना said...

ज़िन्दगी की तल्ख सच्चाइयों से रु-ब-रु करवाति बेहद उम्दा गज़ल्।

Akanksha~आकांक्षा said...

घर जला कर मेरा झूमते
दोस्तों की तरह ये शरर


हैं सभी पास “नीरज” कहाँ
वो जिसे ढूंढती है नज़र
...बहुत खूब जी !!
_________________
'शब्द-शिखर' पर पढ़िए भारत की प्रथम महिला बैरिस्टर के बारे में...

अरुण चन्द्र रॉय said...

बिन डरे सच कहें किस तरह
सीखिये आइनों से हुनर ...
gazal ke baare me jyada nahi jaanta lekin padh kar bahut achha laga.. khas taur par yah sher... bahut sundar !

राजेश उत्‍साही said...

पसंद आई।

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

घर जला कर मेरा झूमते
दोस्तों की तरह ये शरर

behad khubsurat sher hua hai ye.... :)

shikha varshney said...

हैं सभी पास “नीरज” कहाँ
वो जिसे ढूंढती है नज़र
माशाल्लाह जबाब नहीं.

रचना दीक्षित said...

घर जला कर मेरा झूमते
दोस्तों की तरह ये शरर

बहत खूबसूरत ग़ज़ल. हर एक शेर बेमिसाल.

मो सम कौन ? said...

नीरज साहब,
हम तो फ़िर फ़िर कर वहीं पहली पंक्ति पर पहुंच रहे हैं,
"दूरियां मत बढ़ा इस कदर
दूँ सदाएं तो हों बेअसर"
बहुत अच्छी गज़ल लगी।

इस्मत ज़ैदी said...

दूरियां मत बढ़ा इस कदर
दूँ सदाएं तो हों बेअसर
बहुत उम्दा नीरज जी,


सोच मत, ठान ले, कर गुज़र
जिंदगी है बडी मुख़्तसर
वाक़ई वक़्त तो हाथ से रेत की तरह फिसल ही जाता है


याद तेरी हमें आ गयी
मुस्कुराए, हुई ऑंख तर
क्या बात है !सुबहान अल्लाह !
बड़ा ही ज़बर्दस्त मुताले’आ है इंसानी ज़हन ओ दिल

छोटे बहर की बेहद ख़ूबसूरत ग़ज़ल
मुबारक हो

चला बिहारी ब्लॉगर बनने said...

नीरज जी, अब आपकी ग़ज़ल के लिए बेहतर, बेहतरीनऔर ख़ूबसूरत जैसे लफ्ज़ बौने नज़र आते हैं...बहर छोटी भले हो पर मानी इतने बुलंद हैं कि बस सब कुछ उसमें सिमटा दिखाई देता है. एक खासियत और जो मुझको मुतासिर कर गयी वो ये कि सारे अशार बस आस पास से उठाये हुए लगते हैं.. गुफ्तगू करती सही मायनों में एक मुकम्मल ग़ज़ल!!

प्रवीण पाण्डेय said...

ढा दिया आपने है,
गजबिया कहर।

Rohit Jain said...

लाजवाब ग़ज़ल...

बिन डरे सच कहें किस तरह
सीखिये आइनों से हुनर

बेहतरीन शेर

vins said...

सोच मत, ठान ले, कर गुज़र
जिंदगी है बडी मुख़्तसर...

neeraj ji aap vishwaas nahi karogey... par aapki inn panktiyon ney va_kai mein.. mere andar ek nayi soch ko janm diya hai... aur mere liye yeh bohot hee sahi time pey aapney share kiya hai... bohot bohot dhanyawaad... aapka aur inn pankityon ka aabhaar... :)

Shiv said...

बहुत खूब. जैसे हमेशा लिखते हैं आप. ये शेर;

बिन डरे सच कहें किस तरह
सीखिये आइनों से हुनर

आईने हमें हमारी औकात बता देते हैं:-)

Shiv said...

मैं विजय ज़ी सहमत हूँ.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

याद तेरी हमें आ गयी
मुस्कुराए, हुई ऑंख तर

बिन डरे सच कहें किस तरह
सीखिये आइनों से हुनर

बहुत खूबसूरत बात कह दी है इन शेरों में ....सुन्दर ...

sada said...

बिन डरे सच कहें किस तरह
सीखिये आइनों से हुनर

बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों का संगम है यहां तो
अनुपम प्रस्‍तुति ।

DEEPAK BABA said...

बिन डरे सच कहें किस तरह
सीखिये आइनों से हुनर

सीखेंगे......

पर पहले आप सिखाईय की किस प्रकार छोटे छोटे शब्दों में इत्ती बड़ी बड़ी बातें कह जाते हैं..

सतपाल ख़याल said...

सोच मत, ठान ले, कर गुज़र
जिंदगी है बडी मुख़्तसर ..simply great..wahwa!!

मेरे भाव said...

हैं सभी पास “नीरज” कहाँ
वो जिसे ढूंढती है नज़र
......

behtareen sher hain. shubhkamna

विरेन्द्र सिंह चौहान said...

बहुत खूब....सभी शेर बहुत उम्दा है. बधाई.

सीमा रानी said...

neeraj ji ,

pahala sher to lajwab tha hi uspar ye ....
याद तेरी हमें आ गयी
मुस्कुराए, हुई ऑंख तर

kya kahun aap itana achha likhte hain .subhanallh.

usha rai said...

हैं सभी पास “नीरज” कहाँ
वो जिसे ढूंढती है नज़र
आपकी हर गजल दिल को छू लेती है ! सीख देती है और मीठी टीस भी ! आभार

जितेन्द्र ‘जौहर’ Jitendra Jauhar said...

घर जला कर मेरा झूमते,
दोस्तों की तरह ये शरर|

यहाँ "दोस्तों की तरह ये शरर" में उपमालंकार ने सौन्दर्य-वृद्धि में अपना योगदान दिया है!

पूरी ग़ज़ल ही सुन्दर बन पड़ी है...बधाई!

सुलभ § Sulabh said...

लाजवाब!

सोच मत, ठान ले, कर गुज़र
जिंदगी है बडी मुख़्तसर

कुछ एेसी सलाह की जरुरत थी, इस गजल के माध्यम से मिल गई.

kumar zahid said...

वाह वाह नीरज जी
एक कामयाब मुश्किल कोशिश...
मुश्किल ऐसी कि ...

रास्ते हर कदम पुरखतर
हो बसर की कहां पर बसर?

अनामिका की सदायें ...... said...

बहुत खूबसूरत गज़ल.

mridula pradhan said...

behad achchi lagi.

शरद कोकास said...

इस बहर मे बेहतरीन गज़ल है यह

Ashish said...

Bahut khuub....

दिगम्बर नासवा said...

गर सभी के रहें सुर अलग
टूटने से बचेगा न घर


छोटी बहर में इतनी खूबसूरत ग़ज़ल कहना कोई आपसे सीखे .... बहुत ही लाजवाब शेर .. सधे हुवे ... कमाल के ....

राम त्यागी said...

एक ही शब्द - अतिसुन्दर !!

JHAROKHA said...

sir bahut hi behatreen gazal . har panktiyan bhaut hi sundar bhav samete huye.

याद तेरी हमें आ गयी
मुस्कुराए, हुई ऑंख तर

बिन डरे सच कहें किस तरह
सीखिये आइनों से हुनर
bilkul sach.
sir bahut dino se aap mere blog par nahi aaye.kripya mera marg darshan
mere blog par aakar karen .
dhanyvaad sahit -------
poonam

निशांत बिसेन said...

सोच मत, ठान ले, कर गुज़र
जिंदगी है बडी मुख़्तसर

Simply gr8.

Mrs. Asha Joglekar said...

दूरियां मत बढ़ा इस कदर
दूँ सदाएं तो हों बेअसर

सोच मत, ठान ले, कर गुज़र
जिंदगी है बडी मुख़्तसर

नीरज जी वैसे तो गज़ल का हर एक शेर कमाल का है पर उपर वाले दो कुछ कीमती संदेश दे रहे हैं ।

haidabadi said...

The "Ghazal" is sweet short and smart.
तुझको रक्खे राम तुझको अल्लाह रक्खे
दे दाता के नाम तुझको अल्लाह रक्खे

Chaand Shukla
Denmark

जयकृष्ण राय तुषार said...

बहुत खूब नीरज जी बधाई।

राजीव भरोल said...

बहुत बढ़िया गज़ल.. मतला बहुत ही अच्छा लगा.
"आइनों से..", "जिस घडी हमसफ़र..", "हुई आँख तर.." शेर खास तौर पर पसंद आये.

मुदिता said...

नीरज जी,
आपकी बहुत सी गजलें पढ़ डाली पिछले दो तीन दिन में..बेहतरीन अभिव्यक्ति गज़ब कि पकड़ ,विषय और शब्द दोनों पर ही....बहुत अच्छा लगा आपको पढ़ना...
वैसे तो गुलशन के हर फूल कि अपनी खुशबु अपना रंग होता है..पर इस गज़ल का ये शे'र बेहतरीन लगा ..

बिन डरे सच कहें किस तरह
सीखिये आइनों से हुनर

बहुत बढ़िया....

अंकित "सफ़र" said...

नमस्कार नीरज जी,

छोटी बहर अपना मज़ा भी है और मुश्किलें भी.
मतला क्या खूब कहा है,
"दूरियां मत बढ़ा इस कदर
दूँ सदाएं तो हों बेअसर"
ये शेर भी बेहद पसंद आया........
"बिन डरे सच कहें किस तरह
सीखिये आइनों से हुनर "

श्रद्धा जैन said...

Bahut khoobsurat aur alag sa khyaal liye hue matla ..

aur ye sher bhi kam kamaal nahi tha

गर सभी के रहें सुर अलग
टूटने से बचेगा न घर

waah kitni gahri baat kah di

Apanatva said...

दूरियां मत बढ़ा इस कदर
दूँ सदाएं तो हों बेअसर



याद तेरी हमें आ गयी
मुस्कुराए, हुई ऑंख तर

wah kya baat hai....

har sher ek se bad kar ek hai....