Monday, April 13, 2009

अश्क का कतरा,वही गंगा हुआ



आज जो ग़ज़ल पेश कर रहा हूँ उसकी काफिया बंदी उर्दू ग़ज़ल के रिवायतों से मेल नहीं खाती...लेकिन मुझे लगता है की हिंदी ग़ज़ल लिखने वालों को शायद ये सुविधा है...यूँ तो ग़ज़ल ग़ज़ल होती है और उसके नियमों में सबका बंधना जरूरी है, इसलिए ग़ज़ल के उस्तादों से मेरी इस गुस्ताखी के लिए मैं पहले ही माफ़ी मांग लेता हूँ.

तोड़ना इस देश को, धंधा हुआ
ये सियासी खेल अब गंदा हुआ

सर झुका कर रब वहां से चल दिया
नाम पर उसके जहां दंगा हुआ

तोल कर रिश्ते नफा नुक्सान में
आज तन्हा किस कदर बंदा हुआ

क्या छुपाने को बचा है पास फिर
आदमी जब सोच में नंगा हुआ

मौत से बदतर समझिये जिंदगी
जोश लड़ने का अगर ठंडा हुआ

आँख जब से लड़ गयी है आपसे
नींद से हर शब मिरा पंगा हुआ

दूर सारी मुश्किलें उस की हुईं
पास जिसके आपका कंधा हुआ

जो पराई पीर में "नीरज" बहा
अश्क का कतरा,वही गंगा हुआ


( गुरुदेव पंकज सुबीर जी के आशीर्वाद प्राप्त ग़ज़ल )

55 comments:

डॉ. मनोज मिश्र said...

...........वही गंगा हुआ .क्या सुंदर भावाभिब्यक्ति है .बधाई

अनिल कान्त : said...

मज़ा आ गया ...एकदम मस्त .....बेहतरीन लगी मुझे तो

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

seema gupta said...

जिन्दगी भावनाए इंसान रिश्ते देश सियासत सभी को एक साथ समेटे शानदार भावपूर्ण अभिव्यक्ति ...

Regards

पंकज सुबीर said...

लीके लीक गाड़ी चलै
लीके चले कपूत
ये तीनों तिरछे चलें
शायर, सिंह, सपूत
रवायतों से विद्रोह करना ही तो कवि होने का पहला गुण है । दुष्‍यंत ने हमेशा रवायतों का विरोध किया । उन्‍होंने कहा कि मैं शहर का वज्‍न 12 ही मानूंगा 21 नहीं । क्‍योंकि मैं हिंदी में उसे श हर ही कहता हूं । आज दुष्‍यंत की ग़ज़लें किस स्‍थान पर हैं वो कहने की आवश्‍यकता नहीं है । कहा भी तो गया है '' ग़ज़ल को ले चलो अब गांव के दिलकश नजारों में, मुसलसल फन का दम घुटता है इन अदबी इदारों में '' तो ये तो नया दौर है ग़ज़ल का जिसमें विज्ञान जी , द्विजेन्‍द्र जी, नीरज जी, जैसे गुणीजन हिंदी में ही ऐसी ग़ज़लें कह रहे हैं जिनका कोई सानी नहीं है । चूंकि बात ध्‍वनि की है इसलिय धवनि का शब्‍दकोश से कोई लेना देना नहीं होता उसका तो उच्‍चारण से ही मतलब होता है । जिस प्रकार उर्दू में पृथ्‍वी का उच्‍चारण पिरथवी हो जाता है या ब्राह्मण का बिरहमन हो जाता है उसी प्रकार हिंदी में शह र को श हर तथा वज्‍न को वजन कहा जाता है । चूंकि ग़ज़ल शब्‍दकोश से जियादह ध्‍वनि पर निर्भर है इसलिये मेरे विचार से जिस शब्‍द को जिस भाषा में जिस प्रकार से उच्‍चारित किया जाता है उसका वजन भी वैसा ही होना चाहिये जैसे ब्राह्मण का वजन हिंदी में कुछ और होता है किन्‍तु उर्दू में बिरहमन का कुछ और हो जाता है । मेरे विचार में ध्‍वनि ठीक आनी चाहिये बजाय शब्‍द के । क्‍योंकि ग़ज़लों का व्‍याकरण ध्‍वनि पर आधारित है । दुष्‍यंत ने कहा था कि मैं शहर की जगह नगर नहीं लिख सकता शहर ही लिखूंगा और वही हिंदी में सही भी है । जैसे कई बार ईता के दोष की बात आती है जिसमें काफिये के दो हिस्‍से करके उनका अर्थ टटोला जाता है । किन्‍तु मेरे विचार में हिंदी में लिखने वालों के लिये वैसा करने की आवश्‍यकता नहीं है । खैर ये एक बहस का विषय है और आज इस चक्‍कर में एक बहुत सूंदर और दर्शन से लबालब शेर ''जो पराई पीर में नीरज बहा, अश्‍क का कतरा वही गंगा हुआ'' की प्रशंसा करना न रह जाये । नीरज जी आपकी गज़लें तो सोलह साल की षोडशी की तरह हैं जो आज देखो तो कुछ और तथा कल देखो तो कुछ और । बधाई ।

mehek said...

मौत से बदतर समझिये जिंदगी
जोश लड़ने का अगर ठंडा हुआ

आँख जब से लड़ गयी है आपसे
नींद से हर शब मिरा पंगा हुआ
gazal lajawab hai,ye do sher bahut jyada pasand aaye,badhai.

ताऊ रामपुरिया said...

लाजवाब रचना और गुरुदेव की टिपणी पढकर तो बस आनन्द से भी बडा परमानन्द आगया . बहुत धन्यवाद गुरुजी को यह बताने के लिये और आपको बहुत बहुत शुभकामनाएं.

रामराम.

Vijay Kumar Sappatti said...

aadarniya neeraj ji ;


''जो पराई पीर में नीरज बहा, अश्‍क का कतरा वही गंगा हुआ''

kya baat kahi hai .. gazal ki technicalities to mujhe samajh nahi aati hai .. lekin padhte waqt mujhe bahut aanand prapt hua .. har sher me ek nayi baat hai ..

maut se badtar samajhiye zindagi , josh ladne ka agar tanda hua .

aapko dil se badhai ji
aapka
vijay

Dr. Amar Jyoti said...

'जो पराई पीर में…'
बहुत ख़ूब!

कंचन सिंह चौहान said...

सर झुका के रब वहाँ से चल दिया,
नाम पर उसके जहाँ दंगा हुआ...!
बहुत सही...!

रश्मि प्रभा said...

bahut hi achhi gazal hai......padhkar mann khush ho gaya

Parul said...

बहुत ख़ूब!

संध्या आर्य said...

badhiya hai...........

दिगम्बर नासवा said...

जीवन का फलसफा खूबसूरत अंदाज़ में बयान किया है नीरज जी
behatreen है इस gazal के शेर........मजा आ गया पढ़ कर

सर झुका के रब वहाँ से चल दिया,
नाम पर उसके जहाँ दंगा हुआ...!

MAJAA AA GAYA .....KYA BAAT HAI

मीत said...

क्या बात है भाई. बेहतरीन.

मोना परसाई "प्रदक्षिणा" said...

गज़ल का हर शेर वज़नीहै नीरज जी ,गज़ल की रिवायतों का तो पता नहीं पर सार्थक भाव सटीक शब्दों में गुम्फित होकर गहरा प्रभाव छोड़ते है .

मोना परसाई "प्रदक्षिणा" said...
This comment has been removed by the author.
Syed Akbar said...

सर झुका के रब वहाँ से चल दिया,
नाम पर उसके जहाँ दंगा हुआ...!


बेहतरीन...

prabhat gopal said...

मौत से बदतर समझिये जिंदगी
जोश लड़ने का अगर ठंडा हुआ

kafi acha laga

Nirmla Kapila said...

गज़ल का एक एक शेअर कबिले तरीफ है बहुत बहुत बधाई

संगीता पुरी said...

बहुत बढिया लिखा है ... गजब।

रंजना [रंजू भाटिया] said...

हर शेर बेहतरीन लगा ज़िन्दगी के बेहद करीब ...

Mansoor Ali said...

नीर को नीरज ने जब गंगा कहा,
एक कटरा आँख ने टपका दिया.

-सुन्दर मन, भावः-पूर्ण शब्द... असरदार रचना , बधाई .

-मंसूर अली हाशमी

vandana said...

bahut badhiya likha hai ........hamare liye to yahi kafi hai kyunki gazal ki barikiyan to hamein pata nhi magar gazal ke bhav jaroor samajh aate hain aur hum log to bhavon mein hi jeete hain............gazar ka har sher lajawaab hai.

Priyankar said...

बेहतरीन गज़ल .

गुरु का गुड़ अभी चखा नहीं है . हां! चेला ज़रूर चीनी हो गया है.

SWAPN said...

hamen nahin pata neeraj ji gazal ke hisab se ismen kya kami hai .
...............ganga hua.

lajawaab likha hai aapne ek ek sher heera hai. bahut badhai.

Dev said...

आपको और आपके पुरे परिवार को वैशाखी की हार्दिक शुभ कामना !

"अर्श" said...

नीरज जी नमस्कार,
जब स्वयं प्रभु आये है आपके घर तो मेरी क्या मजाल के कुछ कहूँ.. स्वयं गुरु देव ने यह साफ़ भी कर दिया के शहर को १२ नहीं २१ लेना भी अनुचित नहीं है .. आपके किसी एक शे'र का अगर चर्चा करूँ तो दुसरे के साथ बईमानी होगी ... मगर मकते के बारे में क्या कहने प्रभु ने तो खुद ही कह दिया है के कहीं इस बहस में ये शे'र ना छुट जाए..नीरज जी बहोत ही खुबसूरत ग़ज़ल करीने से सजी अश'आर के साथ.. में बहरे हजज मुसमान सालिम ग़ज़ल आपके इंतज़ार में है...

आपका

अर्श

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

अश्क का कतरा ,वही गंगा हुआ
इतनी समझ तो मुझे नहीं क्या वजन है इस ग़ज़ल का लेकिन मुझे बहुत अच्छी लगी यह ग़ज़ल

venus kesari said...

वाह वाह क्या गजल कही
बहुत उम्दा किस्म के शेरों के लिये आपकी बधाई...

वीनस केसरी

Mumukshh Ki Rachanain said...

भाई नीरज जी,

आपने लिखा कि
अश्क का कतरा, वही गंगा हुआ

"पर कौन सी गंगा??????????
पुरातन काल की वह गंगा जिसे श्रद्धालु आज भी उतना ही पवित्र मानते हैं या आज के तथाकथित बुदिमानों की गंगा जो इसे अपवित्र भी कहते हैं और प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से उसे और अपवित्र करने से बाज भी नहीं आते, भले ही गंगा अपने नैसर्गिक गुणों के कारन अपवित्र न हो "

यह व्यंग या टिप्पणी आप की ग़ज़ल को लेकर नहीं, ग़ज़ल तो सुन्दर है ही, व्यंग तो लोगों में गंगा के बारे में व्याप्त गलत अवधारणा से है.

यमुना जिसे दिल्ली में भयंकर गन्दा कहा जाता है, वह आकर गंगा में इलाहबाद में विलीन हो जाती है और उसका सारा मैलापन जाने कहा धुल जाता है.

गंगा को गन्दा कहने वाले पहले अपने अन्दर की गंदगी को साफ़ कर लें फिर गंगा के बारे में कुछ बात करें, इस ग़ज़ल के सन्दर्भ में मुझे बस इतना ही कहना है क्योंकि आपने शायद पवित्र गंगा का ही प्रयोग अपनी ग़ज़ल में किया होगा. और पवित्र गंगा-भावना ही अश्क के खारे कतरे को भी पूज्यनीय और मिठास युक्त बनाने की शक्ति रख सकती है.

चलिए आप की ग़ज़ल के बहाने ही मुझे गंगा मैया का एक बार फिर से गुणगान करने का मौका मिल ही गया.

जय श्री राम.

(पर इसे किसी पार्टी विशेष का चुनाव प्रचार समझ कर आचार संहिता भंग करने का आरोप न लगा दीजियेगा.)

चन्द्र मोहन गुप्त

RAJ SINH said...

neeraj jee,
aapkee sarjakta par to sabhee fida hain hee . main bhee bayan kar chuka hoon kayee bar .
jo khas kahna chahta hoon vah aapkee 'vidrohita' par . use salaam karta hoon . kyoon ?
pankaj jee ne kitna to kah diya . kya utna hee kafee naheen ? sach to yeh hai ki kal kee kavita, uskee jo bhee vidha ho , kisee naam kee bhee mohtaz naheen hogee . jo 'jan' me hee na vyap sake bhale 'clasik' ho le 'manas' na ban saktee hai na bana saktee hai.

thode me kahoon to gar 'tulsee' bhee 'swantah sukhay' na likhte to shayad sanskkrit ka ek aur clasik de jate par mera manna hai ki 'tulsee' aur tamil ke 'kamban' jaise kaviyon ne hee 'RAM' ko 'vishwas' banaye rakha hai .

MUMUKSCH JEE KEE TIPPANEE KA KYA KAHOON ? VO SAHEE YAD DILA RAHE HAIN KI AASTHA, AADARSH AUR AACRAN ME HAM KITNE VIPREET HAIN .

aur aapkee 'mumbaiya' ka to main bhee hamdagar hoon !

DEKHIYE FIR KAB MILTE HAIN .

PREM, SNEH AUR AAPKEE HIMMAT KO SALAAM !

shyam kori 'uday' said...

.... दिल को छूने वाली अभिव्यक्ति है, तारीफ के लिये .... क्या कहें !!!!!

Shiv Kumar Mishra said...

बहुत शानदार गजल! हमेशा की तरह.

डॉ .अनुराग said...

क्या बात है.....ऐसा कन्धा रहे तो जिंदगी आसान हो जाती है ....देरी के लिए मुआफी ...आपके शहर के नजदीक ही था ....

Prem Farrukhabadi said...

I AM SO HAPPY TO VISIT A BLOG OF COMPLETE SHAAYAR.WISH YOU A EVERGREEN LIFE FOREVER.CONGERTS.

अल्पना वर्मा said...

बहुत ही सुन्दर भाव हैं ,कुछ शेर जहाँ जैसे--
सर झुका कर रब वहां से चल दिया
नाम पर उसके जहां दंगा हुआ--
आज कल की स्थिति से निराश मन के भाव हैं वहीँ..आप का यह शेर-
मौत से बदतर समझिये जिंदगी
जोश लड़ने का अगर ठंडा हुआ-सीख देता हुआ--होसला भरने वाला है.

उम्दा ग़ज़ल नीरज जी!बधाई

dwij said...

नीरज भाई साहब,
एक और बहुत
खूबसूरत ग़ज़ल के लिए बहुत-बहुत बधाई.पंगा काफिया का खूबसूरत इस्तेमाल बहुत पसन्द आया,लेकिन मेरा को मिरा लिखने की ज़रूरत समझ नहीं आई.

सुशील कुमार छौक्कर said...

देरी आने के लिए माफी। हर शेर पर वाह निकल रही है। और सोचने को मजबूर करते है।
मौत से बदतर समझिये जिदंगी
जोश लडने का अगर ठंडा हुआ।
क्या कहूँ .....

गर्दूं-गाफिल said...

शेर दर शेर पढ़ते चले गये ।
वाह वाह वाह करते चले गये

Suman said...

baahut accha laga
loksangharsha.blogspo.com

ज्ञानदत्त पाण्डेय | Gyandutt Pandey said...

मौत से बदतर समझिये जिन्दगी।
जोश लड़ने का अगर ठण्डा हुआ!
---------
आपकी इन पंक्तियों को पढ़ने पर हम जोश लाने का यत्न करने की सोच रहे हैं - गम्भीरता से।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

नीरज भाई ये भी आपकी अन्य कृतियोँ की तरह, बहुत अच्छी लगी --

Dr. Chandra Kumar Jain said...

काफ़िये की बात रहने दीजिये
आपकी सुनकर ये मन चंगा हुआ.
==========================
शुक्रिया नीरज जी
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

Abhishek Mishra said...

Bhavpurn gajal, doosre sher ne vishesh prabhavit kiya.

संजीव गौतम said...

अगर कोई नियम तोड़ने से कला की सुन्दरता बढ़ती है तो आगे से वही नियम हैं.
आप बहुत अच्छा लिखते हैं. काश ये ग़ज़ल मैं कहता.

गौतम राजरिशी said...

"नींद से हर शब मेरा पंगा हुआ" इस अनूठे मिस्‍रे की बेमिसाल शायर को मेरा सलाम...

वैसे भी गुरू जी के विचारों के बाद हम अदनों के सारे शब्द बेमानी हो जाते हैं

shama said...

Neeraj ji,
Maine aapki kaafee rachnayen padh daalee...
Har pankti, yaa kahun har shabd mayne rakhta hai...yahan shabdonka koyi bevajah khel nahee hai...
Aapne meree "aajtak yahantak"pe tippanee deke hausla afzayee aur zarra nawazee kee uske liye tahe dilse shukrguzaar hun...
Chamatkrut to mai reh jaatee hun, jab aapko padhtee hun...
Aapne apne qadam dharteepe rakhke,oochayiyan chhoo lee hain..
Mujh jaisi adna-si wyakti aapke lekhanpe kya tippanee karegee?

जितेन्द़ भगत said...

आपका शब्‍द चयन लाजवाब हैं। कि‍तना अर्थपूर्ण और सटीक।

Science Bloggers Association said...

नीरज जी, मार्वलस गजल कही है आपने। आमतौर से छोटी बहर में अच्छी गजल कहना दुश्वार होता है, पर आपने तो इस गजल में गजब ही ढा दिया है। बधाई।
----------
तस्‍लीम
साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

Manish Kumar said...

सहज और सटीक अशआरों से पूर्ण लगी ये ग़ज़ल

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

रचना बहुत अच्छी लगी,बधाई।
मैनें आप का ब्लाग देखा। बहुत अच्छा
लगा।आप मेरे ब्लाग पर आयें,यकीनन अच्छा
लगेगा और अपने विचार जरूर दें। प्लीज.....
हर रविवार को नई ग़ज़ल,गीत अपने तीनों
ब्लाग पर डालता हूँ। मुझे यकीन है कि आप
को जरूर पसंद आयेंगे....
- प्रसन्न वदन चतुर्वेदी

kumar Dheeraj said...

नीरजी बिल्कुल सही बात कही है आपने । सियासत के खेल ने देश को किस कदर गंदा कर दिया है यह बाद छिपी नही है । अपना काम निकालने के लिए इसे कदर गलत रास्ते पर ले जाया गया है कि लोग इससे घृणा करने लगे है । सियासत का यह खेल लोगो को गलत रास्ते पर ले जा रहा है । अच्छा गजल लिखी है शुक्रिया

hem pandey said...

'जो पराई पीर में "नीरज" बहा
अश्क का कतरा वही, गंगा हुआ'
-लाजवाब. साधुवाद.

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

भावपूर्ण अभिव्यक्ति ...

निर्झर'नीर said...

jo paraii peer mein Neeraj baha !\
ashq ka katra vahii ganga huaa !!

away some ..speechlees