Monday, September 29, 2008

काव्य संध्या: आखरी खुराक


"जिस का डर था बेदर्दी वो ही बात हो गई...."जी नहीं मैं आप को "मिल गए नैना से नैना ओये क्या बात हो गई..." वाला गाना सुनाना नहीं चाहता, मैं तो ये कह रहा हूँ की एक डर जो दिल में था की एक न एक दिन तो इस काव्य संध्या की रोचक श्रृखला का अंत होना ही है वो बात अब हो गई है. अब भाई ये तो विधि का नियम है जो शुरू हुआ है उसका अंत तो होना ही है लेकिन एक के अंत से दूसरे का जन्म होता है, ये भी तो नियम है. काव्य श्रृखला समाप्त हुई तो क्या हुआ क्या पता कोई और नई श्रृंखला कहीं जन्म लेने की प्रक्रिया से गुजर रही हो...
चलिए अधिक दार्शनिकता ना बघारते हुए सीधे वहां चलते हैं जहाँ श्रोता अवाक् हैं ये देख कर की वागीश सारस्वत जी जिन्होंने अभी अपनी रचना का पाठ किया था, अचानक तेजी से मंच की और दुबारा क्यूँ बढ़ रहे हैं. आप भी इस बात से सर न खुजलायें क्यूँ की देखिये वो आमंत्रित कर रहे हैं इस काव्य संध्या के विलक्षण संचालक श्री देव मणि पाण्डेय जी को रचना पाठ के लिए...



परिचय: अत्यधिक मिलनसार, विनम्र और वाकपटु श्री देव मणि पाण्डेय देश भर में होने वाले कवि सम्मेलनों और मुशायरों में एक जाना पहचाना नाम है. आप उस विभाग में हिन्दी अधिकारी के पद पर हैं जिस विभाग के नाम से अच्छे खासे लोगों की घिघ्गी बंध जाती है, जी हाँ सही पहचाना--" आयकर विभाग".

मुस्कुराते हुए देव मणि साहेब ने जो एक बार अपने विशेष अंदाज में अपनी रचनाओं का पाठ शुरू किया तो श्रोता मन्त्र मुग्ध सुनते ही रहे...उन्होंने अपनी काव्य यात्रा का आगाज़ उस शाम से किया जिसने हम सब को एक सूत्र में पिरो दिया था....याने आज काव्य संध्या की शाम.

छ्म छ्म करती गाती शाम
चांद से मिलने निकली शाम.

उडती फिरती है फूलों में
रंग बिरंगी तितली शाम.

आंखों में सौ रंग भरे
आज की निखरी निखरी शाम.

अलग अलग हैं सबके ख्वाब
सबकी अपनी अपनी शाम.

*********
सावन आया धूल उड़ाता रिमझिम की सौग़ात कहां
ये धरती अब तक प्यासी है पहले सी बरसात कहां.

मौसम ने अगवानी की तो मुस्काए कुछ फूल मगर
मन में धूम मचाने वाली ख़ुशबू की बारात कहां.

खोल के खिड़की दरवाज़ों को रोशन कर लो घर आंगन
चांद सितारे लेकर यारो फिर आएगी रात कहां.

भूल गये हम हीर की तानें क़िस्से लैला मजनूं के
दिल में प्यार जगाने वाले वो दिलकश नग़्मात कहां.

ख़्वाबों की तस्वीरों में अब आओ भर लें रंग नया
चांद, समंदर, कश्ती, हमतुम,ये जलवे इक साथ कहां.

ना पहले से तौर तरीके ना पहले जैसे आदाब
अपने दौर के इन बच्चौं में पहले जैसी बात कहां.
*********

ना हंसते हैं ना रोते हैं
ऐसे भी इंसा होते हैं.

दुख में रातें कितनी तन्हा
दिन कितने मुश्किल होते हैं.

खुद्दारी से जीने वाले
अपने बोझ को खुद ढोते हैं.

सपने हैं उन आंखों में भी
फुटपाथों पर जो सोते हैं

**********
दिल के ज़ख्मों को क्या सीना
दर्द न हो तो फिर क्या जीना

प्यार नहीं तो बेमानी हैं
काबा , काशी और मदीना .

महलों वालों क्या समझेंगे
क्या मेहनत,क्या धूल पसीना .

तुम बिन तनहा है हर लम्हा
रीता रीता , साल - महीना

**********
श्रोता कहाँ उन्हें जाने देना चाहते थे...देव मणि जी भी मूड में थे लेकिन समय मूड में नहीं था...घड़ी की सुईयां अपनी रफ्तार से बढ़ रही थीं...समय को शायरी की समझ कहाँ...खुश्क, संवेदनहीन, भागने, दौड़ने वाले और गणित में उलझे हुओं को शायरी से वैसे भी कोई नाता नहीं रहता...
और अब अंत में बहुत आदर से बुलाया जा रहा है आज की हमारी विशेष मेहमान देवी नागरानी जी को :



परिचय: हिन्दी और सिन्धी दोनों भाषाओँ में समान रूप से लिखने वाली देवी नागरानी वर्तमान में न्यू जर्सी अमेरिका में शिक्षिका हैं, इनकी लगभग चार पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं.हाल ही में प्रकाशित पुस्तक "दिल से दिल तक " है जिसका विमोचन कुछ माह पूर्व मुंबई में हुआ था.

देवी नागरानी जी, जिन्हें मैं स्नेह से दीदी कहता हूँ, ने अपनी मीठी और सुरीली आवाज में जब गा कर अपनी ग़ज़लें सुनाईं तो श्रोता झूम उठे.

सबसे पहले उन्होंने अपनी ग़ज़लों के कुछ शेर सुनाये...आप देखें:

मुहब्बत की ईंटें न होती जो उस में
तो रिश्तों की पुख्ता ईमारत न होती
*
उस से कुछ इस तरह हुआ मिलना
मिलके कोई बिछुड़ रहा जैसे
*
तेगों से वार करते वो मुझ पर तो गम न था
लफ्जों के तीर चीर के मेरा जिगर गए

कुरुक्षेत्र है ये जिंदगी रिश्तों की जंग है
हम हौसलों के साथ हमेशा गुजर गए
*
मुस्काते मंद मंद हैं हर इक सवाल पर
हर इक अदा जवाब की कितनी है लाजवाब
*
फूलों की सोहबतों ने यूँ आदत बिगाड़ दी
भूली मैं कैसे खार चुभा था यहीं कहीं
*
वो खड़ी है बाल खोले आईने के सामने
एक बेवा का संवारना और सजना भी है क्या
*
डोली तो मेरे ख्वाब की उठ्ठी नहीं मगर
यादों में गूंजती हुई शहनाईयां रहीं

बचपन तो छोड़ आए थे, लेकिन हमारे साथ
ता-उम्र खेलती हुई अमराईयाँ रहीं

चाहत खुलूस प्यार के रिश्ते बदल गए
जज़्बात में न आज वो गहराईयाँ रहीं
*
दौलत को तिरे दर्द की रख्खा सहेज कर
मोती कभी पलकों से गिराए नहीं हमने

आई जो तेरी याद तो लिखने लगी ग़ज़ल
औरों को गीत रोके सुनाये नहीं हमने
**
जरा सोच लो दोष देने से पहले
क्या इक हाथ से कोई ताली बजी है
*
अनबन ईंटों में कुछ हुई होगी
यूँ न दीवार वो गिरी होगी

पुख्ता होंगीं कहाँ से दीवारें
कुछ मिलावट कहीं रही होगी

तेरी उंगली उठी किसी पे अगर
कोई तुझ पर भी तो उठी होगी
*
जैसे ही देवी जी ग़ज़लें सुना के मुडीं श्रोता खड़े हो कर उनके सम्मान में तालियाँ बजाने लगे...हर ताली और और की पुकार कर रही थी....लेकिन अब तक तो आप जान ही चुके होंगे की समय बहुत बलवान हो चुका था...शाम रात में ढल चुकी थी और दूर मुंबई से आए महमानों को घर लौटने की जल्दी अब उनके चेहरे पर स्पष्ट दिखाई दे रही थी...इस तरह एक यादगार काव्य संध्या अपने खूबसूरत मुकाम पर आख़िर पहुँच ही गयी और जिसका डर था बेदर्दी वही बात हो ही गयी....
इस काव्य संध्या की अद्भुत यात्रा में मुझे बहुत से सहयात्री मिले कुछ जो अंत तक मेरे साथ रहे लगातार मेरा हौसला बढ़ते रहे और कुछ जो बीच बीच में आ कर मुझे सँभालते रहे पूछते रहे की भाई कोई तकलीफ तो नहीं है ना, है तो बताओ हम मदद करते हैं, बढ़िया चल रहे हो चलते रहो.
मेरा फ़र्ज़ बनता है की मैं सर्व श्री अभिषेक ओझा जी, अमर ज्योति जी, अनिता जी, अनुराग जी, अनूप शुक्ल जी, अशोक पाण्डेय जी, बवाल जी, भावेश झा जी, चंद्र कुमार जैन जी, दीपक जी, फिरदौस खान जी, ज्ञान दत्त पाण्डेय जी, गौतम जी, हर्षद जंगला जी, जीतेन्द्र भगत जी, कंचन सिंह जी, कुश जी, लावण्या जी, मनीष कुमार जी, महेंद्र मिश्रा जी, मकरंद जी, मीत जी, मिनाक्षी जी, मुमुक्ष जी,नजर महमूद जी, नीतिश राज जी, पल्लवी जी, परमजीत बलि जी, पारुल जी, गुरुदेव पंकज सुबीर जी, रंजना भाटिया जी, राज भाटिया जी, रक्षंदा जी, रश्मि प्रभा जी, रंजन जी, रविकांत जी, सचिन मिश्रा जी, सीमा जी, शोभा जी, सुशील कुमार जी, स्मार्ट इंडियन जी, स्वाति जी, श्रद्धा जी, भाई शिव कुमार मिश्र जी, ताऊ रामपुरिया जी, उड़न तश्तरी महाराज( समीर लाल जी), विजय मुदगिल जी, वीनस जी, विपिन जिंदगी जी, योगेन्द्र मुदगिल जी और जाकिर अली जी.( वो सब भी भी जो चुपचाप आए और मेरा कन्धा थपथपा कर चले गए) को इस सहयोग के लिए आदर सहित नमन करूँ.

आप सोच रहे होंगे की भाई शिव ने जिस कुरता धारी शायर (याने की मैं ) के आने और अपनी शायरी सुनाने की बात की थी, वो कहाँ है? उसका नंबर कब आएगा? जो आप को बता दूँ की मेरे मन में आईडिया आया की जब मैंने वो ग़ज़ल, जिसे काव्य संध्या में सुनाया था, अपने ब्लॉग पर पहले से ही लगा रखी है तो उसे दुबारा यहाँ फ़िर से पढ़वाने में क्या तुक...??
आप इस बात को सुन कर शरमाते सकुचाते हुए कहिये ना "वाट एन आईडिया सर जी..."
और मैं फ़िर अभिषेक बच्चन की तरह सर को झटका देकर मुस्कुरा कर अपनी टांग हिलाता हूँ...

चलते चलते एक शेर मेरी अगली ग़ज़ल से:

जब तलक जीना है "नीरज" मुस्कुराते ही रहो
क्या ख़बर हिस्से में अब कितनी बची है जिन्दगी



25 comments:

seema gupta said...

जब तलक जीना है "नीरज" मुस्कुराते ही रहो
क्या ख़बर हिस्से में अब कितनी बची है जिन्दगी
" bda jindadil sher hai aapka, or utne hee jindadil aap inssan bhee hain, iss kavy sandyha ke sath ka safar bhut accha rha, ek se bdh kr ek rachaneyn pdhne ko mile or bhut kuch sikhne ko bhee mila. khair end to hr cheez ka ek din hona hee hai, magr ye safar yadgar rhega, or apke vjes se hume ye safar ka hisa bnne ka mauka mila uske liye bhut bhut shukriya"

Regards

Mumukshh Ki Rachanain said...

भाई नीरज जी,
काव्य संध्या का प्रस्तुतीकरण जितना उम्दा था, उसकी जितनी भी तारीफ की जाय कम है, एक बार फिर हार्दिक बधाई स्वीकार करें.
सच कहा आपने अंत एक सत्य है.
इस सत्य को हर जीवित आत्मा भली भांति जानती है, किंतु जन्म एक सत्य है किसी को पता नही होता, क्योंकि तब कोई होता ही नही, इसी तरह कब क्या कोई नई प्रस्तुति कब -कहाँ-कैसे मिल जायेगी ,कोई नही जानता, परन्तु सामने आने के बाद प्रतिक्रियाएं, आलोचनाएं, समालोचनाएँ ज्यादा आसन हो जाती है , क्योंकि यह आम मानव का एक स्वाभाविक स्वभाव है.
आपने एक और सत्य बात कही कि
" समय को शायरी की समझ कहाँ...खुश्क, संवेदनहीन, भागने, दौड़ने वाले और गणित में उलझे हुओं को शायरी से वैसे भी कोई नाता नहीं रहता..."
कारण कि घायल की गति घायल ही जानता है.
जीवन की सच्ची समझ जीवन के संध्या बेला में, सारे अनुभवों के बाद ही हो पाती है . तभी समझ में आता है कि क्या खोया क्या पाया, समाज को क्या दिया, समाज से क्या मिला, किस-किस को लुटा, किस-किस से लुटे आदि-आदि..............

चन्द्र मोहन गुप्त

पंकज सुबीर said...

ये तो ग़लत बात है कि अपनी बारी आने पर पतली गली पकड़ ( श्रोताओं की हूटिंग का डर था क्‍या , और हमारा क्‍या जो हम पिछले चार पौस्‍टों से अंडे टमाटर लिये तैयार बैठे थे ) कम अ स कम वो लिंक तो देते जहां पर वो ग़ज़ल है । खैर आपने एक मुश्किल काम ऐसे कर दिया जैसे बह़त ही आसान था । आपको बधाई पहले एक अच्‍छे आयोजन के लिये और फिर उसकी बहुत बहुत अच्‍छी रिपोर्टिंग के लिये ।

Gyandutt Pandey said...

आपकी पोस्टों से एक बात स्पष्ट लगी। कविता और काव्य करने वाला मन सब तरफ पाया जाता है। और काव्य-उकृष्टता व्यापक है।
आशा है आप लोगों से इसी प्रकार मिलाते रहेंगे।

रंजना [रंजू भाटिया] said...

जब तलक जीना है "नीरज" मुस्कुराते ही रहो
क्या ख़बर हिस्से में अब कितनी बची है जिन्दगी

बहुत खूब ..पर यह बात तो ग़लत है सब खुराके इतने अच्छे ढंग से दी .पर अपनी बारी आने पर सिर्फ़ एक शेर ..कोई बात नही आप दुबारा सुने दे ..बहुत अच्छा रहा यह सफर ...एक तो ख़ुद को साथ महसूस किया ..दूसरा लगा की इस तरह के आयोजन होते रहने चाहिए ...शुक्रिया आपकी मेहनत काबिले तारीफ है जो हम तक यह आपने पहुंचाया

ताऊ रामपुरिया said...

नीरज जी आपने ये बिल्कुल नए अंदाज का काम किया है ! इस तरह से पुरे आयोजन को इतने लोगो तक
इस जीवंत अंदाज में पहुचाना कोई हँसी खेल नही है ! आपने इतना दुरूह कार्य किया है की आपको जितना
धन्यवाद दिया जाए वो कम पडेगा ! मैं आपको प्रणाम करता हूँ और अनंत शुभकामनाएं स्वीकार कीजिये मेरी तरफ़ से !

डॉ .अनुराग said...

नीरज जी....आपके शेर से inspire होकर कुछ कलम-घसीटी करने का मन हो आया सो ठेल रहा हूँ...मुआफ करना ...

मिल के साथ बैठे एक वक़्त गुजरा
इन दिनों तू कहाँ है जिंदगी !

Udan Tashtari said...

ये हुआ न धमाकेदार आयोजन. देव मणी जी भी खूब छाये. आपको अपनी गजल का लिंक तो जरुर ही देना चाहिये. :)

बहुत बहुत बधाई, जय हो और शुभकामनाऐ‍.

दीपक "तिवारी साहब" said...

बेहतरीन काव्य गोष्टी का स्वाद मिला !
तिवारी साहब का सलाम !

सुशील कुमार छौक्कर said...

नीरज जी, काश ऐसी संध्या मे हम भी वहाँ होते, कितनी प्यारी सुन्दर रचनाएं मिलती सुनने को। पर पढ कर भी बहुत ही आनंद आया।

जब तलक जीना है "नीरज" मुस्कुराते ही रहो
क्या ख़बर हिस्से में अब कितनी बची है जिन्दगी।

बहुत खूब।

ना हंसते हैं ना रोते हैं
ऐसे भी इंसा होते हैं.
दुख में रातें कितनी तन्हा
दिन कितने मुश्किल होते हैं.
खुद्दारी से जीने वाले
अपने बोझ को खुद ढोते हैं.
सपने हैं उन आंखों में भी
फुटपाथों पर जो सोते हैं

वैसे सभी बहुत अच्छी लगी। पर ये दिल के पास आकर कुछ कह गई।

जितेन्द़ भगत said...

आपने दोनों जगह मंच का सही संचालन कि‍या। इस आनंदानुभूति‍ के लि‍ए आभार।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

आप ऐसे ही आयोजन करवाते रहीये नीरज भाई साहब और हमेँ देवीजी , देवमणि पाँडेयजी जैसे कवियोँ को सुनने का सुअवसर मिलता रहे
आप कहीँ नहीँ जायेँगेँ ..
लिखते, सुनते, सुनवाते रहेँगेँ ..
ये पक्का विश्वास है :)
- लावण्या

गौतम राजरिशी said...

....मनभावन.मजा आ गया.हर खुराक एक से बढ़ कर एक....क्षुधा को और और बढ़ाती हुई.
और इस समापन शेर की पूरी गज़ल कब पढ़्वा रहे हैं?

रविकांत पाण्डेय said...

अहा! आनंद ही आनंद। सब एक से बढ़कर एक! पर ये आपने गलत किया नीरज जी....सिर्फ़ एक शेर!!! भूखे को भरपेट भोजन न देकर सिर्फ़ एक कौर देकर टरकाना भारतीय परंपरा के विपरीत है।

श्यामल सुमन said...

नीरज भाई,

जब तलक जीना है "नीरज" मुस्कुराते ही रहो
क्या ख़बर हिस्से में अब कितनी बची है जिन्दगी

जिन्दादिली से परपूर्ण इन पंक्तियों के लिए बधाई। हो सके तो पूरी रचना के दर्शन करवाने की कृपा करें।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com

rakhshanda said...

आप ऐसे ही आयोजन करवाते रहीये नीरज ji

rakhshanda said...

आपको ईद और नवरात्रि की बहुत बहुत मुबारकबाद

haidabadi said...

नीरज भाई
खा करके खुराकें तंग आ गए थे
अब रोगी की दशा उत्तम हो गई होगी
देवी जी और देव साहिब ने तो कमाल कर दिया है
उनको पढ़ कर बड़ जाती है मुख की आभा
अब तो भोग पढ़ चुका है
स्वामी नीरज का शेर बहुत पसंद आया
जब तलक जीना है "नीरज" मुस्कुराते ही रहो
क्या ख़बर हिस्से में अब कितनी बची है जिन्दगी
मौके का फ़ायदा उठाते हुए मैं भी अपना एक शेर चिपकाने
ज़ुर्रत कर रहा हूँ
जिन्दगी तो फरेब देती है
मौत से काश हम मिले होते

चाँद शुक्ला हदियाबादी
डेनमार्क

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

aapne iske liye bahut mehnat ki hai.. aur aapki mehnat ke liye koti koti badhai..

sari hi khurake asardar rahi..

Dr. Chandra Kumar Jain said...

नीरज जी,
सच कहूँ आखिरी खुराक ने तो
बिल्कुल चंगा कर दिया.
इस किस्त की ग़ज़लें लाजवाब हैं
और आपकी वह बात भी जो
मुस्कान का मोल समझा रही है.
===========================
शुक्रिया
डॉ.चन्द्रकुमार जैन

Kavi Kulwant said...

Niraj ji bahut mehanat ki aapne..
kaabile taarif hai aap ki mehnat.. bahut rang le ke aayee hai...... yeh aap ki report(s)...

anitakumar said...

वॉह्ट ए प्रेसेंटेशन सर जी,नमन

bavaal said...

आदरणीय नीरज जी, क्या हम आपके नहीं हैं ? इतना सुंदर आयोजन देखकर मैं तो ठगा सा ही रह गया था . क्या टीपता, क्या टीप ही सकता था ? बहुत बेहतर. अल्फाज़ की ज़द के परे तारीफ़ है सर . मैं देर से नहीं आया मालिक बस देखता रह गया न इसीलिये . आपकी फ़रमाइश पर शेर छोड़ा था ब्लॉग पर. थोड़ा वक्त निकाल कर पढ़ लीजियेगा . आपका अपना

venus kesari said...

नीरज जी नमस्कार
जिस तरह से रोग का प्रकोप कम होने पर आदमी को आलस्य घेर लेता है और वो दावा लेने में कोताही करने लगता है उसी तरह आपकी आखरी खुराक लेने में मुझको भी विलंब हो गया
मगर आखरी खुराक लेते ही रोग जड़ सहित गायब हो गया
इस पूरी ट्रीटमेंट के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद
वीनस केसरी

Shiv Kumar Mishra said...

भइया,
देवमणि पाण्डेय जी तो छा गए...उनकी रचनाओं में कुछ है. देवी नागरानी जी की गजल भी बहुत खूब रही....अगली बार जिस काव्य संध्या में भी जाईयेगा, ऐसी ही प्रस्तुति करियेगा.