Tuesday, June 24, 2008

संध्या को आँखें मूँद कर



ग़ज़ल उर्दू की विधा है या हिन्दी की ये बहस का विषय हो सकता है लेकिन अभिव्यक्ति कभी भाषा की मोहताज़ नहीं होती. मेरे प्रिय शायर स्व.श्री कृशन बिहारी "नूर" साहेब की एक ग़ज़ल पेश है जिसमें देखिये उन्होंने अपनी ग़ज़ल में हिन्दी शब्दों का किस खूबसूरती से प्रयोग कर के जादुई असर पैदा किया है.

आते जाते साँस हर दुःख को नमन करते रहे
उँगलियाँ जलती रहीं और हम हवन करते रहे

कार्य दूभर था,मगर ज्वाला शमन करते रहे
किस हृदये से क्या कहें, इच्छा दमन करते रहे

दिन को आँखे खोल कर,संध्या को आँखें मूँद कर
तेरे हर इक रूप की पूजा नयन करते रहे

खैर हम तो अपने ही दुःख-सुख से कुछ लज्जित हुए
लोग तो आराधना मैं भी गबन करते रहे

हम जब आशंकाओं के पर्वत शिखर तक आ गए
आस्था के गंगा जल से आचमन करते रहे

चलना आवश्यक था जीवन के लिए चलना पड़ा
"नूर" ग़ज़लें कह के दूर अपनी थकन करते रहे

21 comments:

अल्पना वर्मा said...

खैर हम तो अपने ही दुःख-सुख से कुछ लज्जित हुए
लोग तो आराधना मैं भी गबन करते रहे

-bahut hi achche gahazal hai.
-vichar/chintan bhi samayeek hain.
* Krishna'noor ' ji ki aur bhi ghazalen padhvayeeye.pahli baar un ki ghazal padhee hai -
dhnywaaad.

मीत said...

आह नीरज साहब, क्या बात है. बहुत ही बढ़िया है भाई. वाह !

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

आहा! क्या बात है नीरज जी.. दिन बना दिया इतनी बहडिया ग़ज़ल पढ़वाकर

DR.ANURAG said...

लना आवश्यक था जीवन के लिए चलना पड़ा
"नूर" ग़ज़लें कह के दूर अपनी थकन करते रहे
vah vah....kya bat kahi hai....

सुशील कुमार छौक्कर said...

आते जाते साँस हर दुःख को नमन करते रहे
उँगलियाँ जलती रहीं और हम हवन करते रहे

चलना आवश्यक था जीवन के लिए चलना पड़ा
"नूर" ग़ज़लें कह के दूर अपनी थकन करते रहे

नीरज जी बहुत सुन्दर। आपकी पोस्ट पढकर आंनद आता है।

रंजू ranju said...

दिन को आँखे खोल कर,संध्या को आँखें मूँद कर
तेरे हर इक रूप की पूजा नयन करते रहे

खैर हम तो अपने ही दुःख-सुख से कुछ लज्जित हुए
लोग तो आराधना मैं भी गबन करते रहे

शुक्रिया इसको यहाँ पढवाने का

pallavi trivedi said...

खैर हम तो अपने ही दुःख-सुख से कुछ लज्जित हुए
लोग तो आराधना मैं भी गबन करते रहे

waah...bahut sundar ghazal padhwai aapne.

Priyankar said...

अरे वाह ! नूर साहब के तो हम भी फ़ैन हैं . उनकी 'आईना झूठ बोलता ही नहीं' जैसी गज़लें अपनी अर्थवत्ता और सरलता के लिए चाही-सराही जाती हैं .

अशोक पाण्डेय said...

सचमुच गजल में हिन्‍दी शब्‍दों का खूबसूरती से इस्‍तेमाल हुआ है। पढ़ाने के लिए धन्‍यवाद।

मोहिन्दर कुमार said...

सुन्दर भाव भरी रचना के लिये बधाई... आप की गजल पढ कर एक और गजल याद आ गई..

अपनी मर्जी से कहां अपने सफ़र में हम हैं
रुख हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं

Dr. Chandra Kumar Jain said...

हाथों से हवन
और
आचमन दोनों को
सम्भव बनाने वाले
शायर के नयन
पूजा की तरह
अपने भावों का
जतन करते हुए
'नीरज-कथन' का
'नूर'बनकर पेश आए है.
=======================
अंतस्तल को छूती हुई प्रस्तुति,
अतल गहराइयों से आभार.
डा.चन्द्रकुमार जैन

योगेन्द्र मौदगिल said...

ईश्वर की अद्वितिय रचना मिष्टी की मासूम अदा
बचपन की यादें खुलवाएं नीरज भैय्या खोपोली

राकेश खंडेलवाल said...

सच कहा नीरज भाई. नूर साहब की कलमही तो लिख सकती थी

मैं एक कतरा हूँ लेकिन मेरा वज़ूद तो है
हुआ करे जो समन्दर मेरी तलाश मेम है
मैं देवता की तरह कैद अपने मंदिर में
वो मेरे जिस्म के बाहर मेरी तलाश में है

मेरे भी प्रिय शायरों में हैं नूर साहब ..

योगेन्द्र मौदगिल said...

हम से ना पूछो कि कैसे आचमन करते रहे
जेब खाली और पण्डित को नमन करते रहे

पुरखे तो सारे के सारे हंस रहे होंगे मिंया
क्योंकि हम उनकी तरह सब कुछ दमन करते रहे

नूर साहेब की गज़ल का शेर हरइक खूब है
मौदगिल खुश हो के नीरज को नमन करते रहे

Mumukshh Ki Rachanain said...

भाई नीरज जी
आपने अपने प्रिय शायर स्व.श्री कृशन बिहारी "नूर" साहेब की निम्न ग़ज़ल
आते जाते साँस हर दुःख को नमन करते रहे
उँगलियाँ जलती रहीं और हम हवन करते रहे

कार्य दूभर था,मगर ज्वाला शमन करते रहे
किस हृदये से क्या कहें, इच्छा दमन करते रहे

दिन को आँखे खोल कर,संध्या को आँखें मूँद कर
तेरे हर इक रूप की पूजा नयन करते रहे

खैर हम तो अपने ही दुःख-सुख से कुछ लज्जित हुए
लोग तो आराधना मैं भी गबन करते रहे

हम जब आशंकाओं के पर्वत शिखर तक आ गए
आस्था के गंगा जल से आचमन करते रहे

जो प्रस्तुत की है वह आज के मनुष्यों का सही चित्रण प्रस्तुत करता है क्योंकि आज का मनुष्य जो कुछ बी करता है, उसपर भी संदेह से भरा रहता है, हर कार्य में स्वार्थ तलाशता है , धार्मिक कार्य करना उसकी मजबूरी है पर मन शशंकित रहता है कहने का मतलब है की पर्याप्त ज्ञान न होने से विस्वास नही बनता और अविश्वास ही मानव को सशंकित बना देती है . यदि पर्याप्त ज्ञान न हो तो जिसकी शरण में हो उस ज्ञानी के ज्ञान पर श्रद्धा तो रखनी ही होगी , इसे परिप्रेक्ष में मैंने भी चाँद लाइन अपने " श्रद्धा" कविता- संग्रह में कभी लिखे थे , जिन्हें, मैं पुनः उधृत कर रहा हूँ...........
श्रद्धा
(३३)
अच्छा दिखाने कि ख्वाहिश सबकी
फिर, झूँठ ज़हन में क्यों आते हैं
शायद अन्दर डर है या फिर वे
इच्छाओं का सागर अपनाते हैं
प्रयास सदा चींटी भी करती है
पर झूंठ-ग़लत कर्मों से रह दूर
ज्यों श्रद्धा में डूबे कर्मवीर को सब
पर्याय"प्रयास" का ही बतलाते हैं

चंद्र मोहन गुप्ता

Udan Tashtari said...

छा गये...स्व.श्री कृशन बिहारी "नूर" को पढ़वाया, वाह जी वाह.

महेंद्र मिश्रा said...

नीरज जी
बहुत सुंदर अभिव्यक्ति वाह .धन्यवाद

Gyandutt Pandey said...

धन्यवाद नीरज जी!

श्रद्धा जैन said...

आते जाते साँस हर दुःख को नमन करते रहे
उँगलियाँ जलती रहीं और हम हवन करते रहे

वह नीरज जी नूर साहेब की हिन्दी की ग़ज़ल देखी
कुछ ऐसी की ग़ज़लों से मिलाते रहे

हम आपके आभारी है

महावीर said...

बहुत बहुत धन्यवाद 'नूर' साहब की इतनी ख़ूबसूरत ग़ज़ल पढ़ने का अवसर देकर।
जो लोग ग़ज़ल में हिंदी शब्दों के प्रयोग को ग़लत समझते हैं, यह उनकी भूल या अनभिज्ञता है। हिंदी ही नहीं बहुत पहले संस्कृत में भी वर्ण वृत्त मिलेंगे जो आगे चल कर उर्दू ग़ज़लों की बहरों में देखा गया है। एक छोटा सा उदाहरणः-
'बहरे-मुतकारिब मुसम्मन' जिसमें 122 (फऊलुन)-4 बार और संस्कृत वर्ण वृत्त
'भुजंगप्रयात' में भी 8 प्रति चरण 'यगण' (।ऽऽ) चार बार होते हैं जिसका अर्थ है कि उर्दू बहर और संस्कृत वृत्त में साम्य है।
इसके अतिरिक्त, उर्दू का नाम होने से ग़ज़ल उर्दू ज़बान की धरोहर नहीं हो जाती है। ग़ज़ल
सार्वभौमिक है, किसी भी भाषा में लिखी जा सकती है।
'नूर' साहब की यह ग़ज़ल हर तरह से एक उम्दा ग़ज़ल है जिसके लिए फिर एक बार फिर आपका धन्यवाद।

seema gupta said...

चलना आवश्यक था जीवन के लिए चलना पड़ा
"नूर" ग़ज़लें कह के दूर अपनी थकन करते रहे

"wah wah bhut khub"

Regards