Monday, April 7, 2008

मन अमराई यादें कोयल


जड़ जिसने भी काटी प्यारे
अपना ही था साथी प्यारे

सच्चा तो सूली पे लटके
लुच्चे को है माफ़ी प्यारे

उलटी सीधी सब मनवा ले
रख हाथों में लाठी प्यारे

सोचो क्या होगा गुलशन का
माली रखता आरी प्यारे

इक तो राहें काटों वाली
दूजे दुश्मन राही प्यारे

भोला कहने से अच्छा है
देदो मुझको गाली प्यारे

मन अमराई यादें कोयल
जब जी चाहे गाती प्यारे

तेरी पीड़ा से वो तड़पे
समझो सच्ची यारी प्यारे

तन्हा जीना ऐसे नीरज
ज्यूँ बादल बिन पानी प्यारे

20 comments:

Shiv Kumar Mishra said...

वाह! वाह! बहुत खूब!

haidabadi said...

जनाबे नीरज साहिब
होली के बाद आपकी शायरी में निखार आया है
दोनों गज़लें देखीं एक खूबसूरत एक खूबसीरत
ख़याल की पाकीज़गी ज़बान की दिलकशी
शगुफ्तगी और ताजगी. आपका कलाम
आपके दिल की आवाज़ है
दर्द है गुदाज़ है
सोज़ है साज़ है
दिल से निकले और दिल में पहुंचे
की खूबसूरत मिसाल है
उसकी गली से गुज़रा तो "चाँद" यह लगा है
वोह ओट से परदे सरका रहा है शायद
चाँद शुक्ला हदियाबादी डेनमार्क

Udan Tashtari said...

तन्हा जीना ऐसे नीरज
ज्यूँ बादल बिन पानी प्यारे


--वाह जी वाह!! बहुत खूब...

२३/२४/२५ को मुम्बई में हूँ..२६ को फ्लाईट है.

फोन जो अभी और उस वक्त मेरे पास ही रहेगा:

९८ २६१ २१४३१

सादर
समीर

अल्पना वर्मा said...

तन्हा जीना ऐसे नीरज
ज्यूँ बादल बिन पानी प्यारे

bahut khuub!

Manish said...

मन अमराई यादें कोयल
जब जी चाहे गाती प्यारे

बहुत सुंदर !

पंकज सुबीर said...

नीरज जी आपके धुंआधार फैनों में एक मेरा नाम भ्‍ीा शामिल कर लें । आप तो ऐसा लगता है कि सारे काफिये निबटा कर ही छोड़ेंगें कि किसी और के लिये कुछ बचे ही नहीं । इस बार भी आपने अच्‍छे प्रयोग किये हैं । अभी कुछ स्‍तंभित हूं अत: कुछ कर नहीं रहा हूं पर शीघ्र ही ब्‍लागिंग में लौटूंगा

Gyandutt Pandey said...

ऐसे सरल तरीके से शब्दों को गूंथ कर तिलस्म पैदा कर देते है‍ आप। किन शब्दों में अपना विस्मय व्यक्त करें!

राकेश खंडेलवाल said...

मन अमराई यादें कोयल

खूबसूरत बिम्ब है.
नव संवत की शुभकामनायें
झील की लहरों पर बिखरता है स्वर्ण
पत्तों पर छा रहा नया नया वर्ण
अँगड़ाई लेते हैं कोयल के गीत
अलगोजे छेड़ रहे मधुरिम संगीत
आँगन में उतर रही सोनहली धूप
संध्या के दर्पण में नया नया रूप
पुरबा की चूनर में मलयज की शान
कलियों के चेहरों पर आई मुस्कान
पगडंडी है लदी हुई गाड़ियों भरी
सरसों की दुल्हन अब पालकी चढ़ी
निशिगंधा खोल रही महकों के द्वार
खुनक भरे मौसम में डूबा घरबार
भरा प्रेम पत्रों से मेंहदी ने हाथ
छत ने की आँगन से मीठी सी बात
ठिठुरन पर आज चढ़ा देखिये बुखार
चैती इस पड़वा ने खड़काया द्वार.
नव संवत की शुभकामनायें

Dr. Chandra Kumar Jain said...

कितनी गज़ब ग़ज़ल कह दी है
सचमुच न्यारी-न्यारी प्यारे
कितनी सहज-सरल कह दी हैं
बातें प्यारी-प्यारी प्यारे
मन खुलना आसां है कितना
देखे दुनिया सारी प्यारे
नीरज का अंदाज़ निराला
सब पर पड़ती भारी प्यारे!

बढ़ाई....बधाई .....बधाई .
आपका
डा. चंद्रकुमार जैन

अमिताभ फौजदार said...

very nice !!

जोशिम said...

हाजिर जनाब -
प्यारे प्यारे से नजारे प्यारे
काफिले आप के सारे प्यारे
- सादर मनीष

नीरज गोस्वामी said...

दिव्या माथुर साहिबा का कमेन्ट जो मुझे मेरे ई मेल पर मिला.
"abhi main aapki - zindagi bhar yaha wahan - mein hi bhatak rahi thi ki aaj ek aur ek naayab tohfa mila
'jad jisne bhi kaati pyaare'
ke roop mein, kitni khari khari baat kartey hain aapbhi ki dil bahalta hi nahin, is duniya mein jeena hai to do hi tareekein ho saktey hain - ek aapka - khara sacha, aur ek mera - bhulaaye apne ko galatfahmiyon mein

shubhkamnayon ke saath
दिव्या"

Dr. Chandra Kumar Jain said...

नीरज जी,
ऊपर मेरी टिप्पणी की अन्तिम
दो पंक्तियाँ संशोधित करना चाहता हूँ .
वो इस तरह की -

नीरज की हर बात निराली
सब पर पड़ती भारी प्यारे .

मित्र गण कृपया सुधार कर पढ़ें.
धन्यवाद .

rakesh said...

तन्हा जीना ऐसे नीरज
ज्यूँ बादल बिन पानी प्यारे

KAYA BHAI KAST SE MARE JA RAHYEN HAIN??

भोला कहने से अच्छा है
देदो मुझको गाली प्यारे

KHUB KAHI AAPNE GALI TO FIR GALI HIN HAIN

JO SOCHA WO HUA JO DEKHA WO DEKHAI PADA.

SARA KUCH ANDAR HAI BAHAR USKA PRATIBIB DIKHAI PADTA HAI. SAJJAN LOGON KO NA TO BURAI DEKHI DETI HAI AUR NA SUNAI PADTI HAI. AANTERMAN KI SAFAI KIJEYE FLUSH KIJYE AUR KACHDA BAHAR KIJEYE

मीनाक्षी said...

ज्ञान जी सही कह रहे हैं... सरल सहज ही आप शब्दों को मुग्ध करके अपना बना लेते हैं.. हमारे पास तारीफ के शब्द ही नही बचते.

Mumukshh Ki Rachanain said...

भाई नीरज जी,
शानदार ग़ज़ल पेश करने के लिए आप बधाई के पात्र हैं, पर उए ग़ज़ल आपके मुख्य विचार "जिंदगी जिन्दादिली का नम है" से मेल नही खाती, अतः मेरी निम्न पंकितियों पर गौर फरमाएं:

यूं हो "भोला" तनहा जीने से अच्छा
ले लो इस बंदूक का ही साथ प्यारे

कल तक जो यूं ही थे तड़पा रहे
वे ही घूमेंगे आगे-पीछे सारे के सारे

खौफ से हमारा सरल जीवन बना कठिन
उसे मिटाने किसी को तो राम बना प्यारे

शेष फिर कभी
आपका अनुज
चंद्र मोहन गुप्ता "मुमुक्षु"

Rohit said...

भोला कहने से अच्छा है
देदो मुझको गाली प्यारे

क्या बोलूं इन लब्ज़ों में क्या
तूने बात सुना दी प्यारे

लाजवाब......

अनुराग अन्वेषी said...

बहुत प्यारी रचना।

महावीर said...

बहुत दिनों के बाद आपकी साईट पर देखा तो एक से एक सुंदर रचनाएं मिलीं। इस छोटी बहर का कमाल भी देखा। सरल और थोड़े शब्दों में ही बहुत कुछ लिख दिया।
बधाई स्वीकारें।

harsh said...

very nice man
ese he galiyan
likhte rahie janabe ali