Friday, November 2, 2007

किसान क्या है






लगातार ग़ज़ल पर ग़ज़ल पोस्ट करते जाने के बाद मैंने सोचा की ये पढने वालों के साथ बहुत बेइन्साफी हो जायेगी.इसलिए कुछ और विषय पर बात की जाए. तो पेश है जायका बदलने को ये पोस्ट.
आप ने ज्ञान चतुर्वेदी जी का नाम जरूर सुना होगा यदि नहीं सुना तो अब सुन लीजिये वो हिन्दी व्यंग के बहुत बड़े हस्ताक्षर हैं. अगर आप ने अभी तक उनको नहीं पढ़ा है तो सच मानिए अपने जीवन के ये वर्ष व्यर्थ ही गवां दिए हैं. ज्ञान जी पेशे से डाक्टर हैं और वो भी दिल के लेकिन उनके काम अपने पेशे से बिल्कुल विपरीत हैं.कोई डाक्टर नहीं चाहता की उसके मरीजों की संख्या मैं इजाफा न हो लेकिन ज्ञान जी के व्यंग लेख पढने के बाद शायद ही किसी को दिल की बिमारी हो.व्यंग और हास्य का ऐसा अद्भुत मिश्रण शरद जोशीजी, परसाई जी, श्रीलाल शुक्लजी और रविद्र नाथ त्यागी जी के बाद देखने को नहीं मिला.
अभी हाल ही मैं जयपुर अपने घर जाना हुआ जहाँ एक पुस्तक मेला लगा हुआ था. वहाँ से ज्ञान जी की लिखी दो पुस्तकें "जो घर फूंके आपना " और "दंगे में मुर्गा "खरीद लाया. दोनों पुस्तकें उनकी विलक्षण व्यंग लेखन प्रतिभा का ज्वलंत प्रमाण हैं. उनकी "दंगे में मुर्गा" की पहली रचना का एक अंश आप को पढ़वाता हूँ जिसमें ज्ञान भाई ने अपने एक वरिष्ट सरकारी मित्र के लिए, जो देश के प्रधान मंत्री को बताना चाहते थे की किसान क्या होता है ये नोट लिख के दिया, बकौल उनके :

"एक वरिष्ट अधिकारी मेरे मित्र हुआ करते हैं उन्होंने मुझसे किसान पर कुछ लिख कर देने को कहा क्यों की वो दिल्ली से बाहर बरसों से नहीं गए थे, और किसान किस चिडिया का नाम है नहीं जानते थे मैंने किसान पर एक परिचय लिख कर दिया :

"किसान क्या है ?
भारतीय किसान एक दोपाया जानवर है, जो प्रथम दृष्टि मैं देखने पर इंसानों से मिलता जुलता दिखाई पड़ता है. इसी कारण से कई नासमझ लोग किसानों को भी इंसान मान लेते हैं तथा चाहते हैं की इनके साथ आदमियों जैसा व्यवहार किया जाए, परन्तु मात्र दो पैरों पर चल लेने से ही कोई इंसान नहीं बन जाता है. कुत्ते भी उचित ट्रेनिंग लेने पर दो पैरों पर चल लेते हैं, जैसा की श्रीमान ने देखा ही होगा. अतः मेरी विनम्र राय में भारतीय किसान भी कुत्ता, भेड़,बकरी, गाय, भैंस आदि की भांति गावों में पाए जाने वाला एक जानवर है. अलबत्ता कुछ मामलों में ये इन पशुओं से भिन्न भी है . उदाहरण के लिए देखें तो गाय थानेदार से नहीं डरती,कुत्ता पटवारी को देख कर दुम नहीं दुबकाता तथा बकरी तहसीलदार को सामने पा कर जमीन पर नहीं लौटती. किसान ऐसा करता है. बल्कि गाय बैल इत्यादी की भीड़ में खड़े किसान को पहचानने का सबसे सटीक तरीका ही ये है इस झुंड के बीच सिपाही, पटवारी, कानूनगो, थानेदार या तहसीलदार को भेज दिया जाए.उसको देख कर किसान की पेशाब निकल जायेगी जबकि बैल इत्यादी की नहीं.कुत्ते गिरदावर या बी.डी.ओ. साहेब से नहीं डरते. कुछ कुत्ते तो थानेदार पर भोंकते हुए पाये गए हैं. पर किसान ने ऐसा कभी नहीं किया. उसने जब जब भी किसी साफ सुथरे, कोट पेंट पहने आदमी को अपने सामने पाया, वो कांपने लगा. किसान ने हर ऐसे ऐरे गेरे को झुक कर नमस्ते की है, जो उसे शाशन के गिरोह का नज़र आया. किसान के इस व्यवहार को छोड़ दें, तो अन्य उल्लेखित जानवरों से वो किसी भी तरह भिन्न नहीं है.किसान भी धूल मैं लौटता है, गंदा पानी पीता है, नंगा घूमता है, डंडे खाता है, और अब तो हमारे सूखा राहत कार्यक्रमों के चलते बकरियों की तरह पेड़ों की पत्तियां तथा छाल आदि भी खाता पाया गया है. इन सारी बातों से स्पष्ट हो जाता है की किसान एक पशु है, ढोर-डंगर है. शायद इसी सोच के तहत बहुत से गावों मैं ढोर-डाक्टर ही इनका इलाज भी करते हैं और ये ठीक भी हो जाते हैं . "

ज्ञान भाई अपना ये लेख यहीं खत्म नहीं करते बल्कि और भी बहुत कुछ बताते चलते हैं, जो में आप को नहीं बता रहा.कारण साफ है की किताब में खरीद के लाया और मजे मुफ्त में आप उठाएं ये कहाँ तक ठीक है? दूसरी बात ये की मैंने उनकी पुस्तक से ये प्रसंग बिना उनकी अनुमति के पोस्ट किया है इसलिए हो सकता है की वो नाराज हो कर व्यंग लेखन ही छोड़ दें
अरे आप निराश न हों एक आध दिन में आप को उनके लेखन की और बानगी भी पेश करूँगा.. इंतज़ार कीजिये.

10 comments:

काकेश said...

चलिये फिर से पढ़ लिया. मैने भी कुछ दिनों पहले "जो घर फूंके" खरीदी थी अभी पढ़ ही रहा हूँ.मैंने भी आज से खोया पानी को छापना शुरु किया है.

बाल किशन said...

बड़े वापाजी ये अच्छा नही किया आपने. ज्ञान भइया,मिश्राजी,पौराणिक जी के पेट पर लात मारने की तयारी शुरू करदी है . खैर जो भी हो हमतो आपके साथ है .पढेंगे,बार बार पढेंगे और मन माफिक टिपण्णी भी करेंगे.
अच्छा लगा और भी छापियेगा.कंजूसी मत कीजिये.

Udan Tashtari said...

ज्ञान जी के लेखन का मैं बहुत समय से मुरीद हूँ. आपने उनकी पुस्तक का अंश पेश कर बहुत अच्छा किया. और लाईये.

बोधिसत्व said...

अब तो जिसकी कोई शान न हो वही किसान है....अच्छी पेश...

Shiv Kumar Mishra said...

नीरज भैया,

आपकी गजलों को पढ़कर कौन अभागा है जो ख़ुद पर ज्यादती समझेगा?....वैसे ज्ञान जी का लेख पढ़कर बहुत बढ़िया लगा...जबरदस्त लिखते हैं ही.

Ranjana said...

Great........

राजीव जैन said...

सर
ज्ञानदत्‍तजी के ब्‍लॉग पर जयपुर के एक अस्‍पताल में थूंकने से बचने का एक उपाय लिखा
अच्‍छा लगा
अब जयपुर से आपके रिश्‍ते पर भी कुछ लिखें तो
जयपुरवासी आपके आभारी रहेंगे

Gyandutt Pandey said...

यह राजीव जैन जी की फरमाइश पूरी कीजिये।

ज्ञान चतुर्वेदी जी की एक किताब हमारे पास भी है। पढ़ी नहीं। अब शुरू करते हैं। वैसे फुटकर रूप में उन्हें बहुत पढते-पसन्द करते रहे हैं।

डॉ.सुभाष भदौरिया. said...

नीरजजी ज्ञान चतुर्वेदी के उपन्यास 1-नरक यात्रा 2-बारहमासी पर एम.ए.2 लघुशोध प्रबंध तैयार कराये हैं.आप नरक यात्रा न पढ़ा हो तो अवश्य पढ़ें.
सरकारी चिकित्सालयों में डॉक्टरों के खेल का चित्रण है.आप अच्छे रचनाकारों से लोगों को वाकिफ़ करा रहे हैं.

Kamlesh Pandey said...

भाई नीरजजी... सलाम है आपको! कितनी मेहनत से आपने कितनी किताबे अपने ब्लॉग पर जुटाईं हैं हमारे लिए. आज ज्ञानजी के वाल पर आपका पोस्ट देख कि 'खोया पानी' भी आपके एजेंडे में है, ये टिपण्णी लिख रहा हूँ. खाकसार ने इस किताब की पांडुलिपि (और लफ्ज़ के व्यंग्य-सम्पादन के दौरान धारावाहिक स्वरूप) को शब्द-शब्द कहता है और रस लिया है.. ज्ञानजी मेरे अग्रज, प्रेरणा-स्त्रोत और डांटने वाले गुरु भी हैं. व्यंग्य कि मेरी दो किताबें प्रकाशित हैं (पर चर्चित नहीं शायद) खैर...
आपके ब्लॉग पर आता रहूँगा. आप लगे रहें.